'इज्या' की जीवंत, प्रेम और रहस्यमयी कविताएँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी

समीक्षित कृति: इज्या (काव्य संग्रह)
कवयित्री: पारमिता षडंगी
मूल्य: ₹ 200/-
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई


कविता में मन के उद्गार व्यक्त करने की अपूर्व क्षमता होती है और वह हर किसी के मन को छूती, सहलाती है। कविता सुकून देती है और मन की शांति का हरण भी करती है। यह किंचित भिन्न लगता है, कविता एक साथ दोनों प्रभाव कैसे छोड़ती है, कैसे हमारी प्राण-चेतना को उस ऊर्ध्व तक ले जाती है। कविता सफलता पूर्वक यह कार्य सम्पन्न करती है। उसकी पैठ हमारे अंतरतम तक सहज ही होती है, वह भीतर के तारों को सहज ही झंकृत करती है और हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व नृत्य-मुद्रा अख्तियार कर लेता है।

कुछ महीनों पूर्व ही उड़िया-हिन्दी की महत्वपूर्ण कवयित्री-कहानीकार सुश्री पारमिता षडंगी से परिचय हुआ है। उनके पिता श्री वंशीधर षडंगी उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार हैं, उनकी छोटी बहन इप्सिता षडंगी कविता लेखन और आलोचना में संलग्न हैं। मेरे लिए सुखद है, इस तरह मुझे हिन्दी के अलावा गैर हिन्दी-भाषी लोगों द्वारा लिखे जा रहे हिन्दी भाषा साहित्य को पढ़ने, देखने का अवसर मिल रहा है। उड़िया साहित्यकारों का जीवनानुभव अपने तरीके से प्रभावित, रोमांचित कर रहा है। काव्य संग्रह के पृष्ठ भाग में, प्रकाशक की ओर से विज्ञापित है-"पारमिता षडंगी ओड़िया साहित्य जगत में एक जाना-पहचाना नाम है। नारी मनस्तत्व का विश्लेषण, सूक्ष्म अवबोध का अन्वेषण तथा एक बलिष्ठ कहानी के आधार-उनकी कहानियों को अलग परिचय देते हैं। जीवनवादी कहानीकार होते हुए भी पारमिता की कविताएँ चेतना और मानसिकता को खूब प्रभावित करती हैं। हिन्दी और ओड़िया साहित्य में कई पुरस्कारों से सम्मानित पारमिता का यह प्रथम कविता संकलन है। इन कविताओं की कलात्मकता, हिन्दी कविता साहित्य में एक स्वतंत्र स्थान अधिकार किया है।"

विजय कुमार तिवारी
भूमिका के तौर पर पारमिता षडंगी 'मेरी कलम से' में लिखती हैं, "अपने भीतर समुद्र की लहरों जैसे प्रबल वेग से उठने वाली कुछ अभिव्यक्ति को प्रकाशित करने के लिए जब कलम पकड़ती हूँ तो फिर वही पीड़ा, जैसे प्रसव-वेदना। उसके साथ मेरे सारे शब्द नहीं मानते मेरी बात। लुका छुपी खेलते हैं, आसानी से पकड़ में नहीं आते हैं। छोड़ देती हूँ अभिमान को, समर्पण कर देती हूँ अपने आपको उनके सामने। फिर जाकर लिख पाती हूँ एक कविता।" 

वे आगे लिखती हैं, "फिर कलम पकड़ती हूँ-- बन जाती हूँ मैं रंगीन तितली, उड़ती हूँ शब्दों के साथ।" पारमिता महत्वपूर्ण बात बताती हैं, "मैं शब्दों की उंगली पकड़ती हूँ, वे रास्ता दिखाते हैं, निकाल लेते हैं मुझे त्रिशंकु अवस्था से, यत्न से।" इप्सिता षडंगी ने इस संग्रह पर अपनी भावुक टिप्पणी की है, उसे पढ़ने और अनुभव करने का अपना आनंद है, वे लिखती हैं-"दीदी की कविताएँ आधुनिक कविता शैली में रहकर भी एक स्वतंत्र परिचय प्राप्त करती हैं। उनकी कविता प्रतीकवाद होने के साथ-साथ कल्पना क्षेत्र में मौलिक और प्रभावशाली है। कुछ कविताएँ शब्द, अर्थ से उपर उठकर एक शाश्वत ध्वनि का परिचय कराती हैं। ----दीदी की कविताएँ जितनी स्वप्निल हैं उतनी वास्तव जीवन की परिभाषा को भी बोलती हैं।"

