कथा शिल्पी मुंशी प्रेमचंद

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी); ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले स्थित सुप्रसिद्ध लमही गाँव निवासी अजायबराय तथा माता आनंदी देवी के घर हिंदी के महत्वपूर्ण कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ। मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। सर्वप्रथम उन्होंने उर्दू साहित्य में लेखन की शुरुआत नवाब राय के नाम से की। प्रेमचंद के पिता डाकखाने में एक क्लर्क थे। बचपन में माता का स्वर्गवास होने से पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और सौतेली माँ के नियंत्रण में रहने के कारण प्रेमचंद का बचपन बहुत कष्ट में रहा। प्रेमचंद की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू में हुई। उन्होंने स्नातक तक अध्ययन किया और साथ में नौकरी भी की लेकिन नौकरी में मन अधिक नहीं लगा। उनका साहित्य के प्रति अनुराग बचपन से ही था। उनके साहित्यिक अनुराग ने उन्हें हिंदी ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य के क्षितिज का महान साहित्यकार बना दिया। अल्पायु में ही प्रेमचंद का विवाह कर दिया गया। लेकिन मनोनुकूल पत्नी न होने के कारण बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह कर लिया। जिन्होंने आगे चलकर "प्रेमचंद घर में" नाम से उनकी जीवनी लिखी। प्रेमचंद को समझने में यह बहुत उपयोगी पुस्तक है। शिवरानी देवी से तीन संतान हुई जिसमें दो पुत्र और एक पुत्री शामिल है। हिंदी के श्रेष्ठ कहानीकार अमृतराय उन्हीं के पुत्र हैं जिन्होंने अपने पिता प्रेमचंद की जीवनी 'कलम का सिपाही' नाम से लिखी। जिसका प्रकाशन 1962 में हुआ।

मुंशी प्रेमचंद
(31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936)
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के ऐसे अटल नक्षत्र की भाँति है। जिनके बिना हिंदी साहित्य का इतिहास अधूरा है। कथा साहित्य की बात करते हैं तो वे ऐसी धुरी है जिसके चारों तरफ हिंदी कथा साहित्य घूमता है। उपन्यास सम्राट अभिधान से अभिहित मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य की एक ऐसी विरासत हैं जिनके बिना हिंदी के विकास का अध्ययन अधूरा है। मुंशी प्रेमचंद एक कुशल लेखक, जागरूक नागरिक, प्रखर वक्ता तथा सुधि संपादक थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन किया लेकिन उपन्यास और कहानी विधा में वे सिद्धहस्त रचनाकार थे।

मुंशी प्रेमचंद ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में लेखन आरंभ किया। उनकी प्रारंभिक उपलब्ध रचना 'आलिवर क्रामवेल की जीवनी' (1903) मानी जाती है प्रेमचंद का पहला उपन्यास 'हम कुर्ता और हम सबाब' (1906) माना गया है। यह उर्दू में लिखा गया था। उनके प्रारंभिक लेखन की शुरुआत उर्दू से हुई। प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह 1907 में प्रकाशित "सोजे वतन' नाम से महत्वपूर्ण प्रकाशित हुआ। इसमें प्रकाशित कहानी 'दुनिया का सबसे अनमोल रत्न' मानी गई है। इस संग्रह की तमाम कहानियों में देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। हम सबको मालूम है कि इसके प्रकाशन हुआ वह अंग्रेजी दासता का समय था। अंग्रेजों के दमन से भी हम सब वाकिफ हैं। यह कहानी संग्रह जब सामने आया तो अंग्रेजों में बौखलाहट हो गई। उन्होंने तत्काल इस रचना को जब्त कर लिया। तत्पश्चात मुंशी प्रेमचंद पर यह पाबंदी लगा दी कि आप लेखन नहीं करेंगे। अंग्रेजों ने मुंशी प्रेमचंद को मजबूर किया अपने हाथों से इस रचना 'सोजे वतन' को जलाने के लिए। एक रचनाकार की रचनाएँ उसकी संतान के बराबर होती है। खुद रचनाकार अपने हाथ से अपनी रचना को जलाए तो कितना दर्द होगा। एक लेखक ही उस दर्द को महसूस कर सकता है। यह हम महसूस कर सकते हैं। इस घटना के बाद हिंदी के वरिष्ठ आलोचक रामविलास शर्मा कहते हैं कि "दुनिया में जनतंत्र स्थापित करने का ठेका लेने वाले अंग्रेजों ने भारतीय भाषा के बड़े लेखक की रचना का इस तरह से सम्मान किया।" यह बहुत गहरा व्यंग्य हैं। एक लेखक अपने लेखन को कैसे विराम दे सकता है। लेखक के अंदर की बेचैनी का समन है लेखन। नवाब राय के नाम से जब लेखन बंद हुआ तो प्रेमचंद जी के अभिन्न मित्र दयानारायण निगम जो 'जमाना' पत्रिका के संपादक थे, ने उनका नाम 'प्रेमचंद' रखा। यही नाम आज तक हिंदी साहित्य का महत्वपूर्ण नाम बन गया।

