कुँवर बेचैन: एकांतिक अनुराग और मानवी संघर्ष के नवगीतकार

मनोहर अभय
नवगीतों के राजकुमार कहे जाने वाले डॉ.कुँवर बेचैन कोरोना काल में 29 अप्रैल 2021 को चले गए, न लौटने को। हम पुकारते ही रहे "लौट आ रे\फिर से लौट आ ओ! प्रवासी जल !फिर से लौट आ"। प्रवासी कहते हैं यात्री, बटोही या किसी परदेश निवासी को। इस धरा पर रहने वाले हम सब प्रवासी ही तो हैं। फिर पानियों से भरे मेघ कौन स्थायी निवासी हैं! घिरे, बरसे और लौट गए। लौट गए तो सूखेंगे नदी- ताल। गुम हो जाएगी लहराती लहरों की तरलता (रूखा सूखा सा जीवन) और बढ़ेगी मन में व्यतीत की व्यथा, मरुथल की घबराहट। तब प्रवासी जल की वापसी का आवाहन जरूरी है। यही तो कहा है डॉ. बेचैन ने इस गीत में "लौट आ रे!\ओ प्रवासी जल!\फिर से लौट आ!\रह गया है प्राण मन में \रेत, केवल रेत जलता \खो गई है हर लहर की\मौन लहराती तरलता\कह रहा है चीख कर मरुथल\फिर से लौट आ रे"!

 नवगीत कवि डॉ. शांति सुमन ने भी बादलों का आवाहन कुछ इसी तरह किया: "दुख रही है अब नदी की देह\ बादल लौट आ। उग रहा है मौसमी सन्देह\बादल लौट आ"। यह चीख किसी मरुथल की नहीं और न ही किसी नदी की दुखती देह का दुःख। ये कुँवर बैचेन के मरुथली जिंदगी का हाहाकार है। उनके दुखों की दुखती रग की बैचेनी, जिसने कुँवर बहादुर सक्सेना को कुँवर बैचेन बना दिया। आपदाओं, व्यथाओं से भरा बहुत ही संघर्षशील जीवन जिया, एक जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के काँठ नामक कस्बे के पास उमरी गाँव में जन्मे डॉ.बेचैन ने। जन्म के दो महीने के बाद ही पिता का देहावसान हो गया । पिता की मृत्यु के पाँच-पाँच सात दिन बाद घर में डकैती पड़ी। डकैत पूर्वजों की सारी जमा-जथा (24–25 कलश चाँदी के रुपए तथा सोने-चाँदी के जेवर) जो जमीन में गढ़े थे निकाल ले गए। बाद में माता गंगा देवी दो बड़ी बहिनों सहित उन्हें लेकर अपने माईके आ गईं।नानी अकेली। नाना-मामा की मृत्यु हो चुकी थी। डेढ़-दो साल जैसे -तैसे काट कर फिर मुरादाबाद मौसी के पास आ गए। मौसाजी के सद्प्रयत्नोँ से बड़ी बहन चमन देई की शादी जंगबहादुर सक्सेना से हो गई। वे अकेले थे। माता -पिता का निधन हो चुका था। चंदौसी में एक प्रिंटिंगप्रेस में मशीन मैन थे। उनका अनुरोध कि माता गंगादेई को कहीं और जाने की जरूरत नहीं। वे उनकी संरक्षिका के रूप में उनके साथ ही रहें। इन विषम परिस्थितों में बड़ी बहिन के संरक्षण में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। एम कॉम, एम ए (हिंदी) के अतिरिक्त पी-एच.डी की उपाधि अर्जित की। विभिन्न विद्यालयों में अध्यापन करते हुए वे एम एम एच स्नातकोत्तर कॉलेज गाजियाबाद में प्रोफेसर व हिंदी विभागाध्यक्ष पद से 2001 में सेवानिवृत्त हुए।