'इज्या' के पृष्ठ भाग के भीतरी पन्ने पर लता तेजेश्वर 'रेनुका', मोतीलाल दास जी और हीना मोदी ने बधाइयाँ-शुभकामनाएँ दी हैं। हिन्दी के कवि ब्रज श्रीवास्तव ने 'सकारात्मकता का अभिनंदन' शीर्षक से पारमिता की कविताओं की सुन्दर, सार्थक विवेचना की है। उनके भाव-विचारों को उद्धृत करना उचित ही है, वे लिखते हैं-"पारमिता की कवि समझ बहुत दूर तक है। निःसंदेह वह अपनी कहन से हमें चकित करती हैं। उनका लक्ष्य अमानवीयता को संसार से खदेड़ने का है। उनकी कविता में यह संदेश जगह-जगह पर नजर आया है कि मनुष्य को मनुष्य की तरह सम्मान मिले, उसे जीने की और कहने की आजादी मिलनी ही चाहिए। एक वास्तविक कवि हमेशा इन्हीं बातों की पैरवी करता है कि प्रेम और सद्भावना के ध्वज लहराते रहें। सभी इंसान इन्हें फहराते रहें।"

'इज्या' काव्य संग्रह में पारमिता षडंगी की कुल 45 कविताएँ हैं जिनकी शब्द-साधना उनके लिए सहज तो नहीं ही रही होगी, फिर भी उन्होंने प्रयास किया और सफल हुई हैं। मैं उन्हें बधाई देता हूँ और सतत हिन्दी काव्य लेखन के लिए शुभकामनाएँ भी।

कवयित्री  के सामने 'अनकही' कविता में विचित्र सी परिस्थितियाँ हैं, शहर अवसादों से भरा है, समझौता किए जा रहा है और शब्दों के मृत्यु की घोषणाएँ भी। उसके सामने प्रश्न है-क्या सच में/शब्दों की अब/ कोई आवश्यकता नहीं? वह बगीचे में देखती है-यहाँ तो लटक रहे हैं/शब्दों के शव। उपर आकाश में उड़ रही थी शब्दों की खाल/और यह शहर/डूब रहा था/एक शुष्क/शब्दकोष की अंदर। सारे बिम्ब बेचैनी दिखाते हैं। पहले भी लोगों ने कविता के मृत्यु की घोषणाएँ की हैं, कविता लिखी जा रही है। वैसे ही शब्द कभी नहीं मरते, हर संघर्ष के साथ नये-नये तेवर लिए उभरते हैं और हुंकृति करते हैं। 'आईना' की छवि जानी-पहचानी सी है, कुछ अनजानी सी और जो बोलना होता है, वह तो रह ही जाता है। बिम्ब देखिए-आईने में वह ऐसी थी/जैसे डाक में न भेजे जाने वाली/कुंवारी चिट्ठी। कवयित्री को दोनों की अनुभूतियों में इतनी समानता दिखती है, वह पूछती है, वह मैं ही तो थी? पारमिता षडंगी की कविताओं में विस्तार है, कथ्य उभरते हैं, दृश्य दिखाई देते हैं परन्तु वे एक-दूसरे से तालमेल के अभाव में प्रभाव खो बैठते हैं। भाषा व व्याकरण के साथ-साथ जो भाव प्रकट करना चाहती हैं, उसके लिए उपयुक्त शब्दों को किंचित अधिक तलाशने की जरुरत है। 'इतिहास' कविता में वह संकल्पित होती हैं-कुछ तो करना पड़ेगा/ढूँढना होगा शब्दों के पीछे/छिपे हुए अर्थ को। वह सुझाव देती हैं-अब इतिहास की नीरवता के/पास जाओ/रफू कर लो उसके फटे हुए/कपड़ों को/सुन लो उसके टूटे शब्दों के/गुहार को, देखना अर्थ सारे/निकल आएंगे।

