जनहित और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

भद्रलोक में भद्रजन का वास हो। भद्रजन भद्र समाज का निर्माण करें और भद्र समाज का इससे विकास हो तो वहाँ की प्रसन्नता की कल्पना अद्भुत होगी। भला व्यक्ति, शिष्ट जन, सभ्य लोग ही तो जनहित के लिए जीते हैं। भद्र उपनिषद् की भाषा बोलते हैं। भद्र-जन जनकल्याण के लिए सत्य के लिए यह भाषा बोलते हैं। 

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः॥
- बृहदारण्यकोपनिषद् 1-3-28

अर्थात असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरत्व की ओर मुझे ले चलो। उपनिषद कहते हैं सत्य, सार्वभौमिक और शाश्वत अमृत-तत्त्व की बात और भद्रजन इसके वाहक होते हैं।
भद्र लोग लोक कल्याण के लिए जनहित को संकल्प के रूप में लेते हैं। इसे धर्म का नाम दे दिया जाता है जबकि यह साधना का एक स्वरूप है। भद्रलोग भद्र समाज की स्थापना हेतु ऐसे संकल्प लेते हैं और इसको सिद्ध करके शांतिपूर्ण और समरस समाज की स्थापना करते हैं। भारत में शंकराचार्य इस परम्परा के वाहक के रूप में मिलते हैं जिन्होंने जनहित के लिए पूरे भारत का भ्रमण किया और ऐसी संकल्पनाएँ द्वैत और अद्वैत के बारे में प्रकट कीं जो सनातन सभ्यता की धुरी बनीं।

अब एक कविता स्मरण आ रही है पूरन चंद्र जोशी की। उनकी कविता भद्रजन के बारे में जो द्वैध है उसके बारे में कहती है कुछ। कविता है- ये हैं/इत्यादि जन/जो गाँव के होते हुए भी/गाँव के नहीं हैं/आए हैं हम/बंगाल के/इस घनी आबादी वाले/गाँव में/हाल जानने/गाँव का/गाँव के ग़रीबों का/गाँव में/दाख़िल होते ही/स्वागत किया/गाँव के मुखिया ने/गाँव के अन्य भद्रजनों के साथ/ले गया अपनी हवेली में/तैयारी पूरी थी/शहर के भद्र लोगों के/स्वागत-सत्कार की/पूछते हैं मुखिया से/‘एखाने कौ जन आछेन-एइ ग्राम मध्ये’? (कितने लोग बसे हैं इस ग्राम में)/कहता है मुखिया/‘हौबे कुड़ी पचीस कुटुंब’ (होंगे बीस-पच्चीस परिवार)/फिर पूछते हैं/उधर नज़र डालकर /जिधर ग़रीबों की बस्ती है/‘ओखाने तो अनेक जन दिखछेन’ (उधर तो अनेक लोग नज़र आते हैं)/जवाब मिलता है/‘ओ आपनी ओ एटसेटराज़ कथा बोलछेन’ (आप उन इत्यादि जनों की बात कर रहे हैं)/‘ओरा तो अनेक आछेन, पशु पोकार मतो, (वो तो अनेक हैं, पशुओं, कीड़े मकोड़ों की तरह उनकी कोई गिनती नहीं)/सुनकर/चकित हैं हम सब/गाँव का जिनके श्रम, उद्यम, सेवा से/चलता है सब काम/वे ही हो गए एटसेटराज़/यानी इत्यादि जन/और जो परजीवी हैं/एकदम ‘इत्यादि जनों’ के ही/श्रम उद्यम सेवा पर आश्रित/वे हो गए भद्रजन!/ हे अभागे देश!/ यह कैसी विडंबना है/‘‘भद्रजन और इत्यादि जन’’ का/यह विभाजनदेशव्यापी है/हर गाँव हर शहर में/क्या इसी सदियों पुराने/अभिशाप को ढोते हुए/हम प्रवेश करेंगे/इक्कीसवीं सदी में भी?

सवाल यह है कि जनहित के सन्दर्भ में यह कविता क्यों याद आती है। दरअसल, कविता के सही अर्थ और मर्म को समझें। भद्र-जन के बारे में समझ ही बदल जाएगी। स्व-घोषित भद्र लोगों द्वारा दूसरों को अभद्र कहने की यह हिमाकत निश्चय ही 21वीं सदी के लिए करारा तमाचा है। भद्र खुद को कहकर दूसरों को अभद्र कहती सामाजिक लाचारी की व्याख्या यदि करेंगे तो समाज का कुछ और ही चेहरा और चरित्र सामने आ जायेगा जिससे जनहित की गंभीरता समझने की भी आशा हम नहीं कर सकते। इस कविता में पूरन चंद्र जोशी ने सत्य का उदघाटन किया जो शायद अभद्र मानसिकता का गुलाम होकर दूसरों की परिभाषा रचता है।

