जीवन के क्षितिज पर इन्द्रधनुषी रंग (संस्मरण)

देवी नागरानी
सहरा की प्यास कभी नहीं बुझती। जी हाँ जीवन जीने की प्यास भी कभी नहीं मिटती। कितने वर्ष बीते, कितने मौसम आए गये पर मन में फिर से हर मौसम के बाद जीवन में हरियाली के नए कोंपल जहाँ उग आते है, वहीं नई आशाएँ नई तमन्नाएँ लहलहाने लगती हैं।

 यही हाल मेरा भी था, जाने कितनी बार निराशाओं के बवंडर से जूझते हुए हर बार शतरंज के प्यादों की तरह उन्हें मात देती रही हूँ। मन में आशाओं के अनगिनत ख़ज़ाने दफ़्न रहे पर बावजूद इसके मेरे जीवन के संकल्प एक के बाद एक पूरे ओज पर उत्सवों की तरह अपनी सम्पूर्णता के साथ सम्पन्न होते रहे... 
पहले बड़ी बेटी की शादी...
फिर उससे छोटी बेटी की शादी... 
और आख़िर में बेटे की शादी...

किसी की कोई मनमानी न थी, न किसी की अनुचित मांग या फरमाइश। ज़माना वही था, बस दिन कुछ और थे। कुटुम्ब संस्थाओं की तरह एक दूजे से जुड़े हुए, मन भी मिले हुए, सब कार्य सरलता व सहूलियत से हो जाया करते थे।

शादी ब्याह में मेहमानों का आना-जाना, रहना, खाना-पीना, ओढना-बिछाना सब कुछ तो होता था, वो भी घरों में। मेला लगा रहता था, आते जाते मुस्कुराकर टकराना, काम का संदेश एक दूजे को देते हुए आँख मारना, कनखियों से देखना, हँसना, हट-हट कर आने जाने का स्थान देने में भी एक आनंद भरा रहता।

शादी ब्याह के अनगिनत मौके मुझे भी मिले। अपने घर के, भाई बहनों के घर के शादी ब्याह में शामिल होने के। पर एक अवसर जो मन में दुःख की काली घटा की तरह घना कोहरा बन कर छा गया वह बरसों बाद याद बनकर आज सामने आया है। 

बड़े भैया के मंझले बेटे की शादी में अपने तीन बच्चों को, जो बहुत ही छोटे थे उन्हें ले मायके आई। घर में शोर शराबा, हँसी के साथ ठहाके, रात को खाने के बाद ढोलकी व थाल पर चम्मच का ठेका, जिसके ताल पर जवानों की कमर भी लचकने लगती थी। रंग बिरंगे मंज़र आँखों के आगे रक्स करते हुए नज़र आते रहे।

मैं भी बहुत बड़ी न थी, तीस साल की थी, पर कुदरत ने सरताज को समय के पहले बुला लिया था और मैं सफ़ेद सूती साड़ी में लिपटी हुई मायके की सबसे बड़ी बेटी होने के नाते पति के निधन के बाद, इस शादी में आई। आना पड़ा, माँ थी, जिसने जिद की कि मेरा आना बनता है, बड़ी बेटी हूँ। बस छोटा भाई आया और ससुराल की अनुमति से मुझे एक महीने के लिए मायके लिवा ले आया। 

मैं भी कोई अनजान न थी, तीन बच्चों की माँ थी, पहली बार तो मायके नहीं आई थी। जानती थी, अपने पति की मौत के चार महीने बाद बड़े भाई के बेटे की शादी पर आई हूँ। सभी की सहानुभूति हफ़्ता भर चली। बड़ी भाभी की कोशिश यही रही कि मैं ज़्यादा भीड़ का हिस्सा न बनूँ। सफ़ेद सारी में लिपटी एक गुड़िया की तरह कोने में बैठकर उसका जायज़ काम करती रहूँ। अन्य सभी जवान बहू बेटियाँ रंग बिरंगे, चमकते दमकते लिबासों में सजी दुल्हन की तरह आईने को देखती हुई मुस्कराती, खिलखिलाती एक दूजे से पूछतीं, “मैं कैसी लग रही हूँ?”

“बहुत सुंदर”, कहीं मेरी नज़र न लगे।” कहते हुए भाभी उनके गाल पर हलकी सी थाप देती। मेरी बड़ी बेटी जो आठ साल थी, पास आती और मुझे बाँह से खींचते हुए कहती, “माँ चलो न आप भी तैयार हो जाओ, सभी की तरह।” 

वही तो नहीं कर पाई मैं तब...
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घर में शोर शराबा व हंगामा दिन तमाम रहता, कुछ मेहमान आ रहे है, जिन्हें स्टेशन से लिवा लाने के लिए आवाजें दी जा रही है... मतलब बारात के पहले का शोर जिससे उत्सव जैसा होने का ज़ायका मिले। 
“बड़ी भाभी किसी को मसाले की टोकरी साफ़ करने को देती, किसी को बासमती चावल का बड़ा डब्बा व दो थालियाँ देकर कहती, “हाथ चलाओ, दुपहर को ताहिरी बनानी है (केसरी बादाम वाले मीठे चावल)।
“अरी मोहिनी तू ज़रा आलू की गूनी ले आ, मामी के साथ बैठकर आलू-टूक बनाने की तैयारी कर, और किसी को तलने के लिए कढ़ाई पर बिठा दे। कुछ कम न हो,  50-60 लोग तो खाने पर होंगे ही। चलो लड़कियों उठो और जल्दी जल्दी हाथ चलाओ”
बस उनका कहना क्या था जैसे... हरकतों में संचार आ जाता... 
“साथी हाथ बढ़ाना 
एक अकेला थक जाएगा
मिलकार बोझ उठाना” 

