आत्मकथा अंश: आक के फूल, धतूरे के फूल

धरोहर

[विलक्षण लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी (28 मई1908-12 फ़रवरी 2003) हिंदी साहित्य के बड़े अद्भुत कथाशिल्पी और किस्सागो थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस विशाल देश की धरती से उपजे लोकगीतों की खोज में लगाया, और इसके लिए देश का चप्पा-चप्पा छान मारा। यहाँ तक कि जेब में चार पैसे भी न होते, पर इस फक्कड़ फकीर की उत्साह भरी यात्राएँ अनवरत जारी रहती थीं। धरती उनका बिछौना था और आकाश छत, जिसके नीचे उन्हें आश्रय मिल जाता। घोर तंगहाली में दूर-दूर की यात्राएँ करके, उन्होंने देश के हर जनपद के लोकगीत एकत्र किए और उन पर सुंदर भावनात्मक लेख लिखे, तो देश भर में फैले हजारों पाठकों के साथ-साथ महात्मा गाँधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, महामना मालवीय, राजगोपालाचार्य और महापंडित राहुल सांकृत्यायन तक उनके लेखन के मुरीद बने।
इन्हीं लोकयात्राओं में हासिल हुए अनुभवों की अकूत संपदा ने सत्यार्थी जी को कहानीकार भी बनाया। ‘जन्मभूमि’ सत्यार्थी जी की बड़ी मर्मस्पर्शी कहानी है, जिसे पढ़ते हुए देश-विभाजन की वह करुण त्रासदी सामने आ जाती है, जिसने पूरे देश को झिंझोड़ दिया था। आजादी के पचहत्तर बरसों बाद भी इतिहास के उन रक्त-रंजित पन्नों की कराहें सामने आती हैं तो हम स्तब्ध से रह जाते हैं।]
समय की पिटारी में वे स्मृतियाँ आज भी बंद पड़ी है। पिटारी का ढकना उठाया नहीं कि पुरानी स्मृतियाँ जाग उठीं। शायद इनका कोई क्रम नहीं, शायद इनका कोई अर्थ नहीं, ये स्मृतियाँ पिटारी से सिर निकालकर बाहर की हवा खाना चाहती हैं। बाहर की झलक देखना चाहती हैं।

घर में एक दुलहन आई है। रिश्ते में बालक की चाची है। माँ कहती है, “यह तेरी मौसी है।” चाची--मौसी, मौसी—चाची! बालक की समझ में यह बात नहीं आती। दुलहन तो दुलहन है। शायद बालक इतना भी नहीं समझता। वह दुलहन के पास से हिलता ही नहीं। माँ घूरती है। अब क्यों घूरती है माँ? बालक कुछ नहीं समझ सकता। 
माँ खिलखिलाकर हँस पड़ती है, वह चाहती है कि बालक उसका अंचल पकड़कर भी उसी तरह चले, जिस तरह वह अपनी मौसी का अंचल पकड़कर चलता है। बालक यह नहीं समझ सकता। दुलहन भीतर जाती है जहाँ अंधकार है। बालक भी साथ-साथ रहता है। दुलहन कपड़े बदल रही है। “तुम भी साथ चले आए?” दुलहन हँसकर पूछती है। अंधकार के बावजूद वह बालक के गाल पर अपना हाथ रख देती है, उसे भींच लेती है। 
कपड़े बदलकर, नया लहँगा पहनकर वह बाहर निकलती है। साथ-साथ बालक चलता है, सुनहरी गोट वाले मलगजी लहँगे से उसका हाथ नहीं हटता। दुलहन अपनी सखियों के साथ नहर पर जाएगी। वह सोचती है कि बालक उसके साथ इतना कैसे घुल-मिल गया। माँ अपनी जगह है, दुलहन अपनी जगह। दुलहन बालक को छेड़ती है, “तेरे लिए भी ला दूँगी एक नन्ही-मुन्नी-सी दुलहन!”

