‘दलित संदर्भ और हिंदी उपन्यास’ कृति की समीक्षा

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237
मार्गदर्शक- प्रो. जशाभाई पटेल


दलित संदर्भ और हिंदी उपन्यास (दलित और गैरदलित उपन्यासकारों के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में) 
रचनाकार: डॉ . दिलीप मेहरा
पृष्ठ: 312, पेपरबैक 
मूल्य: ₹ 950.00
प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, शाहदरा, दिल्ली-110032
 

“मेरी माँ ने जने सब अछूत ही अछूत /तुम्हारी माँ ने सब बामन ही बामन। कितने ताज्जुब की बात है /
जबकि प्रजनन-क्रिया एक ही जैसी है। /वह दिन कब आएगा /बामनी नहीं जनेगी बामन /चमारी नहीं जनेगी चमार /भंगिन भी नहीं जनेगी भंगी। /तब नहीं चुनेंगे 
/जातीयहीनता के दंश।1(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

नीलम वाधवानी
हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक डॉ दिलीप मेहरा द्वारा रचित एवं गुजरात हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा 2019 में प्रथम पुरस्कृत ‘दलित संदर्भ और हिंदी उपन्यास’ नामक कृति हिंदी साहित्य जगत में अपना विशेष महत्व रखती है। जिसमें दलित तथा गैरदलित उपन्यासकारों कि औपन्यासिक रचनाओं के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में दलित जीवन की समस्याओं को उद्घाटित करते हुए समाधान की और पहुंचाने का एक समर्थ प्रयास है। यह कृति 6 भागों में विभाजित है।प्रथम अध्याय में आलोच्य विषय के सिद्धान्त पक्ष का निरूपण है। अतः एक तरह से इसे विषय प्रवर्तक अध्याय भी कह सकते हैं। जहाँ दलित-विमर्श को लेकर कुछ प्रश्नों के तार्किक विश्लेषण का प्रयास किया गया है। दलित की परिभाषा देते हुए लेखक कहता है कि 
“ ...जिसका दलन होता है, जो हजारों वर्षों से जाति की मार झेल रहे हैं, जिनको निम्न माना जाता है, जो ब्राह्मणवादी* मानसिकता के शिकार हैं वे सब दलित हैं।”1

*सम्पादकीय नोट: किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के नाम पर बनाये शब्द का गाली, अपशब्द, या निंदनीय और घृणास्पद रूप में प्रयोग नितांत अनुचित, और भेदभावपूर्ण है। दुर्भाग्य से भारत और हिंदी में शिक्षित वर्ग में भी अनेक लोगों द्वारा किसी निंदनीय प्रवृत्ति, विशेषकर जातिवाद को दर्शाने के लिये ब्राह्मणवाद शब्द का प्रयोग सामान्यरूप से होने लगा है। इस प्रकार के जाति-वर्ग सूचक शब्दों का दुरुपयोग सही नहीं है - ऐसे शब्दों का प्रयोग जाति पर आधारित घृणा दर्शाता है और किसी भी समतामूलक सभ्य समाज में अनैतिक और अवैध माना जायेगा। जातिद्वेष अनेक रूप धरकर सामने आता है। इस क्षेत्र में जागरूक होना हमारा कर्तव्य है। हमें चाहिये कि जातिद्वेष से ऊपर उठें और जातिसूचक शब्दों के दुरुपयोग से बचें। यदि अब तक आपने इस प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया है, तो कृपया अब दीजिये।     

दिलीप मेहरा
इसी अध्याय में दलित-साहित्य को लेकर आज साहित्य में जो अनेक सकारात्मक व नकारात्मक प्रश्न खड़े हो रहे हैं, उन सभी को सुनियोजित रूप से एक तार्किक अन्त तक ले जाने का सुंदर प्रयास है। यथा बहुत से लेखक-साहित्यकार, विवेचक (बेशक अदलित-वर्ग से सम्बद्ध) ‘दलित साहित्य’ को एक सिरे से खारिज कर रहे हैं। उनका तर्क है कि साहित्य कभी दलित हो ही नहीं सकता और इसीलिए दलित-साहित्य जैसी कोई चीज है ही नहीं। इस प्रश्न को निरूपित करते हुए लेखक तर्क देता है कि जब भक्ति-साहित्य है, सन्त-साहित्य है, सिद्ध-साहित्य या नाथ साहित्य या जैन साहित्य है तो दलित साहित्य क्यों नहीं हो सकता।

