समीक्षा: गहन अनुभूतियों से भरा अनिमा दास का सोनेट संकलन "शिशिर के शतदल"

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: शिशिर के शतदल (सोनेट संग्रह)
कवयित्री: अनिमा दास
मूल्य: ₹ 300.00
प्रकाशक: सर्व भाषा ट्रस्ट, दिल्ली


साहित्य सृजन अपने आप में रोचक प्रक्रिया है। साहित्य में काव्य विधा का अपना आनंद है। काव्य विधा में सोनेट लिखना किंचित दुरुह भी है और मनोरंजक भी। अभी हाल में ही सुरेन्द्र नगर, गुजरात से निकलने वाली पत्रिका 'विश्वगाथा' के जनवरी-मार्च 2023 अंक में सोनेट पढ़ने को मिला। कवयित्री सुश्री अनिमा दास कटक,उड़ीसा से हैं और हिन्दी में साहित्य लेखन करती हैं। सोनेट को लेकर मेरी अत्यन्त सीमित जानकारी है। बस इतना ही पता है कि हिन्दी के बड़े कवि त्रिलोचन जी ने हिन्दी भाषा में सोनेट लिखा है।

कटक भुवनेश्वर से दूर नहीं है और आजकल मोबाइल का जमाना है। उन्होंने  अपने लेखन के बारे में संक्षेप में जानकारी दी। किसी भी हिन्दी भाषी के लिए यह सुखद और अचंभित करने वाला संयोग हो सकता है कि उड़िया भाषी लेखिका का सम्पूर्ण सृजन हिन्दी में हो रहा है। उन्हें एक उभरती हुई कवयित्री के रूप में देखा जा रहा है। किसी भी रचनाकार को उनके सृजन-लेखन के द्वारा ही परखा-जाना जा सकता है। मेरे लिए सुखद संयोग है,उनका सोनेट संग्रह " शिशिर के शतदल" मेरे सामने है। इसी बहाने काव्य की सोनेट विधा को पढ़ने-समझने का अवसर मिला है। हिन्दी में सोनेट लेखन और सुश्री अनिमा दास के लेखन को किंचित गहराई से समझ सकूँगा।

विजय कुमार तिवारी
आखिर काव्य की सोनेट विधा क्या है? काव्य विधा के बारे में हम जानते-समझते हैं परन्तु सोनेट को लेकर हिन्दी में कम ही चर्चा होती है। सोनेट इटेलियन शब्द सानेटो का लघु रूप है। यह धुन के साथ गायी जाने वाली कविता है। ऐसी छोटी धुन, जो मेण्डोलिन या ल्यूट (एक प्रकार का तार वाद्य) पर गायी जाती है। यह एक चौदह पंक्तियों वाली कविता है जिसकी इटली में उत्पन्न एक परिवर्तनीय कविता योजना है और 16 वीं शताब्दी में सर थॉमस व्याट और सरे के अर्ल हेनरी हॉवर्ड द्वारा इंग्लैंड लाया गया था। शाब्दिक रूप से एक "छोटा गीत", सोनेट परंपरागत रूप से एक ही भावना पर प्रतिबिंबित करता है, इसकी समापन पंक्तियों में स्पष्टीकरण या विचार के "मोड़" के साथ। हिंदी कविता में सोनेट के जन्मदाता त्रिलोचन शास्त्री जी हैं। वे कविता व भाषा में प्रयोग के पक्षधर थे।  वैसे तो उन्होंने गीत, गजल, कुंडलियाँ, बरवै, मुक्त छंद आदि अन्य काव्य विधाओं में अपनी लेखनी चलाई, लेकिन सोनेट (चतुष्पदी) के कारण उनकी विशेष ख्याति फैली। उन्हें आधुनिक हिंदी कविता में सोनेट का जन्मदाता कहा जाता है। प्रारम्भ में हिंदी में सोनेट को विजातीय माना जाता था, लेकिन त्रिलोचन जी ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया। इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएँ कीं, संभवत: स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं। सोनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन जी ने आजमाया।