बालक हँसता नहीं। वह यह सब नहीं समझ सकता। उसकी तो एक ही जिद है कि दुलहन के साथ ही बाहर जाएगा, जहाँ वह आक के फूलों को हाथ से मसल सकेगा, जहाँ वह धतूरे के फूलों को तोड़ सकेगा। दुलहन की सखियाँ उसे मना करेंगी। दुलहन कहेगी—बच्चा ही तो है, ले लेने दो एक फूल!
घर की बैठक। दरवाजे अंदर से बंद। खिड़की भी अंदर से बंद। वहाँ एक बीमार पड़ा है। वह कब से बीमार है, बालक यह सब नहीं जानता। वह क्यों बीमार है? कब अच्छा होगा? बालक से कोई यह मत पूछे। बालक बैठक में चला आता है। अंधकार में उसका हाथ सरककर बीमार के पास आ जाता है। 
बीमार सब समझता है। वह उठता है। ऊपर रखी कोई चीज तलाश करता है। मिठाई। इसी मिठाई का एक टुकड़ा वह बालक के हाथ में थमा देता है। मिठाई का टुकड़ा लेकर बालक बाहर निकल गया। मिठाई कहाँ से आती है? बालक यह सब नहीं जानता। वह चाहता है कि उसे मिठाई मिलती रहे। 
“आक के फूल, धतूरे के फूल: ये फूल तो अच्छे नहीं!” हर कोई यही कहता है। “इतनी मिठाई भी मत खाया करो!” माँ डाँट पिलाती है। बाबा जी हैं कि उसे पिन्नी का टुकड़ा जरूर देते हैं—मेथी वाली पिन्नी का कसैला सा टुकड़ा। बालक पिन्नी का टुकड़ा जरूर लेता है। 
बाबा जी के पास हमेशा पिन्नियाँ रहती हैं। पिन्नी का टुकड़ा मुँह में डालते ही बालक थू करके इसे फेंक देता है। अब बाबा जी छोटा टुकड़ा देने लगे हैं। “पिन्नी अच्छी नहीं लगती तो लेता क्यों है?” माँ समझाती है। बालक नाचता है, गाता है—
अक्क दे फुल्ल
धतूरे दे फुल्ल,
की की मुल्ल
दस्स, भैणाँ!
दस्स, वीरा!
ताया जी दी बरफी
बाबा जी दी पिन्नी।
(आक के फूल, धतूरे के फूल, इनका क्या-क्या मोल है? बताओ बहन! बताओ बीरन! ताया जी की बरफी, बाबा जी की पिन्नी।)
*

दुलहन कभी-कभी बालक को अपने साथ नहर पर नहाने के लिए भी ले जाती है। वह अपनी सखियों के साथ नहर में उतरती है। बालक कपड़े उतारे जाने के बाद भी सीढ़ियों पर ही खड़ा रहता है, पानी में उतरते उसे डर लगता है। दुलहन उसे अपनी बाँहों में लेना चाहती है, वह भाग जाता है। दुलहन की सखियाँ उसे जबरदस्ती उठाकर एक-आध डुबकी देना चाहती हैं, बालक रोता है, चिल्लाता है। 
दुलहन सोचती है कि बालक नहर पर आया ही क्यों था? बालक यह सब नहीं जानता। उसे नहाती हुई दुलहन को देखने का शौक है। नहर की पटरी से नीचे आक के पौधे हैं। बालक दौड़कर आक और धतूरे के फूल तोड़ लाता है। “मत तोड़ो ये फूल!” सखियाँ उसे मना करती हैं। दुलहन हँसकर कहती है, “अरे, यह बच्चा ही तो है! इसे तोड़ लेने दो आक के फूल, धतूरे के फूल!”

