‘साहित्य और दर्शन का अद्भुत् समन्वय: अश्वघोष कृत सौन्दरनन्दम् महाकाव्य

डॉ. धनंजय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233

संस्कृत वाङ्मय में महाकवि अश्वघोष का स्थान विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण है। बौद्धकवि अश्वघोष संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवियों में एक हैं। इनका समय प्रथम शताब्दी ई0 है। ये कुषाणवंश के राजा कनिष्क के समकालीन थे। अश्वघोष मूलतः साकेत (अयोध्या) के रहने वाले ब्राह्मण थे, जो बाद में बौद्ध बन गए। अश्वघोष बहुत बडे़ आचार्य एवं पटु वक्ता थे। इनके द्वारा रचित तीन ग्रन्थ हैं - बुद्धचरितम् और सौन्दरनन्दम् महाकाव्य तथा शारिपुत्र-प्रकरण (नाटक)। 
 सौन्दरनन्दम् अष्टादश सर्गो में निबद्ध एक सफल महाकाव्य है। इसमें बुद्ध के सौतेले भाई नन्द की धर्मदीक्षा का वर्णन है। यह कवि अश्वघोष की सफल कृति है। प्रथम सर्ग में कपिलवस्तु का वर्णन है। मुख्यतः नन्द और सुन्दरी के परस्पर अनुराग का श्रृंगारपूर्ण ढ़ंग से प्रस्तुत करने के बाद कवि ने बौद्ध धर्म के उपदेशों का अत्यन्त रोचक उपमाओं द्वारा प्रतिपादन किया है। सौन्दरनन्दम् वैदर्भी रीति में निबद्ध महाकाव्य है। इसमें अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से किया गया है। कवि की भाषा प्रांजल एवं प्रभावकारी है। अश्वघोष ने बौद्धधर्म के उपदेशों को काव्य का रूप देकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है, जिससे लोग संन्यास-धर्म के प्रति प्रवृत्त हों। भोग के प्रति आसक्ति की व्यर्थता और संसार की असारता दिखाने में कवि को पूरी सफलता मिली है।
 सौन्दरनन्दम् के अध्ययन के उपरान्त यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि अश्वघोष बौद्ध दर्शन के उद्भट विद्वान् व कुशल उपदेष्टा हैं। संक्षेप में बौद्ध दर्शन को देख लेना उचित है क्योंकि सौन्दरनन्दम् में कवि की भावना और उद्देश्य के लिए इसकी महती आवश्यकता है। हम जानते हैं कि ‘दर्शन’ शब्द की निष्पत्ति ‘दृश्’ धातु से हुई है। ‘दृश्’ का अर्थ होता है - देखना। अतः ‘‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’’ अर्थात् जिसके द्वारा देखा जाए वही दर्शन है। यहाँ दर्शन से अभिप्राय ‘आत्म-दर्शन’ से ही है। दर्शन सम्पूर्ण विश्व और जीवन की व्याख्या तथा मूल्य निर्धारित करने का प्रयास है। भारतीय दर्शन दुःख की आधारशिला पर प्रतिष्ठित है। समस्त दर्शन दुःख निवृति के उपायों की खोज में लगा हुआ है क्योंकि संसार में प्राणी - दैहिक, दैविक और भौतिक - त्रिविधात्मक दुःखों से ग्रस्त है। मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति होती है कि वह सुख की प्राप्ति करे। समस्त दर्शनों का लक्ष्य है कि किसी उपाय से सर्वोच्च सुख की प्राप्ति का उपाय बताये जो इस जगत् के दुःखों का आत्यन्तिक निवारण करने में समर्थ हो। 
