संस्मरण: याद आती है नामवर जी से वह अद्भुत मुलाकात


नामवर जी मुझे हिंदी के सबसे अधिक प्रखर, मेधावी और सर्जनात्मक आलोचक लगते हैं। उन्हें पढ़ते हुए हमेशा लगता है जैसे वे आगाह कर रहे हों कि चीजें हमें जिस तरह नजर आती हैं, हो सकता है कि वे ठीक वैसी न हों। बल्कि संभव है कि वे उससे उलट हों। लिहाजा एकदम बँधे-बधाए नजरिए से चीजों को देखना ठीक नहीं। हमें अपने आप और अपने नजरिए पर भी संदेह करना चाहिए। जिन बटखरों से हम चीजों को तोल रहे हैं, कभी-कभी उन पर भी संदेह करना चाहिए। बल्कि हो सके तो उन्हें भी तोलकर देखना चाहिए। यानी एक सक्षम और सतर्क आलोचक को अपने आप और अपने प्रतिमानों की भी समय-समय पर जाँच-परख करते रहना चाहिए। ताकि हम कोल्हू के बैल की तरह जिंदगी भर गोल-गोल घेरे में ही न घूमते रह जाएँ। दूसरे लफ्जों में, सच्चाई की खोज के लिए हमें वहाँ भी खतरे उठाने चाहिए, जहाँ खतरे उठाना शायद सबसे मुश्किल काम है।
इसीलिए नामवर जी हमेशा वाद-विवाद-संवाद शैली को लेकर आगे बढ़ते हैं और विचारों की लगाम को मानो खुला छोड़ देते हैं। उन्हें पढ़ें तो अकसर बहुत विरोधी लगने वाली चीजें एक-दूसरे से टकराती नजर आती हैं, और आगे चलकर उनमें से कभी-कभी तो ऐसा अकल्पनीय सत्य निकलकर आता है, जो खासा चकित, बल्कि स्तब्ध करने वाला भी होता है। बहुत से लोग उससे चौंकते भी हैं। और इस कारण नामवर जी से चिढ़ने और परेशान होने वाले लोग भी बहुत हैं। बहुत विरोधी भी उन्होंने बनाए। पर शायद हर सत्यखोजी को यह रास्ता अपनाना ही होता है, ताकि उसकी हालत ताँगे में जुते उस घोड़े सरीखी न हो जाए, जिसकी आँखों के दोनों ओर पट्टी बँधी है और उसे दौड़ना, बस दौड़ना ही है।
इस लिहाज से ‘कविता के नए प्रतिमान’ नामवर जी की ही नहीं, हिंदी आलोचना की सर्वोच्च उपलब्धियों में से है। बहुत से चिंतक और आलोचक इसमें नामवर जी को प्रगतिवाद से दूर जाते हुए देखते हैं। शायद इसलिए कि इसमें नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन, जो सहज ही प्रगतिवाद के सबसे बड़े और मूर्धन्य कवियों के रूप में उभरे थे, केंद्र में नहीं है। इसके बजाय श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय सरीखे कवि इसके केंद्र में आ जाते हैं। कुछ आलोचकों को इसमें वस्तु के बजाय कला या रूपवादी आग्रह अधिक प्रबल लगे, और इस कारण बहुत आक्षेप भी लगे। हालाँकि हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में सर्वाधिक प्रमुख और बड़े कवि के रूप में तो मुक्तिबोध ही उभरकर आते हैं, जिन्हें प्रगतिवाद की सर्वोच्च प्रतिभा के रूप में नामवर जी प्रस्तुत करते हैं, और आज प्रायः सभी इसे स्वीकार करते हैं।

नामवर सिंह
स्वयं अपनी बात कहूँ तो नामवर जी को जानने की मेरी शुरुआत ‘कविता के नए प्रतिमान’ से ही हुई थी और उसने मेरे भीतर किस बुरी तरह हलचल मचा दी थी, इसे बता पाना आज भी मेरे लिए मुश्किल है। मैंने उसे केवल पसंद ही नहीं किया था, कुछ-कुछ शायद नापसंद भी किया था, पर इस दुर्वह आकर्षण के साथ उसने मुझे खींचा था कि जिन दिनों मैं इसे पढ़ रहा था, चौबीसों घंटे मैं नामवर जी के साथ ही रहता, बोलता और बतियाता था। कुछ-कुछ शायद बहसता भी था। 
बहुत कुछ था जो इस पुस्तक को पढ़ने के साथ-साथ मेरे भीतर बन रहा था, और बहुत कुछ था जो टूट भी रहा था। खासकर पुरानी भाषा और पुरानी सोच की जकड़बंदियाँ। मुझे अपने आप से ही लड़ना पड़ रहा था। और विचारों की अपनी दुनिया में बहुत सारे जो सबल पक्ष और मोरचे नजर आते थे, वे एकाएक कमजोर और संदेहास्पद लगने लगे थे। यों कुरुक्षेत्र पहुँचने पर जिन किताबों ने मुझे सही मायनों में पुनर्नवा किया या इसमें मदद की, उऩमें बेशक नामवर जी की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ भी थी। यह मेरी जीवन-कथा का ऐसा सत्य है, जिसे मैं कभी भूल ही नहीं सकता।
उन दिनों मैं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था। नामवर जी तो वहाँ न थे, पर मन में नामवर जी की छवि तो थी ही, जिसके साथ मैं गुत्थमगुत्था होता और मन ही मन उसे सराहे बिना भी न रह पाता। ऐसी चीजें टॉलस्टाय, दोस्तोवस्की सरीखे दिग्गज लेखकों के उपन्यासों को पढ़ते हुए तो हो जाती थीं। शरत के ‘पथेरदावी’ जैसे उपन्यासों में भी यह बात है, पर कोई आलोचना की किताब मुझे इस बुरी तरह मथ डालेगी और भीतर हलचलों भरी हलचल पैदा कर देगी, मुझे दूर-दूर तक इसकी कल्पना न थी। 