मुंशी प्रेमचंद उस विशाल वट वृक्ष की भांति हैं जिसकी शीतल छांव में अनेक वनस्पतियों तथा जीव जंतुओं का विकास होता है। वे हिंदी कथा साहित्य के बरगद है। हिंदी कथाकारों ने मुंशी प्रेमचंद को आधारगत तथा दृष्टिगत रखते हुए हिंदी कथा साहित्य रूपी महल तैयार किया है। मुंशी प्रेमचंद ने अनेक उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, संपादकीय, संस्मरण आदि की रचना की। लेकिन मूल रूप से वे कथाकार थे। उन्होंने अपने जीवन काल में 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, जो मानसरोवर भाग 1 से 8 तक में संकलित हैं, 3 नाटक, 10 अनुवाद पुस्तक, सात बाल पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, संपादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मुंशी प्रेमचंद ने जिस काल में कलम उठाई उस समय उनके पीछे हिंदी की कोई ठोस और प्रामाणिक विरासत नहीं थी, और ना ही कोई विचार और ना ही कोई मॉडल था। वे स्वयंभू कथा रचनाकार की भाँति हिंदी कथा साहित्य के लैंप पोस्ट हैं। जहाँ से अनेक कथाकारों को रोशनी अर्थात् साहित्य लेखन की समझ मिलती है।

मुंशी प्रेमचंद के साहित्य की विशेषताओं के बारे में बात करते हैं, तो क्रमशः उनकी सभी विधाओं में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक आदि युगीन चेतना स्पष्ट परिलक्षित होती है। उनकी कहानियों की यदि बात करें तो अधिकतर कहानियों में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण मिलता है। उन्होंने सभी जातियों तथा वर्गों विशेषकर किसान, मजदूर से लेकर पशु पक्षियों तक को भी अपनी कहानी में मुख्य पात्र बनाया है। प्रेमचंद की कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, के साथ शोषित वर्ग की समस्याएँ बहुत ही गंभीरता से चित्रित हुई है। उन्होंने समाज सुधार, देश प्रेम, स्वाधीनता संग्राम से संबंधित कहानियाँ लिखी। उन्होंने कहानियों में सामाजिक, ऐतिहासिक, प्रेम संबंधी आदि अनेक विषयों को विषय वस्तु बनाया। जिससे उनकी कहानियों में विविधता दिखाई देता है।

मुंशी प्रेमचंद के लेखन का आरंभ उस समय होता है जब भारत में अंग्रेजी शासन और शिक्षा एवं सभ्यता के प्रभाव से समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों एवं धार्मिक आडंबरों के खिलाफ एक नवीन चेतना और गौरव की भावना का उदय हो रहा था। महात्मा गांधी राजनीतिक मंच पर पूरी तरह से उदित हो गए थे। गांधीजी के सत्य, अहिंसा, सदाचार, सत्याग्रह, अस्पृश्यता विरोध, स्त्रियों की उन्नति, ग्राम सुधार, ग्राम स्वराज, अछूतोद्धार, स्वदेशी भावना आदि से संबंधित विचारधारा का लोगों पर काफी प्रभाव पड़ने लगा था। इस समय अन्याय, उत्पीड़न के खिलाफ विरोध की नई शक्ति का उदय हो चुका था।‌ उत्पीड़क समाज तथा सामन्त वर्ग आदि की टक्कर लेने का साहस शोषित लोगों में जगा था। लोगों में नवीन चेतना का उदय हुआ था।