 भारतीय दर्शन के सामान्यतः दो भेद हैं - आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन। वेदों की सत्ता को स्वीकार करने वाले अथवा वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक दर्शन की श्रेणी में रखे गये हैं। जैसे - न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त। वेदों को प्रमाण न मानने के कारण, वेद विरोधी होने के कारण तथा ईश्वर को न मानने के कारण या सिद्ध पुरूष को ही ईश्वर मानने वाले दर्शनों को नास्तिक दर्शन कहते हैं। इसके अन्तर्गत विशेषतः तीन दर्शनों को स्वीकार किया गया है - चार्वाकदर्शन, जैनदर्शन और बौद्ध दर्शन। बौद्ध दर्शन एक नास्तिक दर्शन है क्योंकि यह वेदों के प्रामाण्य को नहीं स्वीकारता तथा बुद्ध को अपना ईश्वर मानता है।
 बौद्ध दर्शन भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट प्रमुख दार्शनिक सिद्धान्तों पर आधारित है। भगवान् बुद्ध के उपदेश मौखिक थे और उनके शिष्य उन्हें याद रख पाठ किया करते थे। बुद्ध निर्वाण के बाद उनके उपदेशों एवं सिद्धान्तों तथा दार्शनिक विचारों को ग्रन्थों का रूप दिया गया। पालि भाषा में लिखित ‘विनयपिटक’ और ‘सुत्तपिटक’ बौद्ध दर्शन के आधारभूत ग्रन्थ हैं। बौद्ध-दर्शन आध्यात्मिक अद्वैतवाद या निरपेक्षतत्त्ववाद है। इनके अनुसार परमतत्त्व निर्वाण है, जो अतीन्द्रिय, बुद्धि-विकल्पातीत एवं अनिर्वचनीय है। बोधि से इस दुःख रूप अविद्याजन्य संसारचक्र की निवृत्ति होती है। बौद्धदर्शन का अद्वैतवाद उपनिषद् पर ही आधारित है। निश्चय ही बुद्ध उपनिषद् के ऋणी हैं। बुद्ध ने माना है कि वे किसी नये धर्म का उपदेश नहीं दे रहे अपितु प्राचीन सम्बुद्धों एवं ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत सत्य का उन्होंने साक्षात् अनुभव किया है। वे अपने उन्हीं अनुभव का उपदेश बौद्धदर्शन में करते हैं। बुद्ध द्वारा उपदिष्ट दार्शनिक सिद्धान्तों में - चार आर्यसत्य, आर्य अष्टांगिकमार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर मौन, अनात्मवाद और निर्वाण प्रमुख हैं। दुःख, दुःख-समुदय, दुःख निरोध और दुःख-निरोध-मार्ग ये चार बुद्धोपदिष्ट आर्य सत्य हैं। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि - ये आठ आर्य अष्टांगिक मार्ग हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद बुद्ध के उपदेशों का आधारभूत सिद्धान्त है। बौद्ध दर्शन का यह केन्द्रीय सिद्धान्त है। इसी केन्द्रीय सिद्धान्त के परितः सामान्य जन को बोधगम्य कराने के लिए महाकवि अश्वघोष ने अपने साहित्यक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। सौन्दरनन्दम् इस दृष्टि से भी अपूर्व है। दर्शन की गम्भीर बातों को अश्वघोष ने अपने महाकाव्य सौन्दरनन्दम् में ललितशैली में प्रस्तुत कर समाज के लिए उपादेय बना दिया है। निश्चय ही औषधि रूप दर्शन को साहित्य की चासनी में लपेटकर जन कल्याण के निमित्त सौन्दरनन्दम् को कवि ने प्रस्तुत किया है।