सच कहूँ तो जिन किताबों ने मेरी भाषा और व्यक्तित्व को पूरी तरह बदला, उनमें बेशक ‘कविता के नए प्रतिमान’ भी थी, जिसकी मेरे जीवन में ऊँची जगह है। कहना होगा, गुरु की तरह। और नामवर जी से बगैर मिले ही मैंने उन्हें अपने अंतर्मन में गुरु के आसन पर बैठा लिया था। खासकर रघुवीर सहाय और उनकी सपाटबानी को मैंने पहली बार नामवर जी की इस पुस्तक के जरिए ही इतनी गहराई और उत्कटता के साथ जाना था। पर इससे भी बड़ी बात थी मुक्तिबोध और उनकी कविता की विराटता का अहसास। मैं स्वीकार करता हूँ कि अगर मैंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक न पढ़ी होती, तो मुक्तिबोध को मैंने इतनी आत्मिक गहराई से न जाना होता कि वे मुझे तुलसी और निराला के बाद हिंदी के सबसे बड़े और असाध्य कवि लगने लगे, और लगते हैं।
यों संयोग से मैं उन दिनों मुक्तिबोध को बड़ी गहराई से पढ़ भी रहा था। ‘चाँद का मुँह टेढा है’ हमेशा मेरी मेरी मेज या तकिए के आसपास रहता था। उसकी ऊबड़-खाबड़ सी लगती कविताओं की शख्सियत से मैं अभिभूत था। वे बहुत गहरे भीतरी द्वंद्व की कविताएँ थीं, पर इसके साथ ही वे ताकत की कविताएँ थीं। बेहद शक्तिशाली कविताएँ, जो शुरू में थोड़ी अनाकर्षक सी लगती हैं। आपको कुछ-कुछ परे भी धकेलती हैं। पर एक बार धैर्य के साथ आप उनके निकट पहुँचे नहीं कि वे आपको अपने स्नेह, प्यार और अपनत्व से लपेटने लगती हैं। इस मानी में, आप एक बार आप मुक्तिबोध के हुए नहीं कि हमेशा के लिए उन्हीं के होकर रह जाते हैं। इसे दूसरे लफ्जों में मैं कुछ ऐसे कहना चाहूँगा कि मुक्तिबोध का घर बहुत बड़ा है। बड़ी दुर्वह ऊँचाइयों वाला। वहाँ पहुँचना मुश्किल है। पर एक बार आप उस घर में दाखिल हुए तो फिर कभी वहाँ से निकल नहीं पाते।
पर मुझे स्वीकारना होगा कि जटिलताओं के कवि मुक्तिबोध को मैंने सबसे पहले ‘कविता के नए प्रतिमान’ के जरिए ही इस कदर पूर्णता के साथ जाना और उनके प्रीतिकर आस्वाद को महसूस किया था। और तभी से मन में उनकी ऐसी अमिट और विराट छवि निर्मित हुई, जो फिर कभी धुँधली नहीं हुई। यहाँ तक कि रामविलास जी को व्यास सम्मान मिलने पर मैं ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के लिए उनका इंटरव्यू करने गया तो मुक्तिबोध को लेकर मेरी उनसे लंबी बहस हुई थी। मेरा कहना था कि आप निराला की टूटन को तो बड़ी सहानुभूति से देखते हैं, पर मुक्तिबोध को विभक्त व्यक्तित्व का कवि कहकर नकारते हैं। ऐसा क्यों?
यह चर्चा इस कदर तीखी हो गई थी कि रामविलास जी कुछ खीज उठे थे। उन्होंने गुस्से में कहा कि अगर आपने अब एक भी सवाल कविता पर पूछा तो मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूँगा। मेरे लिए यह स्तब्धकारी स्थिति थी। इसलिए कि मैं रामविलास जी का बहुत सम्मान करता था। उनसे कोई बहस करने तो मैं नहीं गया था, पर मुक्तिबोध को जिस तरह वे नकारते हैं, वह मुझे स्वीकार्य न था, और इससे इंटरव्यू में स्वभावतः थोड़ी अतिरिक्त गरमी आ गई थी।
अलबता ‘कविता के नए प्रतिमान’ के बाद मैंने नामवर जी की पुस्तक ‘छायावाद’ पढ़ी, जो बेहद भावनात्मक और काव्यमय पुस्तक है। कहना चाहिए, आलोचना की उनकी पहली पुस्तक, जिसमें दिमाग नहीं, हृदय से लिखी गई बहुत रसपूर्ण आलोचना है। लिहाजा इसे पढ़ने का आनंद कुछ अलग ही था। बेशक छायावाद को समझने की एक ताजगी भरी दृष्टि इसमें है, जो कहीं उलझाती नहीं है और छायावादी कविता का आनंद लेने की बड़ी उर्वर जमीन तैयार कर देती है। 
फिर बरसों बाद, दिल्ली आने पर नामवर जी की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ पढ़ी, जिसे एक तरह से उन्होंने अपने गुरु आचार्य दिवेदी को ट्रिब्यूट के तौर पर लिखा था। पर पता नहीं क्यों, इसे पढ़कर मैं ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ। शायद पुस्तक मेरी उम्मीदों से कमतर थी। बहुत आश्वस्त करने वाली भी नहीं। मेरे लिए यह बड़े आश्चर्य की बात थी कि एक आलोचक की हैसियत से नामवर जी का कद तो बढ़ा था, पर उनकी कृति शायद उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकी थी, जिसकी मुझ सरीखे पाठक उम्मीद करते हैं। और जाहिर है, ‘दूसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक मुझे अपने साथ उस तरह बहा नहीं सकी, जैसे कभी ‘कविता के नए प्रतिमान’ के जादुई आकर्षण में मैं बहता चला गया था। 
हालाँकि आश्चर्य, ‘कविता के नए प्रतिमान’ उस दौर की किताब है, जब नामवर जी नामवर बन रहे थे। बल्कि सच कहूँ तो नामवर जी को नामवर बनाने वाली किताब ‘कविता के नए प्रतिमान’ ही है। ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का वाद-विवाद-संवाद उस ऊँचाई तक नहीं जा पाता कि पाठक को भीतर से झकझोर दे, और साथ ही कहीं अपनी विश्वसनीयता और भरोसा भी कायम करे। 
