कहानी: कर्मयोगी

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com

पुरी के चंद्रभागा समुद्र-तट पर घूमते हुए नब्बे वर्षीय प्रोफेसर शिवदयाल सिंह ‘शिवदीप’ ने दूर से एकदम सादे लिबास में एक अधेड़-युवा को देखा तो सहसा उन्हें लगा कि उसे कहीं देखा है। दूर से देखने पर भी उसके चेहरे की चमक को साफ-साफ देखा जा सकता था। उस अधेड़-युवा के शरीर पर वस्त्र के नाम पर केवल खादी की एक चकचक धुली धोती थी, जिसे उसने आधी पहन रखी थी और आधी को शरीर पर लपेट रखा था। प्रोफेसर सिंह ने जब करीब से देखा तो उन्हें लगा कि अरे, यह तो शीतलचंद्र है। शीतलचंद्र राय जो कभी उनके कॉलेज के अध्यापकीय जीवन में उनका प्रिय शिष्य हुआ करता था। गुरु की अनुभवी नजरें धोखा नहीं खा सकती थी। फिर भी, वे पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। किसी अज्ञात प्रेरणा से प्रोफेसर सिंह के मुख से निकल पड़ा- शीतलचंद्र। इस अनजान स्थल पर अपना नाम सुन कर शीतल चौंक उठा। पीछे मुड़कर देखा तो ऋषितुल्य गुरुदेव सामने थे। उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि गुरुदेव उसके इतने निकट हैं। एक क्षण के लिए उसे लगा जैसे उसके शरीर पर अमृत-वर्षा हो रही है और वह अमृत स्नान कर रहा है। खैर, उसने खुद को संयत किया। गुरु के पाँव छुए और पास ही एक झोपड़ीनुमा चाय की दुकान के एक कोने में लगी बेंच पर बैठ गए। गुरु ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपनी आपबीती में खो गए। कब दिन बीता और कब सांझ हुई। चायवाले ने सांझ की बत्ती जलाई तो तंद्रा भंग हुई।
सांझ के समय ढेर सारी स्त्रियां, पुरुष-बच्चे-बूढ़े चंद्रभागा के समुद्र तट की बालुका-राशि पर टहल रहे थे। पूर्णिमा का दूधिया चांद उग आया था। चतुर्दिक चारु-चंद्र की चंचल किरणें जल-थल में खेल रही थी। दूधिया रोशनी में घंटे भर पहले बालू के ढेर पर उकेरी गयी बालू से बनी मोहक मूर्तियां और समुद्र में चांदी-सा चमकता निर्मल जल अपनी भव्यता की गाथा बयां कर रहा था। पर्यटकों को यहां की रेतीली-राशि पर घूमते हुए सुहाने मौसम के कारण आनंद की अनुभूति हो रही थी। सामने अरब सागर लगातार दहाड़े़ं मार रहा था। लहरें जितनी तेजी से सागर-तट पर आ रही थीं, उतनी ही तेजी से वापस भी लौट रही थीं। शीतलचंद्र को सागर तट के इस हलचल भरे माहौल में एक अजीब-सी पर, खुशनुमा अनुभूति हो रही थी। उसकी विशालता और आती-जाती लहरों की संगीतमय ध्वनि ने उसे मोहित कर रखा था। गुरुवर ने शीतल के मनोभावों को ताड़कर कहा- बेटे! सागर में लहरों का बनना और फिर रेत किनारे पहुँच कर उसका मिट जाना मनुष्य को एक महत्वपूर्ण संदेश दे जाता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। लहरों का बनना और मिट जाना तय है, चाहे लहरें कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हों ? देख रहे हो न! ये वही लहरें है जो सागर के गर्भ से निकलकर अलग होने के लिए दौड़ रही हैं और अंततः तट तक आकर मिट जा रही हैं। यही इसकी नियति है। इतना कहते-कहते गुरुदेव दार्शनिक मुद्रा में आ गए। कहने लगे मनुष्य की नियति भी तो यही है। मनुष्य इन्हीं लहरों की तरह जीवन-पर्यंत आपा-धापी की दौड़ में शामिल रहता है। वह सृष्टि का अंश होते हुए भी स्वयं को ताकतवर समझता है और अंततः लहर की तरह समाप्त हो जाता है। मनुष्य को इस तरह सृष्टि का अंश होकर जीने में जीवन का सुख मिलता है। शीतल गुरुवर की गंभीर बातें सुनता रहा और कब अतीत में खो गया, उसे मालूम नहीं।