 मानवता के विकास का चरमोत्कर्ष साहित्य में तब दिखाई देता है जब उसमें धर्म और दर्शन का एकत्र समन्वय हो। इस दृष्टि से अश्वघोष की कृति मानवता की उन्नति की परम परिणति के रूप में कहा जा सकता है। सौन्दरनन्दम् महाकाव्य में अश्वघोष ने काव्यात्मक रूप से दर्शन के विविध पक्षों को सफलता पूर्वक उद्घाटित किया है। विशेष रूप से बौद्ध धर्म के धर्मचक्र का निरूपण कवि की मेधा की चिन्तनशीलता को परिलक्षित करता है। बौद्ध धर्म में कारण-कार्य-श्रृंखला रूप प्रतीत्यसमुत्पाद द्वादशाझ््क-चक्र है जिसे भवचक्र, संसारचक्र, जन्ममरणचक्र और धर्मचक्र भी कहा जाता है। प्रथम अंग द्वितीय अंग का कारण है, द्वितीय अंग तृतीय अंग का कारण है और इस प्रकार यह द्वादशांक चक्र चलते रहता है। ये द्वादश अंग हैं - अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति और जरा-मरण। मरण इस चक्र का अन्त नहीं है। मरण के बाद भी अविद्या और कर्म संस्कार रहते हैं जो नए जन्म का कारण बनते हैं और यह जन्म-मरण-चक्र चलता रहता है।
 अश्वघोष ने काव्यात्मक शैली में बौद्धदर्शन की मुख्य दार्शनिक बातों को अपने सौन्दरनन्दम् में समाविष्ट कर काव्य को सार्वदेशिक और सार्वकालिक बनाने की चेष्टा की है। यथा - पदार्थ विज्ञान के रूप में आलय विज्ञान और प्रकृति विज्ञान को रेखांकित किया है। बौद्ध दर्शन के उभय प्रमाणों - प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुमान प्रमाण का प्रयोग किया है। एक प्रचारक के रूप में बौद्ध दर्शन के प्रमुख सिद्धान्तों असत्कार्यवाद, चार आर्य सत्य, प्रतीत्यसमुत्पादवाद, क्षणिकत्व(अनित्य)वाद, अनात्मवाद, शून्यवाद आदि का यथावसर सुन्दर निरूपण किया है। ‘‘नित्यविज्ञानमेवात्मा’’ का विवेचन हर अश्वघोष को अभीष्ट है। भगवान् बुद्ध को ईश्वर के रूप में स्वीकार किया है। सृष्टि-प्रक्रिया को समझाते हुए स्वीकार किया है कि परमाणुओं में क्रिया के फलस्वरूप समुदायोत्पत्ति से सृष्टि होती है। ये परमाणु पृथिवी, जल, तेज और वायु के भेद से चार हैं। निर्वाण या मोक्ष का सम्यक् विवेचन किया है। अश्वघोष से स्पष्ट उद्घोषणा की है कि अविद्या, रागादि के निरोध से जन्ममरण के स्रोत का सर्वथा अभाव ही निर्वाण या मोक्ष है।
 भगवान बुद्ध के उपदेशों का सारांश उनके द्वारा प्रस्थापित ‘चार-आर्य-सत्य’ के सिद्धान्त में निहित है। ये चार आर्य आर्य सत्य ही बौद्ध दर्शन के मूल आधार के रूप में जाने जाते हैं। बोध प्राप्ति के बाद वाराणसी के सारनाथ नामक स्थान में प्रथम उपदेश के रूप में भगवान् गौतम बुद्ध ने पहली बार ‘‘चार आर्य सत्य’’ के सिद्धान्त को उद्घाटित किया। दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निरोध और दुःख-निरोध-मार्ग, ये चार बुद्धोपदिष्ट आर्य सत्य हैं। इन आर्य सत्यों को अश्वघोष ने ललित शैली में सौनदरनन्दम् में उपस्थापित किया है।