पिता जी ने चमार को बुलाकर कहा, “हमारे बेटे का नाप ले लो।” चमार बालक के पैरों का नाप लेता है और चला जाता है। बालक भी सबकी नजर बचाकर चमार के पीछे हो लेता है। चमारों की गली। संता चमार का घर। चमार अपने काम पर आ बैठा। सामने पत्थर की सिल पड़ी है, जिस पर वह अपनी आर को तीखी करता है, अपनी रंबी को तेज करता है। रंबी से चमड़ा काटता है। आर से चमड़े में सिलाई करता है। बालक यह सब देखता है और सोचता है कि उसे तो अपना जूता खुद ही तैयार करना चाहिए।

चमार उसे देखता है। “तुम इधर कैसे चले आए, बेटा?” चमार पुचकारता है। चमारिन हँसकर कहती है, “बच्चा ही तो है!” चमार रंबी से चमड़ा काटते हुए कहता है, “अरी पगली! लाला जी ने देख लिया तो इसे मारेंगे।” 
संतासिंह किसी दूसरे बच्चे के लिए तैयार किए हुए लगभग उसी नाप के जूते उठाकर और बालक को साथ लेकर चल पड़ता है। आकर लाला जी से कहता है, “अपने बेटे को सँभालकर रखा कीजिए, लाला जी! और ये लीजिए इसके जूते।” लाला जी कहते है, “इतनी जल्द तैयार भी कर लाया, संतासिंह? अच्छा तो ठीक है।” 
फिर जब लाला जी को पता चलता है कि बालक संतासिंह के घर जा पहुँचा था, तो वह उसे घूरते हैं। संतासिंह कहता है, “इतना मत घूरो, लाला जी! अभी बच्चा ही तो है!” 
लाला जी को याद आता है कि इसी तरह एक दिन उनका बेटा बख्शी खाँ चिट‌्ठीरसाँ के घर जा पहुँचा था, जो छुट‌्टी वाले दिन जिल्दसाजी का काम करता है। उससे बालक उर्दू के कायदे की जिल्द बँधवा लाया था। लाला जी बालक को घूरते हैं और डाँटकर कहते हैं, “अंदर जाकर खेलो।”

स्कूल में बालक की पढ़ाई ‘कच्ची पहली’ में हो रही है। घर में उसकी पढ़ाई होती है ‘त्रिंजन’ में, जहाँ गली की लड़कियाँ, दुलहनें और माताएँ मिलकर चरखा कातती हैं। बालक को किसी का चरखा पसंद है तो अपनी मौसी का, जो उसे आक और धतूरे के फूल तोड़ने से कभी मना नहीं करती, जो उसे बलपूर्वक नहर में डुबकी नहीं दिलाती। 
श्राद्धों के दिनों में गली की लड़कियाँ ‘पूरो’ (अन्नपूर्णा, जिसे हिंदी में साँझी कहते हैं) बनाती हैं, लड़कों को वे अपनी पूरों नहीं दिखातीं। बालक है कि किसी-न-किसी तरह, और वह भी लड़कियों को दक्षिणा दिए बिना ही, मिट‌्टी से बनाई गई देवी के दर्शन कर लेता है।

भोर के समय जब गली की लड़कियाँ गाती हुई नहर की ओर जाती हैं तो बालक की आँख खुल जाती है और वह उनके साथ जाने के लिए लालायित हो उठता है। जिस दिन लड़कियाँ अपनी-अपनी थाली में घी के दीये जलाकर नहर की ओर चल पड़ती हैं, बालक लड़कियों के साथ रहता है, पूरो का जल में प्रवाह कर दिया जाता है और ये दीये भी फूस के पूले पर रखकर पानी में बहा दिए जाते हैं। बालक की कल्पना में नए-नए चित्र उभरते हैं—आक के फूल, धतूरे के फूल, पानी में बहते हुए दीये...!
*