इतना कष्टकारी जीवन जीने के बाद भी कुँवर बेचैन का कवि जीवन के गीत,जिजीविषा के गीतों का शिल्पी है: (“हो के मायूस न यूँ शाम-से ढलते रहिए\ ज़िन्दगी भोर है सूरज से निकलते रहिए \एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो कब तक जिएँगे \धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिए)। कवि ने अपने संघर्षमय जीवन की तुलना ऐसे पेड़ से की जो बाढ़ के पानी में घिर रहा है। बाढ़ग्रस्त भागे जा रहे हैं। पेड़ कहाँ जाए? (“वो दौड़ा आ रहा है सामने से बाढ़ का पानी\कोई उस पेड़ से सीखे मुसीबत में अड़े रहना“)।कवि ने जीवन समर से पलायन करना तो सीखा ही नहीं।उनके लिए ‘’गीत रोशनी की लकीर पर लिखा हुआ वह शब्द है जो कभी पक्षियों की चहचहाहट, कभी फूलों की की महक और कभी सुबह की ताजा हवा का झोँका लेकर अवतरित होता है।यह जितना दिखने सरल लगता है, उतना लिखने में कठिन है। एक ही भावभूमि को प्रारम्भ से अंत तक सुरक्षित रखते हुए पूरी तन्मयता के साथ, मनोरम भावानुगामिनी विशेष लय और ताल से युक्त शब्द योजना में बाँधना सफल गीतकार की अपनी निजी विशेषता है" (शब्दायन-सम्पादक निर्मल शुक्ल )।

जीवन सुख दुःख की धूप -छाँव है। मिलन से जुडी है, बिछुड़न। संयोग है तो वियोग भी। कवि कथन है "मिलना और बिछुड़ना दोनों\जीवन की मजबूरी है---उतने ही हम पास रहेंगे,\जितनी हम में दूरी है।--आँखों से आँसू की बिछुड़न\होंठों से बाँसुरियों की\तट से नव लहरों की बिछुड़न\पनघट से गागरियों की --जंगल -जंगल भटकेगा ही\जिस मृग पर कस्तूरी है"। मिलने की प्रसन्नता और बिछुड़ने परविषाद स्वाभाविक है। हँसी - खुशी में स्थायित्व नहीं है। द्रष्टव्य है: "बंद होंठों में छुपा लो\ये हँसी के फूल\वर्ना रो पड़ोगे"।किस बात का रोना -धोना ?आज समय प्रतिकूल है, तो कल अनुकूल भी होगा। कवि की संवेदना आशा और आस्था से आपूरित है: " लाख भंवरें हों नदी में\पर कहीं पर कूल भी है।\शाख पर इक फूल भी है"। जीवन की आपाधापी और रोज की भागम- भाग से कवि परिचित है।फिर भी भाव -भीने क्षण बचाए रखने की पुरजोर कोशिश है "कल समय की व्यस्तताओं से निकालूँगा समय कुछ\फिर भरूँगा खुद तुम्हारी माँग में सिन्दूर\मुझको माफ़ करना"। गीत कवि बच्चन भी जीवन की आपाधापी की बात कहते हैं, पर उनका लहजा कुछ और है "जीवन की आपाधापी में \कब वक्त मिला\कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,\जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या"।

डॉ. बेचैन रूमानियत के कवि हैं।कोमलकांत पदावली के सुमधुर गायक। संवेदना मानो ओस में भीगी। फूल से सुकुमार शब्द।सीपी में मोती सी दमकती व्यंजना। यही है पहचान उनके गीतों की। हाँ! उनकी रूमानियत नितांत पार्थिव है; दैहिक। बच्चन ने कहा "तुम्हारे नील झील-से नैन,\नीर निर्झर-से लहरे केश"। तो डॉ. बेचैन बोले "तुम्हारे हाथ से टंक कर\बने हीरे, बने मोती\बटन मेरी कमीज़ों के ।\नयन का जागरण देतीं,\नहाई देह की छुअनें\कभी भीगी हुई अलकें\कभी ये चुंबनों के फूल\केसर गंध सी पलकें,\सवेरे ही सपन झूले\बने ये सावनी लोचन\कई त्यौहार- तीजों के।\बनी झंकार वीणा की\तुम्हारी चूड़ियों के हाथ में\यह चाय की प्याली,\थकावट की लकती धूप को\दो नैन हरियाली\तुम्हारी दृष्टियाँ छूकर\उभरने और जयादा लग गए हैं\रंग चीज़ों के”।यहाँ न झील है न झरने।है तो नहाई देह की छुअन, भीगी हुई अलकें, चुंबनों के फूल,चूड़ियों के हाथ में चाय की प्याली। दाम्पत्य जीवन की खुली कहानी है।दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ बन जातीं हैं कवि के गीतों का आलम्बन। ये आलंबन वक्त के दर्द, समय की दुर्बलताओं, सामजिक विभीषिकाओं को बिम्बित करते हैं।गरीबी का नंगा नाँच। इतना नंगा कि पहनने के लिए पर्याप्त कपडे भी नहीं। ऐसे परिदृश्य को डॉ. बेचैन ने प्रतीकों, बिंबों,मिथकोँ, पुराकथाओं के माध्यम से इस तरह शब्दांकित किया कि कथ्य का गाम्भीर्य स्वतः ही खुलता चला जाता है।समाज में जो गलत हो रहा है, जो विकृत है उस पर सीधा शाब्दिक प्रहार नहीं, बल्कि उसे अनावृत करती शब्द की व्यंजना शक्ति। कुर्सी पर बैठा कवि पुस्तक पढ़ रहा है। सामने मेज पर है कागज, कलम पेपरवेट और दफ्तर - की दिनचर्या में काम आने वाली चीजें। साधारण सी दिखने वाली ये वस्तुएँ दफ्तरों से लेकर समाज में फैले भ्रष्ट- आचरण की बखिया उधेड़ने वाले बिम्ब और प्रतीक के उपादान हैं। द्रष्टव्य है: दृष्टि हटी जब भी मन\पुस्तक के पेज से \फिसल गईं स्वकृतियाँ जीवन की मेज से \हाथों को मिली लेखनी बबूल की \दासी जो मेहनत के साँवरे उसूल की \जितने ही प्राण रहे \मेरे परहेज से \गलत दिशा चुनी गई कागज़ के पेट ने \उसको सम्मान दिया \हर पेपरवेट ने \भरी जाती खुशियाँ झूठ के दहेज़ से।