उपरोक्त विवरण मैंने कहीं-कहीं से उद्धृत किया है और इस तरह मेरी अपनी जानकारी भी बढ रही है।

'शिशिर के शतदल' के प्रकाशकीय में सर्वभाषा ट्रस्ट के प्रकाशक केशव मोहन पाण्डेय जी लिखते हैं-"अनिमा दास जी के सोनेट हृदय की अतल गहराइयों में स्थिर हो जाते हैं। उन्होंने बड़े मनोयोग से समृद्ध परम्परा वाली विधा को सृजित किया है। अनिमा जी की लेखनी सोनेट्स एवं छंद मुक्त कविताओं में प्राण भर देती हैं।' विनीत मोहन औदिच्य जी लिखते हैं, "सोनेट रचनाओं में सार्थक शब्द चयन से आप (अनिमा दास) चुम्बकीय आकर्षण उत्पन्न करती हैं जिसके फलस्वरूप निःसंदेह ही लय,गेयता की अभिवृद्धि होती है। भाव अभिव्यक्ति में अनिमा जी का कोई सानी नहीं है। प्रकृति, प्रेम, विरह, मिलन, व्यथा, आशा, मृत्यु, पर्यावरण आदि। विषय चाहे कोई भी हो, इनकी कलम कुशलता से अबाधित गति से चलती है। वास्तविक जीवन के अनुभवों से पगे सोनेट कवयित्री के चिंतन का आधार पाकर जीवंत हो उठते हैं। असंदिग्ध काव्य प्रतिभा की धनी अनिमा जी के जादुई स्पर्श से सोनेट संगीत की मधुर ध्वनियों को स्पष्ट सुना जा सकता है।" 

कवि उपन्यासकार प्रताप नारायण सिंह ने "हिन्दी साहित्य में सोनेट" शीर्षक से इस संग्रह में सार्थक लेख लिखा है। डा० संजिता मिश्र और लिली मित्रा के लेखों से सोनेट व अनिमा जी के लेखन के बारे में बहुत कुछ समझा जा सकता है।

"मेरी काव्यात्मक यात्रा में सोनेट" शीर्षक से अनिमा दास ने इस संग्रह में मार्मिक और सारगर्भित लेख लिखा है। उनका भाव देखिए-"जब असंख्य विवक्षाएँ निस्सृत होती हैं कोलाहल पूर्ण क्षत-विक्षत अतीत से तब कवि की लेखनी अगम्य हृदय के समस्त शब्दों को करती है एकत्रित एवं सृजित होती हैं कई कविताएं। रचनात्मकता,भाव विह्वलता एवं नूतन संघर्ष सहित पुनः कवि कर विस्मृत अतीत, वर्तमान एवं भविष्य को समर्पित कर देता है मन एवं आत्मा,सृष्टि के सान्निध्य में।" वे आगे लिखती हैं-" मैं किशोरावस्था से ही अंग्रेजी एवं ओड़िया सोनेट पढ़ती रही हूँ किन्तु सोनेट पर मैंने 2016 में काम करना आरंभ किया एवं प्रकाशित हो पायी 2018 में। ओड़िया भाषा साहित्य सोनेट से समृद्ध है। मैं ओड़िया साहित्य से स्वयं को संश्लिष्ट तो नहीं कर पायी,अतः हिन्दी साहित्य में सोनेट का विस्तार करने का लक्ष्य लिए लिख रही हूँ।" सुश्री अनिमा जी पुनः लिखती हैं, "मेरी लेखनी सदैव प्रकृति, प्रेम, विच्छेद, स्त्रीत्व एवं सदा प्रिय मृत्यु पर ही सृजित करती रही है अनेकों सोनेट। मैं स्वयं को हिन्दी साहित्य जगत का एक अंश पाती हूँ तो मुझे आत्मिक शांति प्राप्त होती है क्योंकि मुझे हमारे देश की राजभाषा को श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का सुयोग मिलता है।" उनकी इस भावना का हिन्दी साहित्य जगत में सम्मान मिलना ही चाहिए।

कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, अचानक ही सही, मुझे सोनेट विधा में लेखन करने वाली महत्वपूर्ण कवयित्री के सृजन संसार को पढ़ने का सुअवसर मिला है। 'शिशिर के शतदल' सोनेट संग्रह हिन्दी में सोनेट लेखन की कमी को दूर कर ही रहा है, बल्कि अग्रणी लेखिका अनिमा दास नये कवियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन रही हैं। काव्य भाव-संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है और अनिमा दास में वह कूट-कूट कर भरा है। एक तरह से हिन्दी सोनेट संसार उनका ऋणी है क्योंकि किसी विधा को जीवंत करना साधारण कार्य नहीं है। उनके शब्द सामर्थ्य से,बिम्बों,उपमाओं के सम्यक प्रयोग से हर काव्य साहित्य प्रेमी चमत्कृत होगा। उनमें लेखन की गंभीरता है,गरिमा और भाव-प्रवणता है। 'शिशिर के शतदल' में पूरे सौ सोनेट हैं जिनका विस्तार अभिभूत करने वाला है। 'अंतर्व्यथा' की अभिव्यक्ति देखिए-

विचलित तो था नहीं मन कभी, किंतु आज हुआ उदास
जैसे शुभ्रा सी ऊषा सुप्त रहती, विछोह के सायंकाल में

सोनेट के अंत में लिखती हैं-

नहीं बनूँगी आख्यायिका न रची जाऊँगी कभी बंदिनी सी
मैं रहूँगी सदा भविष्य की रौप्यजल में, मुग्धा कुमुदिनी सी।

'प्राप्ति' सोनेट में ईश्वरीय चेतना के विस्तार की अनुभूति कवयित्री के मानस पटल और हृदय की गहराई में व्याप्त है-

माना मैंने तुम्हें पूर्ण सत्य में,स्नेह में, त्याग में है तुम्हारी व्याप्ति
तुम अनेक में हो एक, शून्य में हो ध्वनि तथा अतृप्ति में प्राप्ति।

उड़िया के कवियों में एक विशेषता यह भी है,वे जीवन के यथार्थ को तो ग्रहण करते ही हैं,मिथ को भी साथ लेकर चलते हैं। अनिमा दास अपने हर सोनेट में बिंबों की भरमार करती चलती हैं। 'प्रश्न' के विस्तार में जीर्ण शाखाओं,मौन सुमनों,चोटियों से प्रश्न न करने का आग्रह करती कवयित्री कहती हैं, यह भी मत पूछो कि कैसे ज्वालामुखी सी जली थी निर्मम धूप में। अनेक बिंबों के द्वारा वह अपना परिचय देते हुए समर्पित भाव से बताती हैं- मैं थी तुममें विलीन--पूर्ण द्रवीभूत। 'नारी' में नारी का भव्य, विराट चित्रण अद्भुत है। उनके पास सुंदर उपमाएं हैं,बिंब हैं और अलंकारिक चित्रण चमत्कृत करता है। चंद शब्दों,वाक्यों या पृष्ठों में अनिमा दास के सोनेट को समेटना संभव नहीं है। उनके पास विस्तार है, जिसे समझने के लिए विस्तार में जाना चाहिए। 'विग्रह' में वे संकल्पों को आदर्श विचारों के साथ जीवित करना चाहती हैं। वे बार-बार 'मोहना', 'प्रिया-मोहन', 'मोहन प्रिया' और 'मोहना! जैसी रचनाओं में  अपने मोहन को पुकारती हैं और समर्पित होना चाहती है। भगवान कृष्ण के प्रति कवयित्री का प्रेम पाठकों को नाना दिव्य अनुभूतियों से भर देता है। 'मां भारती' में रक्तिम अतीत, रक्तिम वर्तमान और रक्तिम भविष्य जैसा सच भयभीत करने वाला है और मां भारती सारी विसंगतियों से मुक्त होना चाहती हैं।