गाँव के बाहर है ‘पत्थराँ वाली’, जहाँ शिवालय है और एक श्मशान भी। वहाँ बालक नहीं जाते, क्योंकि उन्हें डराया जाता है कि वहाँ भूत रहते हैं! बालक अपनी मौसी से बार-बार ‘पत्थरा वाली’ चलने के लिए जिद करता है। एक दिन वह कुछ बालकों के साथ वहाँ जा पहुँचता है, डरकर पीछे भाग आता है। उसके साथ दूसरे बालक भी दौड़ आते हैं।
घर आकर बालक अपनी मौसी को बताता है कि किस तरह उसने उधर से एक भूत को आते देखा, जिसके मुँह से आग निकल रही थी। मौसी हँसती है और कहती है, “इसीलिए तो मैं तुझे उधर नहीं ले जाना चाहती थी। फिर कभी मत जाना उधर, नहीं तो भूत खा जाएगा।”

‘सत गुरियानी’ सरोवर से सटा हुआ एक दूसरा श्मशान है। वहाँ भी भूत बताए जाते हैं। बालक वहाँ भी नहीं जाते। मौसी के मना करने के बावजूद बालक एक दिन ‘सत गुरियानी’ तक हो आया। रात को उसने स्वप्न में देखा—बालकों का एक जमघट लगा है, सब बालक उसकी तरफ बाँहें फैला रहे हैं, उसे अपने पास बुला रहे हैं!...मौसी ने सुना तो बोली, “फिर मत जाना ‘सत गुरियानी’!” लेकिन बालक का मन ‘पत्थराँ वाली’ और ‘सत गुरियानी’ जाने से बाज नहीं आता, जैसे वहाँ आक और धतूरे के फूल सबसे सुंदर हों। 
मौसी फूलाँ रानी कहानी सुनाती है। बालक को इस कहानी की फूलाँ रानी पसंद नहीं, क्योंकि मौसी कई बार कह चुकी है कि फूलाँ रानी तो कभी आक और धतूरे के फूलों को हाथ नहीं लगाती थी।
गाँव के छोटे चौक में सभा लगी है, पक्का गाना गाया जा रहा है। पक्का गाना! बालक को लगता है, जैसे गाने वाले का साँस टूट रहा है। वह उससे कहना चाहता है, “देखो जी, आक और धतूरे के फूल सूँघा करो, फिर गाना गाया करो!”
बामा मीरसी कई बार शिव का रूप धारण करके बाजार में आता है। उसे साधारण वेश में देखकर भी बालक समझता है, शिव भगवान‌् आ रहे हैं। वह ताया जी से मिली हुई बरफी या बाबा जी से मिली हुई पिन्नी का टुकड़ा बामा के हाथ पर ला रखता है और हँसकर कहता है, “इसे खा लो, महाराज!”
फिर एक दिन...ताया जी को आँगन में नहलाया जा रहा है। घर वाले रो रहे हैं। बालक यह सब नहीं समझ सकता। ताया जी को नहलाए जाने का दृश्य उसे याद रहता है...अब ताया जी कहीं नजर नहीं आते। मौसी कहती है कि ताया जी मर गए। बालक यह सब नहीं समझ सकता। वह तो यही जानता है कि अब बैठक में ताया जी की चारपाई नजर नहीं आती और अब उसका हाथ मिठाई के लिए आगे नहीं बढ़ सकता। बैठक में अब वह अंधकार नहीं है, दरवाजे खुले रहते हैं। बालक को इसका बहुत दुख है।

मौसी अब वह सुनहरी गोट वाला मलगजी लहँगा नहीं पहनती। इसका भी बालक को दुख है। सपने में वह देखता है—दुलहन ने वही लहँगा पहन लिया, उसने बालक को गोद में उठा लिया, वह उसे आक और धतूरे के फूल दे रही है। संता चमार के यहाँ बैठा बालक अपने हाथ से अपनी जूती सी रहा है! बख्शी खाँ के यहाँ बैठा बालक अपनी पुस्तक की जिल्द बाँध रहा है! राँझा वैरागी के पास खड़ा बालक कबूतर उड़ा रहा है! नीली घोड़ी पर सवार होकर बालक उसे दौड़ाए लिए जा रहा है, कभी ‘पत्थराँ वाली’ जा पहुँचता है, कभी ‘सत गुरियानी’!...
जमीन कहीं-कहीं से ऊँची-नीची होने लगती है, कहीं-कहीं पहाड़ियाँ सिर उठाने लगती हैं! बालक इन पहाड़ियों की तरफ अपनी घोड़ी दौड़ाता है... बालक को यह नापसंद है कि जमीन एकदम सपाट हो।
*

