शैलेंद्र चौहान की कहानियाँ : जिंदगी की गुम त्रासदियों के अक्स

पुस्तक: गंगा से कावेरी
लेखक: शैलेन्द्र चौहान
मूल्य: ₹ 299.00
प्रकाशक: मंथन प्रकाशन, जयपुर

शैलेंद्र चौहान की पहचान ज्यादातर उनकी कविताओं से है। पर वे बड़े अच्छे गद्यकार भी हैं। उनके पास सीधे-सादे, मामूली लफ्जों से बड़ी बात कहने की कूवत और एक सधी हुई भाषा है, जिससे अपेक्षित प्रभाव वे पैदा कर पाते हैं। गद्य की कई विधाओं में उन्होंने लिखा। लेख, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा और आलोचना—सभी को उन्होंने आजमाया, और किसी का अनुकरण किए बगैर अपना एक अलग रास्ता बनाया। शैलेंद्र के अलहदा और विशिष्ट अंदाज के कारण आप उनके गद्य को दूर से पहचान सकते हैं। उनका यह अलग अंदाज कैसा है—इसे बताने के लिए दो शब्द हैं मेरे पास—बेबनाव सादगी। मेरा खयाल है, यह शब्द-युग्म अच्छी तरह से शैलेंद्र और उनके गद्यकार से हमें परचा देता है। बहुतों को यह अचरज भरा लग सकता है कि शैलेंद्र चौहान के यथार्थपरक गद्य की ताकत को मैंने पहलेपहल उनकी कविताओं में गहरे झाँककर देखा था। उनकी कविताएँ कविता तो हैं, पर इसके साथ ही हमारे आसपास की जिंदगी के दर्द को बहुत कम अल्फाज में कह पाने की सामर्थ्य वाले गद्य को भी आप वहाँ आकार लेते देखते हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ कहीं-कहीं मुझे जिंदगी की असल डायरी या नोटबुक सरीखी लगती हैं। इसके बावजूद उनकी कविताई कहीं दबती नहीं है।

प्रकाश मनु
शैलेंद्र के कविता संग्रह ‘नौ रुपए बीस पैसे के लिए’ की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई, लेकिन यह यकीनन चर्चा के काबिल संग्रह था, जिसे आसानी से भुला दिया गया। समकालीन कविता के बार-बार दोहराए जाने वाले बहुचर्चित और बड़े नामों के पीछे भागती आलोचना के लिए यह कोई दर्ज करने लायक संग्रह न था। यों भी इस हुल्लड़बाजी और आपाधापी की दुनिया में भला ‘नौ रुपए बीस पैसे’ की किसी की मर्मांतक मजबूरी को याद रखने और उसे कविता में टाँक देने वाले कवि को पूरी संजीदगी से पढ़ने की किसे फुर्सत है?

गंगा से कावेरी शैलेंद्र चौहान का दूसरा कहानी-संग्रह है, जिसमें उनकी बारह कहानियाँ शामिल हैं। लेकिन जैसा कि इसके शीर्षक से ही संकेत मिलने लगता है, ये कहानियाँ कोई कहानियों जैसी कहानियाँ हीं हैं। कहानी के किसी खास ढाँचे को जेहन में रखकर इन्हें पढ़ने वालों को तो सकता है, थोड़ी निराशा भी है। लेकिन कहानीकार की मूल प्रतिज्ञा इन्हें कटे-सँवरे या तराशे हुए रूप में सामने रखकर पाठकों को कथा-रस में सराबोर करना शायद रहा ही नहीं। शैलेंद्र अपनी कहानियों में अपनी गुम चोटों और अपने आसपास और परिवेश की टूट-फूट और छूटती जा रही जगहों को दिखाना कहीं ज्यादा जरूरी समझते हैं। इधर के बरसों में हमारी सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि हमारे आसपास लोग गुम होने लगे हैं और संख्याएँ बढ़ती जा रही हैं। यही बात साहित्य की दुनिया, खासकर कहानियों में भी हुई है। शायद यही वजह है कि शैलेंद्र चौहान जैसा कोई लेखक ‘कहानियों जैसी कहानियाँ’ न लिखने की प्रतिज्ञा के साथ कहानियाँ लिखता है। और ऐसी कहानियाँ लिखकर दिखा देता है, जिसमें जीवन के यथार्थ की सीधी धमक है, और अगर आप एक सहृदय लेखक या पाठक हैं, तो उसे नजरअंदाज कतई नहीं कर सकते। उनका सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वे पूरी तरह उनके अनुभवों की कहानियाँ हैं जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं। साथ ही उनकी किसी भी कहानी को पढ़कर, फिर चाहे वह ‘दादी’ जैसी पारिवारिक कथा हो या ‘एक और ऋतुचक्र’ जैसी प्रेमकथा या ‘भूमिका’ जैसी जझारू तेवर वाली कहानी—पहले से पढ़ी हुई किसी भी और कहानी की याद आना मुश्किल है। यानी शैलेंद्र की कहानियाँ पूरी तरह उनके अपने रंग-ढंग और अहसास की कहानियाँ हैं। किसी-किसी को ये बहुत उखड़ी-उखड़ी और अटपटी कहानियाँ भी लग सकती हैं।...तो भी ये यकीनन एक भिन्न कथात्मक अनुभव की और ध्यान खींचने वाली कहानियाँ हैं जो हिंदी कहानी के कैनवास में एक नई पाँत के बनने की संभावना जरूर व्यक्त करती हैं। और फिर उनमें जिंदगी के जिन हालात और चरित्रों के अक्स उभरकर आए हैं, उनकी प्रामाणिकता से इनकार तो आप कर ही नहीं सकते। उसका गहरा प्रभाव दिल पर पड़ता ही है, और हमें शैलेंद्र ऐसे क्षणों में किसी संवेदनशील गाइड की तरह जिंदगी के कुछ अनजान रास्तों, गलियों और चौरस्तों पर ले जाते नजर आते हैं। उनके साथ यह संवेदनात्मक यात्रा हमारे अनुभवों में बहुत कुछ नया जोड़ती है।

