चार कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) एक चिट्ठी बेटी के लिए

बेटी तू तो गई है नानी के
और पापा को बिल्कुल भूल ही गई शायद
कि दफ्तर से लौटेंगे तो झट गले में झूल
पीठ पर कुदक्कड़ी मार
छत की रॉड पकड़ेगा कौन
किसका कान मरोड़ेंगे पापा
आँखें तरेरकर
डाँटेगे और मुसकराएँगे मंद-मंद

बेटी तू तो पास है मम्मी के
और मम्मी की मम्मी की भी गोद में
दुबक जाती होगी मौका देखकर
मगर मेरे पास तो यह धूलअँटा खाली-खाली
कमरा ही बच गया न
और कुछ लाचार दिन

तेरे पीछे यह खाली-खाली कमरा
बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता बेटी
कोने में औंधा पड़ा तेरा भालू जरूर
आँसू बहाता होगा चुपके-चुपके
और हरी नीली चोटी वाली गुड़ियाँ तो मुझे
पक्का यकीन है
चारपाई तले के कबाड़ में फँसी
दाँत किटकिटाती होंगी मुझ पर

मगर हिम्मत ही नहीं होती लगाऊँ हाथ
पोंछकर सजा दूँ अलमारी में
लगाऊँगा हाथ तो कीलों पर टँगे भालू जिराफ जोकर
नहीं पकड़ लेंगे शरारतन कालर मेरा?

मुँह बिचकाती हैं अकसर पंखे की गरम हवा में
फड़फड़ाती चिड़ियाँ
जो तूने कैलेंडरों पर बनाईं
और मैं सन्न रह जाता हूँ
फिर बता, बता तो जरा
अजगर की तरह बेतरतीब फैले वक्त में
मैं किससे खेलते काटूँ वक्त और कैसे
कौन बातें करते-करते टोकेगा मुझे गोल
शरारती आँखों से
जब मैं दफ्तर के मनहूस दोस्तों की हिंसा
चेहरे से झाड़ने की खातिर
गालों में फूला-फुलाकर हवा
गरदन मटका रहा होऊँगा एकांत में—

कि पापा लगता है कि जैसे आप
जोकर हैं

अपनी यह जोकरी किसे दिखाऊँ बेटी
किसे बताऊँ कि कैसे
रोज-रोज दुबलाते
झुँझलाते
बीते हैं ये मरमुक्खे दिन!

मगर हाँ, बताऊँ!...
कि वो कल का किस्सा तो कुछ अजब ही है
कि जब शुरू हुआ जिंदा जादू का खेल
मेरे आगे-पीछे

और मैं भौचक्का!
मैं जो पड़ा था कमरे की गर्द में उदास
ऊबा हुआ सोचता कहाँ जाऊँ
क्या करूँ छुट्टी के दिन की अजीब मुसीबत में!
तो अचानक तेरी ड्राइंग वाली डायरी तक चला गया हाथ
जिसकी जल्द तो कब की उखड़ गई
पन्नों पर धूल गर्द...

मगर जैसे ही दाखिल हुआ तेरी उस रंगों
वाली दुनिया में
सब कुछ उलट-पुलट गया

डायरी में बने चित्रों में होने लगी हरकत
तितली उड़ी तो उड़ती ही चली गई आसमान तलक
हिरन भागता ही चला गया जंगल की ओर
भागा तो भागते-भागते
भालू से टकराया
दोनों ने हाथ मिलाया दो भले दोस्तों की तरह
फिर खेलने लगे ठीक वैसे ही जैसे तू
खिलाती थी उन्हें झूठ-मूठ
अपनी वाचाल सहेलियों के बीच

और फिर देखते ही देखते
तूने जो बनाए थे कुत्ता गाय मुर्गी बत्तख लूमड़
और बिलौटे
सबमें ही जान पड़ गई
एक-एक कर आते गए पास

फिर तो घेरा बनाकर सभी मेरे चारों ओर
नाचे कूदे
कूदे नाचे खिलखिलाए
एक नन्ही खिलखिलाहट थी वह बेटी
बिल्कुल तेरी ही तरह
कि जो छुपम छुपाई से निकलकर आए
तेरे चमकते चेहरे पर सजी होती थी
कि पापा मैं तो गई ही नहीं
लो पापा, मैं तो यहीं हूँ आपके साथ!