कभी-कभी गाँव में खानाबदोश आ निकलते हैं। गाँव के बाहर ये ‘गड‌्डीयाँ वाले’ अपनी गाड़ियाँ रोककर खेमे गाड़ देते हैं। उनके खेमों के पास चक्कर काटना बालक को बहुत पसंद है। खेमों से अजनबी आँखें बालक को अपने पास बुलाती हैं। नए-नए चेहरे देखकर बालक खुशी से नाच उठता है। मौसी बार-बार मना करती है, “ये तो खानाबदोश हैं, बच्चों को पकड़कर ले जाते हैं, इन पर कौन विश्वास करेगा?”
रात को सपने में बालक देखता है—वह भी खानाबदोशों के साथ शामिल हो गया है, घर पीछे रह गया, माँ पीछे रह गई, मौसी पीछे रह गई!...

बालक उर्दू का कायदा पढ़ रहा है, उसका मन नहीं लगता। कभी उसके कानों में चिड़िया और काग की कथा का वह बोल गूँज उठता है, “चीं-चीं मेरा पूँझा सड़िया! क्यों पराया खिच्चड़ खादा?” (चीं-चीं, मेरी पूँछ जल गई। हाय, मैंने पराई खिचड़ी क्यों खाई!) कभी वह कायदा बंद करके गुनगुनाने लगता है, “वा वगी उड़ जाणगे, लक्क टुनूँ-टुनूँ!” (हवा चलेगी तो उड़ जाएँगे, कमर टुनूँ, टुनूँ!) कभी उसे लगता है जैसे आज भी पहले की तरह उसकी माँ सवेरे जागने पर उसका मुँह धोते हुए गा रही है, “इच्ची-बिच्ची कोको खाए, घियो दी चूरी काका खाए।” (इच्ची-विच्ची यानी आँख का कीचड़ कोको—पंजाब की किंवदंतियों में भय का प्रतीक, खाए। घी की चूरी बालक खाए!) 
कभी कायदा पढ़ते-पढ़ते उसे झपकी आ जाती है, वह देखता है—उसकी मौसी भागवंती एक छोटी-सी लड़की का रूप धारण करके उसके साथ खेलने चली आई है। उधर से भाभी धनदेवी भी नन्ही-मुन्नी-सी लड़की बनकर उछलती-कूदती आ रही है। दोनों ने उसे पकड़ लिया और उससे खेलने लगीं और गाने लगीं—
चीचो चीच कचोलियाँ
घुमियाराँ दो घर कित्थे जे?
ईचकनाँ पर मीचकनाँ
नीली घोड़ी चढ़ यारो
भंडा भंडारिया किन्ना कुभार?
इक्क मुट‌्ठी चुक्क लै, दूजी नूँ तियार। 
लुक छिप जाना
मकई दा दाना,
राजे दी बेटी आई जे। 
(चीचो चीच कचोलियाँ। कुम्हारों का घर कहाँ है? ईचकने के ऊपर है मीचकना। यारो, नीली घोड़ी पर चढ़ो। हे भंडारे के भंडारी, कितना बोझ है? एक मुट्ठी के उठते ही दूसरी मुट्ठी तैयार है। ओ मकई के दाने, जल्दी से लुक-छिप जाओ, राजा की बेटी आई है।)

मौसी भागवंती जैसे देखते-देखते राजा की बेटी बन गई हो। धनदेवी पूछती हैं, “क्या मैं नहीं हूँ राजा की बेटी?” बालक उनकी बाँहों से निकलकर कहीं दूर भाग जाना चाहता है—दूर, बहुत दूर, नीली घोड़ी पर चढ़कर, जहाँ कोई यह न पूछे कि कुम्हारों का घर कितनी दूर है...‘इक्क मुट‌्ठी चुक्क लै, दूजी नूँ तियार।’ जहाँ एक मुट‌्ठी सिर से उठाते ही झट दूसरी मुट‌्ठी का भार नहीं आ पड़ेगा...