द्वितीय अध्याय में लेखक द्वारा अदलित लेखकों-उपन्यासकारों द्वारा लिखित दलित-चेतना युक्त उपन्यासों का विश्लेषणमूलक अध्ययन किया गया है। इन उपन्यासों में ‘रामलाल’ मन्नन द्विवेदी, ‘बधुआ की बेटी’ पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गोदान’ प्रेमचन्द, ‘बगुला के पंख’, ‘गोली’, ‘उदयास्त’ आचार्य चतुरसेन शास्त्री, ‘अलका’ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, ‘अन्तिम आकांक्षा’ सियारामशरण ‘गुप्त’, ‘अमिता’, ‘जुनिया’ गोविन्द वल्लभ पन्त, ‘एक टुकड़ा इतिहास’ गोपाल उपाध्याय, ‘बलचनमा’, ‘वरुण के बेटे’, ‘इमरतिया’ नागार्जुन, ‘एक अकेला’ रामकुमार भ्रमर, ‘अलग-अलग वैतरणी’ डॉ. शिव प्रसाद सिंह, ‘आधा गाँव’ डॉ. राही मासूम रज़ा, ‘जल टूटता हुआ’, ‘सूखा हुआ तालाब’ डॉ. रामदरश मिश्र, ‘धरती धन न अपना’, ‘जमीन तो अपनी ही थी’ जगदीश चन्द्र, ‘मैला आँचल’ फणीश्वरनाथ रेणु, ‘महाभोज’ मन्नू भंडारी, ‘सती मैया का चौरा’ भैरव प्रसाद गुप्त, ‘सागर लहरें और मनुष्य’ उदयशंकर भट्ट, ‘एकलव्य’ चन्द्रमोहन प्रधान, ‘एक नौकरानी की डायरी’ कृष्ण बलदेव वैद, ‘नदी के मोड़ पर’ दामोदर सदन, ‘नदी फिर बह चली’ हिमांशु श्रीवास्तव, ‘नागवल्लरी’ शैलेश मटियानी, ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ अब्दुल बिस्मिल्लाह, ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ अमृतलाल नागर, ‘पीली छतरी वाली लड़की’ उदय प्रकाश, ‘मोरी की ईंट’ मदन दीक्षित, ‘गगन घटा गहरानी’ मनमोहन पाठक, ‘धार’ संजीव, ‘अल्मा कबूतरी’ मैत्रेयी पुष्पा, ‘तर्पण’ शिवमूर्ति आदि प्रमुख हैं। ये सभी उपन्यास दलित चेतना सम्पन्न उपन्यास हैं। 

तृतीय अध्याय में लेखक द्वारा दलित उपन्यासकारों के उपन्यासों का समीक्षात्मक अनुशीलन प्रस्तुत किया गया है। इन उपन्यासों में ‘आग पानी आकाश’ रामधारी सिंह दिवाकर, ‘छप्पर’ जयप्रकाश कर्दम, ‘आज बाजार बन्द है’, ‘मुक्ति पर्व’, डॉ. मोहनदास नैमिशराय, ‘उधर के लोग’ अजय नावरिया, ‘करुणा’ जयप्रकाश कर्दम, ‘जख्म हमारे’ डॉ. मोहनदास नैमिशराय, ‘जस तस भई सवेर’ सत्य प्रकाश, ‘डंक’, ‘सूअरदान’ रूपनारायण सोनकर, ‘तिलचट्टे’ पुन्नी सिंह, ‘मिट्टी की सौगन्ध’ प्रेम कापडिया, ‘मुक्तिपथ’ अभय मौर्य, ‘मिस रमिया’ कावेरी, ‘नीला आकाश’ सुशीला टाँकभौरे, ‘गवाह तथागत’ कमल तेजस, ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ जाटव, ‘उधर के लोग’ अजय नावरिया, ‘भँवर’ कैलाश चन्द चौहान आदि उपन्यास है।