'खजुराहो' कविता में मन की पीड़ा उभरती है-इस गुफा के संगीत और/अंधकार के बीच में/समय ने मुझे भी छला है। प्रश्न देखिए- क्या किसी पुरुष ने दी है/कभी अग्निपरीक्षा? वह सत्य लिखती हैं-हाँ, यह सच तो है/प्राण हो या निष्प्राण/नारी को ही तो ढूँढनी पड़ती है/अपनी अस्मिता। वह आगे लिखती हैं- कैसे कहूँ तुम्हें/भाषा के अलावा/नहीं कोई और हथियार/मेरे पास। कवयित्री के भीतर की दर्द भरी अनुभूतियाँ नारी-विमर्श का मार्मिक चित्रण है। 'शेष पृष्ठा' घड़ी और वक्त के अन्तर्द्वन्द में उलझी कविता है। आरम्भ और अंत सबको पता है परन्तु बीच का जीवन दूसरा कोई जान सकता है क्या? अपने अंत को स्वीकार करती यह मार्मिक और यथार्थ कविता है। 'मेरे बाद' जीवन का सत्व बयान करती कविता है। मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। कवयित्री लिखती हैं- फिर भी सोचते हो/'काश! मैं वापस आ जाती/तुम्हारे पास, और मिट जातीं/सारी दूरियाँ'/अगर ऐसा है तो/महसूस करो मुझे/स्वीकार करो/मृत्यु जैसा कुछ नहीं है/मेरे जाने के बाद भी।

पारमिता की गहरी दृष्टि से भरे हुए बिम्ब सहज समझ में नहीं आते। 'गीत' की पंक्तियाँ देखिए- रस की सच्ची धार तो/पत्थरों में ही प्रवाहित है/खुली आँखों से सपना/देखती नायिकाएं/उनके अंग हैं/वे किसी के संग हैं/फिर भी होंठों पर चुप्पी है। कवयित्री ने छेनी को पंखुड़ी में, पत्थर को मेनका में बदल देने वाली कविता लिखी है। 'कविता लिखनी है' में वह बताती है-आजकल बहुत कम चीजें/असर करती हैं---आगे स्पष्ट करती हैं- मैं तुम्हें बता दूँ/जिस रस में रहस्य नहीं/वह कविता नहीं/अब मुझे जाने दो/भीगना है मुझे/राग में/अनुराग में/विराग में। वह यशोधरा और बुद्ध का प्रसंग याद करती है, कहती है-मुझे मत रोको, कविता लिखनी है अभी। कवयित्री सदैव प्रेयसी या भक्ति भाव में बहती रहती है, अपने भगवान या प्रियतम से संवाद करती है और कविता में प्रेम व वैराग्य चित्रित करती है। 'कोहरा' में कौन नायिका की तमन्नाएँ जगा रहा है? वह कहती है- मेरे स्वप्न के भाग्य में वह/भीगी हुई सर्दी की रात नहीं। 'मीरा' कविता में कवयित्री मीरा बन जाना चाहती है जिसके प्रेम का अंत नहीं है या प्रतीक्षा की सीमा नहीं और कहती हैं-'मैं तुम्हारी हूँ कृष्ण।' 'पिता' के लिए ऐसी सहृदय विराट अनुभूति पारमिता ही कर सकती हैं, लिखती हैं- समृद्ध है वह/मेरे भीतर/किसी सुरक्षित दुर्ग की/सुरंग जैसे/ले जाते हैं/भिन्न एक पृथ्वी का/आलोकित इलाका/जहाँ, मैंने ढूँढ लिया है/ईश्वर से भी/अधिक ईश्वर को। 'मंत्र' कविता में कवयित्री शब्दों के मंत्र बनने की प्रक्रिया समझाती हैं-पकड़कर सारे शब्दों को/ले आई तुम्हारे पास/बदल गये वे सारे शब्द/मंत्र में/शायद तुम्हारे छूने के बाद।

