'काला सोना' मेरी नज़र में

समीक्षक: वंदना गुप्ता

पुस्तक: काला सोना 
लेखक: रेनू यादव
विधा: कहानी
संस्करण: प्रथम, 2022
प्रकाशन: शिवना प्रकाशन, सीहोर


कहानियों का अपना एक वृहत् संसार है। हर जीवन एक कहानी है। हमारे आसपास ही घूम रही है लेकिन वहाँ से सन्दर्भ को उठाकर कहानी के रूप में प्रस्तुत करने की कला सबको नहीं आती। इस कला में केवल कथाकार ही माहिर होते हैं। रेनू यादव एक उभरती हुई कथाकार हैं। इनका पहला कथा संग्रह “काला सोना” शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

किसी भी लेखक के लिए प्रथम संग्रह चुनौतीपूर्ण होता है। उसे कथाकार के रूप में स्वीकृति मिलेगी अथवा नहीं। इस सम्भावना को रेनू यादव ने एक सिरे से नकार दिया है। उनके पास न केवल कथ्य है अपितु भाषा और शिल्प भी है। जिस क्षेत्र विशेष की कहानियाँ हैं वहीं की बोली को उन्होंने प्रधानता प्रदान की है। इसके अतिरिक्त कहीं भी दोहराव नहीं है। मुख्य स्वर स्त्री स्वर है लेकिन विषय भिन्न हैं। पाठक सोचता है नया क्या देंगी, सब तो कहा जा चुका लेकिन लेखिका नया देती हैं, समाज का वह चेहरा दिखाती हैं।

वन्दना गुप्ता
पहली ही कहानी ‘नचनिया’ के माध्यम से उन्होंने स्त्री-विमर्श नहीं अपितु पुरुष-विमर्श का डंका बजाया है। पुरुष के लिए जीवन सहज नहीं होता जैसे स्त्री के लिए नहीं होता। पुरुष के सर पर घर परिवार की जिम्मेदारी होती है जिसके लिए उसे कभी-कभी वह कार्य करना पड़ता है जो समाज की निगाह में स्वीकार्य नहीं। ऐसे ही विषय को इस कहानी में उठाया है जहाँ नचनिया का नाच तो समाज देखना चाहता है, उसे पाना भी चाहता है लेकिन उसकी हकीकत से वाकिफ नहीं होता। कभी-कभी विवशता में पुरुष को भी स्त्री का रूप धर ये स्वांग करना पड़ता है तो ऐसे में उसके घरवालों को, समाज को वह स्वीकार्य होगा अथवा नहीं इस प्रश्न का उत्तर कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।
शीर्षक कहानी ‘काला सोना’ समाज के घिनौने चेहरे को ही नहीं उकेरती बल्कि गरीबी के कारण अपनी पत्नी, बेटियों तक का सौदा कैसे होता है, अफीम की खेती के साथ शोषण की खेती कैसे होती है इसे प्रस्तुत करना एक कला है जिसमें रेनू यादव सिद्धहस्त हैं। इस कहानी में बिखराव की तमाम संभावनाएँ थीं, लेकिन वे कहीं नहीं भटकीं बल्कि देह विमर्श पर न अटककर मुद्दे को गहनता से उठाया है जो वास्तव में स्त्री-विमर्श को इंगित करता है।
डॉ. रेनू यादव
‘मुखाग्नि’ स्त्री-विमर्श को अगले पायदान पर ले जाने वाली कहानी है। एक जवान की पत्नी का जीवन कैसा होता है उसे तो कहानी इंगित करती ही है साथ ही उसकी विधवा होने पर भी अपने विवेक का साथ न छोड़ स्वयं निर्णय लेने में कैसे सक्षम होती है? उसका बखूबी चित्रण लेखिका करती हैं। जब अपने पति को मुखाग्नि देने के लिए, शोषण के खिलाफ खड़े होने के लिए वह पितृसता के खिलाफ खड़ी हो जाती है और पुत्र न होने पर पुत्री के हाथों मुखाग्नि देने के निर्णय लेती है। दीनहीन से सक्षम होने तक का सफ़र तय करते हैं इनके स्त्री पात्र।

‘छोछक’ कहानी समाज में व्याप्त दहेज़ प्रथा, बेटी के पिता होने की विडंबना का चित्रण है। ‘कोपभवन’ कहानी पुरुष-विमर्श का एक और रूपक रचती है साथ ही समलैंगिक संबंधों को, जिनकी शहरों में भी सहज स्वीकृति नहीं, वहीं गाँव में उनका क्या भविष्य होता है, तो दर्शाती ही है, साथ ही स्त्री विमर्श का ऐसा स्वरूप भी प्रस्तुत कर देती है जहाँ एक लड़की को फुटबाल की भाँति एक से दूसरे पाले में जब डाला जाता है तब प्रतिकार के पायदान पर चढ़कर वह अपने लिए जमीन खड़ी कर लेती है, ये भी उभरकर सामने आता है।