अब तू ही बता बेटी
कि पूरा डेढ़ हफ्ता तो बीत गया तुझे गए
मैं तुझे चिट्ठी लिखूँ तो क्या
और न लिखूँ तो कैसे!
*


(2) पत्नी के साथ खाँसी की एक रात

प्रभात अपनी लाल-लाल आँखें निकालकर मुझे न डरा
इस तरह रजाई से बाहर मुँह निकालने में खौफ होता है
मेरी ताकत और रक्त की ताजगी और आशा रात ने
निचोड़ ली है
रात जो बुरी तरह खाँसती है एक अजीब से भयानक अहसास के साथ
न सिर्फ कानों के पर्दे फटने लगते बल्कि सामने
जीवन और मौत एकमेक होकर बहुत सर्द दहशत के साथ
झूलते दिखाई देते

पत्नी को शहद मिला सितोपलादि चूर्ण देकर उसे चाटते हुए शांत
देखता हूँ तो मन में दोनों हाथ जोड़ सितोपलादि को
नमन करने लगता हूँ पर
अंधकार के पर्दे पर तभी
कुबड़ी छायाएँ नाचने लगती हैं
और रात और नंगी और बेशर्म और घिनौनी और डरावनी हो जाती है

रात...रात...रात...एक बेवजह सिलसिला
कमजोरी और कायरता का
राम मेरे लिए हमेशा बीमार पत्नी हमेशा हमेशा मरी हुई माँ
और हमेशा हमेशा राक्षसी हैड का चेहरा है

सर्दी का मौसम है पर मुझे किसी गवाक्ष से
धूप की किरन और उससे नाजुकी से काँपता शीशा नहीं दिखाई देता

कोई गोरैया मेरी खिड़की पर फीता नहीं बाँध जाती
दरवाजा खोलने पर कहीं कोई फूल रखा हुआ नहीं मिलता
सिर्फ मनहूस चेहरे वाली जमादारनी
खुफिया निगाहों से भीतर तक झाँक जाती है कि इनके साथ
कोई अच्चा-बच्चा नहीं सामान भी बस यों ही सा है
कहीं ये कहीं से भागे हुए तो नहीं?

बगल की भोथरे चेहरे वाली लिपस्टिक पुती मिसेज सक्सेना
को सब हाल बताएगी कि वाकई कहीं कोई बात है
और मैं कल की रोटी चलाने के लिए आज किसी बढ़िया
से टॉपिक पर कुछ लिखूँगा आदमी को चिचियाहट को
बहुत दबाकर क्योंकि संपादक उसे नहीं छापते

ढोंग है वक्त साला काला और भयानक—कवियों का ढोंग है
और मैं भी उनमें एक हूँ जो कविता लिखते समय दूसरा
हो जाता हूँ और अपने मरे हुए बच्चे को नहीं देख पाता

मैंने कई घंटे, दिन और रोशनी नकारते अपना
मांस नोंचते हुए अपनी मैली रजाई की खोह में जी लिए हैं
और अब सवाल है कि बाहर निकलूँ कैसे
बाहर जहाँ पट्ठा सूरज तप रहा है, जप रहा है
कोई नया जीवन-क्रम और ससुर पहरेदार बनकर
बैठा है जिंदगी का

लेकिन मुझे उठना ही होगा भूख मुझे भीतर
से चटकाती फोड़ती है और नियति के
दरवाजे पर लाकर छोड़ जाती है
और मेरे भीतर फिर से विचारों की, मरे हुए
स्वप्नों की होड़ लग जाती है :

शायद आज कहीं से अचानक इंटरव्यू का लैटर टपक पड़े
शायद आज किसी पत्रिका में मेरा निबंध छपा हो
शायद आज कोई प्रकाशक छापने के लिए मेरे कविता-संग्रह
की पांडुलिपि माँगे
शायद आज देखने पर हैड की चिट्ठी में ‘सीरियसली वार्न्ड’
की जगह कोई फूलनुमा शब्द हो

शायद अब तक सितोपलादि चूर्ण से मेरी बीवी
खाँसी से निजात पा चुकी हो और उसके लिए
डेढ़-डेढ़ रुपए के कैप्सूल खरीदने की यंत्रणा से बच जाऊँ
शायद घर से आज माँ की चिट्ठी आए कि वह जिंदा है और
भाई की कि मनीआर्डर भेज रहा है और दोस्त की वह मुझे अब भी
चाहता है और मैंने उसके जीवन को नया अर्थ दिया है