अनिमा दास जीवन में प्रेम को अधिक महत्व देती हैं। उन्होंने अपने सोनेट संग्रह में प्रेम जैसी उत्कट भावना पर बहुत लिखा है। प्रेम हर किसी के जीवन का वह पहलू है जिसकी चाह सबको है। जिसके जीवन में प्रेम  उतर आया, उसका जीवन धन्य हो गया और जिसे निराश होना पड़ा,उसे उसकी महत्ता समझ में आ जाती है। अनिमा दास 'विरह से प्रेम' में प्रेम को परिभाषित करती हैं और तुलना भी- "तुम्हें प्रेम से प्रेम है असीम, मुझे विरह से प्रगाढ़ आत्मीयता।" हर किसी के जीवन में ऐसा विरोधाभास प्रेम की उच्चतर अवस्था होती है। यहाँ भी कवयित्री को प्रणय से वैराग्य है और मृत्यु काम्य है।

'मैं अभिसारिका' सोनेट में चिन्तन की गहराई, भाव-संवेदनाओं से भरी अनुभूतियाँ और प्रेमी-प्रियतमा के बीच जबरदस्त विरोधाभास के बावजूद कवयित्री का भाव, विह्वल और चमत्कृत करने वाला है-

विपरीत है संबंध का स्वरूप, किंतु है नहीं निष्ठुर भ्रांति
रहूँगी मैं तेरी चिराभिसारिका, प्रेम की हूँ शेष विश्रांति। 

'प्रेयसी' में नायिका के मन के गहन भाव,प्रेमानुनय,सहज तत्परता,सहज स्वीकार परन्तु मुँह से नकार उनके काव्य लेखन का श्रेष्ठ उदाहरण है। 'मनोकामना' व 'उद्गार' सोनेट में कवयित्री के भाव और बिंबों से भरे शब्द पाठक को किसी सात्विक आलोक में ले जाते हैं। नाना विरोधों व असमानताओं के बावजूद प्रियतमा का सहज समर्पण भाव और उद्गार देखते बनता है। 'प्रेम पराग' में वे लिखती हैं कि तुम्हारी मधुर स्मृति उन्मुक्त बादलों में घुलकर उत्तर दिशा से उड़ आयी है,उसमें तुम्हारे प्रीति की सुगंध है जो उन्मादित कर रही है। वियोग के इस दुःसह काल में तुम्हारा स्वागत है हे दिव्य दुख! तुम शून्य ही शून्य में आओ। मेरा हृदय मौन है,तुम इसमें असंख्य मौनता का उपहार दे जाओ। 'वियोग एवं प्रेम' में नायिका की स्थिति बड़ी विचित्र है,कभी प्रेम की अनुभूति होती है, कभी वियोग की, कभी सहस्र वीणाओं से प्रणय की धुन और कभी तृप्ति से वंचित,विरहाग्नि में दहकता सर्वांग। ऐसे गीत/सोनेट गहन अनुभव के दौर से गुजरने के बाद ही लिखे जा सकते हैं। साहित्य में हमने ऐसे नाना प्रसंगों को पढ़ा है, सुखद है अनिमा दास जी के रूप में आज वैसी ही साक्षात मूर्ति हमारे सामने हैं। प्रेम हो,वियोग हो तो 'विरह विलाप' होता ही है। यहाँ मूलतः उलाहनाएँ हैं,दोनों की स्थितियों, दशाओं की तुलना हैं और अंत में मासूम प्रश्न भी-

ज्वलन मेरी आत्मा की है असह्य क्यूँ?
अस्थिर क्षरित व्यथा न होती सह्य क्यूँ?