 प्रथम आर्य सत्य के अनुसार संसार दुःखमय है। सौन्दरनन्दम् में अश्वघोष के अनुसार जन्म लेना दुःख है। जरा (बुढ़ापा) दुःख है। मरण दुःख है। शोक करना दुःख है। विलाप करना दुःख है। इच्छा की पूर्ति न होना दुःख है। प्रिय-वियोग दुःख है तथा अप्रिय संयोग भी दुःख है। संक्षेप में ‘‘पंच उपादान स्कन्ध’’ ही दुःख है। अर्थात् सम्पूर्ण विश्व दुःखमय है। यह लौकिक अनुभव से सिद्ध है। संसार के सर्व पदार्थ अनित्य और नश्वर होने के कारण दुःख-रूप हैं। लौकिक सुख भी वस्तुतः दुःख से घिरा है। इस सुख को प्राप्त करने के प्रयास में दुःख है, प्राप्त हो जाने पर यह नष्ट न हो जाय यह विचार दुःख देता है और नष्ट होने पर दुःख है ही। काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, जन्म, जरा और मरण सब दुःख है। अप्रिय संयोग दुःख है, प्रिय वियोग दुःख है, इच्छा पूर्ण न होना दुःख है, स्वार्थ, हिंसा, संघर्षादि दुःख है। रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान ये पाँच स्कन्ध दुःख हैं। संक्षेप में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त सारा जीवन ही दुःख है और मृत्यु भी दुःख का अन्त नहीं है क्योंकि मृत्यु के बाद पुनर्जन्म है और जन्म के बाद मृत्यु है। इस प्रकार यह जन्म-मृत्यु-चक्र या भवचक्र चलता रहता है तथा व्यक्ति इसमें फँस कर दुःख भोगता रहता है। अश्वघोष ने सौनदरनन्दम् में भी समस्त दुःखों को तीन वर्गो में रखा है - दुःख-दुःखता, विपरिणाम-दुःख और संसार दुःख। अश्वघोष के अनुसार दुःख का ही भाव तथा दुःख का ही अभाव होता है। अर्थात् जन्म और मरण दोनों दुःख ही है। इस गंभीर तथ्य को समझाने के लिए अत्यन्त मार्मिक उपदेश दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि दुःख के सत्यस्वरूप की शिक्षा को भली-भाँति समझे बिना अन्य आर्य सत्यों का ज्ञान असम्भव है। ‘दुःख-समुदय’ द्वितीय आर्य सत्य है। ‘दुःख-समुदय’ का अर्थ है -दुःख उत्पन्न होता है, इसका उदय या समुदय होता है। जो उत्पन्न होता है उसे कार्य कहते हैं और प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं हो सकता है। कार्य सदा कारण सापेक्ष होता है। कारण के होने पर ही कार्य होता है- यह नियम अटल है। कार्य उत्पत्ति के लिए हेतु-प्रयत्न सामग्री आवश्यक है। कार्य कारण की लम्बी श्रृंखला है जो द्वादशांक-चक्र के रूप में घूमती रहती है। यह प्रतीत्यसमुत्पादचक्र ही दुःख-समुदय का कारण है और अविद्या इसकी जननी है। अविद्याजन्य तृष्णा के कारण संसार में आसक्ति होती है और भवचक्र चलता रहता है। दुःख समुदय को कहीं-कहीं ‘दुःख-समुदाय’ भी कहा गया है। दुःख समुदाय के कुल बारह अंग हैं। अतः इसे द्वादश निदान भी कहते हैं। ये द्वादश-निदान निम्नलिखित हैं - 1. अविद्या 2.संस्कार (भूत जीवन) 3. विज्ञान 4. नामरूप, 5. षडायतन 6. स्पर्श 7. वेदना 8. तृष्णा 9. उपादान (वत्र्तमान जीवन) 10. भव 11. जति 12. जरा-मरण (भविष्य जीवन)।
 ‘दुःख-निरोध’ तृतीय आर्यसत्य है। कारण के होने पर ही कार्य उत्पन्न होता है, अतः कारण के न रहने पर कार्य भी नहीं रह सकता और न पुनः उत्पन्न हो सकता। दुःख कार्य है अतः उसके कारण को दूर कर देने पर दुःख का निरोध सम्भव है। अविद्या के नाश से उससे चलने वाला द्वादशांक प्रतीत्यसमुत्पाद-चक्र भी नहीं चलता। यही दुःख निरोध है। तृष्णा के सर्वथा क्षय होने पर अनासक्ति रूप निर्विकल्पावस्था होती है। अविद्या निवृति से