यह एक ऐसा समय था जिसमें मुंशी प्रेमचंद ने कल्पना और रोमांच के चमत्कार प्रदर्शन को छोड़कर अपने साहित्य में यथार्थ के ठोस धरातल पर कदम रखा। यही कारण है उनके साहित्य की पहुँच निम्न मध्यम वर्ग के नजदीक चली जाती हैं। प्रेमचंद उनके मन की बात कहते हैं। वास्तविकता यह है कि हिंदी कथा साहित्य पहली दफा जन जीवन के सरोकारों से रूबरू हो रहा था।

प्रेमचंद की कुछ कालजयी कहानियाँ है। जिनके विषय वैविध्य के चलते चयन किया गया है। कुछ प्रमुख कहानियां हैं- पंच परमेश्वर, गुल्ली डंडा, दो बैलों की कथा, बड़े भाई साहब, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, ईदगाह, ठाकुर का कुआं, सद्गति, बूढ़ी काकी, नशा, नमक का दरोगा आदि।

कहानियों की भांति मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास भी समाज के निम्न मध्यम वर्ग की बात कहते हैं। उनका साहित्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक जागरूकता और देश प्रेम के प्रति प्रतिबद्ध है। वह आम आदमी का साहित्य है । आम आदमी की मनो भावनाओं को प्रेमचंद ने आकार देने का काम किया है। उनकी कहानियाँ जिस प्रकार से सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों, अंध परंपराओं पर प्रहार करती हैं। ठीक उसी तरह से उनके उपन्यास भी अलग-अलग सामाजिक समस्याओं को उठाते हैं और समाधान करने की कोशिश करते हैं। प्रेमचंद तत्कालीन विचारधाराओं मसलन आर्यसमाज, गांधीवाद, वामपंथ, समाजवाद से ऊपर उठकर वे सुधारवादी दृष्टिकोण के पक्षधर थे।

प्रेमचंद का कालजयी उपन्यास है- 'गोदान'। जो कृषक जीवन का महाकाव्य कहा जाता है। गोदान में किसान से मजदूर बनने की कथा है। जिसमें किसान की सुख, दुख तथा उसके जीवन के मनोभाव को बहुत ही सूक्ष्मता से आकार देने का काम किया है। यह उपन्यास कृषक जीवन की करूण कथा भी है। गोदान के साथ 'सेवा सदन' और 'कायाकल्प' उपन्यास में सांप्रदायिक समस्या को उठाया है। सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान में अंतरजातीय विवाह की बात भी आती है। समाज में नारी की स्थिति और उसके अधिकारों के प्रति जागरूकता इन उपन्यासों में दिखलाई पड़ता है। 'गबन' और 'निर्मला' में मध्यम वर्ग की कुंठाओं का बहुत ही स्वाभाविक और सजीव चित्रण मिलता है। 'गबन' उपन्यास में नारियों की आभूषण प्रियता और मध्य वर्गीय परिवार की झूठी मान प्रतिष्ठा का प्रदर्शन दिखाया है।

प्रेमचंद के उपन्यासों में वे तमाम गुण मौजूद हैं जो एक साथ साहित्य में होने चाहिए। प्रेमचंद के उपन्यासों में मनोरंजन, कल्पना भी है और साथ में सभी उपन्यासों में यथार्थ रूपी सत्य भी उपस्थित है। रचनाकार के उपन्यासों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है यथार्थवादिता के साथ आदर्शवाद का मिश्रण। जिसे हम आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद कह सकते हैं। प्रेमचंद के उपन्यासों में आदर्श, कर्तव्य, प्रेम, करुणा, समाज सुधार, देशभक्ति, सत्याग्रह, अहिंसा, स्त्रियों की वेदना, मध्यमवर्गीय मनुष्य की त्रासदी, कृषक जीवन की समस्याएँ, मेहनतकश, कमेरी दुनिया का संघर्ष आदि अनेक जीवन संदर्भों का बहुत ही प्रभावोत्पादक चित्रण मिलता है।

