समीक्षा: मेरी पसंदीदा कहानियाँ

समीक्षा: मधु संधु

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब

पुस्तक: मेरी पसंदीदा कहानियाँ 
लेखिका: हंसा दीप 
प्रकाशक: किताबगंज, राजस्थान 
वर्ष: 2023 
मूल्य: ₹ 350.00 रुपये

वह एक चिलचिलाती गर्मी की दोपहर थी। डोरबैल ने पुकारा तो देखा बाहर डाकिया था। आजकल डाक कहाँ आती है। इसके सारे काम तो मोबाइल ही निपटा देता है। औत्सुक्य से गेट खोला और एक पार्सल। यह डॉ. हंसा दीप का कहानी संग्रह था- ‘मेरी पसंदीदा कहानियाँ’। उनकी कुछ कहानियाँ पिछले दिनों भी पढ़ी थी- पुरवाई में, विभोम स्वर में, रचना उत्सव में। कुछ ऐसा आकर्षण था कि देर रात तक पूरी पुस्तक पढ़ डाली। 
मधु संधु
‘मेरी पसंदीदा कहानियाँ’ कैनेडा में रहने वाली ख्यातिलब्ध कथाकार डॉ. हंसा दीप का 2023 में किताबगंज प्रकाशन राजस्थान से प्रकाशित सातवाँ कहानी संग्रह है। इससे पहले उनके ‘चश्में अपने अपने’‘प्रवास में आसपास’, ‘शत प्रतिशत’, ‘उम्र के शिखर पर खड़े लोग’, ‘छोड़ आए वो गलियां’, ‘ चेहरों पर टंगी तख्तियाँ’ कहानी संग्रह एवं ‘बंद मुट्ठी’, ‘कुबेर’, ‘केसरिया बालम’ और ‘काँच के घर’ उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। उनकी कहानियाँ गुजराती, पंजाबी, मराठी में भी अनूदित हुई हैं। डॉ. हंसा दीप संप्रति टोरेंटों विश्व विद्यालय में प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं यानी उनकी जन्म भूमि भारत और कर्मभूमि अमेरिका- कैनेडा हैं। कहती हैं-
"जीवन की शाम कैनेडा में बीतने के बावजूद, भारत में बिताई जीवन की सुबह और अमेरिका में बीती दोपहर, मेरे जीवन के सम्पूर्ण दिन का हिस्सा है।" 

‘मेरी पसंदीदा कहानियाँ’ के लिए उन्होंने अपनी 127 कहानियों में से कुल उन्नीस कहानियों का चयन किया है- दोरंगी लेन, हरा पत्ता पीला पत्ता, टूक टूक कलेजा, फालतू कोना, शून्य के भीतर, सोविनियर, शत प्रतिशत, इलायची, कुलांचे भरते मृग, अक्स, छोड़ आए वो गलियाँ, पूर्णविराम के पहले, फौजी, पापा की मुक्ति, नेपथ्य से, ऊँचाइयाँ, दो और दो बाईस, पुराना चावल, चेहरों पर टंगी तख्तियाँ। 

अकेलापन उनके पात्रों के जीवन की दुखती रग है। यह महसूस करने की स्थिति है, कटाव की स्थिति है, बहुत कुछ छूट जाने की स्थिति है, उदासी- विसंगति- व्यर्थताबोध की स्थिति है, मानसिक ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य को भी चुनौती की स्थिति है। ‘दोरंगी लेन’, कुलांचे भरता मृग’ ‘हरा पत्ता पीला पत्ता’, ‘टूक- टूक कलेजा’ में उम्रदराज वृद्ध पात्रों की जीवन संध्या का अकेलापन है। ‘दोरंगी लेन’ की साठ- पैंसठ वर्षीय ऐंजला को यह अकेलापन पति और बेटियों की आकस्मिक दुर्घटना मृत्यु ने दिया है। ‘ कुलांचे भरता मृग’ की अमायरा ने भी आकस्मिक दुर्घटना में माता- पिता खो दिये हैं। ‘हरा पत्ता पीला पत्ता’ में अपने जमाने के जाने-माने कार्डिओलोजिस्ट डॉक्टर एडम मिलर जीवन संध्या की असहायावस्था में शारीरिक परेशानियों के साथ-साथ अकेलापन भोग रहे हैं। अपने भव्य अतीत को भुलाना उनके लिए असंभव है-