'प्रेम' और 'कुँवारी प्रीति' जैसे सोनेट के प्रेम, वियोग के उच्चतर भाव पाठकों के हृदय में विह्वलता जगाते हैं,लिखती हैं- 'उर था शुष्क व्यथित' या 'था चंचल पीड़ा का घोर उन्माद' या 'प्रतीक्षारत है दिन' और 'भीग रही है अश्रुजल में कुँवारी प्रीति'। कवयित्री के ये गहन भाव सबको बहा ले जाने वाले हैं। प्रेम में सर्वाधिक दुखद होता है जब नायिका उपेक्षित महसूस करती है या उसके प्रेम की सम्पूर्ण स्वीकृति नहीं मिलती। उसका मन चीत्कार कर उठता है। कवयित्री की यात्रा में प्रेम के बाद विरह है,जीवन मे पीड़ा है,उसका मर्मस्पर्शी चित्रण पराकाष्ठा तक पहुँचता है और मृत्यु आकर्षित करती है, लिखती हैं-

गतिमान है विहग दल श्वेत शब्द के पंखों पर चले आओ
मृत्यु यहाँ महकती है,प्रिय,मंदराचल पर मंगलगान गाओ।

अनिमा दास शब्दों की थाल सजाती हैं जैसे कोई पूजा के लिए थाल लेकर अपने देवी-देवता के विग्रह के सामने सम्पूर्ण श्रद्धा से एक-एक पुष्प अर्पित करता है, उनके सोनेट में शब्द मानो पिरोये हुए हैं। कल्पना कीजिए,कोई सर्वांग सौन्दर्यमयी,पूर्ण समर्पण भाव लिए,हृदय और पूरा गात प्रेम और श्रद्धा से भरा, एक-एक शब्द जोड़ रही है। अनिमा दास की साहित्यिक यात्रा ऐसे ही प्रेम,रोमांच, विरह से भरी हुई है। 'मैं', 'मैं और तुम', 'प्रिय मेरे', 'स्पर्श--स्वप्न का' जैसे सोनेट की गहन अनुभूतियाँ सहजता से सब कुछ उजागर कर देती हैं।

यह भी एक विचित्र संयोग ही है, 'मृत्यु' उनके लेखन में डर पैदा नहीं करती बल्कि भिन्न तरह से आकर्षित करती है।'मृत्यु कलिका' में लिखती हैं-

इस संघर्ष की समाप्ति है तू, मैं केवल अवशेष हूँ
अंत में मेरी प्राप्ति तू ही है, मैं केवल निर्निमेष हूँ।

कवयित्री ने सहज मन से लिखा है- स्वीकार है मुझे तू, इस महायात्रा की प्रक्रियाओं में। मृत्यु के प्रति ऐसी आसक्ति विरले देखने को मिलती है। उनके यहाँ मृत्यु किसी खुशबू की तरह है,महकती रहती है। 'री मृत्यु!' सोनेट में  संवाद और उसका स्वागत अद्भुत है।

सोनेट लेखन में सिद्धहस्त अनिमा दास किसी निर्झरणी की तरह सतत प्रवाहित होती दिखाई देती है। उनके लेखन में प्रकृति,ऋतुएं और मानवीय भावनाएँ जिस तरह समाहित हैं,जिस तरह उनका विस्तार हुआ है, उससे उनकी अद्भुत क्षमता का परिचय मिलता है। 'पर्यावरण', 'शीत ऋतु', 'मेघावृत आकाश', 'पुष्प', 'जीवन नदी', 'चंद्रलेखा', 'विषपुष्प', 'उषा', 'प्रकृति कुमारी', 'ऋतु', 'पावस', 'अपरिचित अश्विन', 'विभावरी', और 'शिशिर के शतदल' जैसे सोनेट  में अनिमा दास ने अपनी चरम अनुभूतियों को व्यक्त किया है। जिसने प्रकृति के साथ मानवीय संवेदनाओं को जोड़ना सीख लिया,उसके लिए सृष्टि स्वतः खुलती चली जाती है,कुछ भी गोपन या रहस्यमय नहीं रह जाता। हमारा चित्त आकर्षित होने लगता है और प्रकृति अपना सर्वस्व दोनों हाथों उलीचने लगती है। अनिमा दास ने 'चित्रांगदा', 'उर्वशी', 'चंद्रलेखा', 'मित्रविंदा', 'शेफालिका' जैसी रचनाओं में मिथक को गढ़ने की कोशिश की है और सहज ही भीतर के भावों को पल्लवित, कुसुमित किया है। उड़िया साहित्य की यह पहचान भी है जिसका मर्मस्पर्शी वर्णन अपने सोनेट में कवयित्री ने किया है। 'चित्रांगदा' में लिखती हैं-