आवाम की खुशियों का प्रार्थना पत्र वाजिब है। विवाह जैसी खुशियाँ हैं। पर चाहिए 'बाबूडोम' का अनुमोदन। कागज़ का पेट भरना है। बबूल की लेखनी से क्या उम्मीद की जाए। उधर आवेदन पत्र दबाये बैठा है पेपरवेट (अफसरों का दवाब)। पेपर वेट हटेगा, ऊपरी दवाब या लेन-देन से। विवाह में चलन है दहेज का। दीजिए दहेज (झूठ-फरेब और रिश्वत) उसूल रह गए सिर पीटते।सब जानते हैं मेज की सफाई-सजावट के लिए चाहिए मेजपोश। जब मेजपोश ही मटमैला हो तो "जीने का एक दिन \ मरने के चार \हमने लिए उधार मटमैले मेजपोश\लंगड़े ये स्टूल \गमलों में गंधहीन कागज के फूल \रेतीली दीवारें \लोहे के द्वार \दो गज की देहों को \दस इंची वस्त्र \इस्पाती दुश्मन को लकड़ी के पर शस्त्र \झुकी हुई \पीठों पर पर्वत के भार \हमने लिए उधार\घाव भरे पाँवों को पथरीले पंथ \अनपढ़ की आँखोँ को एम.ए के ग्रन्थ \फूलों के हृदयों को \काँटों के हार"। चमक--दमक के साथ राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना है।इसके लिए उधार की जिंस है वह भी मटमैली जिस पर गुलदान रखे जाने हैं वे स्टूल लंगड़े हैं (सीधे खड़े नहीं हो सकते)। फूल कागज के निर्गन्ध हैं।फौलाद जैसे दुश्मन से लोहा लेना है लकड़ी के शस्त्रों से। बाहर लोहे का दरवाजा भीतर कच्ची दीवारों वाले घर। पढ़ने के लिए अनपढ़ को उच्च शिक्षा के ग्रन्थ।पूरा गीत विरोधोक्ति से भरा है। 