हिंसा की शुरुआत यहीं से होती है जब कोई व्यक्ति, व्यवस्था और सत्ता भद्र खुद को कहकर दूसरों को अभद्र घोषित करने लगती है। देसज संस्कृति में जीने वाले जब अभद्र हो जाते हैं और एलीट तबके के लोग जब खुद ही भद्र हो जाते हैं। भारत के सनातन संस्कृति में यह असुंदर बात है। इनसे जनहित की कामना नहीं की जा सकती। हम देखते हैं कि देश-काल और परिस्थितियों के अनुसार सार्वभौमिक सोच और सभ्यता के अनुगामी, सत्य के वाहक इसका प्रतिरोध करते हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में बहुत से ऐसे उदहारण हैं जो अभद्र होती सभ्यता के प्रतिरोध में किसी न किसी भद्र-जन को खड़ा करते हैं। धर्म पर अधर्म का जब-जब आधिपत्य हुआ इसका प्रतिरोध हुआ चाहे वह कोई भी कालखंड हो। विष्णु के विभिन्न अवतारों में श्रीराम और श्रीकृष्ण सबसे ज्यादा लोक में प्रचलित अवतार हुए हैं। दोनों में जो इन ब्रह्म-शक्तियों का प्रतिरोध है वह अभद्र-जन के खिलाफ़ भद्र-निष्ठा के साथ है। पूरी गीता में ऐसे अभद्र होती शक्ति के संहार के बारे में ईश्वर का आग्रह है।

आज के समय में तकनीकी और आधुनिक सभ्यता की अपनी व्याख्या में यदि हम जाएँ तो देसज लोग कॉर्पोरेट संस्कृति के आगोश में आ चुके लोगों के लिए अभद्र घोषित किये जा चुके हैं। हिंसा की वेदी पर चढ़ा देने को आतुर ये स्व-घोषित भद्र लोग देसज व लोक में जीने वाले लोगों के लिए भयानक हिंसा के कारण बनते जा रहे हैं। इसी प्रकार राज्यों के बीच भी कलह हैं। ज्यादा अमीर देश गरीब और अपने लिए वजूद तलाशते देशों को अभद्र बताकर उन्हें आज की समस्त समस्याओं की जड़ बताते हैं और उनपर दोष मढ़ा करते हैं। खुद परमाणु हथियारों से समृद्ध होंगे, खुद ज्यादा कार्बन का उत्सर्जन करेंगे, खुद युद्ध जैसी स्थितियों को जन्म देंगे लेकिन वे गरीब देशों को या अर्ध-विकसित देशों को अभद्र देश कहते हैं। देखा जाए तो यह स्थिति अब लोक से अमर्यादित होते समृद्ध देशों में व्याप्त है। अपने से कमजोर को अभद्र कहने की आदत सी बन गई है जिसे मैं केवल और केवल हिंसा और हिंसक मानसिकता के रूप में देख पाता हूँ।

यह भद्र और अभद्र के संघर्ष निःसंदेह किसी जनहित की ओर नहीं बढ़ने देते। यह संघर्ष हमारे समस्त विकास और एकात्मकता को बाधित करते हैं। उनका प्रभाव हमारे प्रकृति पर भी पड़ता है। हमारे जीवन-शैली पर पड़ता है। हमारे साथ पनप रही नई पीढ़ी पर पड़ता है जो बहुत ही मासूम हैं। इन मासूमों के दिमाग में हम अपनी अभद्रता का ज़हर घोलते हैं और परिणाम यही होता है कि हम पहले से ज्यादा अधिक बर्बर और हिंसक हो जाते हैं। जब से दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के अपने कसीदे गाये जा रहे हैं तो देखिए कि देशों के भीतर नागरिकों में, उनके आबोहवा में कितने तरीके के अंतर्कलह देखने को मिलने लगे हैं। जो जितना अधिक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सहायता से अपना जीवन उन्नति की ओर ले जा रहा है वह उतना अधिक भद्र खुद को समझ रहा है। लोक में और जंगल में रहने वाले लोगों का फिर क्या? क्या वे अभद्र-जन होकर रह जाएंगे वर्षों तक, सवाल यह है। लेकिन यह एक अत्यंत संवेदनशील मामला है कि भद्र होने और भद्र न होने को ठीक प्रकार से समझा नहीं जा रहा है। सच तो यह है कि जनहित की जिनसे हम अपेक्षा कर रहे हैं वे हमारे लिए संकट के रूप में उभर रहे हैं। आज तो सबसे बड़ा संकट इसी बात का है कि भद्र कौन है? शंकराचार्य ने जिस उद्देश्य से जीवन-जगत को समझा, जो उपनिषद कहते हैं उसके सत्य आज के जनहित से मेल नहीं खाते। ऐसे में, आज इस संकट से निपटने के लिए व्यापक रूप से संवाद की आवश्यकता महसूस होती है वरना यह स्व-घोषित भद्र समाज समाज के अन्य तबकों को जीने से वंचित करके उनकी स्वतंत्रता, उनके जीवन के मायने को बदल देगा।