शायद टेढ़ी-मेढ़ी चारपाई की बहियाँ तन जाएँ और मैं
उस पर एक नई गृहस्थी की शुरुआत कर सकूँ कि जिसमें
मेरी निगाहें कृपालुओं और मनीआर्डरों पर न टिकी रहें
शायद मैं किसी तरह जी जाऊँ
अभी दाँतेदार दुर्गंध के भीतर भी कहीं कुछ शेष है
उसी को बचा लूँ

इसलिए मेरे हमेशा के बैरी प्रभात मुझको—एक कायर को
अपनी लाल-लाल आँखें निकालकर न डरा
या डरा भी तो घिघियाकर अब रजाई से, चारपाई से
छूटने दे और सिर झुकाए दबे पाँव
बाथरूम तक जाने दे
ओ प्रभात! मेरे सिरदर्द!
*


(3) उम्र की वो नदी

कहाँ खो गई उम्र की वो नदी
जो खुली धूप में
कुलाँचें भरती उछलती दौड़ती थी
तो समय ठिठक जाता था

रोमांचित राहें, पड़ाव
हरे-भरे कछार
मीठे आवेग से भर छूने को ललकते थे गाल

और वह निधड़क
पेड़ों से झुक-झुककर बातें करती
फूलों के संग-संग हँसती
अचानक खिलखिलाकर खुली रेत पर बिछ जाती थी

उमंगों भरा सीना
उमगकर आकाश हो जाता था!

गुनगुनी बाँहों में 
कचनार कलियों का परस,
साँसों में चटखते गुलाबों की खुशबू तिर आती थी

पास, सिर्फ पास रहने की
अतर्कित प्यास लिए
पंख तोलता था मन दूर, जादुई उजालों की दिशा में
उजले हंसों की तरह

अब नहीं हैं वे मुक्त हवाएँ
वे जिद्दी उफान,
मगर अब भी, कभी-कभी पारे की तरह थरथराता एकांत 
अधीर हो पूछता है सवाल

कि कहाँ खो गई उम्र की वो नदी
जो कुलाँचें भरती दौड़ती थी
और समय उसकी गुंजलक में
कैद हो जाता था!
*


(4) लिरिकल प्रस्फुटन: अँधेरे की छाती पर

पिछले छह महीने तेरे लिए लगातार
कविता तलाश करते बीता हूँ मैं
उन-उन जगहों पर भी जहा धुंध को अकसर
आकार मिला है मैं इस बार चुप और उद्विग्न ही बैठा
सोचा किया कि क्यों नहीं, क्यों नहीं कविता इस बार
और हर बार हैरान होकर लौटा हूँ
कि निराला के यहाँ कांत कविता है तू
तो मेरे लिए क्यों नहीं, क्यों नहीं भद्रे, क्या प्यार मेरा विकलांग
या कि दुर्बल है
नहीं उसमें लय चेतना समूची सृष्टि की उत्ताल, उदात्त
अनाविल और अनिवार्य
या कि प्यार के साथ कविता की जरूरत अब रह नहीं गई
वह मद्धिम गुनगुनाहट अब नहीं रहा?

तुम हँसती हो और ‘‘मतलब...मतलब’’
करके पूरा करती हो
कोई बेमतलब-सा वाक्य न चाहते हुए भी मेरी तसल्ली के लिए
आँखों में गहरे झाँकते कि यह जैसे कोई सवाल ही नहीं

मैं अचरज से तुम्हारे गालों में उभरते गंभीर राग
को पढ़ता हूँ और हैरान हो जाता हूँ
और सोच नहीं पाता

सच पागल तू उस सबसे अलग कुछ और है
कि जो लय-भरा प्यार है वह तू नहीं तू
कविता से बाहर है
इससे अधिक नहीं सोच पाता
तू अपने आप में जिंदा है
सीधी-सादी दुबली और पुख्ता कहीं भीतर से हँसती और
अकसर उदास
काव्य की शराबी और स्पंजी उपमाएँ तेरे लिए नहीं
और गीत तुझ पर फिट नहीं होते
नकली लगती हैं नायिकाएँ महाकाव्यों की
तेरी दुर्बल और सही छवि के आगे