 डॉ. बेचैन ने नवगीत की रचना ऐसे कालखंड में की जब कोई गीत के निधन की बात कर रहा है, तो कोई उन में नए प्राण फूँकना चाहता है।रागात्मक गीतों को जब पूरी तरह से खारिज कर दिया था। तो कोई जमीनी हकीकत का हल्फिया वयान लिख रहा था है।जीवन समर में उलझे युवा कवि डॉ.बेचैन की अपनी बेचैनी थी। उनके लिए मधुमासी दिन आए और चले गए। क्या मधुमास ?क्या पतझार? बानगी देखिए: " संघर्षों से बतियाने में\ उलझा था जब मेरा मन\ चला गया था आकर यौवन\ मुझको बिना बताये\ ज्यों अनपढ़ी प्रेम की पाती\ किसी प्रेमिका के हाथों से\ आँधी में उड़ जाए"। यहाँ जिंदगी का यथार्थ बोल रहा है, पूरी रूमानियत और नए उपमानों के साथ। गीतकार शतदल ने लिखा "गंध ने छू लिया प्यार से क्या इन्हें/ ये अधर इस जनम \तो हुए बांसुरी"।उधर भारत भूषण ने कहा: "आधी उम्र \करके धुआँ \ये तो कहो \किस के हुए\परिवार के \या प्यार के"।भारत भूषण के एक अन्य गीत की पंक्तियाँ थीं " 'सीपिया बरन\ मंगलमय तन/ जीवन दर्शन बांचते नयन"। डॉ.बेचैन कब चूकने वाले थे,बोले "जितनी दूर नयन से सपना\जितनी दूर अधर से हँसना\बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से\उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से"। अथवा "बहुत धीरे\ बहुत धीरे से\कान में खनके मँजीरे से\स्वप्न में शायद हँसी हो\ तुमने .बहुत दिनों के बाद\ खिड़कियाँ खोली हैं \ओ वसंती पवन! हमारे घर आना"! सरल शब्द हैं। शिल्प में है नव्यता। जीवन जगत से उठाई भवभूमि। मन को छूता एक मार्मिक गीत है, जो पुरातन और अधुनातन के बीच की कसमसाती जिंदगी को शब्दांकित करता है "जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने\दादी की हँसुली ने, माँ की पायल ने\उस सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर\मेरी टाई टँगने से कतराती है"। यहाँ घर की बात है, मकान की नहीं। मकान में वह ममत्व नहीं जो माता- पिता ने मर-खप कर, जीवन भर की कमाई लगा कर बनाए घर में है। 'कच्ची दीवारों" और' सच्चे घर ' की व्यंजना से जो लालित्य उभरता है वह अपने आप में अनूठा है। सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर टाई का टँगने से कतराना आधुनिकता की अस्वीकृति को व्यंजित करता है। विगत पीढ़ियों ने कठोर श्रम और निष्ठा से जो संस्कार संहिता तैयार की है, उसे आज की पीढ़ी नकारने पर उतारू है। जबकि कवि उस अमूल्य धरोहर को खोना नहीं चाहता, इसलिए कि अतीत में सब कुछ अर्थ हीन नहीं है। बहुत कुछ सार्थक भी है जो व्यक्ति को विभ्रम से बचा सकता है। किन्तु आज सारे संस्कार घर-परिवार की मर्यादा आधुनिकता की भेंट चढ़ गए हैं कवि व्यथित है मर्म से भरी भावोक्ति देखिए: "जिन्हें दिया संगीत द्वार की साँकल ने\खाँसी के ठनके, चूड़ी की हलचल ने \उन संकेतों वाले भावुक घूँघट पर\दरवाज़े की 'कॉल बैल' हँस जाती है"। डॉ. बेचैन अपने जीवन दर्शन को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं: आज के खुरदरे और संवेदन- हीन जीवन को आद्रता देना मह्त्वपूर्ण मानवी मूल्य है ( सूखी मिट्टी से कोई भी मूरत न कभी बन पाएगी,\जब हवा चलेगी ये मिटटी खुद अपनी धुल उड़ाएगी,इसलिए, सजल बादल बनकर, बौछार के छींटे देता चल,\ये दुनिया सूखी मिटटी है, तू प्यार के छीटें देता चल.")। कवि की मान्यता है कि रचनाकार और उसकी रचना का अंतर्संबंध बिल्कुल वैसा ही है जैसा बर्फ और पानी का। बर्फ जब पिघलती है तो पानी हो जाती है और पानी जम कर बन जाता है बर्फ। कबीर ने भी यही कहा था "पाणी ही तैं हिम भया, हिम हवै गया बिलाइ"।कवि के जीवन दर्शन की गाँठें खोलता गीतांश है, "नदी बोली समन्दर से\मैं तेरे पास आई हूँ \मुझे भी गा मेरे शायर,\मैं तेरी ही रुबाई हूँ".।