"आईने में शक्ल देखने का दुस्साहस नहीं कर पाते। वही तस्वीर जेहन में रखना चाहते थे, जो उनकी पहचान थी, पोस्टरों पर रहती थी, पावर पॉइंट की स्लाइड्स पर थी, मरीजों की आँखों में रहती थी, सुप्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ डॉक्टर एडम मिलर के मुसकुराते चेहरे के साथ। " 

‘टूक- टूक कलेजा’ में यह अकेलापन अपनों की देन है। माँ वस्तु हो गई है। पुराना और छोटा घर हो गई है। अस्थिपंजर हो गई है। क्योंकि बच्चों के समक्ष विशाल, आकर्षक संसार और भविष्य है। अब उन्हें माँ का फौलादी संरक्षण नहीं चाहिए। वे भावप्रूफ हैं-
"मैंने बच्चों की सुविधा के लिए उस घर को छोड़ा था। अब बच्चों ने अपनी सुविधा के लिए मुझे छोड़ दिया। ... मैं ही छोटी हो गई और बच्चों का कद बड़ा हो चला था। घर की अतिरिक्त चाबियाँ मुझे थमा कर बच्चों ने जैसे मुक्ति पा ली थी। पुरानेपन और छोटेपन से मुक्ति का एहसास। " 

बच्चों की छाया तले बौने होते माँ- बाप – आज की बड़ी सच्चाई है। 

‘फालतू कोना’ में पत्नी के काम पर जाने, कमाने, बच्चों के बड़े हो जाने पर पति सुहास की मुखियागिरी का सिंहासन डगमगा जाता है और वह नितांत अकेलापन न झेल पाने के कारण शराब को अपना स्थायी साथी बना लेता है। वह अपने क्रूर व्यवहार से इतना अवांच्छित हो जाता है कि उसकी मृत्यु पर भी सबको शवयात्रा से जल्दी फारिग होने की भगदड़ रहती है। ऐसी ही अनासक्ति ‘पापा की मुक्ति’ में भी है। इतने बड़े परिवार सत्य, जीवन सत्य, समाज सत्य को चित्रित करना लेखिका के सबल साहस का परिणाम ही है।

हंसा के पात्रों ने अकेलेपन को नियति को हवा नहीं दी। वे लगातार उससे छुटकारा पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। ‘दोरंगी लेन’ की एंजेला किरायेदार युवती में अपनी मृत बेटियों का बिम्ब ढूंढ अकेलेपन से मुक्ति का प्रयास करती है। ‘हरा पत्ता पीला पत्ता’ के डॉक्टर मिलर पड़ौस के एक वर्ष के बच्चे का साथ पाकर, उसकी मैत्री की शक्ति पाकर स्वस्थ होने लगते हैं-
"हरे पत्ते और पीले पत्ते की जुगलबंदी ने एक नये रंग को जन्म दे दिया था, जो सिर्फ खुशियों का रंग था। एक अपनी हरीतिमा पर खुश और एक अपनी पीलिमा पर”। 

‘शून्य के भीतर’ की कौमुदी अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मूक जानवरों- बिल्ली, रेकून, पपी, गिलहरी के साथ अपने नये परिवार का गठन करती है। 

‘पुराना चावल’’ की छियानवे वर्षीय वृदधा जीवंत भी है और पूरी तरह चुस्त भी। वृद्धावस्था के बावजूद उस का घर आज भी परियों के महल जैसा स्वच्छ, सुंदर और आकर्षक है। 

यहाँ कथ्य और भाव प्रमुख हैं, इसलिए अनिवार्य नहीं कि हर कहानी में स्थान का उल्लेख हो। भारत और विदेश दोनों ही यहाँ उपस्थित हैं। ‘दोरंगी लेन’ में टोरेंटों में वेस्टर्न यूनिवरसिटी के पास फरगस नाम का छोटा सा कस्बा है। ‘सोविनियर’ में टोरेटों की फ्रेंच कक्षा में एशियन और साउथ एशियन छात्रों की भरमार है। ‘शून्य के भीतर’ में टोरेंटों और आकलैंड है। ‘चेहरों पर टंगी तख्तियाँ’ और ‘पुराना चावल’ में टोरंटो है। ‘ नेपथ्य में’ में न्यूयार्क और भारत है। अनेक कहानियों में स्थान गौण हो गया है। 