मेरा खयाल है, ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के बरसों बाद आई विश्वनाथ त्रिपाठी जी की ‘व्योमकेश दरवेश’ इस लिहाज से कहीं ज्यादा बड़ी और ऐतिहासिक महत्त्व की कृति है, जिसे पढ़कर आचार्य दिवेदी की असाधारण शख्सियत, सोच और उनका होना कहीं अधिक समझ में आता है। 

[2]

नामवर जी की उपस्थिति मेरे जीवन में एक और रूप में भी है। पर शायद उसे बताने के लिए मुझे अपने निजी जीवन के कुछ पन्ने खोलने होंगे, जिनमें मेरी जीवन कथा का कुरुक्षेत्र अध्याय जुड़ा हुआ है। मेरे जीवन का सबसे विचित्र, बीहड़ और उथल-पुथल भरा दौर, जिसे याद करना एक साथ ही रोमांचक और खासा तकलीफदेह भी है।
असल में मैं शुरू से ही विज्ञान का विद्यार्थी रहा। प्रतिभाशाली था और नंबर खासे अच्छे आते थे, तो घर वालों का सपना था कि मैं इंजीनियर बनूँ। पर किशोरावस्था तक आते-आते साहित्य का कीड़ा मुझे काट चुका था। कुछ इस तरह कि मैं कुछ भी करूँ, पर मेरे भीतर तो साहित्य ही नदी की धार बनकर बहता था। रात-दिन, चौबीसों घंटे। नवीं-दसवीं तक आते-आते प्रेमचंद का लगभग पूरा साहित्य मैं पढ़ चुका था। फिर बंकिम, शरत और रवींद्र का चस्का लगा, और यह पाट चौड़ा ही होता गया। शुरू में हिंद पाकेट बुक्स की एक और दो रुपए में आने वाली पुस्तकों ने इसमें बहुत मदद की। फिर जब रुचियाँ बढ़ीं तो और रास्ते भी निकलते गए।
इंटरमीडिएट के बाद इंजीनियरिंग के एक बड़े संस्थान में मेरा दाखिला हुआ, पर मैंने कोई बहाना बनाकर टाल दिया। घर वालों को समझाया कि मैं भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करके प्रोफेसर बनना चाहूँगा। पर आगरा कालेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करने के बाद जैसे इल्हाम हुआ कि मुझे तो इस दुनिया में साहित्य के लिए भेजा गया है। तो मैं कब तक चक्की के पाटों के बीच पिसता रहूँगा? तभी तय किया था कि हिंदी में एम.ए. करके शोध करूँगा और पूरा जीवन साहित्य ही लिखूँगा-पढ़ूँगा। साहित्य की रोटी खाऊँगा। पूरी नहीं तो आधी सही, पर साहित्य के लिए जिऊँगा, साहित्य के लिए मरूँगा।
एम.एस-सी. के बाद अपने गृहनगर शिकोहाबाद से मैंने हिंदी में एम.ए. किया, फिर यूजीसी के फेलोशिप के तहत रिसर्च करने कुरुक्षेत्र विश्वविदालय पहुँच गया। वहाँ हिंदी विभाग के अध्यक्ष कविहृदय रामेश्वरलाल खंडेलवाल जी थे, जो स्वयं भी कविताएँ लिखते थे। उन्हें मैं भा गया था, इसलिए मेरा चयन भी उन्होंने ही किया था। पर कुरुक्षेत्र जाने पर मुक्तिबोध, धूमिल, जगूड़ी, रघुवीर सहाय, विष्णु खरे सरीखे कवियों को पढ़ा तो लगा, मैं अंदर-बाहर से बदल रहा हूँ। खंडेलवाल जी कविताएँ तो नई कविता सरीखी लिखते थे, पर अपने छायावादी संस्कारों से मुक्त भी नहीं हो पा रहे थे। जबकि मुझे बिल्कुल नया जीवन, नई सोच मिल गई थी। मेरी भाषा और व्यक्तित्व दोनों ही बड़ी तेजी से बदले।
खंडेलवाल जी मेरे शोध निर्देशक थे। वही मुझे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में लाए थे, पर अब वही मुझसे कुछ नाराज रहने लगे। साहित्यिक रुचियों की भिन्नता का असर कई और चीजों पर भी पड़ने लगा था। फिर इसी में मेरे विवाह का प्रसंग भी जुड़ा।
असल में खंडेलवाल जी केवल मेरे ही नहीं, मेरे साथ ही समकालीन कविता में शोध कर रही मेरी पत्नी सुनीता के भी शोध निर्देशक थे, जो तब शोधछात्रा थी। साथ-साथ शोध करते हुए हम निकट आए और फिर जीवन का सफर भी साथ ही तय करने का फैसला किया। बहुत सादा ढंग से हमने विवाह किया, जिसमें यूनिवर्सिटी के दो-चार मित्र और कुछ परिवारीजन थे। न कोई ढोल-तमाशा न दिखावा। जो कपड़े रोज पहनते थे, वही कपड़े। कुछ भी अलग नहीं। कोई डेढ़-दो घंटे का बहुत सादा सा आयोजन, जिसमें केवल चाय पिलाकर सबको विदा किया गया।
अंतरजातीय विवाह की अपनी मुश्किलें थीं। वे तो झेलनी ही थीं। लेकिन खंडेलवाल जी ने विभागीय कार्यवाही करके हमारी मुश्किलें और भी बढ़ा दीं। नतीजे के तौर पर हम दोनों के शोध निर्देशक बदले गए। सुनीता का स्कॉलरशिप भी रोक दिया गया। कई तरह के अन्याय। विवाह के तुरंत बाद ही ये तकलीफदेह स्थितियाँ हृदय तोड़ देने वाली थीं।