संग्रह की कहानी ‘दादी’ शायद शैलेंद्र की सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली कहानी है। यह दादी की सहज और गौरवूपर्ण उपस्थिति के कारण तो आकर्षक है ही, साथ ही दादी और पोते के बीच बदल गई दुनिया को नापने के लिए ‘बेरोमीटर’ भी है। यह एक सादा, लेकिन बगैर कुछ कहे भीतर तक थरथरा देने वाली कहानी है। ऐसी कहानी जिसमें घटना-क्रम बहुत संक्षिप्त है। कथानायक को किसी सम्मेलन में भाग लेने के लिए अलीगढ़ जाना है। मैनपुरी से अलीगढ़ जाने के लिए टिकट के पैसे उसके पास नहीं हैं, तो वह दादी को चश्मा बनवाने का लोभ देकर साथ ले जाता है। लेकिन वहाँ दादी के कष्ट और सम्मेलन की व्यस्तताओं के बीच जो टकराहट होती है, वह कहानी को सहज ही यथार्थ के एक तीखे ‘नाटक’ में बदल देती है। पोता सम्मेलन और दादी के बीच भटकता रहता है और लौटकर दादी अपने कष्टों का बयान करती है तो मारे गुस्से के फट पड़ता है। लेकिन डाक्टरनी के वैभव का वर्णन करते-करते दादी अपनी ग्राम्य बुद्धि से चुपके से यह बता ही जाती है कि उसके पोते का रास्ता भी कहीं न कहीं उसी वैभव से होकर जाता है। पोता यानी कथानायक सीधे-सीधे इस बात को स्वीकार तो नहीं करता, पर यह उसे जरूर पता चल जाता है कि उस सीधी-सादी अनपढ़ दादी ने उसके ‘प्रगतिवाद’ की धज्जियाँ जरूर उड़ा दी हैं।
दादी को लेकर हिंदी में तमाम कहानियाँ लिखी गई हैं, पर जाहिर है शैलेंद्र चौहान ने दादी को जिस विडंबना के बीच उकेरा है, वह उनकी ‘दादी’ को एक कतई अलग ढंग की कहानी में बदल देता है। गंगा से कावेरी तक’ एक रेलयात्रा के ‘भोगे हुए सच’ का वर्णन है, जिसमें बाहरी कुरुपता और छि:-छि: के साथ एक भीतरी भाव-अभाव यात्रा भी लगातार चलती रहती है, जिसमें एक अजीब सी भावनात्मक खालिश बार-बार उभरती है। कथानायक इस अनकही खालिश को भूलने के लिए रास्ते में हंसराज रहबर का जो उपन्यास खरीदता है, उससे वह खलिश और उसके सवाल और उग्र हो जाते हैं और रेलयात्रा के साथ-साथ बाहर से भीतर और भीतर से बाहर आने-जाने की यह समांतर यात्रा जारी रहती है। लेकिन कहानी में यथास्थिति का वर्णन एक अतिरेक की सीमा तक पहुँच गया है, जिससे कहानी कुछ दब सी गई है।