ओ गैरिक वस्त्रे, तू मेरा ही तप्त मांसल मैं है
जो मुझे जिंदा रखती है
नहीं कभी खत्म होने देगी मुझे तेरी शांत
आँखें कहती हैं और अपनी दृढ़ता में इतना कसकर
बाँध लेती है अकसर तेरी आवेशहीन मुद्रा कि काँपने नहीं पाता
हालाँकि तब भी तेरे माथे की ढलान और
नासिका की नोक पर उड़ती उदासी साफ पढ़ी जाती है

और सारे-सारे दिन बेकार, नहीं, बेकार नहीं सोचता हूँ
कि तुझमें पतली सी भी चमक लाने काश, कुछ कर पाता
हालाँकि नहीं कुछ कर पाता हूँ फिर भी इससे घड़ी-घड़ी तुझे
महसूसता जागता हूँ किसी दूधिया उच्छ्वास मे लिपटा
बहुत-बहुत कोमल होकर कि गुजरते पास से हर किसी को
दोनों हाथ जोड़ नमस्ते करने का मन होता
हर मोड़ खुद को तोड़ने की ललक
बिना कारण, बे-बात

ऐसा दूधिया उच्छ्वास नारंगी झालरें जिसमें
वह शायद करुणा है
करुणा इत्ती करुणा शीतल बहुत और तेज कि छूती है तो
चीखना चाहता पर विवश सधा हुआ सा पीछे चल देता हूँ
और सब देखता हुआ भी कुछ नहीं देखता
सिवाय इसके कि तू कमजोर कतई नहीं
और कहीं से अकड़ी या उखड़ी भी नहीं
चाल में धीरज और द्युति कि जिससे गुलमोहर
अकारण न रह जाएँ
और पत्तियों के किनारे चमकने लगें हवा मीठी हो जाए
फूल आँखें खोल दें और वाकई तारे लगें 
सब ओर पीले अमलतासों का लिरिकल प्रस्फुटन
अँधेरे की छाती पर

दिल की सारी उत्तेजना होंठों में दबाए तू असाधारण शांत है
आवेशहीन भी कोई गहरा आवेश लिपटा है इस कदर
कि तू बोले
तो सर्वांग जैसे रोशनी की बारीक परतों में बदल जाए
जिसमें कुछ आँच सा हो सुलगता बहुत मद्धिम फिर भी तेज!

मगर तू बोलती नहीं केवल हँसती है और वह हँसी
तिरछे चाँद सी नहीं चंपे सी नहीं लहर सी नहीं
टिनोपाल भी नहीं
शायद आषाढ़ के दुपहरी आकाश की
प्याजी हँसी हो वह राग की विराग साधना सी
ठीक से कह हीं सकता

ठीक से कह नहीं सकता
बार-बार चुकते हुए मुझे तू क्यों
खड़ा कर जाती है नहीं जानता और पूछता भी नहीं चाहता,
हाँ, अकसर सोचता हूँ कि मेरी दृष्टि के भीतर गहरे उजाड़
और अंधड़पूर्ण तिमिर में
दो फीके लहरिल होंठ और असरदार आँखें बनकर सिमटी
निश्चिंत और शालीन धौतांगी तू कौन है कौन है जो हर बार
मेरे अभिमान-जर्जरित अस्तित्व को दुनिया की ओर
घुमा देती है
और जीवन ले आती है चुपके से मुझे निराश के लिए

तू बाँसुरी फूल या हंस नहीं हो सकती जानता हूँ
भूरी चिड़िया या चमकीली प्यारी-प्यारी नागिन भी तू नहीं
चाँद तू नहीं शराब तू नहीं दिमाग तू नहीं कमाल तू नहीं
बबाल तू नहीं
और कविता का जंजाल भी नहीं

तो तू कौन है
कौन है मेरे लिए ओ नन्ही उजली बालिका
तू शायद मेरे भीतर युगों से साधनारत मनु का सही
और एकमात्र परिचय है
और मात्र परिचय?

आह! मुझे कितना कुछ जना है तूने
सच बता सच, क्या तू माँ है?
**

2 comments :

  1. मन को झगझोड़ती कविताएं।
    नीलम राकेश, लखनऊ

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  2. बहुत सुन्दर, भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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