'तन्हा शाम' कोरोना काल की वीभत्स और भयावह कविता है। भुताणु ने सब कुछ बदलकर रख दिया है और सारा चित्रण डरावना है। कवयित्री का भाव देखिए- ये तो कोरोना का कहर है, और/इस घर से हमें उभरना है। 'वापसी' जीवन के कठिन प्रश्नपत्र की मार्मिक कविता है। वह कहती है- धीरे-धीरे बीतने/वाला समय, कभी-कभी/फँस जाता है धागों की तरह। आगे पूछती है-अंधेरी कोठरी में/उदास झरोखे/इंतजार करते हैं किसी की/वापसी का/क्या सचमुच कोई कभी/वापस आया है/किसी के इंतजार को/सफल करने के लिए। मृत्यु के बाद या छोड़कर चले जाने के बाद कोई वापस नहीं आता। 'वर्षा और मैं' भक्ति में डूबी प्रेयसी की प्रतीक्षा की कविता है-निःशर्त प्रेम है मेरा/निर्विकार तुम/अगर चाहो, परीक्षा ले लो/इसी रात की।

पारमिता षडंगी की 'मैं' कविता स्त्री-पुरुष के रिश्ते की गहन छानबीन करती है, उनकी पीड़ा देखिए-तुम्हें राज करने का/अधिकार दिया था मैंने/मान रही थी सारे हुक्म/तुम्हारी छाया के नीचे/जकड़ गया था/ मेरा सम्मान/बिना करवट लिये। यह अनुभूति देखिए-प्रेम नर-नारी का/एक युद्ध, आदर्शों का, भ्रम का, कल्पना और विलास का। कवयित्री पुरुष की सीमा रेखा बताती है-पति और पिता का कर्तव्य/फिर/और क्या काम पुरुष का। कविता की अगली पंक्तियों में नारी-व्यथा का चित्रण है और चुनौती भी- अहिल्या हूँ, सीता हूँ, द्रोपदी भी हूँ/क्रोध मत दिलाओ/वरना, गुम जाओगे तुम। 'एक चाँदनी रात' की सुखद स्मृति है कवयित्री को-मैंने चाँद को देखा/मेरे भीतर के समुद्र में/उफान आने लगा। वह शब्दों से कहती है- रख लो अपने अर्थों को/सम्भाल कर/व्याप्त है प्रेम की धारा/वो जंगल खत्म होने तक/चलो मेरे साथ/ मैं दे दूँगी तुम्हें पता/एक चाँदनी रात का। 'असहायता' निराशा में डूबे मन की कविता है, जीवन भर की यात्रा निरर्थक लगती है और माया नगरी(मुम्बई) का यथार्थ देखिए-निष्ठुर है ये माया नगरी/हाथ बढ़ाकर भी/सहारा कहाँ देती है। 'किन्नर' प्रजाति के सत्य, पीड़ा और दुखद जीवन की मार्मिक कविता है। 'हम-तुम' सुखद जीवन की अद्भुत कविता है-यहाँ मैं हूँ--तुम हो/और हमारे बीच/खिले हुए फूलों की बारात/ उनकी महक लेकर/मैं बदल जाऊँगी/ एक सफेद कागज में/तुम छू लेना/मुझे प्यार से। 'अनाज' में किसान के साथ-साथ सभी के लिए वीभत्स युद्ध की स्थिति का चित्रण करते हुए मार्मिक संकेत है। 'खालीपन' अकेले होते जाने के संत्रास की कविता है, देखिए-और बेबसी में मैं/कुछ परायेपन को/अपने आसपास/आईने की चमक समझकर/खाली कविता ही लिखती/रहती हूँ। 'कोनार्क' के सूर्य-मन्दिर के लिए 'प्रस्तर कविता तुम' से बड़ा कोई भाव नहीं हो सकता। कवयित्री की अनुभूतियाँ देखिए-दूर क्षितिज से आने वाली/रक्तिम आभा/विभक्त कर देती है/उस नजर को जो/दिखती है, मिलन के लिए आतुर गणिका की आँखों में/और, इंतजार की मधुरता लिए/किसी एक प्रेयसी के मन में। पीड़ा और संवेदना अनुभव कीजिए कवयित्री के मन की-उड़ने को तत्पर तुम/कोशिश तो की होगी/फिर भी कहाँ उड़ सके/प्रस्तर के हृदय में/प्रेम का समुद्र।-----पत्थर हो तुम/फिर भी साक्षी/प्रेम की/मिलन की/प्रतीक्षा की/विरह की/छुपी हुई है एक शून्यता/तुम्हारे भीतर। एक सुखद उम्मीद है पारमिता को-कल फिर नया सवेरा आयेगा/सूरज की रक्तिम आभा/अधीर है/लज्जा की ओढ़नी से/निकल कर/चूमने तुम्हारे माथे को/सबसे पहले। 'भारत के वीर' कविता में हमारे वीर जवानों के शौर्य, पराक्रम और त्याग के भाव भरे हुए हैं। ऐसे वीरों को शत-शत नमन।