संग्रह की दो लंबी और महत्त्वाकांक्षी कहानियाँ हैं, ‘मोहरे’ और ‘भूमिका’। इनमें ‘मोहरे’ लोकल राजनीति की चालों-कुचालों और तरह-तरह के दाँव-पेचों के बीच से गुजरकर आगे बढ़ती है। जैसा कि आम तौर से होता है, दो गुट हैं और उनका होना किसी भी और चीज से ज्यादा स्वार्थों के गठजोड़ से ज्यादा प्रभावित है। थोड़े स्वार्थ इधर-उधर खिसकाकर और थोड़ी ले-दे के बाद एक अध्यापक का चुनाव में खड़ा होना उस बासी माहौल में ताजा हवा के झोंके की तरह महसूस होता है। कुछ उम्मीदें बँधती हैं, कुछ नई गोटें बिछाई जाती हैं और अंतत: बढ़ते हुए दबाव के बीच अध्यापक के कदम पीछे हटने लगते हैं। कहानी का अंत एक नवयुवक के गुस्से से होता है, जो इस पूरे परिदृश्य पर थूककर एक तरफ चला जाता है। यह लोकल राजनीति की तमाम तिकड़मों को परत-दर-परत खोलने वाली एक अच्छी कहानी है।

‘भूमिका’ भी लंबी कहानी है और ‘दादी’ के बाद शायद इस संग्रह की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और ध्यान आकर्षित करने वाली कहानी है। इसमें कथानायक एक कंपनी में अफसर हैं, लेकिन उसकी सहानुभूति गरीब कामगारों और संघर्षशील शक्तियों के साथ हैं। लिहाजा उसका झगड़ा ज्यादातर उन अफसरों से ही होता है जो कामगरों को नफरत की आँख से देखते हैं और उनके हितों के विरूद्ध काम करने में जिनका बड़प्पन प्रकट होता है। कहानी में शुरू से आखिर तक एक लगातार गहाराता हुआ तनाव है, और तनाव पैदा करने वाली स्थितियाँ इस कदर विश्वसनीय और ‘असली’ है कि बहुत बार लगता है, हम कहानी नहीं पढ़ रहे, किसी अंतहीन लड़ाई के मोरचे पर सीधे-सीधे उतार दिए गए हैं। बस, फर्क यह है कि यह लड़ाई कभी शीतयुद्ध में बदलती है तो कभी सीधे-सीधे मारपीट की शक्ल ले लेती है। अलबत्ता कथानायक एक छिपे हुए कायराना हमले में चोटिल होता है और इस हालत में चारपाई पर पड़े-पड़े भी, वह मजदूरों के साथ जुड़ा उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है। लेकिन अंत में षड्यंत्र का सबसे बदसूरत रूप सामने आता है। कथानायक का चुपचाप तबादला कर दिया जाता है। मजदूर दुखी हैं, हताश हैं और कहानी के अंत में इस ‘त्रासदी’ के सन्नाटे को हम एक शोकधुन की तरह सुन पाते हैं। मेरे खयाल से, ‘भूमिका’ को शैलेंद्र की सर्वाधिक प्रतिनिधि कहानी कहा जाना चाहिए।

इस संग्रह में शैलेन्द्र की दो बहुत सशक्त कहानियां शामिल हैं- हम भीख नहीं मांगते और संप्रति अपौरुषेय। हम भीख नहीं मांगते उन्नीस सौ चौरासी के दंगों पर आधारित कहानी है जिसमें दंगों से प्रभावित एक सिख परिवार पर हुए हमले का सचमुच हिला देने वाला वर्णन है जो किसी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती है। संप्रति अपौरुषेय एक सरकारी सार्वजनिक उपक्रम में पदस्थ भ्रष्ट परपीड़क मैनेजर और उसके मातहत इंजीनियर के तनावपूर्ण संबंधों की कथा है। यहां उस उपक्रम के आंतरिक माहौल का वास्तविक और प्रभावी वर्णन है और उसके ढांचे में व्याप्त शोषण और अन्यायपूर्ण स्थितियों को पूरी तरह खोलकर रख दिया गया है।

शैलेंद्र का कहानी कहने का ढंग कभी-कभी अमरकांत की याद दिलाता है। क्योंकि वे भी बड़ी घटनाओं या नाटकीय वृतांतों के बजाय छोटे-छोटे ब्योरों से बड़ा काम लेते दिखाई देते हैं। लेकिन इस कला को अभी उन्हें निखारना होगा।

हालाँकि शैलेंद्र की कहानियाँ ‘कला’ के स्तर पर चाहे जैसी भी हों, उनकी ‘अनुभवों की विश्वसनीयता’ को नजरअंदाज करना मुश्किल है। फिर उनकी एक शक्ति यह भी है कि अपने अनुभव पर भरोसा करके वे उसे कहानी की शक्ल में कहते हैं, ‘कहानी जैसी कहानी’ बनाते नहीं है। इससे कहानी में और चाहे जो भी कमियाँ आती हों, पर शैलेंद्र की कहानी पूरी तरह शैलेंद्र की कहानी लगती है।
***

प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: + 91 981 060 2327
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।