जिसने बचपन से आभाव झेले हों, विपरीत स्थितियों में जीवन जिया हो, उसकी सर्जना कितनी ही रूमानी रही हो मानवीय संघर्ष की करुण कथा को नहीं भूल सकता। जनसामान्य की वेदना, भोगी हुई जिन्दगी की कशमकश, दमघोटू बेचैनी, कारुणिक अनुभूति स्वाभाविक है। किन्तु डॉ. बेचैन ने जो कहा उसमें सकारात्मक सोच है, ओस से अभिसिक्त फूलों की छुअन है। कवि औरों के दुःख में अपना दुःख तलाशता है,तथा अपने दुःख में औरों का दुःख। पढ़िए क्या कहती हुईं ये पंक्तियाँ : "हमारा दुख जब दूसरों के पास जाता है, तो वे भी हमारे दुख के साथ एकाकार हो जाते हैं'। इसे ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हृदय की रस-दशा और मुक्तावस्था कहा है। जब मैं अपनी कोई दर्दीली कविता सुनाता हूँ, तो मैंने लोगों की आँखों से आँसू बहते हुए देखे हैं"। कवि और सामाजिक की वेदना जब एकाकार हो जाती है, तब परवर्ती डूब जाता है कविता के अमृत कुंड में। यों समझिए कि उनके गीतों में रागात्मकता है, तो सामाजिक विद्रूपताओं का खुलासा भी है। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि डॉ.बेचैन का कवि अपने परिवेश से बेखबर था। उसने आवाज दी;।कहा भी कि विसंगति और विद्रूपताओं को देखते हुए मौन धारण करना अच्छा नहीं है (आवाज़ को / आवाज़ दे\ये मौन-व्रत /अच्छा नहीं।जलते हैं घर\ जलते नगर\जलने लगे / चिड़यों के पर,\तू ख्वाब में\डूबा रहा\तेरी नज़र / थी बेख़बर। आँखों के ख़त / पर नींद का\यह दस्तख़त / अच्छा नहीं।)जिस कशिश के साथ कवि सामाजिक शुचिता पर बल देता है, उसी तड़प के साथ राष्ट्र के प्रति समर्पण और ऐक्य के लिए जनमानस को उत्प्रेरित करता है: "चलो की आज मिल के साथ राष्ट्र-वन्दना करें\सभी दिलों में एक रंग, सिर्फ प्यार का भरें\चलो कि आज मिल के हम, खाएँ एक ये कसम\स्वदेश के लिये जिएँ , स्वदेश के लिये मरें"। ऐसी ही एक और पंक्ति है: तुम्हें कसम है,\तुम भी एक पल न टूटना\कि देश के खुले नयन के ख्वाब हम हैं, ख्वाब तुम"।

आज जीवन जीना दूभर हो गया है। दृष्टव्य है गीत पिन बहुत सारे, "जिंदगी का अर्थ\मरना हो गया है\और जीने के लिये हैं\दिन बहुत सारे ।\इस समय की मेज़ पर\रक्खी हुई\जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी\दोस्ती का अर्थ\चुभना हो गया है\और चुभने के लिए हैं\पिन बहुत सारे! व्यवस्था पर सीधा प्रहार करता गीत है "चल ततइया" -- काट तन,मोटी व्यवस्था का\जो धकेले जा रही है\देश का पहिया! चल ततइया! छोड़ मीठा गुड़\तू वहाँ तक उड़\है जहाँ पर क़ैद पेटों में रुपइया! चल ततइया! डंक कर पैना\चल बढ़ा सेना\थाम तुरही, छोड़कर मीठा पपइया !!)

कवि की लोकमंगल भावना अपूर्व है, अनुपम अद्व्तीय: है भाल यह ऊँचा गगन\हैं स्वेदकन / नक्षत्र-गन,\दीपक जला उस द्वार पर\जिस द्वार पर / है तम सघन। ---रखना दीप संभाल कर\एक शिकन भी रह ना जाये\उजियारे के गाल पर"। कहना न होगा कवि ने कथ्य की बुनावट और सजावट जिस नव्यता ऋजुता से की है उसका पर्याय देखने को भी नहीं मिलता । यहाँ आप को मिलेंगे आँखों के ख़त, नहाई देह की छुअनें, चाँद की नथुनी, साँसों की फा़इल,हृदयों के कार्यालय,निम्न-मध्यमवर्ग केपरिवार की अल्प -मासिक आय-सी जिंदगी, कटखने तूफान, फ़सलों के शस्त्र, मन के रूमाल, फूल की रस्सी बुनना, आदि। 

डॉ. बेचैन के सहकर्मी से. रा. यात्री कहते हैं, "मैंने कुँवर को हमेशा गुनगुनाते हुए ही पाया। लगता था वह अपने किसी गीत या शेर पर सवार है। अभिव्यक्ति के प्रति समर्पित मैंने ऐसा दूसरा रचनाकार नहीं देखा। कहना मुश्किल है वह गीत कहता था या शब्दों की चित्रकारी करता था"। गीतों का ऐसा दूसरा चित्रकार कहाँ मिलेगा। डॉ कुँवर ने कभी लिखा था " बहुत प्यारे लग रहे हो"। सचमुच ही वे जन- जन के प्यारे गीतकार थे, एकांतिक अनुराग और मानवी संघर्ष के कविर्मनीषी। आज उनकी ये पंक्तियाँ बार- बार याद आ रही हैं ‘’कब न जाने आऊँगा मैं \यह जरा सी बात कहने \यह कि तुम मन की अंगूठी के अनूठे नग रहे हो \बहुत प्यारे लग रहे हो।
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डॉ. मनोहर अभय

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चलभाष: 91671 48096
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