और सच में, दुपट्टों को कमर से बांधते हुए सभी अपने-अपने काम को अंजाम देते। न कोई आगे न कोई पीछे। बस मैं एक अकेली एक ही जगह घंटों बैठी सुई धागे से कभी गुरु के रूमाल को गोटा टाँकती, तो कभी साड़ी को फाल लगाती रहती। शादी ब्याह का घर, काम तो अनगिनत थे। एक काम ख़त्म भी न होता तो भाभी दूजा हर एक के हाथ में थमा दे जाती।

“दीदी इस ब्लाउज़ को थोड़ा ढीला करना है, माप लेकर कर देना शाम को पहनना है।”

“अच्छा भाभी” मैं उतने ही ऊँचे स्वर में हामी भर देती जो सिर्फ उसे ही सुनाई देता हो। बस बहुत कुछ करने के बाद इतना ही कह पाती। घंटे डेढ़ के बाद पानी के बहाने उठकर सभी कमरों का चक्कर लगा कमर सीधी कर आती।

छोटी चाची सब देखती पर चुप रहती, बस मेरी नज़रों से नज़रें मिलाते ही कुछ मौन इशारों में हमदर्दी जताती। कभी-कभी कुछ ज़ोर से आवाज़ देते कहती, “अरी देदाँ, छोड़ इस सुई धागे को, बाहर शगुन का उत्सव शुरू हुआ है जाकर देख आ। अपनी बहनों के साथ कुछ मिल जुलकर हंगामे का हिस्सा बन। जब से आई है, बस एक यही काम ले बैठी है, शादी ख़त्म होते ही सब चले जाएंगे। कौन सा मायके में रहना है। चल उठ बेटे, मेरे लिए रसोईघर जाकर एक गर्म कप चाय का बना ला।”

मेरे उठने की कोशिश को नाकाम साबित करते हुए बड़ी भाभी भीतर से उतने ही ज़ोर से आवाज़ देते हुए कहती “मैं यहाँ रसोई में हूँ, बना देती हूँ। पूछ ले किसी और को भी चाय चाहिए क्या? दीदी तुम भी बैठकर वह अधूरा काम पूरा करके सब समेट लो। फिर हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर बाहर जाकर मिल बैठना।”

छोटी चाची की आँखें एक बार फिर मेरी ओर उठकर नीचे झुक जाती, शायद अपनी कोशिश पर नाकामी के अहसास का कोहरा छाता हुआ पाती, और मैं एक बार फिर गठरी की तरह घुटनों के बीच साड़ी लिए फॉल लगाने में मशगूल सी हो जाती।
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खैर समय चलता रहा, न तब रुका, न अब। बस यादें किसी चलचित्र की तरह कभी साकार होने लगती है। जो तब न कर पाई वही सब फिर से करने के अनेक मौके जीवन में मिले। अब पचास बरस के सफ़र में बहुत कुछ कर पाई हूँ जो जीवन को बाग़-बाग़ करता है। यह ज़रूर कहूँगी कि अपने तीनों बच्चों की शादियों पर हलकी सी सिल्क की साड़ी पहन लिया करती थी, उनके बच्चों की शादियों पर भी सादगी से उसी रंग रूप में तैयार होती हूँ, जो वक़्त के साथ नानी-दादी को जँचता है। हाँ तब बेरंग सूत की साड़ी हुआ करती थी अब हलके मनपसंद बादामी, या आसमानी रंग की साड़ी होती है... और मुझे लगता है जैसे मेरे जीवन के क्षितिज पर इन्द्रधनुषी रंग छाए हुए है। बेरंग बेसूद सा जीवन भी कुछ रंगों से भरा हुआ हो तो मन में जीने की और समय के साथ चलने की चाह बनी रहती है।
जीवन में रंग भरो, बेरंग कुछ भी न हो। कुदरत की छटाएँ हमें हर तरफ़ से यही सन्देश दे रही है। नीला आसमान, क्षितिज पर सूर्य किरणों का रक्स, व अलौकिक रंगों से बिखरा व निखरा कलात्मक सौन्दर्य। सब रंग बिखरे हुए एक दूसरे में घुलमिलकर एक नया खुशनुमा वातावरण प्रदान का रहे हैं। बस नजर उठाकर देखने की ज़रूरत है, बहुत दूर नहीं, अपने ही आस पास, खिड़की के उस पार...

हाँ अपने भीतर के झरोखे से जहाँ दिन की रोशनी के बाद, अंधेरों के बीच से होकर एक नई रोशनी जुगनू सी रिमझिम लिए जगमगाती हुई नज़र आती है।

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