मौसी भागवंती और भाभी धनदेवी पर बालक रंग डाल रहा है। होली के दिन हैं। उन्होंने भी तो उसे रंग से भिगो दिया।...लोहड़ी के दिन हैं। दूसरे बच्चों के साथ मिलकर बालक द्वार-द्वार पर गाकर लकड़ी माँग रहा है, हाथ उठा-उठाकर सिर हिला-हिलाकर, जैसे सबसे अधिक मस्ती का अनुभव उसी को हो रहा हो, जैसे वही सब बच्चों का सरदार हो, सब उसके हुक्म में बँधे हुए गा रहे हों— 
पा नी माई पा,
काले कुत्ते नूँ वी पा,
काला कुत्ता दे दुआई,
तेरियाँ जीवण मंझियाँ, गाईं। 
(दान दो, माई दान दो, काले कुत्ते के लिए भी दान दो। काला कुत्ता दुआएँ दे रहा है, तुम्हारी भैंसें और गायें जीती रहें।)
भीतर से मौसी भागवंती निकलकर सबके देखते-देखते बालक को गोद में उठा लेती है और कहती है, “वाह! अपने ही घर से दान लेने चले आए‌?” दूसरी ओर से भाभी धनदेवी आकर उसके सिर पर हाथ मारकर कहती है—
दो दड़िक्का, पिया पड़िक्का,
माँ रानी घर होएया निक्का!
(दो दड़िक्का, पड़िक्का की आवाजें आईँ, माँ रानी के घऱ बेटा हुआ है।)

फिर माँ का चेहरा उभरता है। वह कहती है, “मै समझ गई, तुम्हें तो मौसी और भाभी ही अच्छी लगती हैं!”...और जब बालक की झपकी टूटती है, वह देखता है कि वह स्कूल के अहाते में पीपल के नीचे बैठा है जहाँ मास्टर जी उसे घूरते हुए कह रहे हैं, “तो यहाँ सोने के लिए चले आते हो? सोने के लिए घर होता है, पढ़ने के लिए स्कूल!”
बालक की कल्पना के द्वार बंद नहीं हो सकते। जैसे धनदेवी और भागवंती उसकी तरफ मकई का दाना फेंककर कह रही हों, ‘लुक छिप जाना, मकई दा दाना!’ जैसे मौसी गा रही हो—
हेरनी हो हेरनी
हेरनी छड्डियाँ लम्मियाँ,
मींह वरह्या ते कणकाँ जम्मियाँ,
कणकाँ विच्च बटेरे
दो साधू दे, दो मेरे।
(हेरनी ओ हेरनी! हेरनी ने लंबी कोंपलें छोड़ीं। मेंह बरसा तो गेहूँ उगा। गेहूँ के खेतों में हैं बटेर, दो साधु के, दो मेरे।)

जैसे बालक गेहूँ के खेतों में बटेरे पकड़ रहा हो। खरगोश हाथ आ गया। बालक इस खरगोश को गाँव में ले आया। गली के सिरे पर ही भागवंती और धनदेवी मिल गईं, यह खरगोश वे छीनने लगीं। बालक इस खरगोश को छोड़ना नहीं चाहता...उसकी झपकी टूटी तो क्या देखा कि मास्टर जी भी कुरसी पर बैठे ऊँघ रहे हैं। पीपल के पत्ते डोल रहे हैं। बड़ी उमस है। लड़के सब पसीना-पसीना, वह स्वयं भी पसीना-पसीना, मास्टरजी भी पसीने-पसीने। पीपल के पत्ते डोल रहे हैं। बालक सोचता है कि उससे तो पीपल के पत्ते ही अच्छे हैं। 
*