ऐसे वक्त में किसी तरह जीवन की गाड़ी ठेलता हुआ, मैं शोध में जुटा था। शोध का विषय भी काफी अलग और व्यापक था, ‘छायावाद एवं परवर्ती कविता में सौंदर्यानुभूति’। परवर्ती का मतलब आठवें दशक की कविता तक, जिसमें धूमिल, जगूड़ी और कुछ बाद की पीढ़ी भी आ जाती है। मुश्किलें थीं, पर इस कठिन दौर में भी नामवर जी मानो गुरु के रूप में मेरे साथ खड़े थे, मुक्तिबोध एक बड़े कवि और चिंतक के रूप में मुझे सहारा दे रहे थे। मैंने तय कर लिया था कि जिस कृत्रिम भाषा में ज्यादातर शोधगंथ लिखे जाते हैं, मैं उसमें नहीं लिखूँगा। बल्कि जिस भाषा को मैं रोज लिखने-पढ़ने में बरतता हूँ, जिसमें सोचता और कविताएँ लिखता हूँ, उसी भाषा में मैं अपना शोधग्रंथ लिखूँगा।
समकालीन कविता को समझने की दृष्टि मुझे नामवर जी से मिली तो आधुनिक साहित्य के सौंदर्य-बोध को समझने में मुक्तिबोध की पुस्तकों ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’, ‘एक साहित्यिक की डायरी’ तथा ‘नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ से मुझे बहुत मदद मिली थी। सौंदर्यशास्त्र पर प्लेटो समेत बहुत से विदेशी चिंतकों की पुस्तकें तो पढ़ी ही थीं। बहुत कुछ था, जो एक साथ चल रहा था। शोध पूरा हुआ और शोधग्रंथ जमा हुआ तो मेरी एक आँख हँस रही थी, एक रो रही थी। खुशी इस बात की थी कि अंततः इन बुरी स्थितियों में भी शोधकार्य ठीक से संपन्न हुआ। रोना इसलिए आ रहा था कि शोधग्रंथ जमा होते ही मेरा फेलोशिप भी बंद हो गया, और अब मैं पूरी तरह बेरोजगारी की चपेट में आ चुका था।
ऐसे वक्त में खंडेलवाल जी ने शायद मेरी मुश्किलें कुछ और बढ़ाने के लिए ही, मेरे शोधग्रंथ को जाँच के लिए हिंदी आलोचना के दो दिग्गजों डा नगेंद और नामवर जी के पास भेज दिया। दोनों परस्पर विरोधी विचारों के थे। लिहाजा अधिक संभावना यही थी कि एक उसे पसंद करेगा तो दूसरा नकारेगा। पर मेरे जीवन का यह बड़ा सुखद आश्चर्य है कि डा. नगेंद्र और नामवर जी दोनों ने ही मेरे शोधगंथ की काफी तारीफ की, भले ही दोनों ने अलग-अलग बिंदुओं की तारीफ की हो। जो भी हो, मेरे लिए तो यह अकल्पनीय ही था।
बाद में मौखिक परीक्षा के लिए मैं डा. नगेंद के निवास पर पहुँचा तो उन्होंने शोधग्रंथ पर हलकी नजरसानी करने के बाद परिशिष्ट पर नजर गड़ाते हुए कहा, “आपने मेरी ज्यादा पुस्तकों का संदर्भ नहीं दिया...?”
इस पर मैंने उन्हें बताया कि मेरी सौंदर्य दृष्टि उनकी दृष्टि से काफी अलग है। छायावादी कवियों की तरह केवल कुछ चीजों में सौंदर्य देखने के बजाय मैं समूचे जीवन और जीवन यथार्थ में सौंदर्य देखता हूँ, और इसी को अधिक श्रेयस्कर भी मानता हूँ। प्रगतिवादी कविता और आगे चलकर समकालीन कविता तक का सौंदर्य इसी रूप में देखना संभव है। फिर मैंने उन्हें बताया कि पहले मैं भी कुछ छायावादी किस्म का कवि हुआ करता था। छायावादी कविता मुझे बहुत मोहती भी थी। पर जब मैं अपने जीवन के सबसे घोर संघर्षों में जुटा था, तब छायावादी कविता मुझे छोड़ गई। लेकिन मुक्तिबोध की कविता और उनकी सौंदर्य दृटि मेरे साथ रही, बल्कि उससे मुझे बहुत सहारा मिला, जैसा कि बाद के और भी बहुत से कवियों से मिला, जो जीवनधर्मी कवि थे। उनकी सौंदर्यदृष्टि भी जीवनधर्मी सौंदर्यदृष्टि थी, और वही मुझे सही भी लगती है।”
मुझे लगा कि डा. नगेंद्र बुरा मान जाएँगे। पर इसके बजाय उन्होंने मेरे जीवन और परिस्थितियों को लेकर थोड़ी सी बातचीत करने के बाद कहा, “आप बाद में कभी आइए मेरे पास। मैं देखता हूँ, आपके लिए क्या कर सकता हूँ।”
मैं डा. नगेंद से मिलने तो नहीं गया, पर मैंने अपने भीतर बैठे नामवर जी और मुक्तिबोध दोनों को ही धन्यवाद दिया, जिन्होंने मुझे यह सच कहने की हिम्मत और साहस दिया। और सच पूछिए तो मेरे शोध निर्देशक चाहे जो भी रहे हों, पर मैंने अपने मन में शोध निर्देशक के आसन पर नामवर जी की मूर्ति को बैठाकर ही यह पूरा शोधप्रबंध लिखा था। संयोग से जिसे खुद नामवर जी ने देखा भी, और सही किया।
यों मुझे नए साहित्य और समकालीनता से जोड़ने वाले बेशक नामवर जी ही थे, जिनके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान और गहरी कृतज्ञता है। पर फिर भी, यह बड़ी हैरानी की बात है कि उन्हें पढ़ते हुए कई बार मेरे मन में गहरा असंतोष उमड़ता था। उनसे बात करने और कभी-कभी तो बहसने की इच्छा होती थी। उनके बहुत से अंतर्विरोध परेशान करते थे। मसलन एक सवाल तो यही बार-बार में उठता था कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में बाबा नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन लगभग अनुपस्थित क्यों हैं? उनके कविता के नए प्रतिमानों पर ये बड़े और मूर्धन्य कवि खरे नहीं उतरते तो यह उनके नए प्रतिमानों का दोष है या इन कवियों का? 