प्रेमचंद के समय भारतीय समाज अनेक सामाजिक तथा धार्मिक रूढ़ियों से भरा हुआ था। इसके शिकार प्रेमचंद जी भी हुए है। उन्होंने अनेक प्रकार के रूढ़िवाद से ग्रस्त समाज को यथाशक्ति साहित्य के शस्त्र अर्थात् लेखनी से मुक्त कराने का संकल्प लिया। प्रेमचंद अपनी एक कहानी के पात्र के माध्यम से घोषणा करवाते हैं और कहते हैं कि "मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं।" यह प्रेमचंद जी बोल रहे थे। प्रेमचंद कालीन समाज में वैवाहिक रूढ़ियों का समावेश भी था। वे थी बेमेल विवाह, बहुविवाह, अभिभावकों द्वारा आयोजित विवाह, पुनर्विवाह, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, वृद्ध विवाह, पतिव्रत धर्म तथा वेश्यावृत्ति। इन सभी समस्याओं पर प्रेमचंद ने बहुत ही तीक्ष्णता से प्रहार किया है और इनकी पोल खोलकर सामने रख दी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कथन के माध्यम से यदि यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि "प्रेमचंद के कथा साहित्य में उत्तर भारत की रीति, नीति, परंपरा और संस्कृति, समाज आदि का बहुत ही सुक्ष्मातिसूक्ष्म वर्णन मिलता है।"

कथा साहित्य के अतिरिक्त उनका इत्र सृजन भी बहुत मिलता है। जहाँ कथा साहित्य से बात नहीं बनती। वहाँ प्रेमचंद जी नाटक, संस्मरण, लेख, समीक्षा, संपादकीय, निबंध आदि के माध्यम से अपनी बात कहते हैं। वे एक तरफ कुशल नाटककार हैं, तो दूसरी तरफ कुशल निबंधकार भी है। तथा इन सबसे ऊपर सिद्धहस्त संपादक हैं। 1930 में हंस पत्रिका का आरंभ एक नए युग की शुरुआत मानी जाती है। हंस को मुंशी प्रेमचंद अपनी संतान के समान मानते थे। हंस को निकालने के लिए वह अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। आज उन्हीं की मेहनत का फल है कि वह पत्र अभी भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि कथा शिल्पी मुंशी प्रेमचंद का साहित्य का अवदान हिंदी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर साबित होता है। जहाँ से सीमांकन तय होता हैं। अर्थात जहाँ से साहित्य की समीक्षा तय होती है।
बहुत ही साधारण दिखने वाले प्रेमचंद जी का साहित्य असाधारण साहित्य है। विलक्षण है। ज्ञान राशि का संचित कोश है। वे सदैव साहित्य लिखते थे। साहित्य के सपने देखते थे। और एक आदर्शवादी समाज की स्थापना की बात करते थे। साहित्य के सपने लेते, साहित्य लिखते और बुनते तथा एक अच्छे समाज के निर्माण की बात करते-करते 8 अक्टूबर, 1936 को मुंशी प्रेमचंद का देहावसान हो जाता है। उनका देहावसान अवश्य होता है परंतु अपनी रचनाओं के माध्यम से वे आज भी हमारे मध्य उपस्थित हैं। जब भी हम और हमारा समाज भटकाव की तरफ जाता है। किसान, मजदूर, शोषित, पीड़ित, वंचित लोगों का शोषण दिखाई पड़ता है, तो मुंशी प्रेमचंद हमारे सामने एक आकार लेकर उपस्थित हो जाते हैं।

मुंशी प्रेमचंद एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार और संस्था थे। उनका साहित्य उस समुद्र की भाँति हैं जिसमें जितने गोते लगाएंगे उतने ही रत्न प्राप्त करेंगे। ठीक उसी तरह से उनके साहित्य का अध्ययन करना उस समय के समाज, संस्कृति, रीति, नीति, परंपराओं के साथ तत्कालीन समय और समाज की मनोदशा का अध्ययन करना है।

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