यदि यह सबकुछ है तो सवाल है भद्र कौन है? भद्र शिष्ट होते हैं। भद्र कृपालु होते हैं। भद्र दयालु होते हैं। भद्र सबके कल्याण में अपना कल्याण देखते हैं। भद्र सबके होने में अपने होने की कामना करते हैं। भद्र दानशील होते हैं। भद्र प्रज्ञावान होते हैं। भद्र सहज होते हैं। भद्र-जन का लोक सुन्दर होता है, वह अपढ़ हो सकते हैं पर कृतज्ञ होते हैं अपनी भूमि, अपनी सृष्टि और प्रकृति के। भद्र खुद को भद्र नहीं कहते उनका गुणगान उनकी भद्र-स्वभाव को देखकर पशु-पक्षी भी करते हैं, ऐसा शास्त्रों में व्यक्त है। वे सार्वभौमिक सत्य को साथ लेकर चलते हैं। वे निरपेक्ष होते हैं। वे हमेशा स्वान्तः सुखाय की कामना करने से पूर्व सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करते हैं। हमारे देश में या पृथ्वी पर किसी भी परिक्षेत्र में भद्र जन इसीलिए कदाचित कम होते हैं। यहाँ भद्र-जन का आशय केवल पुरुष से नहीं है अपितु स्त्रियाँ भी भद्र हैं और उनके भी स्वभाव भद्र होने के इसी दृष्टि से देखे व समझे जाते हैं। स्त्रियों में भद्र स्वभाव पुरुषों की अपेक्षा अधिक होते हैं क्योंकि उनमें मातृत्व के भाव उन्हें अधिक भद्र बना देता है। वह अधिक आत्मीय होती हैं प्रकृति के साथ, सृष्टि के साथ।

जनहित तो इन्हीं से संभव है। व्यवस्था और सत्ताएँ भद्र स्वभाव की होने से रहीं क्योंकि उनके लिए अपनी जड़ता वाली शक्ति ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण होती है। वे अपने शक्ति के आडम्बर में जनहित का वरन नहीं करतीं। जनहित अहिंसक मन-मस्तिष्क का निर्माण करता है और हिंसा को कम करके असीम शांति को सतत बनाकर संपूर्ण सृष्टि के लिए हितकारी बनता है। जनहित के लिए सांस्कृतिक रूप से अभी भी न व्यक्ति तैयार है न समाज तैयार है और न ही राज्य इसलिए दुनिया में जितनी भी तरह की समस्याएँ हैं, वह मिटने का नाम नहीं ले रही हैं। सहयोग और सहिष्णुता की भावना से इसे बढ़ाया जा सकता है लेकिन जब भद्र होने की परिभाषा ही कुछ और होने लगी है तो ऐसे में इस बात की सम्भावना कम ही बनती है कि एक ऐसा समाज तैयार हो पाएगा जो वास्तविक भद्र-संस्कृति का सूत्रधार बनेगा।

हमारी चेतना में इस प्रकार की अभिव्यक्ति का विस्तार हो जो भद्र होने की वास्तविक मूल्यों को अभिव्यक्त करती हो, तभी यह संभव है। अपनी सामर्थ्य की ओर मनुष्य कभी ठीक से ध्यान नहीं देता है और वह अनेक ऐसे सरोकारों से जुड़ता और जूझता रहता है जो उसे अभद्र होने और हिंसक होने की दिशा में ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं। मनुष्य में यद्यपि इसकी अपर सम्भावना होती है कि वह भद्र आचरण को अपने जीवन में साध ले और उस संवेदना को विकसित करे जिसमें सबके कल्याण की भावना विस्तारित हो सकती है। जनहित भी इसी से मनुष्य के जीवन का अंग बन सकता हैज हम अपने लिए और अपने भविष्य के लिए किस प्रकार से अपने को साधते हैं, यह तो हम मनुष्य पर निर्भर है। निश्चय ही यदि हम भद्र होने के वैशिष्ट्य को समझ लें तो हम एक भद्रलोक और जनहित के भी वाहक बन सकते हैं और यह हमारे जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण गुण बन सकता है।

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