अपरोक्षानुभूति द्वारा दुःख का आत्यान्तिक निरोध हो जाता है। यही निर्वाण है। यही अमृत पद है। निर्वाण शब्द की व्युत्पत्ति है निर् $वाण (बुझ जाना)। अर्थात् विज्ञान के निरोध से निर्वाण की अवस्था में सब कुछ शान्त हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि दीपक का बुझ जाना। निर्वाण दुःखों के नाश की अवस्था है। निर्वाण से बढ़कर कोई सुख नहीं है। यही परम शान्ति है। इसे ही शान्ति, शिव या क्षेम भी कहा गया है। औपधिक और अनौपधिक भेद से निर्वाण के भी दो प्रकार हैं। तृष्णा के निरोध से साधक को शरीर रहने पर भी निर्वाण लाभ हो जाता है। साधक की इन्द्रियाँ कार्य तो करती हैं परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष नहीं होता है। अनौपधिक निर्वाण में साधक के पूर्व कर्मो का संस्कार पूर्णतः नष्ट हो जाता है। यह पाँच स्कन्धों का पूर्ण विनाश है। निर्वाण की ये दोनों अवस्थाएँ अन्य दर्शनों में जीवनमुक्ति तथा चरममुक्ति के रूप में जानी जाती है। ‘दुःख निरोध मार्ग’ को चतुर्थ आर्य सत्य के रूप में जाना जाता है। यह निर्वाण प्राप्ति का मार्ग है। जिन कारणों से दुःखों की उत्पत्ति होती है उन्हीं कारणों के नाश का उपाय हीं निर्वाण मार्ग है। इन मार्गों को अष्टांगिक-मार्ग के नाम से भी जाना जाता है। ये अष्टांगिक मार्ग हैं - 1. सम्यक् दृष्टि 2. सम्यक् संकल्प (प्रज्ञा) 3. सम्यक् वाक् 4. सम्यक् कर्मान्त 5. सम्यक् आजीव 6. सम्यक् व्यायाम (शील) 7. सम्यक् स्मृति और 8. सम्यक् समाधि (समाधि)। ये अष्टांगिक मार्ग प्रज्ञा, शील और समाधि नामक त्रिरत्नों में विभाजित हैं। यह अष्टांग मार्ग ही श्रेष्ठ है। इसी का अनुसरण करने से निर्वाण-लाभ हो सकता है। इस प्रकार स्पष्टतः कहा जा सकता है कि अश्वघोष ने चार आर्य सत्य के निरूपण में अत्यधिक श्रम किया है क्योंकि चारों आर्य सत्य बौद्ध दर्शन के चार स्तम्भ हैं जिनपर सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन टिका है। इसके साथ ही सत्य, अहिंसा, अस्तेय, सर्वभूतानुकम्पा आदि विशेषताओं के निरूपण में ब्राह्मण धर्म के धर्म-सूत्रों तथा प्राचीन स्मृतिग्रन्थों से अश्वघोष प्रभावित हैं साथ ही पालि भाषा में निबद्ध बौद्ध धर्म की प्रमुख बातों को संस्कृत में काव्यमय स्वरूप में प्रकट किया है। इस दृष्टि से अश्वघोष पिटक साहित्य के तीन भागों सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक से प्रभावित है। पालि साहित्य के क्षेत्र में काव्यों की रचना बहुत कम हुई है लेकिन मानव जीवन की गहन एवं व्यापक अनुभूतियों का पहला दर्शन हमें त्रिपिटकों में दिखाई देता है। त्रिपिटकों में संकलित भगवान तथागत के ऊँचे विचारों का विश्लेषण किया गया है। बुद्धत्व से परिनिर्वाण तक के उपदेशों का संग्रह त्रिपिटक है। अश्वघोष निश्चय ही इससे प्रभावित हैं और इसे लिखित एवं प्रामाणिक रूप देने का प्रयास किया है।