इसी तरह नामवर जी के जो लेख और इंटरव्यू मैंने पढ़े, उनमें कहीं वे जीवन यथार्थ की ओर अधिक झुकते नजर आए तो कहीं एक भिन्न तरह के कलावाद की ओर, जिसमें रूप या शैली वस्तु की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यहाँ तक कि कई बार एक ही लेखक के बारे में उनके परस्पर विरोधी विचार भी पढ़ने को मिल जाते हैं।
यों नामवर जी की आलोचना दृष्टि को लेकर बहुत से प्रश्न मन में उठते थे। उनके अंतर्विरोध परेशान करते थे और मैं मन ही मन उनसे बहसता और सवाल करता था। कभी-कभी उन्हें पढ़ते हुए अपने सवालों के जवाब भी मैं तलाशता। पर यह सारा कुछ एकतरफा ही था।
आखिर मैंने सोचा, नामवर जी से मिलना चाहिए और उनके आगे अपने सवालों को रखना चाहिए। हालाँकि मन में यह संकोच भी था कि पता नहीं, एक साहित्यिक के रूप में वे मुझे जानते भी हैं या नहीं। पर मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने बड़ी सहज प्रसन्नता से मिलने की इजाजत दे दी।

[3]

मुझे स्वीकार करना चाहिए कि आज से कोई सत्ताईस बरस पहले, 8 अगस्त, 1996 को सुबह लगभग साढ़े दस बजे मैं नामवर जी के निवास-स्थान, एफ-32, शिवलिक अपार्टमेंट पहुँचा तो मेरी धड़कनें काफी तेज थीं और घंटी दबाकर दरवाजा खुलने का इंतजार करते समय मुझे उन्हें ‘सम’ पर लाने के लिए खास श्रम करना पड़ा। हालाँकि तो भी मैं पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा था और खुद पर बुरी तरह झुँझलाहट छूट रही थी।
बहरहाल दरवाजा खुला और मैं भीतर जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद नामवर जी इंटरव्यू के लिए तैयार होकर आए। सफेद बेदाग कुर्ता, सफेद तहमद, बगल में पान का पुड़ा! मुसकराते हुए उन्होंने मेरी ओर देखा। हालाँकि अब तक मैं पूरी तरह ‘नॉर्मल’ नहीं हो पाया था और घबराहट के मारे बार-बार अपने सवालों पर नजर दौड़ा रहा था, बल्कि उनमें कुछ और जोड़ने-घटाने की निरर्थक कवायद में लीन हो गया। शायद इसलिए कि उन्होंने बातचीत के लिए मुझे बहुत कम समय दिया था, केवल डेढ़ घंटे, जबकि मेरे पास सवालों का अनंत सिलसिला था। आखिर मैं उस विलक्षण शख्स के सामने था, जिसे बरसों पहले मैंने गुरु के आसन पर बैठाया था और जिनसे एकतरफा संवाद करते हुए, पूरा एक युग बीत चुका था।
यह नामवर जी ही थे जिन्होंने मुझे खोला। मैं सत्यार्थी जी की कहानियों का बड़ा संग्रह (जिसका संकलन-संपादन मैंने और संजीव ठाकुर ने किया है।) तथा पत्रकारिता जगत पर लिखे गए अपने चर्चित उपन्यास ‘यह तो दिल्ली है’ का राजकमल से छपा पैपरबैक एडीशन नामवर जी को भेंट करने के लिए ले गया था। उन्हें उलटते-पुलटते हुए नामवर जी सहज भाव से कुछ पूछते-बतियाते रहे और मेरा मनोवैज्ञानिक भय उड़न-छू हो गया। इस बीच खुद ही उन्होंने मेरे बृहत् उपन्यास ‘कथा सर्कस’ की चर्चा की, “आपके कथा सर्कस की तो काफी अच्छी समीक्षाएँ आ रही हैं।” 
“आपने पढ़ीं?” मैंने कुछ संकोच से पूछा। पता चला, नामवर जी ने ‘हंस’ और ‘जनसत्ता’ में छपी समीक्षाएँ पढ़ी हैं। मेरे लिए यह बड़े सुख की बात थी।
“शुरू करें?” मैंने सकुचाते हुए पूछा। 
“आप पानी-वानी पिएँगे?” नामवर जी ने शायद मुझ पर तरस खाते हुए पूछ लिया।
“हाँ, थोड़ा सा पानी...!” पानी पीकर मैंने खुद को थोड़ा ठकठकाया और सवालों के लिए तैयार हो गया।
हाँ, लेकिन मुझे उस ‘मनोवैज्ञानिक भय’ के बारे में थोड़ा सा और बताना चाहिए, जिसका ऊपर जिक्र हुआ है। एक तो पिछले बीस से भी अधिक वर्षों में नामवर जी को पढ़ते और उनकी ‘इमेज’ से एकतरफा झगड़ते हुए ‘मैं बीत रहा था’, और अब जबकि यह सारा कुछ एक पहाड़ की तरह मन में इकट्ठा हो गया था, वे सामने थे और मुझे उनसे बात करने का अवसर मिल रहा था। तो क्या पूछूँ, क्या नहीं, यह तय करना ही मुश्किल था।
बातचीत का विषय बहुत व्यापक था। नामवर जी के आलोचक व्यक्तित्व की बुनावट, अंतर्विरोधों और उसकी विकास-यात्रा से शुरू हुई यह बातचीत प्रगतिवादी विचारधारा के आत्मसंघर्ष, तत्कालीन साहित्य, समाज और परिस्थितियों के विश्लेषण से गुजरती हुई आने वाली सदी को लेकर नामवर जी के चिंतन और वैचारिक द्वंद्व तक को खुद में समेट लेती है।