श्वेत, अश्वेत और एशियन- औरा, एंजेला, सुहास, कौमुदी, मिलर, एना गिल्बर्ट, साशा, कीथ, जोएना, लीसा, शौकत मियाँ, आफ़रीन, रजनी, अमायरा, सुकमा, उर्मी, लियो, टमारा, कौशल्या, मार्था, लोरेन, सुशीम, आशी सभी पात्र यहाँ हैं।

‘चेहरों पर तंगी तख्तियाँ’ की लियो चीन से, टमारा युगांडा से, कौशल्या भारत से और आफ़रीन ईरान से है। भले ही सभी पीढ़ियों से यहाँ रह रही हैं, लेकिन नस्लवादी सोच उन्हें जब- तब प्रताड़ित करती है। लियो की जड़े चीन से जुड़ी हैं, इसलिए कोरोना काल में लोग उसे कोरोना कैरियर कहकर परेशान करते हैं। शहर का चाइना टाउन जंगल की तरह खामोश हो जाता है-
"यह रेसिज़्म है। .... उसके पोते- पोती के साथ खेलने से बच्चे कतराते है। कहते है-तुम चाइनीज़ हो, हमसे दूर रहो।" (ठीक यही स्थिति निर्मल वर्मा की आधी शताब्दी पहले की कहानी ‘दो घर’ में मिलती है।) 

टमारा नीग्रो है, अमेरिका में उनकी पहचान काली चमड़ी से ही है। हर अपराध की पोटली उन्हीं के सिर फोड़ी जाती है। अश्वेत नर्स को कोई पसंद नहीं करता। आफ़रीन जानती है कि हुसैन या खान होने के कारण उन्हें आतंकवादी ही समझा जाता है-
"शहर के किसी भी हिस्से में गोली चले, पहला शक मुसलमानों पर जाता है। मुट्ठी भर आतंकियों के कारण पूरी जाति शक के कठघरे में खड़ी है।" 

आज वैश्वीकरण का समय है। ‘दोरागी लेन’ की नीग्रो ओरा यूगांडा से टोरंटो आकर डॉक्टरी की, मैडिसिन की पढाई कर रही है। उसके मन में गहरे पैठा है कि श्वेत लोगों के लिए अश्वेत लोगों को स्वीकारना आसान नहीं। यह हीन भाव उसे अपने देश से, माँ की सोच से ही मिल गया था। लेकिन टोरेंटों आकर देखती है कि उसकी श्वेत मकान मालकिन का पति और बेटियाँ अश्वेत हैं और वह उसके लिए अपनी बेटियों की तरह ही चिंतित रहती है। नसलवाद उसका भ्रम था, हीन ग्रंथि मात्र थी। नसलवाद से ऊपर वैश्विक मानवतावाद जन्म ले रहा है।

‘फालतू कोना’, ‘शून्य के भीतर’, कहानियाँ पारिवारिक विघटन को लिए हैं। ‘फालतू कोना’ में विघटन का कारण सुहास का अहं है तो ‘शून्य के भीतर’ में स्वार्थी, आत्मकेंद्रित भाई- बहनों की निस्संगता कौमुदी को अकेला कर जाती है। 

‘दो और दो बाईस’ में अमेरिकन पुलिस की कर्तव्यपरायन्ता तथा तत्परता है। ‘सोविनियर’ और ‘शत- प्रतिशत’ में मनोवैज्ञानिक ग्रंथियां हैं। शापित बचपन से जीवन कुंठित हो चुका है। भीतर चल रहे युद्ध जीवन को सामान्य नहीं होने देते। ‘छोड़ आए वो गलियाँ’ में कलेक्टर बना आदिवासी भील सुकमा वीरा, अपराधियों की दुनिया, लूट- पाट, शोषित प्रजा, नाकाम कठपुतली शासनतन्त्र, कामुक- क्रूर सेठ और भ्रष्ट राजनेता हैं। ‘नेपथ्य से’ में विपरीत स्वभाव की दो सहेलियाँ हैं और दोनों अपने जीवन से प्रसन्न हैं- धनाढ्य भी और गरीब भी। क्योंकि अमीरी गरीबी का मापदण्ड सिर्फ पैसा ही नहीं होता। ‘इलायची’ का कसाई शौकत मियाँ अपने बचपन के प्यार के लिए गोश्त खाना बेचना तो दूर, उसे छूना तक छोड़ देता है। ‘अक्स’ में दोहती को नानी बनने के बाद भी अपनी नानी की स्नेहिल स्मृतियाँ घेरे रहती हैं। ‘ऊँचाइयाँ’ की आशी अस्थाना केंद्रीय नेता भी है और नारी सशक्तिकरण की वाहिका भी। देशसेवा और समाज सेवा दोनों उनका लक्ष्य है। 