‘टोनहिन’ कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीति पर लेखिका प्रहार करती हैं साथ ही कैसे लिंगभेद के कारण एक स्त्री का जीवन अभिशप्त हो जाता है सहजता से प्रस्तुत करती हैं। हमारा समाज कितना भीरु है इस कहानी को पढ़कर जाना जा सकता है। टोना-टोटके पर विश्वास है, इंसान पर नहीं और जब किसी को इतना मजबूर कर दिया जाए कि उसके लिए जीने का विकल्प ही न बचे तब जिस चीज से समाज डरता है उसे ही हथियार भी बनाया जा सकता है, इस कहानी को पढ़कर समझ आता है। भय से बड़ा कोई भूत नहीं होता मानो ये कहानी इसी पंक्ति को सार्थक कर रही है।

इस समाज में जाने कितनी विकृतियाँ कुरीतियाँ हैं जिनसे अक्सर शहरी दुनिया अनजान ही रहती है। एक लड़की विधवा हो जाए तो जैसे वह मनुष्य की श्रेणी में ही नहीं आती। उसे जहाँ चाहे जैसे चाहे हांक दिया जाए और वह गूंगी गाय सी चल दे, यही समाज चाहता है और करता भी है। विधवा का विवाह अपने स्वार्थ हेतु पाँच वर्ष के बच्चे से भी करने से नहीं हिचकता। ये समाज कितना संवेदनहीन है, इसका चेहरा इस कहानी में भी नज़र आता है लेकिन लेखिका ने कमजोर स्त्री को सशक्त स्त्री में कैसे परिवर्तित किया है, यह कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है, जहाँ अपने निर्णय वह स्वयं लेती है और समाज की बनायी लक्ष्मण-रेखाओं को लांघ जाती है। इसका दर्शन कहानी चउकवँ राड़ कहानी के माध्यम से होता है।

‘डर’ कहानी कोरोनाकाल के भय का एक ऐसा चेहरा है जिसमें कल्पना और यथार्थ दोनों ही एक दूसरे में गड्डमड्ड होते नज़र आते हैं। ‘खुखड़ी’ कहानी स्त्री-सशक्तिकरण का सफ़र तय करती एक ऐसी स्त्री की कहानी है जहाँ उसका कोई अस्तित्व ही नहीं, जैसा कि हमारी पुरखिनों ने जीवन जीया लेकिन एक पारम्परिक भारतीय स्त्री को गुमान या तो मायके पर होता है या पति पर, ऐसे में पति के लिए जिस स्त्री का महत्त्व ही न हो, उनका जीवन कितना दुश्वार होता है, हम जानते हैं, वह कौड़ी-कौड़ी के लिए मोहताज हो जाती हैं। ईया के माध्यम से ऐसी ही स्त्री का चित्रण किया है जहाँ उसकी दुश्वारियों, तकलीफों की कोई इन्तहा ही नहीं है लेकिन एक स्त्री को अपने मायके से प्राप्त वस्तु पर कितना अधिकार होता है और उसका सदुपयोग वह कैसे करती है कि मरने से पहले आने वाली पीढ़ी को भी एक शिक्षा और दिशा दे जाती है, इस कहानी के माध्यम से प्रस्तुत कर लेखिका ने दिखावटी नहीं अपितु वास्तविक स्त्री विमर्श किया है।

‘मुँहझौंसी’ कहानी स्त्री पीड़ा का आईना है जहाँ पाठक ये सोचने को विवश हो जाता है आखिर स्त्री के जीवन में पीड़ा का कोई अंत है भी अथवा नहीं? उस पर एक स्त्री केवल भोग्या भर है, केवल देह, जब ऐसी मानसिकता हो, वहाँ कीड़े मकोडों-सी ज़िन्दगी के मध्य यदि छल के दलदल में कोई स्त्री फंस जाए उसका क्या हश्र होता है? इस कहानी को पढ़कर जाना जा सकता है। अपने बदले के लिए भी स्त्री की देह का उपयोग किया जाता है, उसे तेज़ाब फेंक झुलसा दिया जाता है। वहीं लोभ का चेहरा भी ये कहानी उकेरती है जहाँ सहानुभूति भी महज आवरण भर होती है, ऐसे में स्त्री टूट जाती है लेकिन यही लेखिका के लेखन की खूबसूरती है उनके स्त्री पात्र टूटते नहीं बल्कि सहजता से खड़े होते हैं और समाज की कुरीतियों से लड़ जाते हैं, अपना एक मुकाम बनाते हैं।

सभी कहानियाँ उस ग्रामीण परिवेश का चित्रण करती हैं जहाँ आज भी अशिक्षा, गरीबी, लाचारी का बोलबाला है और पितृसत्ता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उनसे आज भी स्त्री मुक्त नहीं हो पा रही। केवल वही स्त्रियाँ आगे बढ़ पा रही हैं जो जागरूक होकर अपने निर्णय स्वयं लेने हेतु समाज से लड़ गयीं। यही है वास्तविक स्त्री-विमर्श का स्वरूप। लेखिका को कहानियों हेतु साधुवाद।
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वंदना गुप्ता
rosered8flower@gmail.com

शिक्षा:
स्नातक: कामर्स (दिल्ली यूनिवर्सिटी, भारती कॉलेज); डिप्लोमा: कम्प्यूटर

प्रकाशित पुस्तकें:
बदलती सोच के नए अर्थ (हिंदी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से)
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अपने समय से संवाद (केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के सौजन्य से प्रकाशित


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