 प्रायः संस्कृत साहित्य में काव्य का सृजन आनन्द की अनुभूति, विद्वानों के परितोष और अपनी कला के प्रदर्शन के लिए कवियों ने किया है लेकिन अश्वघोष का ध्येय यह कभी नहीं रहा। अश्वघोष ने तो विषयों में आसक्त मोक्ष विमुख जनों को सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए अपने ग्रन्थों का प्रणयन किया है। मोक्ष-धर्म जैसे अमृत की प्राप्ति को परम लक्ष्य स्वाीकारते हुए उसे पाने के लिए कटु औषधि तुल्य उपदेश को काव्यरूपी मधु से स्वादिष्ट बनाने का सफल प्रयोग किया है। अश्वघोष स्वयं कहते हैं सौनदरनन्दम् महाकाव्य मोक्ष धर्म की व्याख्या से परिपूर्ण है। यह आनन्द प्रदान करने के लिए नहीं अपितु शान्ति प्रदान करने के लिए है। अन्यमनस्क श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए सौनदरनन्दम् को काव्य शैली में रचा गया है। मोक्ष धर्म के अतिरिकत् जो कुछ भी इस काव्य में कहा गया है वह सिर्फ सरस बनाने के लिए ही है जैसे तिक्त औषधि को पीने के लिए उसमें मधु मिलाया जाता है। संसार को प्रायः विषय के आनन्द में लीन तथा मोक्ष से विमुख देखकर ही अश्वघोष ने सौन्दरनन्दम् में तत्त्व उपदेश दिया है। कवि ने स्पष्ट आगाह किया है कि जिस प्रकार जौहरी धातु से उपयोगी स्वर्णकणों को ही ग्रहण करता है उसी प्रकासर पाठकों को सावधानी पूर्वक इस ग्रन्थ से मात्र शान्ति-दायक वस्तु को ही ग्रहण करना चाहिए, ललित वस्तु को नहीं। कवि के ही शब्दों में -
‘‘इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भा कृतिः
श्रोतृणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात्कृता।
यन्मोक्षात्कृतमन्यदत्र हि मया तत्काव्यधर्मात्कृतं
पतु तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति।।’’ 18/63
तथा
‘‘प्रायेणालोक्य लोकं विषयरतिपरं मोक्षात्प्रतिहतं
काव्यव्याजेन तत्त्वं कथितमिह मया मोक्षः परमिति।
तदुबुद्ध्वा शामिकं यत्तदवहितमितो ग्राह्यं न ललितं
पांसुभ्यो धातुजेभ्यो नियतमुपकरं चामीकरमिति।। ’’ 18/64
सौन्दरनन्दम् के अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि अश्वघोष ने वेद, उपनिषद् ही नहीं रामायण और महाभारत का भी गहन अध्ययन किया होगा। इसके साथ ही कामशास्त्र, राजशास्त्र, दण्डनीति, सांख्य, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र और छन्दशास्त्र के भी पटु अध्येता रहे होगे। सौन्दरनन्दम् में कवि ने यथावसर उक्त ग्रन्थों और विद्याओं के दृष्टान्तों और तथ्यों को अपनी कृति में समाविष्ट किया है। निश्चय ही बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद बुद्ध के मौलिक उपदेशों को आत्मसात किया है। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कुशल उपदेष्टा के रूप में स्वयं को स्थापित किया है। सौन्दरन्दम् इसका साक्षात्प्रमाण है। वस्तुतः आदिकवि वाल्मीकि के सर्वश्रेष्ठ उत्तराधिकारी के रूप में महाकवि अश्वघोष ही प्रतीत होते हैं। वाल्मीकि की शैली, भाषा, छन्द और वर्णन की प्रणाली आदि का अनुसरण करते हुए अपनी प्रतिभा का परिचय अश्वघोष ने अपने गन्थों में दिया है। वाल्मीकि की प्रति अश्वघोष की अटूट श्रद्धा है। वाल्मीकि के प्रति आदरभाव प्रकट करते