भारतीय गणतंत्र की मातृशक्तियाँ

डॉ. धनंजय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

अध्यक्ष संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233

विश्व का सबसे बड़ा गणतन्त्र भारत विश्व गुरु के पद पर पुनर्प्रतिष्ठापित होने के लिए अहर्निश प्रयासरत है। भारतीय संविधान ने हमारे देश को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्रीय एकता और अखण्डता तथा बन्धुता के लिए असाधारण कवच प्रदान कर हमें सुरक्षित रखने का प्रयास किया है। संविधान सभा के द्वारा प्रदत्त हमारे संविधान के निर्माण में पंद्रह मातृशक्तियों का अविस्मरणीय योगदान रहा है। आजादी के अमृतकाल में उनके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करना हम समस्त देश वासियों का कत्र्तव्य है। उन मातृशक्तियों को स्मरण किये बिना अमृतकाल के लक्ष्य सार्थक नहीं हो सकते। भारतीय संविधान के निर्माण में जिन 15 मातृशक्तियों की अहम भूमिका रही है, उनके संक्षिप्त परिचय से वर्तमान पीढी को अवश्य अवगत होना चाहिए।

भारत का संविधान भले ही 26 जनवरी 1950 को अमल में आया था, लेकिन देश की संविधान सभा ने इसे 26 नवंबर 1949 को ही स्वीकार कर लिया था। 389 सदस्यीय संविधान सभा में 15 परमविदुषी मातृशक्तियों का योगदान अविस्मरणीय रहा है। भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने में इनकी अहम भूमिका थी। अमृतकाल में इन मातृशक्तियों के बारे में भावी पीढ़ी को अवगत कराना हमारा ध्येय होना चाहिए। भारतीय गणतंत्र की निर्मात्री के रूप में इन्हें याद किया जाना चाहिए। 
ये मातृशक्तियां हैं -
1. ’अम्मू स्वामीनाथन’ - 22 अप्रैल 1894 को केरल के पालघाट में जन्मीं अम्मू स्वामीनाथन 1946 में संविधान सभा की सदस्य बनीं। श्वीमेंस इंडिया एसोसिएशनश् बनाया । 1952 में लोकसभा और 1954 में राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुईं। सेंसर बोर्ड और भारत स्काउट्स की अध्यक्षता की।
2. ’दक्षायनी वेलायुधन’ -04 जुलाई 1912 को कोच्चि में जन्मीं वेलायुधन अनुसूचित जाति से जुड़ी संविधान सभा की एकमात्र महिला सदस्य थीं । 1945 में कोच्चि विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं, अनुसूचित जाति के लोगों की आवाज उठाने के लिए जानी जाती थीं।
3. ’बेगम एजाज रसूल’ - 02 अप्रैल 1909 को मालेरकोटला के एक शाही परिवार में पैदा हुईं। संविधान सभा में शामिल एकमात्र मुस्लिम माहला थीं।
भारत सरकार अधिनियम 1935 के अमल में आने के बाद मुस्लिम लीग से जुड़ीं। 1937 में यूपी विधानसभा में निर्वाचित हुईं। 1969 से 1990 के बीच यूपी विधानसभा की सदस्य रही 2000 में समाज सेवा में योगदान के लिए पद्म भूषण से नवाजी गईं।
4. ’दुर्गाबाई देशमुख’- 15 जुलाई 1909 को आंध्र प्रदेश के राजमंड्री में जन्मीं दुर्गाबाई देशमुख ने 12 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। 1930 में मद्रास में नमक सत्याग्रह में शामिल हुईं। 1936 में महिलाओं की शिक्षा एवं विकास के लिए आंध्र महिलासभा गठित की। केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड और राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति की अध्यक्ष रहीं। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पद्मविभूषण से सम्मानित हुईं।
5. ’हंसा जीवराज मेहता’:- 03 जुलाई 1897 को बड़ौदा में जन्मीं हंसा मेहता इंग्लैंड से समाजशास्त्र और पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद भारत लौटीं। गुजराती भाषा में बच्चों के लिए कई प्रसिद्ध किताबें लिखीं। ‘गुलिवर्स ट्रेवल्स’ सहित कई बाल कहानियों का अनुवाद किया। 1945 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं। अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय बोर्ड का नेतृत्व भी किया।
