अनुवाद: इस्तवान तुर्ज़ी

Istvan Turczi
इस्तवान तुर्ज़ी:
 इस्तवान (1957) हंगरी के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक हैं। उनके 25 काव्य संग्रह, 5 उपन्यास, कई नाटक एवम रेडियो नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें हंगरी के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान और राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया है। उनकी 17 पुस्तकें विश्व के अनेकों भाषाओं में अनुदित हैं। वह हंगेरियन पैन क्लब के सेक्रेटरी जनरल एवम लेखक संघ के चेयरमैन के पद पर कार्यरत हैं। वह वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ पोएट्स के उपाध्यक्ष के पद के लिए दो बार चुने जा चुके हैं।


1. उसके लिये शेन्ज़ेन से - रंग की एक दरार

उसके सिर पर डाला
एक रेशमी कपड़ा
और रेशमी बाल
एक टोपी पहनने के लिए
उसके कानों को सजाने के लिये
चमचमाता सोना
अनमोल रत्न हरे पन्ने के कर्णफूल
उसके आँखों के रंग में
घुलमिल जाने के लिये
और खुशी से फूली न समाती
ऐसा आवेग जो हलचल शुरू करता
प्रेरणा देने वाला नीले और धधकते लाल का निर्मम उल्लास, 
वह बदलाव का स्वागत करती
एक रंगीन गहरी खाई उभरती
रोशनी की आभा और छाया से उपजी
एक  दरार पड़ी उबासी
दृश्यों को परवर्ती करती
और रोशनी को मुँह चिढ़ाती
उसके वैभव का वर्णन करती।


2. नागरिक मृत्यु

नवंबर का एक दिन
हवा में पत्ते सरसराते
पुराने दरख्तों के बीच बलखाती रोशनी
पत्थर के पुराने, घिसे बैंचों के
इर्द-गिर्द, मुड़े-तुड़े साये
सेलफोन से ढँकी साँसें

एक आदमी
नशे में धुत्त या नींद में डूबा
एक टूटी-फूटी राख की मूर्ति
हाथ में दबोचे
धुंध को हवा में छोड़ता
हवा उसकी छाती पर रखे
अख़बार को सरसराती

एक आदमी
बहुत अविचल
हृदय आघात से आहत
सकुचाई तिरछी नज़रों से देखता, 
विवश चेहरे
दया या खोखली उत्सुकता

एन. एन
आस-पास था
लोग दौड़े उसकी ओर
क्या कोई उसे जानता था?
वह क्या पहचाना गया ?

ओह कौन होगा
जो संभालेगा उसको
इस बोझिल घड़ी में
शाम जल्दी आ गयी
बहुत जल्दी
पत्थर के पुराने, घिसे बैंचों के
इर्द-गिर्द, मुड़े-तुड़े साये
लगता है सब कुछ पहले जैसा है।
***

*CIVILITER MORTUUS. Civilly dead; one who is considered as if he were naturally dead, so far as his rights are concerned.

नागरिक मृत्यु: एक व्यक्ति द्वारा सभी या लगभग सभी नागरिक अधिकारों का खो  देना है, जो किसी अपराध का दोषी होने के कारण या किसी देश की सरकार द्वारा  जारी किसी अधिनियम के कारण होता है। जिसके परिणामस्वरूप नागरिक अपने सभी अधिकारों को खो  देता है।

Hawa leaves: Adam Eve is one of the plants / plants that usually grow in front of the home page. probably not much to know that the leaves adam air is to save the health benefits of our bodies. The plants have a Latin name rheo discolor

हवा पत्तियाँ: ऐडम इव एक ऐसा पौधा है जो घरों के सामने  यूँ ही उग जाता है। ज्यादातर लोगों को नहीं पता कि वह हमारे लिए स्वास्थ्य वर्धक है। लैटिन भाषा में उसे रिहो डिसकलर कहते हैं।


3. जीन जेनेट

मैं कोई और तरीका सोच नहीं पाता
उस दैत्य के पोटली  के अंदर
उसके कीड़ों  से भरी रोशनी
उसकी अधम चमक
भव्य प्रयोग के लिये बनाई रूपरेखा