हुए धीमान्, आद्यकवि आदि का प्रयोग करते हैं। प्रौढ़ प्रतिभा के धनी, सूक्ष्म समीक्षक और विशिष्ट अन्तर्दृष्टि सम्पन्न कवि अश्वघोष ने भगवद्गीता के भावों को ही नहीं कदाचित् शब्दों को भी ग्रहण किया है। सौन्दरनन्दम् की शब्दावलियों में गीता की शब्दावलियों से अपूर्व समानता है। शील, संयम, श्रद्धा, सदाचार, इन्द्रियसंयम आदि का वर्णन अश्वघोष ने पूर्णतः श्रीमद्भगवद्गीता के अनुरूप किया है।
 यथा - सौन्दरनन्दम् के तेरहवें सर्ग में अश्वघोष का उपदेश गीता के द्वितीय अध्याय के उपदेश से साम्यता रखता है।
‘‘ततः स्मृतिमधिष्ठाय चपलानि स्वभावतः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निवारयितुमर्हसि।’’ 13/30
‘‘तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्योस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।’’ गीता 2/62
निष्कर्ष:- अश्वघोष रचित सौन्दरनन्दम् विधा की दृष्टि से निश्चय ही एक महाकाव्य है जिसमें शास्त्रीय परम्परा के अनुसार निर्धारित लक्षणों का पालन कवि ने किया है। स्पष्ट है कि महाकवि अश्वघोष रचित सौन्दरनन्दम् लोकमांगलिक जीवन के महत्त्वपूर्ण औदात्य का महाकाव्य है। रचनाकार ने इसमें विश्व मानवता के आध्यात्मिक उत्कर्ष और चारित्रिक उन्नयन का चित्रण अपने युगीन सभ्यता और संस्कृति के गरिमापूर्ण परिवेश में किया है। बौद्धधर्म और दर्शन को लोकग्राह्य बनाने के उद्देश्य से कवि ने महाकाव्य विधा को अपनाकर साहित्यिक मार्ग का अनुसरण किया है। इसमें मानवीय उदात्त मूल्यों को अत्यन्त सावधानी से पाठकों के समक्ष उपस्थापित कर कवि धर्म का सम्यक् निर्वहण किया है। अश्वघोष ने अपने इस महाकाव्य में परोपकार की भावना से ओत-प्रोत हृदय का साक्षात्कार कराया है। दुःखपूर्ण मानव-जीवन को दुःख से मुक्त कराने के लिए व्याकुल और व्यग्र हृदय के कारुणिक उद्गारों की मार्मिक अभिव्यक्ति कर प्रस्तुत महाकाव्य को कालजयी बना दिया है। 
 अश्वघोष ने अपने इस महाकाव्य की कथावस्तु में बौद्ध दर्शन की गंभीरता को साहित्य की मधुरता के साथ पाठकों के समक्ष रखा हैं। अपनी प्रतिभा और अभ्यास का सुन्दर समन्वय दार्शनिक कवि ने किया है। कवि का उद्देश्य तो मात्र मोक्ष मार्ग का निरूपण करना है परन्तु साहित्यिक निबन्धन के कारण कथा को सरस बनाने के लिए साहित्यिक रसों की विविधता को भी सम्मुख रखा है। अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा-मरण, आर्य सत्य, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यग्वाक्, सम्यक् चरित्र, सम्यक् आजीव, सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, सम्यक्समाधि, प्रज्ञा, शील, समाधि इत्यादि समस्त बौद्ध दर्शन शब्दावलियों का गुम्फन कथानक में ललित पद्यों में किया गया है।