चार दशक पूर्व के कॉलेज के वे दिन शीतलचंद्र को ठीक से याद हैं और स्मृतियों के घरौंदे में चक्कर काटने लगे हैं। गुरुवर की उस पर विशेष कृपा-दृष्टि रही है। कॉलेज के अन्य शिक्षक भी उसे बेपनाह प्यार करते थे। इसका एकमात्र कारण उसकी मेधा थी। किंतु, एक दुर्भाग्य हमेशा उसके साथ रही और वह थी उसकी गरीबी, जो संगी-साथी की तरह अध्ययनकाल तक उसके साथ चिपटी रही। गरीबी उसने बहुत नजदीक से देखी थी और अक्सर दो-दो हाथ भी किया था। कॉलेज का पूरा सत्र उसने एक पैंट-शर्ट में ही बिताया था और सर्दी के दिनों में सर्दी को मुट्ठी में कैद करके जिया था। उसके अमीर सहपाठी उसकी गरीबी का मजाक भी उड़ाते थे। उस मजाक को वह हँसी में उड़ा देता था। उसने मुसीबतों से कभी हार नहीं मानी और ना ही हीन-भावना का कभी शिकार हुआ। पढ़ाई में धुन का पक्का और इरादों से दृढ़ शीतल उन दिनों संघर्षशील मानस का जीता-जागता दृष्टांत था। उसकी तेजस्विता के कायल उसके शिक्षकों में भारत के भविष्य का युवा नजर आ़ता था। उन्हें विश्वास था कि शीतल अपनी मेधा, कर्म और सोच से मानवता के लिए अपनी शक्ति का सदुपयोग करेगा। अभावों ने शीतल को परिपक्व बना दिया था। सोच में ठहराव, विचारों में उदारता के साथ-साथ भविष्य के प्रति नयी किरण उसके शिक्षकों को उसमें दिखने लगी थी। शीतल की दिनचर्या और कार्य-शैली से कॉलेज-परिवार के सदस्यों को यह आभास हो गया था कि इसका भविष्य क्या होनेवाला है ? आज दशकों बाद शीतल ने अपने गुरु को नब्बे वर्ष की अवस्था में स्वस्थ देखा तो उसका मन प्रफुल्लित हो गया। अभी भी उम्र का कोई दबाव गुरुदेव पर नहीं था। पंजों के बल जब वे चलते तो नसें चट-चट बोलती थीं। उन्हें देखकर किसी के लिए भी यह अनुमान लगाना कठिन था कि वे नब्बे वसंत देख चुके हैं। मानों, उम्र की जवां-डोर उन्होंने थाम ली थी। तन-मन दोनों से वे अभी भी युवा जैसे थे। शीतल ने देखा कि डेग भरते हुए उनके कदमों की चाप जब जमीन पर पड़ती है तो धूल-मिट्टी उड़ने लगती है। कसरती बदन था उनका। सुबह उठकर जबतक वे सौ दंड-बैठक नहीं कर लेते थे, पानी का एक घूँट नहीं पीते थे। घर में दूध-दही-घी की कोई कमी नहीं थी। इसलिए शरीर बलिष्ठ था। आभा से आभासित उनका मुख-मंडल सूरज के तेज की तरह चमकता था। शरद की शीतल चांदनी हो या ग्रीष्म की लू वे खुले शरीर चल सकते थे। गठीले शरीर में झुर्रियां अभी तक आयी नहीं थी। वे सच्चे कर्मयोगी जो थे। ज्ञान और कर्म का अद्भुत संयोजन था उनमें। प्रायः अपने छात्रों को कहा करते थे कि ज्ञान बीज है और कर्म ज्ञान-रूपी बीज को अंकुरित करने का धर्म है। जैसे कोई बीज जब धरती में रहता है तो सूरज का ताप और जल का संयोग पाकर वह अंकुरित होता है और समय के अंतराल में फल देता है। उन्होंने समझाया था कि केवल कर्म का फल होता तो संसार में जितने मजदूर हैं, वे सभी लखपति या करोड़पति होते। किंतु, केवल कर्म के कारण उन्हें शून्य फल मिलता है। कर्मफल की अपेक्षा ज्ञान का फल विशेष होता है। ज्ञान और कर्म का योग हो जाये तो वह अति उत्तम होता है। जो व्यक्ति कर्म के साथ ज्ञान का संयोजन कर लेता है समय के साथ वह मिल का, किस बड़ी फैक्ट्री या कम्पनी का  स्वामी हो जाता है, जैसे- धीरू भाई अंबानी। गुरुदेव की इस टिप्पणी से शीतल के चेहरे पर गजब की चमक आ गयी थी। उसने मन ही मन ठान लिया था कि वह गुरु के इस आर्ष-वाक्य की साधना करेगा।