चमकती दुनियावी
जेल की उपहास भरी हँसी
विश्वास को समझने की
सड़े-गले ढांचे से रिसती
मौन, तन्मय अवस्था
कहां है
और उसके फ्रेम जड़े चेहरे से
कहाँ से आँसू झरते
ख़ुद, इस मिथ को समझने का तरीका
क्यों कभी मालूम नही होता।


4. उजाला और अंधापन (टेसा वाले दिन)

 एक बार फिर रात ने जब अपनी मखमली पलकें  मुझ पर बंद कीं उसके पहले मैं बाहर ड्योढ़ी में गया। अक्टूबर ने  तलघर के सामने वाले दरवाज़े पर एक रुपहले से ढके कुहासे की दीवार खड़ी कर दी थी, जहां सुबह एक घरेलू गिलहरी अब तक दादा के जतन से रखे पुराने औजारों में  खोजबीन कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि भट्टी तक सिकुड़ गयी है। प्रतिछायाऐं  चारों ओर फैली हुई हैं; फिर एक एकल छलांग से, जैसे मुझसे भाग रहे हों, वे सड़क से गायब हो जाते। ऊपर जूते के फीतेनुमा प्लॉट के अंत में  स्वर्ग- सा भेड़ - क़लम चौड़ा खुला हुआ।  ठंडे भव्य पर्वत की दिशा से, तलहट के बीच से अखरोट के पेड़ के धुआंई पत्तों की सुगंध को चीरती बयार मुझ तक बहती। एक चिड़िया तक दिखायी नहीं देती, लगता है वे दूर पर्वतों के शिखर पर समाचार लेकर जा रहीं। सारे दिन, एक दूसरे को वापस ला रहे। मगर आज, मेरे तिरपनवे जन्मदिन की संध्या पर अंधकार ज्यादा घना है। मुझे वह देखने की आदत है जो मैं देख नहीं सकता। चमकीलापन / धवलता और अंधापन: मैं मोमबत्ती की रोशनी में अकेले वाइन की चुस्कियाँ ले रहा हूँ। विजेताओं की तरह चींटियाँ डेमी जॉन की दिशा में मेरे पैरों के चारों ओर कदमताल करतीं।

5. सफ़ेद रहस्यमय लेखन (टेसा वाले दिन)

अब पहले से भी ज्यादा मुश्किल है मौसमों को पहचानना। कल बगल की नालियोंवाली टीन की चादरों वाले छत पर गिरता बारिश मुझ में अब तक बज रहा। मानो वे एक ताबूत के ढक्कन पर कंकण फ़ेंक रहे हों। आज की सुबह जिस तरफ भी मैं देखता हूँ वहाँ सफ़ेद रहस्यमय लेखन, आकाश, जंगल और मुख्य सड़क का कोबाल्ट सब एक भव्य परिदृश्य में उजागर होते। बोर्ज़सोंनी पर्वत-शिखरों ने धुंध की टोपी पहनी हुई है। हवा, हथौड़े की उठापटक, मेरे कॉफ़ी मशीन की छींक, सब ज्यादा स्पष्ट सुनाई देते। ड्योढ़ी में भूले जग का पानी नाशपाती के आकार में अकड़ा हुआ है। यह अच्छी बात है कि मैंने आग को बुझाने वाले यंत्र को वहाँ नही छोड़ा। मैं पाले से सूखी जड़ों और बदरंग घास के गठ्ठरों के बीच से टकराता हुआ लकड़ी की चारदीवारी तक पहुंचता। इधर- उधर आने वाली शीत ऋतु  के कुतरे टुकड़े पड़े हुए हैं। बसंत ऋतु के आने तक धरती ने सारे रंगों को फुरसत के सुरंग में अलग रखा हुआ है। मेरी चिमनी से निकले धुएँ के साँपों को हवा उठा ले जाती है। फिर भी ऐसा लगता है जैसे कि वह खुद फिसल कर व्यंग भरा प्रश्नचिन्ह बनाती, जब तक वह पूरी तरह से फिर एक बड़े धुएँ में लुप्त नहीं होती।