कुछ सवाल नामवर जी की ‘इमेज’ को लेकर थे, खासकर आलोचक और वक्ता के रूप में जिस तरह से साहित्य जगत में उनकी छवि बन रही थी। कुछ भली-भली सी तो कुछ विवादास्पद भी। इनमें कुछ बहुत तीखे सवाल भी थे, लेकिन नामवर जी ने उतनी ही आत्मीय मुसकराहट और नि:संगता से उनके भी जवाब दिए, बगैर उत्तेजित हुए। हाँ, बीच-बीच में कटाक्ष भरे व्यंग्य के कुछ रेशे उसमें शामिल होते गए। बातचीत के बीच में “अब तो चाय पी जानी चाहिए” के सहज आग्रह के साथ एक बार नामवर जी उठकर गए।
अलबत्ता चाय पीते हुए भी बातचीत के सिलसिले या गति में कोई फर्क नहीं आया। बीच में दो-तीन दफा नामवर जी ने पान के बीड़े मुँह में दबाए और इससे बातचीत का ‘रस’ और बढ़ा ही। यह ‘रस’ अलबत्ता डॉ. नगेंद्र के ‘रसशास्त्र’ में शामिल न था, जिसकी बातचीत में एकाधिक बार चर्चा हुई! 
बहरहाल, लौटते समय लगा, नामवर जी के आलोचक से तो मुलाकात हुई है, लेकिन नामवर जी के भीतर जो एक और नामवर है—और जो आलोचक नहीं, एक बहुत ही तारल्य भरा सर्जक बल्कि वही ज्यादा है, साथ-साथ उससे भी मिल लिया गया है। बातचीत में आचार्य हजारीप्रसाद द्विेवदी, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रामविलास शर्मा आदि का स्मरण और उनसे जुड़े प्रसंगों की निरंतर आवाजाही इस कदर हुई कि यह सारी बातचीत गहन आलोचनात्मक स्तरों पर चलती हुई भी शायद एक लंबे, आत्मीय संस्मरण का सा सुख देती है।

[4]

अलबत्ता, बातचीत की शुरुआत बड़े अनौपचारिक अंदाज में हुई। नामवर जी की साहित्य-यात्रा की शुरुआत कविताओं से हुई थी। विद्यार्थी काल में ही वे बड़े सुंदर गीत लिखने लगे थे और उतने ही सधे हुए, सुमधुर कंठ से उन्हें गाते भी थे। यह चर्चा मैंने कई जगह पढ़ी-सुनी थी कि जाने-माने गीतकार शंभुनाथ सिंह के साथ अकसर वे कवि-सम्मेलनों में जाते थे, और वहाँ उनकी एक अलग पहचान थी। पर अब शायद उस बारे में सोच पाना ही कठिन था। कितना ही चाहें, नामवर जी की वह छवि मन में कहीं अँटती ही न थी।
उसी की ओर इंगित करते हुए मैंने पूछ लिया, “नामवर जी, आपने एक कवि के रूप में अपनी यात्रा शुरू की, फिर आपने आलोचनाएँ लिखीं और अब हिंदी के शीर्षस्थ आलोचकों में आपकी गिनती होती है। कृपया बताएँ, जब आपने लिखना शुरू किया था, तब क्या आप जानते थे कि यहाँ तक पहुँचेंगे...?” 
सवाल सुनकर नामवर जी एक क्षण के लिए चुप रहे। जैसे समय की धारा में तेजी आगे-पीछे जा रहे हों। फिर एकाएक उनकी अविरल वाग्धारा जैसे फूट पड़ी। मेरी उँगली पकड़कर, कई दशकों पहले के अतीत में मुझे अपने साथ ले जाते हुए वे बोले—
“ऐसा है प्रकाश जी, कोई योजना बनाकर कभी कोई काम मैंने जीवन में नहीं किया। कविता से शुरू किया, कविता लिखना अच्छा लगता था तो लिखने लगा।...उस समय प्रारंभिक दिनों में, कम से कम आलोचना लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं था। सन् 1951 में मेरा कविता-संग्रह प्रेस में छपने के लिए गया, तब मैंने एम.ए. कर लिया था। कविता-संग्रह का नाम ‘नीम के फूल’ रखा था।...यह संयोग ही है कि ‘बकलम खुद’ जो मेरा निबंधों का संग्रह है और ‘नीम के फूल’ एक साथ छपने के लिए गए। उन दिनों ‘साहित्य सहकार’ नाम से एक नया प्रकाशन जगदीश भारती ने शुरू किया था। वही छाप रहे थे।...तो ‘बकलम खुद’ की तो—जिसमें व्यक्ति-व्यंग्य तथा ललित निबंध ही थे, करीब दो सौ किताबें छप गई थीं और ‘नीम के फूल’ प्रूफ के लैविल पर ही था। तभी मकान मालिक से जगदीश भारती के कुछ झंझटों के कारण ‘साहित्य सहकार’ प्रकाशन बंद हो गया और ‘नीम के फूल’ मेरा पहला कविता-संग्रह कभी छपा ही नहीं।”
पर क्या यह महज एक संयोग ही था? अगर नामवर जी का कविता-संग्रह ‘नीम के फूल’ उस समय छप जाता तो क्या वे आलोचना पथ के बजाय कविता की राह पर चल पड़ते? पता नहीं क्यों, मेरा मन यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
मन में गहरी जिज्ञासा और उत्सुकता थी कि स्वयं नामवर जी से ही यह बात पूछनी चाहिए। पर मैं पूछ पाता, इससे पहले ही उनका एकदम सधा हुआ जवाब सामने आ गया। उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा कि ऐसा नहीं कि वह संग्रह छप जाता तो वे आगे कविताएँ ही लिखते। इसलिए कि गद्य लिखने की ओर उनका रुझान काफी बढ़ गया था। ‘बकलम खुद’ में व्यंग्यात्मक निबंध ही ज्यादा थे। तो गद्य लिखने में उस समय उनकी दिलचस्पी तो जरूर थी, पर आलोचना में नहीं थी।