पुरी के इस छोटे-से प्रवास से लौटकर गुरुदेव शीतलचंद्र के विकास भारती आश्रम के एक कमरे में ही ठहरे। गुरुदेव के मन में इच्छा हुई कि वह पूछ लें कि शीतल तुममें यह परिवर्तन कैसे हुआ ? और, उन्होंने पूछ भी लिया। शीतल ने बताया कि पढ़ाई समाप्त करने के बाद उसमें नौकरी की अपेक्षा राष्ट्र-सेवा की भावना बलवती हुई और इसके बाद वह अपने कुछ राजनीतिक मित्रों के संपर्क में आया। राष्ट्र-सेवा की धुन में एक यात्रा शुरु हुई। इसी क्रम में मुझे अपने कुछ मित्रों के साथ झारखण्ड के इस सुदूर अंचल में आने का सुअवसर मिला। यों तो हमारे लिए यह एक पर्यटन कार्यक्रम था। नेतरहाट की वादियों में घूमते हुए हम उसकी तलहटी में घने जंगलों के बीच बसे एक गाँव में गए। वहां के निवासियों में अधिकांश आदिवासी ही थे, जिनकी दीन-दशा देखी तो मन भर आया। अपने साथियों के साथ मैंने उन आदिवासियों के कुछ फोटो लिए। यहीं मेरे साथ एक ऐसी हृदय-स्पर्शी घटना घटी जिसने मेरे जीवन को एक नया मकसद, एक नया मोड़ दे दिया। इतना कहकर शीतल चुप हो गया। गुरुदेव शांत-भाव से शीतल की बात सुन रहे थे। शीतल के अचानक चुप हो जाने पर बोले- वह कौन-सी घटना थी, जिसने तुम्हारे जीवन में इतना आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया। केवल एक खादी की धोती और तुम ?
शीतल ने नम आँखों से कहा- गुरुदेव! हम जिस ग्रामीण अंचल में गए थे, वह पूरा अंचल मीलों तक जंगलों-पहाड़ों से घिरा सीधे-सादे लोगों का था। उसमें अधिकांश आबादी उराँव, मुण्डा, हो, बिरजिया जैसे जनजातीय समुदायों की थी और शेष गैर आदिवासी थे, जिन्हें यहां की बोली में सदान कहा जाता है। यह इतना निर्धन क्षेत्र था और इतनी गरीबी थी कि किसी के तन पर पूरे वस्त्र नहीं थे। महिलाएँ एक ही साड़ी को लपेटकर अपनी आबरू बचाने के लिए विवश थीं। पुरुष भी लंगोटीनुमा आधी धोती से वस्त्र के नाम पर अपना तन ढँक लेते थे। बच्चे तो नंग-धड़ंग थे ही। दूर दस-बीस किलोमीटर तक कोई विद्यालय नहीं था। गुरुदेव, यहां आदिवासियों और सदानों के पास जड़ी-बूटियों का पारंपरिक ज्ञान तो बहुत था, पर आधुनिक शिक्षा की कमी थी। ज्ञान और कर्म के बीच तालमेल का अभाव था। मैं यह देखकर अनमना-सा था और मेरे साथी लगातार उनकी तस्वीरें ले रहे थे। इसी बीच एक अधेड़ आदिवासी स्त्री ने अपनी ‘सादरी’ भाषा में कहा था- ‘ई मन अइथुन। मोय संग फोटो खिंचवइथुन और भुलाई के चल जईथुन।’ उस निर्मल-हृदय आदिवासी स्त्री के इस चुभते हुए वाक्य ने मेरे अंतर के तार को विदीर्ण कर दिया था। उस समय तो मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। पर, मन के किसी एक कोने में समुद्र के ज्वार-भाटों की तरह हलचल-सा मच गया था। आपके द्वारा अक्सर कही गयी ये बातें कि ‘शिक्षा पाना सबका मौलिक अधिकार है और यह भी कि ज्ञान और कर्म’ का संतुलन ही सफलता का बीज मंत्र है’ ने मेरे इस हलचल को और गति दे दी थी। मैं लगभग बेचैन हो गया था। समुद्र में लहरें जैसे उफान मारती हैं, कुछ वैसा ही उफान मेरे भीतर भी अहर्निश उठ रहा था। मैंने अनुभव किया कि पारंपरिक ज्ञान और कर्म के ये धनी हैं। बस, ज्ञान और कर्म में संतुलन की कमी है। तब, मैंने निश्चय किया कि मैं इसी वन-प्रांत में रहकर यहां के लोगों के बीच शिक्षा, ज्ञान और कर्म के संतुलन का बीज-मंत्र बांटने की कोशिश करूँगा। मेरे इस निर्णय को मेरे साथियों ने सुना तो वे सन्न रह गए। मुझे बहुत समझाने की कोशिश की गयी। रमेश ने कहा था- शीतल! तुम तो राष्ट्र की सेवा का मिशन लेकर चले थे। ये क्या हो गया तुम्हें ? तुम्हारा वह राष्ट्र-प्रेम कहां गया ?
सुधीर का कहना था- दो दिन में ही भावनाओं का ज्वार ठंढा पड़ जायेगा। 
बचपन का सहपाठी रहा प्रणव ने भी मुझे बहुत समझाने की कोशिश की पर मैं अपने निर्णय पर अडिग रहा। तब, सभी ने एक स्वर में खीझकर कहा था- हम जिस राष्ट्र-सेवा का मिशन लेकर चले थे, शीतल ने उसे यहीं स्थगित कर दिया।
गुरुदेव बोले- फिर, तुमने उन सबको क्या प्रत्युत्तर दिया शीतल। 
शीतल ने कहा- गुरुदेव! मैंने उन सबसे कहा- मित्रो, हो सकता है कि बीते दिनों का मेरा राष्ट्र-प्रेम और राष्ट्र-सेवा की मेरी भावनाएँ मेरे युवा-मन का जोश हो। किंतु, केवल युवा-मन का जोश राष्ट्र-सेवा या राष्ट्र-प्रेम नहीं है। मजदूर जो रात-दिन श्रम करता है। किसान धूप और बारिश में हल चलाता है, अन्न उगाता है। वह शिक्षक जो पूरी निष्ठा और ईमानदारी से देश के बच्चों को सभ्य और सुसंस्कृत नागरिक बनने की शिक्षा देता है। वह इंजीनियर जो देश के लिए मजबूत आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) तैयार करता है। वह सिपाही जो सीमा पर शून्य तापमान में भी देश के लिए सीना ताने खड़ा रहता है। वह चिकित्सक जो दिन हो या रात बीमारजनों की सेवा करता है। और तो और वे लोग जो अपना घर-परिवार छोड़कर विदेशों में श्रम करके देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाते हैं, जिस पर हमारी वैश्विक अर्थ-व्यवस्था टिकी रहती है- सबके सब राष्ट्र-सेवा या राष्ट्र-प्रेम के ही तो प्रतिरूप हैं। हम किसी भी रूप में देश की समृद्धि, उसकी अखंडता और विश्व-समुदाय के बीच राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए काम करते हैं, वह हमारी राष्ट्र-सेवा और राष्ट्र-प्रेम ही है। गुरुदेव, मेरे इन तर्कों ने उन्हें सवाल-जवाब या बहस-विमर्श से रोक दिया था। दो-एक दिनों के बाद वे सभी एक-एक कर चले गए।
शीतल कहता गया- गुरुदेव, एक बार लक्ष्य तय हो जाने के बाद मैं महीनों यहां के गाँवों, खेतों और बियावान जंगलों में भटकता रहा। चाहता था कि यहां के जन-जीवन में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो। गाँव की किनारी पर फूस की झोपड़ी को मैंने आश्रम का रूप दिया। छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा देने की व्यवस्था की और अपने मिशन में आगे बढ़ गया। आश्रम को नाम दिया- विकास भारती। विकास भारती से तात्पर्य था- इस अंचल की सम्यक