बच्चों का शापित बचपन पूरे जीवन को प्रभावित करता है। उन्हें सामान्य होने ही नहीं देता, कुंठित बना देता है, पर पीड़क या आत्म पीड़क बना देता है। यह स्थिति ‘सोविनियर’, ’शत प्रतिशत’ में मिलती है। ‘ऊँचाइयाँ’ का अलंकार अपनी रौबीली राजनेता माँ और डरे सहमे पिता को देखकर अकसर सोचता है- 
"काश वह एक लड़की के रूप में जन्म लेता। लड़कियां कितनी ताकतवर होती हैं। बिलकुल माँ की तरह होता वह भी।"

पापा के डरे सहमे व्यक्तित्व से वह इतना आतंकित है कि अगर शादी करनी ही है तो वह किसी लड़के से ही शादी करेगा, लड़की से नहीं। 

उनके पात्र जीवन के हर क्षेत्र से आए हैं। ‘दोरंगी लेन’, ‘हरा पत्ता पीला पत्ता’, ‘शून्य के भीतर’ में डॉक्टर, ‘सोविनियर’’, ‘कुलांचे भरते मृग’, ‘पूर्णविराम से पहले’, ‘नेपथ्य से’ में शिक्षक नायकत्व लिए हैं। ‘चेहरों पर टंगी तख्तियाँ’ की टमारा नर्स है। ‘इलायची’ का शौकत मियाँ कसाई है। ‘फौजी’ में सैनिक है। ‘ऊँचाइयाँ’ में राजनेता है। 
पात्र परिचय में हंसा जी रेखाचित्र शैली का प्रयोग करती हैं-
"उसकी उम्र साठ से पैंसठ के बीच होगी। वह एक श्वेत महिला थी। बाल करीने से सेट किए हुये थे। सारे बाल सफ़ेद होते हुये भी मुँह पर तेज था। ... गिनी- चुनी झुरियों को छोड़ दें तो चेहरा सौम्य लेकिन भावरहित था। ... गुड मॉर्निंग भी बोलती हैं तो चेहरा ऐसा सपाट रहता है, मानों कोई रिकॉर्डिंग बाजा दी हो।" 

चिंतन की परिपक्वता उनकी भाषा को सूत्रात्मक बना रही है। जैसे- 
1. अतीत जब पीछा नहीं छोड़ता तो अन्तर्मन के भावों पर ताले लग जाते होंगे। 
2. बाहरी काले रंग से भीतर की रंग- बिरंगी दुनिया का कोई वास्ता नहीं होता। 
3. संवादहीनता कई बार शक और संदेह को जन्म देती है। 
4. आदमी खुद से ही डरने लगे, तो निर्भय होने का स्वांग जरूरी हो जाता है। 
5. घर का ख्याल कठोर से कठोर आदमी को भी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ देता है। 
6. संवाद हीनता की दीवार बच्चे जितनी जल्दी तोड़ देते हैं, हमारे लिए कहाँ संभव हो पाता है। 
7. जिस दिन आशा टूटे उस दिन जिजीविषा खत्म होने का अंदेशा होने लगता है। 
हंसा के पात्रों का अकेलापन प्रवास की देन नहीं है। उन्होने उम्रदराज वृद्धों का, नियति के कुठाराघातों का, अनाथ बच्चों का, जीवन की दौड़ में पिछड़जाने वाले अतीतजीवियों का अकेलापन दिया है। उनके यहाँ न स्थान प्रमुख है, न नस्ल, अपितु मनुष्य और उसके भाव, विघटन और स्नेह, संघर्ष और जीवट, मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण, जीवन सत्य और जीवन मूल्य सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। 
 
संदर्भ- 
1. हंसा दीप, मेरे पसंदीदा कहानियाँ, किताबगंज, राजस्थान, 2023, अपनी बात 
2. वही, पृष्ठ 19
3. वही, पृष्ठ 29
4. वही, पृष्ठ 25
5. वही, पृष्ठ 117
6. वही, पृष्ठ 175
7. वही, पृष्ठ 149
8. वही, पृष्ठ 11,13
9. वही, पृष्ठ 11
10. वही, पृष्ठ 13
11. वही, पृष्ठ 128
12. वही, पृष्ठ 128
13. वही, पृष्ठ 129
14. वही, पृष्ठ 129
15. वही, पृष्ठ 147

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