बालक को स्कूल अच्छा नहीं लगता, वह यहाँ से भाग जाना चाहता है। उसे लगता है कि गेहूँ के खेतों में बटेर भी उससे कहीं ज्यादा खुश होंगे। माई बसंतकौर की खँडहर ड‌्योढ़ी के सूराखों में रहने वाले जंगली कबूतर उससे कहीं ज्यादा खुश होंगे, और कहीं ज्यादा खुश होगा धीवरों का नौकर नूना, जिसने विवाह नहीं कराया, जिसका पोपला-सा मुँह किसी बुढ़िया का-सा है, जो प्रत्येक पक्षी की बोली की नकल उतार सकता है। 
बालक चाहता है कि मास्टर जी वाली कुर्सी पर नूना बैठे, या भागवंती और धनदेवी में से ही किसी को यह स्थान मिल जाए, फिर देखो उसकी पढ़ाई कितने मजे से चलती है!...
पीपल के पत्ते डोल रहे हैं। मास्टर जी कड़ककर बालक से कहते हैं, “तो तुम फिर सो रहे हो?” एकाएक बालक की झपकी टूटती है: भय से उसका अंग-अंग काँप उठता है। यह कैसा भय है? एक दैत्य के समान मास्टर जी हाथ में बेंत लिए बैठे हैं। ‘चिड़ी बिचारी की करें? ठंडा पानी पी मरे।’ 
बालक सोचता है कि वह भी एक दिन मर जाएगा, चिड़िया के सामान तड़प-तड़पकर। उसे तो ठंडा पानी भी पीने को नहीं मिलेगा। किसी गीत का बोल उसकी कल्पना को छू जाता है—
तिन्न तीर, खेडन वीर,
हत्थ कमान मोढे तीर!
(तीन तीर, बीरन खेल रहे हैं। हाथों में कमान है, कंधों पर तीर।)

बालक सोचता है कि उसके हाथ में तीर-कमान कहाँ हैं? होता तो पहला तीर मास्टर जी पर ही छोड़ता। बालक सोचता है कि एक दिन मास्टर जी बालक बन जाएँगे और वह मास्टर जी बन जाएगा। उस समय वह मास्टर जी से गिन-गिनकर बदला लेगा। 
उर्दू का कायदा। उसे हर शब्द कीड़ा-मकोड़ा प्रतीत हो रहा है। वह चाहता है कि कायदे को फाड़ डाले और उठाकर कागज के पुरजे मास्टर जी के मुँह पर दे मारे। 
भय ही भय! हँसी-खेल के कीड़े-मकोड़े रींग रहे हैं। ‘चिड़ी बिचारी की करे? ठंडा पानी पी मरे।’ जीवन को निगल जाएगा यह भय एक दिन। 
भय ही भय! लेकिन भय भी क्या बिगाड़ सकता है? फूल तो खिलेंगे, खिलते रहेंगे, आक के फूल, धतूरे के फूल! मिठाई तो मिलेगी, मिलती रहेगी। ताया जी की बरफी, बाबा जी की पिन्नी...यह बालक मैं स्वयं था और आस-पास की दुनिया अपनी आँखों से देख रहा था, इसमें न जाने कैसे-कैसे रंग भर रहा था। 
आक के फूल खिल रहे थे--नन्हे-मुन्ने से फूल! धतूरे के फूल खिल रहे थे--बड़े-बड़े फूल!
**

प्रस्तुति – अलका सोईं (देवेंद्र सत्यार्थी जी की पुत्री)
5-सी/ 46, नई रोहतक रोड, नई दिल्ली-110005,
चलभाष: 9871336616

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