प्रगति और शिक्षा में भागीदारी। अंध-विश्वासों और प्राचीन रूढ़ियों वाले इस क्षेत्र के लोगों ने शुरु-शुरु में संदेह की दृष्टि से भी मुझे देखा। संदेह निवारण के लिए मैंने स्वयं आदिवासी रहन-सहन और जीवन-शैली अपनानी शुरु की। कुछ अपनी बात कहता, कुछ उनकी सुनता। इसी क्रम में मैंने उनकी बोली सीखी और उनसे उन्हीं की बोली में संवाद भी करने लगा। धीरे-धीरे संदेह के बादल छँटने लगे तो कुछ बच्चे आश्रम में पढ़ने के लिए आने लगे। महीना बीतते-बीतते आश्रम में बच्चों की किलकारियां गूँजने लगी और आश्रम नन्हें-नन्हें फूलों की महक से भर उठा।
बच्चों में आधुनिक शिक्षा देने की मेरी कोशिश, मेरे जुनून और समर्पण भाव से पहलीबार इस क्षेत्र के जनजातीय समुदाय के शंकरदेव टोप्पो प्रभावित हुए। शंकरदेव उच्च शिक्षित तो थे ही कवि और रचनाकार भी थे। उनकी कविताएँ और कहानियाँ देश की नामचीन पत्रिकाओं में छप चुकी थीं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित उनके लोकगीत और लोक कथाएँ जनमानस में काफी लोकप्रिय थीं। शंकरदेव के सहयोग से मुझे आश्रम को स्थापित करने और जनजातीय समुदाय से घुलने-मिलने में काफी सहायता मिली। पूरे जनजातीय क्षेत्र में शंकरदेव की अपनी पहचान और विशेष प्रतिष्ठा थी। शंकरदेव का मानना था कि जनजातीय समुदाय की प्रगति के लिए आधुनिक शिक्षा का होना जरूरी है। उनका मेरे इस आश्रम से जुड़ने में आश्रम की शिक्षा नीति का एक अहम रोल था। उन्होंने अनुभव कर लिया था कि आंशिक ही सही पर विकास भारती आश्रम अशिक्षित आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने में अपनी महती भूमिका निभा रहा है। शंकरदेव भी तो आदिवासी बच्चों में शिक्षा की लौ जगाना चाहते थे। अपने आदिवासी भाई-बहनों में शिक्षा का अभाव देखकर उन्हें दुःख होता था। बस क्या था ? आदिवासी बच्चों में शिक्षा की लौ जले, वे मेरे आश्रम विकास भारती की शिक्षा की मुहिम में शामिल हो गए।
उन्हीं दिनों इसी आदिवासी अंचल के प्रखंड कार्यालय में राजेन्द्र जी प्रखण्ड विकास पदाधिकारी बनकर आये। राजेन्द्र जी भी शंकरदेव की तरह चाहते थे कि इस आदिवासी अंचल का सम्यक् विकास हो। विकास भारती का नाम अबतक अंचल और सरकारी महकमों में फैल चुका था। राजेन्द्र जी ने विकास भारती के संबंध में कई लोगों से सुना तो मुझसे मिलने चले आये। मैंने उनसे आदिवासी बच्चों के सम्यक् विकास के लिए सहायता मांगी तो उन्होंने हद से बढ़कर सहायता देने का आश्वासन दिया। सरकारी योजनाओं को चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, कृषि या चिकित्सा का क्षेत्र हो विकास भारती आश्रम के माध्यम से उन्होंने काफी आगे बढ़ाया। बच्चों की कापी-किताब से लेकर खेती-किसानी की हर जरूरत को उन्होंने सरकारी स्तर से मुहैया कराया। शीतल और गुरुदेव के बीच का यह संवाद खत्म होते-होते आधी रात बीत चुकी थी। गुरुदेव ने आखिरी सवाल किया- शीतलचंद्र राय से शीतल भगत का यह नया बाना तुमने क्यों और किस कारण धारण किया ? शीतल ने कहा- गुरुदेव, इसकी भी एक अलग कहानी है। अब शीतल भगत के रूप में मेरा पुनर्जन्म हुआ है। इस पूरे इलाके में मैं इसी नाम से जाना जाता हूँ। गुरुदेव ने फिर पूछा- वह कैसे ?