6. गद्य का युद्ध

मैं सुबह से पढ़ रहा हूँ। बाहर बेरहम ठंड है, हवा तुम्हारी त्वचा की फांके काट रही -  अगर मैं उसे  ऐसा करने दूं तो वह उसके मांसल टुकड़े बना दे। गंजे पेड़ों पर यदि कुछ टांगा जा सकता है तो बस  वह मेरी दृष्टि है।सारे बादल छट गये हैं, इस लिए मैं सीधे आकाश को देख सकता हूँ। खिड़की से परिदृश्य किसी भव्य ग्लास चित्र से कम नही। मेरी मेज़ पर गद्य का प्रबल युद्ध हो रहा। एक साथ आनंदित और चिंतातुर। सब कुछ किसी और की संपत्ति है; केवल समय हमारा है। असीम शून्य, खाने के टेबल पर की गयी भविष्यवाणी, पुराने त्योहारों की ढलान, घास की चटाई की सुगंध, आदि रूप जो कभी देखे नहीं गये। रोमन क्रॉस पर ईसा मसीह के हाथ। अंतरीप जिसने अपना संगीत हवाओं में  छोड़ दिया है। एक छाया बोधिवृक्ष के नीचे या इतका के रास्ते में शराबखाने के ठंडे भूतल में। माउंट सिनाई पर प्यास का आध्यात्म शास्त्र या लिखने की मेज़ का करुणा से भरा कोना। ऐसा लगता है कि वे एक दूसरे को नहीं छूते, जैसे कि दो हिमकण। उनकी कहानी अब मेरी कहानी है। मैं उन्हें भुला कर उनके कार्यों को संभाल कर रखता। मगर उन्हें भूलने से पहले मैं उन्हें फिर से जीता हूँ। रात तैरती है आर-पार शहरों के तंत्रिका तंतुओं के बीच, शैवाल के सघन सपनों की ओर।


7. अब इसके बाद और कविताएँ नहीं होंगी

अब इसके बाद और कविताएँ नहीं होँगी। और नहीं, मैं नहीं कर सकता। चिंता क्यों है। मैं उसको महसूस नहीं करता। एक दिन एक कोरे काग़ज़ के सामने एक हजार साल के बराबर लगता है। हवा की तरह शब्दों के उठने की प्रतीक्षा: अपने आप में फिजूल है। कोई सूर्योदय नहीं। ग्रीष्म-घर में चीखता; अंधों की तरह तुकबन्दी भी इस्तेमाल की मैंने। कितनी देर तक सितारे रूमानी साँसों की धुन पर गिरते रहे। नामों ने बहुत पहले ही अपने शरीर के रोएँ  त्याग दिये और एक खंड होने का भरोसा भी नहीं। सब कुछ मात्र एक शब्द है, फिर मात्र एक और शब्द। फिर भी मैं रुकने में अक्षम हूँ। जितनी बार भी मैं शुरू करता हूँ मैं रुकता हूँ, और मैं फिर से शुरू करता हूँ जितनी बार भी मैं रुकता हूँ। बिलकुल प्यास की तरह है यह। अब इसके बाद और कविताएँ नहीं होंगी, बस यहाँ, यह एक कविता। और यह कविता मेरी नही है, उस व्यक्ति की है जो इसे पढ़ेगा।
 

8. ईश्वर जिसे लेखन कहते हैं

और दस क़दम, और नौ, और आठ, सात, ख़ून दौड़ता पक्के धुन में, आँखें संकुचित होतीं, तीन, दो, एक, और यह कविता भी पूरी हुई। यहाँ है वह।अभी तक उसका कुछ भी उसकी यात्रा पर नही भेजा गया है। वह ठंडा हो रहा, ध्यान के बंद फुलवारी में धूप सेंक रहा। उसकी पंक्तियाँ, कुछ छोटी, कुछ लंबी, एक दूसरे के ऊपर ठुमकतीं धीमे से। वे मेरी सोच को भरमाती की वह चमकता, जब कि वास्तव में वह अपने लाभ के लिये स्वयं चमकता। वह जो भी आकार लेता, जो भी रंग, तुम उसे देखते मानो वह सबसे सुंदर। उसका हर शब्द एक रेशमी सीढ़ी पर फिसलता, तुम्हारे सिर के ऊपर। तुम्हें छूने की अनुमति नहीं। यह तुम्हारा काम नही। यह तुम्हारा है। तुम उसके स्वामी हो, और तुम निर्वासित हो। अगर तुम किसी प्रकार उसका कोई हिस्सा अपने भीतर रखना चाहते हो तो ऐसा मत करना अभी। तुम जितना बेखुद होगे, उतने ही सबल बनोगे। उसकी कोई कामना नही, बस इस तरह मुक़म्मल हुआ वह। तुम कहते (तुम उदधृत करते) कहीं भी ऐसी दुनिया नही, केवल अपने भीतर है। जैसे कि तुम दृढ़ता से कहना चाहते हो कि तुम अब अपने होशोहवास में हो। यह इतना कठिन नही होता अगर तुम निर्लिप्त होने का अभ्यास कर रहे होते। या, उदाहरण के लिए मौन, ईश्वर का  सर्वश्रेष्ठ तर्क जिसे लेखन कहते हैं।