फिर आलोचना की ओर वे कैसे आए? इस बारे में भी उन्होंने बताया और इसका श्रेय प्रगतिशील लेखक संघ की विचारोत्तेजक गोष्ठियों को दिया। उन दिनों नामवर जी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे और काशी शाखा के सचिव थे। वहाँ काफी अच्छी और तेजतर्रार साहित्यिक गोष्ठियाँ हुआ करती थीं। बहुत से नए-पुराने लेखक उनसे जुड़े हुए थे, जो काफी पढ़ते भी थे। तो स्वभावतः गोष्ठियों में रचना-पाठ के साथ-साथ साहित्य के प्रश्नों पर गहन विचार भी होता था। इन गोष्ठियों से ही प्रेरित, प्रभावित, उत्तेजित होकर नामवर जी ने कुछ आलोचनात्मक लेख लिखे। यों आलोचना की ओर उनका रुझान हुआ जो आगे बढ़ता ही गया।
इनमें से दो लेखों की नामवर जी ने खासकर चर्चा की। पहला ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण’ और दूसरा ‘साहित्य में कलात्मक सौंदर्य की समस्या’। इनमें पहला निबंध शिवदानसिंह चौहान के कहने से लिखा गया और उसे उन्होंने ‘आलोचना’ के ‘इतिहास अंक’ में छापा। दूसरा लेखक ‘कल्पना’ के संपादक बदरीविशाल पित्ती के आग्रह पर लिखा गया था, जो संभवत: अक्टूबर 1952 की ‘कल्पना’ में छपा था। ये दोनों लेख नामवर जी की पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना’ में सकलित हैं। खुद नामवर जी के शब्द दोहराऊँ तो इन लेखों पर “मार्क्सवाद से नए-नए परिचय का प्रभाव स्पष्ट है।” इसके बाद आलोचना लिखने का सिलसिला शुरू हो गया।
पर केवल यही एक कारण न था। आलोचनात्मक लेख लिखने का एक कारण और नामवर जी ने बताया। और वह यह कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. करने के बाद नामवर जी वहीं प्राध्यापक हो गए थे। अब अपने विषय को प्रभावी ढंग से छात्रों को समझाने के लिए भी इस तरह के लेखों की दरकार थी। नामवर जी ने बताया, “तो उन दिनों अध्यापक होने के नाते—आप तो अध्यापक रहे हैं, इसलिए जानते ही होंगे—अपने विषय को बेहतर ढंग से विद्यार्थियों के आगे रखने और व्याख्यायित करने के लिए आलोचना की जरूरत पड़ती ही है। शायद यह पहला अवसर है जब सोचने पर मुझे लगता है कि मेरे आलोचना-कर्म में प्रवृत्त होने में मार्क्सवाद और अध्यापन-कर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।”
नामवर जी की आलोचना की पहली पुस्तक ‘छायावाद’ है, जो सन् 1954 में छपी थी। भला इस पुस्तक को लिखने की जरूरत उन्हें क्यों पड़ी? इसका जवाब भी नामवर जी ने दिया। छायावाद की यह विडंबना है कि अकसर उसे रहस्य से मंडित करके कुछ और दुर्बोध बना दिया जाता है। तो इस बड़ी धुँधली-धुँधली और दुर्बोध लगने वाली काव्याधारा को सीधी, सहज भाषा में यथार्थ की भूमि पर रखकर प्रस्तुत किया जाए, इस विचार ने ही उन्हें ‘छायावाद’ पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया।
“छायावादी कविताएँ जितनी मुश्किल नहीं है, उससे ज्यादा तो मुश्किल उनकी आलोचना थी, मुश्किल भी और उबाऊ भी। लगता था, इससे ये सीधे कविताएँ पढ़ लेना ही बेहतर है...!” नामवर जी ने थोड़ी खिन्नता के साथ कहा।
“जैसे डॉ. नगेंद्र की ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’—निहायत रूखी किताब...?” मैं कहता हूँ।
नामवर जी हाँ में सिर हिलाते हैं। फिर कहते हैं, “और भी आलोचकों ने छायावाद के साथ बिल्कुल इसी ढंग का बर्ताव किया है! या तो विद्वत्ता और पांडित्यपूर्ण लंबी-लंबी टीकाएँ या फिर समीक्षा के नाम पर भावपूर्ण उद्गार, ‘अरे-अरे’, ‘ओह-ओह’, ‘वाह-वाह’ आदि।...तो सरल भाषा में और ऐसे ढंग से जिससे उन कविताओं का अर्थ और शक्ति उद्घाटित हो, छायावाद पर लिखने का विचार मेरे मन में आया। यह छायावाद पर कुछ इस तरह की समीक्षा थी, जिसे आजकल ‘क्रिएटिव समीक्षा’ कहा जाता है।”
मुझे याद आया कि नामवर जी ने पुस्तक में अध्यायों के शीर्षक भी कुछ अलग ढंग के दिए हैं। उनमें प्रायः सुप्रसिद्ध छायावादी कवियों की कविताओं की पंक्तियों को ही अध्यायों का शीर्षक बनाया गया है। इससे एक अलग तरह का प्रभाव तो आता ही है। मैंने इस ओर इशारा किया तो नामवर जी बोले—
“हाँ, इसके पीछे कारण जो था और जो मंथन मेरे भीतर चल रहा था, वह यह कि छायावाद के विरोधी और समर्थक दोनों ही छायावाद को ठीक से समझे नहीं, या दोनों ही ठीक से छायावाद की व्याख्या नहीं कर पा रहे हैं। और यह काव्य एक चुनौती तो था ही, जिसे नकारना आसान न था।...तो इस तरह छायावाद पर किताब लिखी गई। फिर कुछ और आलोचनात्मक लेख लिखे और मैं तेजी से आलोचना की ओर बढ़ता गया...!”