गुरुदेव की इच्छा जानकर शीतल कहता चला गया। यह आदिवासी अंचल वास्तव में देवभूमि है। यहां के टाना भगत इस देवभूमि के सच्चे प्रतिनिधि हैं। आप जब टाना भगतों से मिलेंगे तो उनमें आज भी देवरूप दिखाई पड़ेगा। टाना भगत के सूत्रधार जतरा टाना भगत थे, जिन्होंने अंचल के विकास की एक नयी कल्पना की थी और अपनी कल्पना को मूर्त करने की पूरी कोशिश की थी। उनके लक्ष्य थे- प्रकृति की पूजा, मानवता का विकास और राष्ट्र की स्वाधीनता। जतरा भगत वैष्णव विचारधारा के तहत समाज सुधार, अपनी संस्कृति और राष्ट्र की सुरक्षा-संरक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित थे। उन्होंने अपने समुदाय को सत्य, अहिंसा, त्याग का महामंत्र दिया था। अपने उस महामंत्र से उन्होंने पूरे अंचल को राष्ट्रीय आजादी और प्राणीमात्र की रक्षा से जोड़ दिया था। इसी क्रम में वे गांधी जी के राष्ट्रीय आंदोलन, सत्य, अहिंसा और डाॅ॰ अंबेडकर की शिक्षा की नीति से जुड़े। इन दोनों महापुरुषों के आंदोलन से जुड़कर वे अंग्रेजी शासन का शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से प्रतिरोध करते रहे। गांधीजी के खादी से प्रभावित वे खादीमय हो गए, तिरंगा उनका पूज्य और डाॅ॰ अंबेडकर की शिक्षा और मानवता की रक्षा उनका अमोघ अस्त्र हो गया। यहां के टाना भगतों का इतिहास बहुत ही बहादुरी का रहा है और आज भी वे सादगी के प्रतीक हैं। गुरुदेव! जतरा टाना भगत की सादगी, अहिंसा की नीति, शिक्षा का प्रसार और मानवता की सेवा से प्रेरित होकर ही मैंने यह बाना धारण किया है तथा अपने नाम के आगे ‘भगत’ जैसे पवित्र शब्द को शामिल कर लिया है। शीतल ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा- गुरुदेव, यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिस आदिवासी समुदाय को तथाकथित सभ्य समाज जंगली, बर्बर, अज्ञानी और न जाने क्या-क्या कहता है, उसकी संस्कृति में, परंपरा में कितना ज्ञान छिपा हुआ है। हमने अपनी हेठी में उनकी संस्कृति के बारे में गलत धारणा बना रखी है। सच तो यह है कि वे भले ही आधुनिक शिक्षा से दूर हैं, पर उनकी मानवीयता, ईमानदारी और राष्ट्र-प्रेमी होने में कोई संदेह नहीं है। उन्हें प्रकृति से उतना ही लेना पसंद है, जितना समुदाय को जरूरत है। प्रकृति का नाहक दोहन उन्हें पसंद नहीं है। पर्यावरण की शुचिता के लिए यह उनका दाय है। कहते-कहते शीतल गंभीर हो गया।
गुरुदेव शांत-मन शीतल के चढ़ते-गिरते मनोभावों को देखते रहे। उन्हें अपने शिष्य पर आज गर्व हो रहा था। अंतर्मन से उन्होंने शीतल को आशीर्वाद दिया। गुरुदेव को लगा कि उनकी दी हुई शिक्षा अब शीतल भगत के रूप में फलीभूत होने लगी है और शीतल भगत के रूप में एक और कर्मयोगी का अभ्युदय हुआ है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।