9. दोहराना

उठो खड़े हो;खिड़की खोलो। मैं साफ देख सकता हूँ: लंबे समय से तुम्हारे हाथ ने आसमान की ओर इशारा नही किया, और बस अंगड़ाई भर ले सकतीं हैं तुम्हारी उंगलियाँ। पर्दे के पार, सारी दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। तुम पहले ही भौचक्के थे।अब तुम शोर के पास वापस आ गए हो। बेहतर होगा कि तुम सुनो तुम्हारी बूढ़ी आया, हवा कैसे सीटी बजा रही। तुम्हारा शरीर बना है मुझसे और सुबह से, फिर भी तुम जगमगाती स्मृतियों का स्पर्श नही भूलते। तुम उसे संजोए रहते हो जैसे शरद् ऋतु में छीकता कुत्ता नरमी से तुम पर नाक रगड़ता। तुम भयावह दिखते हो; तुम जितना भी खुद को ठीक करना चाहो, आईना वापस फेंकता है अपनी ऐंठी हुई प्रतिक्रिया। तुम्हें अपना व्यक्तित्व पहनना होगा; उसे वैसे ही रहने दो जैसे मैंने अंकित किया था। अब मैं तुम्हारे मुँह से आखिरी शब्द निकालूंगा। अब तुम्हारी उंगलियों के पोरों पर बुझती आग से पूछताछ करूंगा मैं। जहां तुम्हारी आंखें होनी चाहिये, मैं अंधेरों के खोह रख दूंगा। तुम खोजते रोशनी से दूर रहने के तरीके, कैसे तुम ठंडे, बेजान हो सकते, कैसे कुछ नही और समय के नीचे डूब सकते, इस हद तक कि तुम्हें तुम्हारे शरीर के चारो ओर बहती हवा तक महसूस न हो। अब तुम्हें कुछ भी नही चाहिये, कुछ नही चाहिये तुम्हें, तुमने सबका हिसाब बराबर कर दिया, तुम वह हो जो तुम्हारे भीतर से बना है। खिड़की बंद कर दो। एक बार फिर जीना आरंभ करो।
***


10. जीवन- कामना (टेसा वाले दिन)

अगर कभी मैं यहाँ वापस लौटूँ, मेरे अंतिम स्वप्न के सौ साल बाद, यहाँ मुझे  कुछ भी नहीं मिलेगा जो हमारा है। या शायद मुझे मिल भी जाये।एक संवेदना का स्वाद धीरे-धीरे गुम हो जाता, एक साये की तरह अंगड़ाई लेता, पलट जाता। छवि अब आरम्भ होती है। विपरीत दिशाओं में चली जाती मेरी शुरुआत। समय की परतों को एक के ऊपर एक बिछाती आँखें। प्रकाश से भरी हुईं वस्तुएँ, और एक जीवंत पीली लौ मुझे अंधा करती, जैसे कि मैं किसी वाइन के तलघर से बाहर निकल कर धूप में जा रहा होऊँ। आकाश सुलझता; घास और जंगली फूल झूम रहे, जीवित हवा हमारे पंछियों को उड़ान देती। एक भरोसेमंद शैलीकार है हवा। मेरी दृष्टि आरंभ कर रही जलमग्न होना कि उसे यहां आनंद आता है। फर्श रगड़ती, पदचिन्ह खोजती एक खिड़की खुलती है। और पलट कर जो कभी था उसे ज़मीन में दफ़नाती। शायद ही इस से ज्यादा प्रगाढ़, गहन और निकट होगी शरद ऋतु की सुगंध। वह जा चुका जिसका मलाल हो सकता था। इसने अन्य वाक्यों के खाली स्थान को ले लिया है। यह मुझसे जुड़ा है, मुझ से और मुझ में बहता है। फिर घंटियों की घनघनाहट, मगर केवल मेरे कानों में। अगर मैं कभी यहाँ वापस लौटूँ, आकाश, धरती, बोर्ज़सोंनी परिदृश्य, टेसा का घर सब ऐसे खाली होंगे जैसे गिरजाघर अपने दीवारों के बीच सुरक्षित रखते अपने आस्तिक दिवंगतो  की प्रार्थनाओं को।
***