तुम्हारे विक्षिप्त हृदय का,मैं हूँ एकमात्र भग्नांश
स्पंदन में मेरे,अभिगुंजित क्षताक्त कल्पित रुदन।

हमारे जीवन में ईर्ष्या, द्वेष, जलन, अहंकार जैसी भावनाएँ जड़ जमाए हुए हैं और मनुष्य त्रासदी झेलता रहता है। अनिमा दास उन बुराइयों को समझती हैं, उन्होंने अपने आसपास लोगों को त्रस्त होते देखा है और उस पीड़ाजनित अनुभूति को 'अहंकार', 'ईर्ष्या जाल', 'आत्मग्लानि', 'मेरा उत्कल', 'उठो कंकाल' और 'स्मृति एवं भ्रांति' जैसी रचनाओं में उकेरा व चित्रित किया है। 'क्रंदन' में लिखती हैं-

आतंकित है शांत धरती---थरथराता काँपता गगन
विक्षोभ मन में असीम, कौन सुने आत्मा का क्रंदन।

अनिमा दास जीवन के कुछ सहज,महत्वपूर्ण भाव-पक्षों को लेकर भी सोनेट लिखती हैं जैसे 'एकाकीत्व', 'स्व आवृत्ति', 'आत्मध्वनि', 'स्थितप्रज्ञ','त्याग', 'शुभरात्रि', 'विलयन', 'महारात्रि', 'आलिंगन', 'तृप्ति', 'समर्पण', 'पुनरावृत्ति' व 'परितृप्ति' और उनके गहन भाव संवेदनाओं का प्रकाश करती हैं। ऐसी गहन भाव-संवेदनाओं का सहज निरूपण अनिमा दास की लेखनी से ही संभव है।

अनिमा दास के पास असंख्य शब्दावली है,हर भाव-संवेदना और हर स्थिति के लिए उपयुक्त शब्द उन्हें सहज ही उपलब्ध हैं। उनके लेखन में संस्कृत-निष्ठ और उड़िया भाषा के शब्दों की भरमार है। कई बार पाठकों के लिए दुरूह स्थिति पैदा हो जाती है। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है,उन्हें पढ़ने के लिए पाठकों को शब्दकोष का सहारा लेना पड़ेगा। अपने भविष्य के लेखन में उन्हें कतिपय क्लिष्ट शब्दों का शब्दार्थ नीचे लिख देना चाहिए। मुहावरे, अलंकार आदि का भी उनकी रचनाओं में यथा प्रयोग हुआ है और भावों की जबरदस्त अभिव्यक्ति हुई है। वे मन के भीतर छिपाकर कुछ भी नहीं रखतीं,जो भीतर है, उसे अपने पाठकों को समर्पित करती हैं,चाहे उनका प्रेम हो, पीड़ा हो, देहानुभूति या ईश्वरीय अनुभूतियाँ हों। यह साहस भी विरले लोगों में होता है। अंत में श्री विनीत मोहन औदिच्य जी के कथन को उद्धृत करता हूँ,उन्होंने लिखा है-"इस काव्य संग्रह में अंतर्व्यथा से शिशिर के शतदल तक हर सोनेट का इन्द्रधनुषी सौंदर्य देखते ही बनता है। स्वर माधुर्य एवं भाव प्रवणता से सुसज्जित ये सोनेट कालजयी होकर उभरे हैं।"

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