 सौन्दरनन्दम् की उपजीव्यता का श्रेय बौद्धधर्म के ‘धम्मपद’ की महत्त्वपूर्ण व्याख्या ‘अट्ठकथा’ को दिया जा सकता है। बौद्धधर्म में धम्मपद पवित्र ग्रन्थ है। यह श्रीमद्भगवद्गीता के समान आदरणीय है। अश्वघोष ने तथागत के सम्पूर्ण चरित्र को दिव्य और भव्य स्वरूप के साथ चित्रित किया है। दृढसंकल्पी, स्थितप्रज्ञ, चैतन्यस्वरूप, विरक्त, निर्वाण के आकांक्षी, शान्त, जगत्कल्याणकत्र्ता, परम उपदेशक और अवतारी पुरूष का दूसरा नाम है सौन्दरनन्दम् का तथागत। इस उज्ज्वल चरित्र के समक्ष सारे चरित्र मानवीय गुण-दोषों से युक्त होने के कारण बौने सिद्ध होते हैं। इसके साथ ही महाकवि अश्वघोष ने अपने काव्य में अपूर्व एवं अलौकिक चरित्रों की सृष्टि कर महत् लक्ष्य व मानवतावादी उदात्त जीवन मूल्यों तथा संस्कृति के विराट स्वरूप की प्रतिष्ठा की है।
 सम्पूर्ण अध्ययन के उपरान्त हम स्पष्टतः कह सकते हैं कि महाकवि अश्वघोष ने सौन्दरनन्दम् महाकाव्य में जहाँ शान्त रस की सुखद धारा प्रवाहित की है वहीं श्रृंगार, हास्य, करूण, वीर और अद्भुत रसों का भी सुन्दर प्रयोग किया है। इन रसों के प्रयोग ने महाकाव्य को जीवन्त बना दिया है। कवि का मूल उद्देश्य बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना है इसलिए अपने महाकाव्य में वैसे ही घटनाक्रम को प्रमुखता से स्थान दिया है जो उनकी उपदेशात्मक शैली में रसात्मकता के साथ निमग्न हो सके। इस दृष्टि से साहित्य के रौद्र, भयानक और वीभत्स इन तीन अन्य रसों के प्रति न तो उनका झुकाव दिखाई देता है और न कथा वस्तु में इसकी आवश्यकता ही प्रतीत होती है। अतएव स्थायी भाव क्रोध से उत्पन्न रस रौद्र, स्थायी भाव भय से उत्पन्न भयानक रस और जुगुप्सा स्थायीभाव से युक्त बीभत्स रस सौन्दरनन्दम् में कहीं दिखाई नहीं देता। निश्चय कह कवि अश्वघोष का रस प्रयोग साहित्य की मर्यादा और कथावस्तु की आवश्यकता के अनुरूप है। अश्वघोष का प्रकृति चित्रण उदात्त है। बाह्य और अन्तः दोनों प्रकार के प्रकृति चित्रण मेंकवि को सफलता मिली है। प्रायः बाह्य प्रकृति के अन्तर्गत जहाँ नदी, समुद्र, पर्वत, वन-बाग-उपवन, पशु-पक्षी, वृक्ष-लतादि का वर्णन कवि को अभीष्ट है वहीं अन्तः प्रकृति के अन्तर्गत नन्द और उसकी भार्या की आन्तरिक अनुभूतियों को अभिव्यक्त करना अश्वघोष का ध्येय है। महाकवि अश्वघोष ने भार्या विलाप, नन्द विलाप, महापवाद, स्वर्ग दर्शन आदि सर्गो में अन्तःप्रकृति की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। भार्या की विरह दशा, नन्द की व्याकुलता आदि में मर्मस्पर्शी वर्णन प्राप्त होता है जहाँ करूणा, कायरता, अधीरता, स्पन्दन, करुणक्रन्दन, उत्कण्ठा, विलाप आदि साक्षात् शब्दायमान हो रहे हैं। विरह और वियोग की काव्यमयी उपस्थिति से सहृदय पाठक विह्वल हो उठता है। अन्तः प्रकृति के चित्रण में अश्वघोष ने मानव हृदय के संवेदनशील पक्ष का सफल चित्र प्रस्तुत किया है। साथ ही सौन्दरनन्दम् महाकाव्य कल्पना की कमनीयता, भावों की स्पष्टता, व्यंजना की विदग्धता, छन्द की उपयुक्तता, अलंकारों की विविधता, रस की ग्राह्यता, प्रकृति-चित्रण की चारूता, भाषा की प्रांजलता आदि गुणों के कारण उत्कृष्टतम काव्य बन गया है। सौन्दरनन्दम् का काव्य-सौन्दर्य अप्रतिम है।

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