संगीता गुप्ता
संगीता गुप्ता (अनुवादक): दिल्ली निवासी संगीता गुप्ता कवि, कलाकार एवम वृत फिल्म निर्माता हैं। उनकी 25 प्रकाशित पुस्तकें हैं।जिनमें से दस पुस्तकों का विश्व के अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। वह हिंदी एवम अंग्रेजी दोनों भाषाओं में कविताएँ लिखती हैं। वह एक विख्यात चित्रकार हैं और उनके चित्रों की 36 एकल प्रदर्शनियाँ हो चुकी हैं। उन्होंने 30 लघु वृत फिल्मों का निर्माण भी किया है। 

अनुवादक: वक्तव्य
कई बार 'नहीं' कहना बेहद कठिन हो जाता है, और तब तो और ज्यादा मुश्किल होती है जब कोई करीबी दोस्त कुछ करने को बार-बार कहे। ऐसा ही हुआ जब जेकब ने मुझ से कहा कि मैं इस्तवान की कविताओं का हिंदी में अनुवाद कर दूँ। एक, दो नहीं पचपन लंबी कविताओं का अनुवाद। इस्तवान, मूलतः एक प्रसिद्ध हंगेरियन कवि हैं। उनकी अंग्रेजी में लिखी कविताएँ मुझे मेल से भेज दी गईं थीं। मैंने कुछ बहाने भी बनाए पर शायद लचर किस्म के बहाने थे इस लिए जेकब ने उन्हें अनसुना कर दिया। बल्कि वह और ज्यादा जोरदार तरीके से इस्तवान की पैरवी करता रहा। दोनों की दोस्ती सच्ची लगी। मेरा पहले से ही संकोची दिल न-न करते, हाँ कह बैठा।

मैं मूलतः कवि हूँ, अनुवादक नहीं। मैंने कभी कभार ही सिर्फ़ अपनी कुछ कविताओं का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद किया है। हालाकि यह सच है कि मेरे कई काव्य संग्रहों का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में कई विशिष्ट लेखकों और कवियों ने अनुवाद किया है। शायद उस कर्ज़ को उतारने का समय आ गया हो। यह सब सोच कर मैंने इस्तवान  की कविताओं को पढ़ना शुरू किया।

वह एक अलग किस्म का कवि लगा जिसकी इमेजरी बड़ी यूरोपियन है। मैं पूरी तन्मयता से अपने काम में जुट गई।  यह एक तपस्या का काल था जब एक कवि को एक दूसरे कवि की काया में प्रवेश करना पड़ा। लगातार शब्दकोश को भी उलटना-पलटना पड़ा। लगा न्याय करना है तो इन कविताओं को पूरी तरह से जीना होगा। उन्हीं में डूबना- उतराना होगा। मैंने पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अब तो पाठक ही तय करेंगे कि बात कितनी गहरी बन पाई है और मैं कैसी अनुवादक हूँ।

आइए इन बेहद संवेदशील और जीवन दर्शन से भरपूर हंगेरियन कविताओं को पढ़ते हैं और इनके माध्यम से हंगेरियन संस्कृति से भी रूबरू होते हैं। इस्तवान और मेरे इस साझे को आप तक पहुँचाने का श्रेय जेकब जैसे दोस्त को भी जाता है। 

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