6. ’कमला चैधरी’ -22 फरवरी 1908 को लखनऊ के एक प्रतिष्ठित परिवार पैदा हुईं। पढ़ाई जारी रखने के लिए कड़ा संघर्ष किया । 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुईं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष रहीं। साहित्य की दुनिया में भी नाम कमाया। आधुनिक भारत के उद्भव के अलावा महिलाओं के अंतर्मन पर लिखने के लिए जानी जाती थीं।
7. ’लीला रॉय’:- 02 अक्तूबर 1900 को असम के गोलपाड़ा में जन्म हुआ। महिलाओं को मताधिकार सहित अन्य अधिकार देने केलिए आवाज बुलंद की। 1923 में दीपाली संघ और स्कूलों की स्थापना कर देशभर में चर्चा पाई। 1938 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बनाई उपसमिति से जुड़ीं।
8. ’मालती चैधरी’:- 1904 में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्मीं मालती चैधरी की गिनती बालिका एवं महिला शिक्षा के बड़े पैरोकारों में होती है।1927 में नवकृष्ण चैधरी (जो आगे चलकर ओडिशा के मुख्यमंत्री बने) से शादी की। नमक सत्याग्रह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पिछड़े वर्ग के हक की आवाज उठाने के लिए भी जानी जाती थीं। 1975 में भारत में लागू आपातकाल का जबरदस्त विरोध किया था।
9. ’पूर्णिमा बनर्जी’:- समाजवादी विचारधारा से प्रेरित पूर्णिमा बनर्जी किसानों. मजदूरों और ग्रामीणों से जुड़े मुद्दे उठाने के लिए जानी जाती थीं। महात्मा गांधी के सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े होने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें जेल भेजा था।
10. ’राजकुमारी अमृत कौर’:- 02 फरवरी 1889 को लखनऊ में जन्मीं अमृत कौर भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं। दस साल तक इस पद पर आसीन रहीं।अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), टीबी संघ और कुष्ठ रोग प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान का स्थापना की।
11. ’रेणुका रे’: - आईसीएस अधिकारी संतीष चंद्र और सामाजिक कार्यकर्ता चारुलता मुखर्जी की बेटी रेणुका ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए किया था। पश्चिम बंगाल में अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वयक परिषद का गठन किया था। समान नागरिकसंहिता के लिए आवाज बुलंद की। 
12. ’सरोजिनी नायडू’:- 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मीं सरोजिनी नायडू किसी भारतीय राज्य के राज्यपाल पद पर काबिज होने वाली पहली महिला थीं। किंग्स कॉलेज लंदन और गिरटन कॉलेज कैंब्रिज से उच्च शिक्षा हासिल की। 1914 में इंग्लैंड में महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद उनसे प्रभावित हुईं।भारत की आजादी के लिए जीवन समर्पित कर दिया। असहयोग आंदोलन सहित कई आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए जेल भी गईं।
13. ’सुचेता कृपलानी’:- 1908 में अंबाला में जन्मीं सुचेता कृपलानी को भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका के लिए याद किया जाता है । कांग्रेस की महिला इकाई गठित की। किसी भारतीय राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने की उपलब्धि उनके नाम दर्ज है।
14. ’विजयलक्ष्मी पंडित’:- 18 अगस्त 1900 को इलाहाबाद में जन्मीं विजयलक्ष्मी पंडित देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल की बहन थीं। कैबिनेट मंत्री के पद पर काबिज होने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बन इतिहास रचा था।
15. ’एनी मसकैरिनी’:- तिरुवनंतपुरम के लैटिन कैथोलिक परिवार में जन्मीं एनी मसकैरिनी ने त्रावणकोर राज्य में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुखता से भाग लिया।1939 से 1947 के बीच राजनीतिक गतिविधियों के चलते कई बार जेल भेजी गईं। केरल से सांसद चुनी जाने वाली पहली महिला थीं।

 यद्यपि इन मातृशक्तियों में से कुछ के नाम आज सबकी जुबान पर है, पर अन्य के नाम विस्मृत किये जा रहे हैं। हमें आधुनिक भारत के निर्माण में इन मातृशक्तियों को नहीं भूलना चाहिए।

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