'असुरक्षित परी' भय और असुरक्षा की कविता है। आज ऐसा ही माहौल है, कोई सुरक्षित नहीं है। 'काश' बेबसी, लाचारी और गरीबी की कविता है। ऐसी कविताएँ कवयित्री के भीतर की संवेदना, करुणा दिखाती हैं। 'आहुति' किंचित दुरूह कविता है और सारे बिम्ब अबूझ पहेलियों की तरह। इसके पीछे कोई कहानी है, कोई यज्ञ जी रही है कवयित्री। इस संग्रह का शीर्षक 'इज्या' शब्द इसी कविता में है जो संकेत करता है, जीवन का हर क्षण यज्ञमय है। 'तलाक' की गहन पीड़ा, 'एक ऐसी रात' की संवेदना और सारे ऐतिहासिक सन्दर्भ बहुत कुछ स्पष्ट करते हैं, जोड़ते हैं। प्रश्न देखिए-कैसे पहचानोगे इतिहास की/फटी हुई दीवार में/मरे हुए अक्षरों को। 'द्रष्टा' अपने ईश्वर की तलाश में मुखरित होते सारे सन्दर्भ कवयित्री के भीतर का प्रेम और पुकार की कविता है।

पारमिता षडंगी की कविताओं की विशेषता यह भी है, सांसारिक प्रेम की यात्रा करते-करते अचानक सब कुछ ईश्वरीय प्रेम में बदल जाता है। उनकी कविताओं में प्रयुक्त शब्द 'तुम' कभी ईश्वर होता है और कभी उनका सांसारिक प्रियतम। ऐसे में प्रेम तनिक जटिल लगता है जबकि प्रेम तो सहज होता है। कहीं यह जटिलता कवयित्री के जीवन में है जिसे व्यक्त करते हुए कविताएँ लिखती जा रही हैं, नाना रसों में भीगी हुई। 'रिश्ता' इसी गहरे भाव की कविता है। 'बापू का भारत' देश की वर्तमान परिस्थितियों पर यथार्थ चिन्तन है। 'नया साल' में तनिक व्यंग्य भी है और पीड़ा भी। 'भ्रम' और 'जहाँ पहुँच नहीं सकते' जैसी कविताओं के माध्यम से कवयित्री का समग्र चिन्तन उभरता है, सामान्य जीवन, उच्चस्थ दार्शनिकता और पूर्णता की तलाश।  

पारमिता अपनी कविता में दृश्य उकेरती हैं, रंग भरती हैं और दोनों हाथों उछाल देती हैं। 'बसंत' के आगमन का भाव बहुत गहरा है-मेरे भीतर किसी खास जगह में/तेरा हर पल अपने आप/कविता बन कर/ऐसे इश्क की खुशबू फैलाता है/जिसमें प्यार भी है/और आशिक भी/बसंत आ गया है जो। 'आईना-2' संदेह, तिरस्कार और त्यागी हुई स्त्री के भाव की कविता है, प्रश्न देखिए-पवित्र होने के लिए/क्या सचमुच गंगाजल की आवश्यकता है/या आग की। वियोग का भाव लिए त्यागी हुई स्त्री महाकाल को पुकारती है-अब मेरी इतनी प्रार्थना/है, महाकाल, कर दो मुक्त/गिरते हुए पत्ते को/उसके सपने से जो देखा था उसने शाखाओं के साथ/पुनश्च मुक्त कर दो। लाचारी है, उसने तो 'प्रवेश निषेध' टांग रखा है अपने आदिम युग की गुफा में। 'ईप्सित' कविता का आलोक देखिए-हे मेरे ईप्सित!/मेरे भीतर से बाहर निकल आओ/मुक्त करो मुझे/उस इंतजार से जो/आज भी वह वृक्ष कर रहा है/और एक बुद्ध के लिए। कवयित्री प्रतिनिधित्व करती है मुक्तिकामी आत्माओं का, चित्रण देखिए-मेरे भीतर के खालीपन में से/एक आवाज निकल रही है/मुक्ति के लिए/उस यात्रा से/उस उम्मीद से/उस स्वप्न से/मगर बधिर है समय। 'कविता' प्रसव की अनुभूति का व्यापक चित्रण है जिसमें उत्साह-उमंग है, पीड़ा है, सुख और समर्पण है। कवयित्री कविता के जन्म लेने की सम्पूर्ण प्रक्रियाओं, परिस्थितियों  से परिचित है।