 चतुर्थ अध्याय में दलित एवं गैर-दलित दोनों ही प्रकार के उपन्यासकारों एवं उपन्यासों पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार विमर्श किया गया है। यहाँ उन सभी मुद्दों पर चर्चा हुई है यथा गांधी बनाम बाबासाहेब आंबेडकर की दलित विमर्श को लेकर दृष्टि के बारे में चर्चा, दलित एवं अदलित लेखकों के उपन्यासों के एक दूसरे पर पूरक होने की दृष्टि, सहानुभूति एवं स्वानुभूति के तर्क एवं दावे, आक्रोश, गुस्सा, कड़वाहट आदि का चित्रण दलित साहित्यकारों द्वारा अलग चौके की बात करने के मुद्दों का चित्रण आदि बखूबी इस अध्याय में लेखक द्वारा किया गया है। 

पंचम अध्याय में लेखक द्वारा दलित विमर्श संबंधी सभी उपन्यासों के केंद्र में रहने वाली समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है, यथा- जमीदार वर्ग की दादागिरी, शिक्षा की समस्या, आवास की समस्या, रोटी की समस्या, नारी शोषण की समस्या, कुप्रथा एवं अंधविश्वास की समस्या, माननीय सत्ता के लिए संघर्ष, जमीदारों द्वारा आर्थिक शोषण, पूंजीपतियों द्वारा आर्थिक शोषण आदि। धर्म परिवर्तन की समस्या से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों को स्पष्ट करते हुए लेखक लिखता है कि “धर्म परिवर्तन करने से न संस्कार बदलते हैं न जात, न पिंड।” इस समस्या को लेखक मदान दीक्षित के 'मोरी की ईंट' उपन्यास से उदाहरण देते हुए स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार खैराती का बड़ा भाई उसे समझाते हुए कहता है कि, “धर्म की तोबा पलटी से हमारी जात पर कोई असर नहीं पड़ता। मुसलमान बना लिया तो लालबेगी कहने लगे, हलालखोर कहने लगे, अल्लक, बिल्लन, अहमदा, मुहमदा नाम रख दिया। सिख बना लिया तो मजहबी कहने लगे- झंडासिंह, गंडासिंह, बंटासिंह, बसन्तसिंह नाम रख दिया। ईसाई बना लिया तो जॉनसन, थाम्पसन, एडविन नाम रख दिया रहे मेहतर के मेहतर, नरक बटोरने का पट्टा हमारे नाम बदस्तूर कायम रहा।" धर्म परवर्तन के बाद भी जाति रूपी भूत दलितों का पीछा नहीं छोड़ता।”2 

षष्ठम् अध्याय में संपूर्ण शोध को निष्कर्ष रूप में पहुँचाने का प्रयास हुआ है। यहाँ लेखक ने अपनी स्थापना को विभिन्न तर्कों के साथ प्रस्तुत करते हुए इस शोध ग्रंथ की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला है। इस तरह यह समीक्षा ग्रंथ पूरी तरह उन सभी उपन्यासकारों के प्रति न्याय करता है जिन्होंने दलित जीवन की कठिनाइयों को अपने उपन्यासों में स्थान दिया है। साथ ही स्वानुभूति तथा सहानुभूति दोनों के गहरे अंतर पर भी प्रकाश डालता है। अंततः स्पष्ट है कि आज के दलित वर्ग की स्थिति को और अधिक समझने के लिए यह ग्रंथ एक साफ दर्पण का कार्य करता है जिसमें दलित जीवन पर लिखने वाले सभी उपन्यासकारों के उपन्यासों को एक जगह रखकर उनकी तुलना करते हुए दलित जीवन की समस्या को सुलझाने का प्रयास किया गया है। इस आलोचना ग्रंथ की भाषा सहज तथा सरल है। इससे यह ग्रंथ और भी अधिक बोधगम्य सिद्ध होता है। 


संदर्भ सूची

1. पुस्तक: दलित निर्वाचित कविताएँ (पृष्ठ 66), संपादक: कँवल भारती, रचनाकार: ओमप्रकाश वाल्मीकि, प्रकाशन: इतिहासबोध प्रकाशन, संस्करण: 2006
https://www.hindwi.org/kavita/dalit/wo-din-kab-ayega-omprakash-valmiki-kavita?sort=

2. ‘दलित संदर्भ और हिंदी उपन्यास’, डा. दिलीप मेहरा, अनुज्ञा बुक्स प्रकाशक, पृ.सं 26
3. वही, पृ.278


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