पारमिता सदैव किसी खास मनःस्थिति में रहती है, भीतर खालीपन, जागने-सोने की बेचैनी, प्रेम की गुहार और मुक्ति की कामना। मन वैरागी भी है और प्रेम में डूबना भी चाहता है, 'चलो एक तस्वीर बनाएं' की पंक्तियाँ देखिए-जिंदगी, जिंदगी को बुला रही थी/मेरे भीतर के खालीपन में/रात भी थोड़ी-थोड़ी/मेरी नींद को चुराने लगी थी। कवयित्री नीरवता से उबरना चाहती है और बोलने वाली तस्वीर बनाना चाहती है। अचानक अहसास होता है, उम्र कहीं खो गयी है, वह ढूँढ रही है घने जंगल में। 'फिर से' कविता का भाव देखिए-चारों तरफ घेर के बैठे हैं/पंचभूत/मुझ से मेरे ही अंश को/छीनने के लिए। 'इंतजार' कविता में जीवन-संदेश छिपा हुआ है। सारे बिम्ब बहुत कुछ कहते, समझाते हैं और चिन्तन की दिशा देते हैं। कवयित्री का व्यापक जीवनानुभव पाठकों को झकझोरता है और इंतजार करने का संदेश देता है। 'सत्य से मिलकर' भक्ति, समर्पण और प्रेम की अद्भुत कविता है। ऐसी ही हैं पारमिता, इन्हीं भावनाओं से भरी हुई और ईश्वरीय प्राण-चेतना में डूबी हुई। 'शब्द, निःशब्द का' जैसी कविता मौन की साधना में लिखी जाती है। कविता के प्रश्न सत्य हैं-क्या सचमुच निःशब्द चुप रहता है?/नहीं तो, अविराम वह/कुछ ना कुछ बोलता है/गुनगुनाता भी है/कभी-कभी सुन लेती हूँ/उसकी कथा--उसकी व्यथा/विश्वास करो/पाषाण की आँखों से भी आँसू निकलता है।

सारांशतः कहा जा सकता है, पारमिता षडंगी की हिन्दी कविताओं का यह संग्रह चमत्कृत करता है, अनुभूति के जिस स्तर से कविताएँ निःसृत हुई हैं, वह उनके जीवन की तप-साधना है, प्रेम की तड़प है और उन्होंने उसे संसार से निकालकर ईश्वरान्मुखी बनाया है। उन्होंने स्वयं जीना सीखा है और अपनी कविताओं के माध्यम से दुनिया के लिए मार्गदर्शन दे रही हैं। हिन्दी भाषा पर उन्हें अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी, व्याकरण जानना, समझना होगा और सुगम्य कविताएँ लिखनी होंगी। उनके भीतर के भाव-प्रवाह पाठकों तक तभी पहुँच पायेंगे, जब सुगम्यता होगी। उनकी भाषा में हिन्दी के साथ-साथ प्रचलित उर्दू के शब्द बहुतायत हैं। निश्चित ही उन्होंने ऐतिहासिक सन्दर्भों को पढ़ा है, जाना है। उन्हें स्त्री के संघर्ष की समझ और ईश्वरीय व्यवस्था पर विश्वास है। यह उनका हिन्दी में प्रथम प्रयास है, निश्चित ही भविष्य में उनकी कविताएँ हिन्दी साहित्य में अपना विस्तृत आसमान बनाएंगी।


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