एक सवाल मेरे मन में बार-बार उठ रहा था। आलोचना की बात चली तो मैंने पूछ लिया, “डॉक्टर साहब, अगर इस बिंदु पर खड़े होकर आप अपनी पिछली सारी यात्रा पर निगाह डालें, तो एक आलोचक के रूप में अपनी भूमिका या अपने काम से आपको कितना संतोष है—कितना अवसाद?”
इस पर नामवर जी कुछ गंभीर होकर बोले, “प्रकाश जी, अपने आलोचना कार्य से संतोष मुझे कभी नहीं रहा, बल्कि आप कह सकते हैं, जो कुछ मैंने लिखा, उसे लेकर एक तीव्र असंतोष का भाव मन में रहा है—अब भी है।”
सुनकर मैं एक क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। एकदम अवाक। नामवर जी सरीखा हिंदी का मूर्धन्य आलोचक यह कहे, मेरे लिए यह सचमुच बड़े अचरज की बात थी। बल्कि अकल्पनीय।
“इस असंतोष का कारण...?” मैंने जानना चाहा। फिर कहा, “यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूँ, क्योंकि आप तो हिंदी के बहु-प्रशंसित आलोचकों में से हैं?”
सवाल सुनकर नामवर जी ने एक तरह के आत्म-स्वीकार या कनफेशन के साथ जो कुछ कहा, वह और भी हैरान करने वाला था। उन्होंने बताया कि, “असंतोष का एक मुख्य कारण तो यह है कि मेरा जितना भी लेखन है, वह एक तरह से फरमाइशी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने आलोचनात्मक लेखों को फरमाइशी कहा करते थे। बहरहाल, ऐसे लेखन में कुछ न कुछ अधूरापन रह ही जाता है जो मुझे बुरी तरह सालता रहता है।...”
फिर अपनी बात को कुछ और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, कि जो कुछ भी उन्होंने लिखा, वह तुरंत छप गया। उन्हें प्रकाशकों के पीछे भागने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। बल्कि प्रकाशक ही उनके पास आए। लिहाजा उनका असंतोष न छपने को लेकर नहीं है, बल्कि जो वे लिख सकते थे, या जैसी पूर्णता के साथ लिख सकते थे, वैसा न लिख पाने का असंतोष ही उन्हें सालता है। मन की एक गहरी टीस के साथ उन्होंने कहा—
“लेकिन जब चीजें छप गईं तो मैंने, आपको सच बताऊँ, उन्हें कभी ढंग से पलटकर नहीं देखा। पीछे लौटकर देखना मेरी आदत नहीं रही...जो लिख लिया, उसे छोड़कर आगे बढ़ा। लेकिन इस सारी प्रक्रिया में यह तकलीफ तो है ही कि जो लिख सकता था—या जो कहीं बेहतर था, नहीं लिखा गया...और काफी कुछ अधूरा छूट गया!...या बहुत-सा महत्त्वपूर्ण इसमें अनलिखा रह गया। समय-समय पर लेख लिखे गए, पुस्तक बन गई, पर बहुत-सा असंतोष भी मन में इसलिए रहा कि व्यवस्थित ढंग से जो करना चाहता था, नहीं हुआ।”
एक बड़े आलोचक का इतना खरा और ईमानदार कनफेशन मेरे लिए एक बड़ी और लगभग असंभव सी बात थी।
“लेकिन ‘कविता के नए प्रतिमान’...?” मैंने पूछा, “डॉक्टर साहब, ‘कविता के लिए प्रतिमान’ में तो ऐसा नहीं लगता कि यह फरमाइशी लेखन है या कहें कि तात्कालिकता के दबाव में लिखी गई कोई चीज हो?...इसके पीछे तो गहरे दबाव और बड़ी तैयारी लगती है—नहीं?”
नामवर जी बोले, “हाँ, आपकी यह बात सही है कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ ऐसे सवालों को लेकर लिखी गई जो मुझे बहुत अरसे से परेशान कर रहे थे। मेरी और पुस्तकों की तुलना में यह कहीं ज्यादा समय में और ज्यादा बँधे हुए ढंग से लिखी गई। लेकिन इस पुस्तक में भी बहुत कुछ छूट गया...बहुत कुछ अधूरा ही रह गया, जिसे इसलिए रहने दिया गया कि चलिए, यहाँ इतना ही काफी है, अब आगे किसी और पुस्तक में देखेंगे...!”
नामवर जी ने एक आलोचक के रूप में अपने असंतोष को बहुत साफ शब्दों में मेरे आगे रख दिया था। पर मुझे लगता है कि यह तो आलोचना की नियति है ही। उसे रचनाओं के पीछे-पीछे ही चलना है। रचनाएँ आगे निकलती जाएँगी, आलोचना को उसकी तुलना में पिछड़ना ही है। यहाँ बड़े से बड़ा आलोचक भी शायद कुछ विवश और असमर्थ है।
साहित्य में आलोचना की इस दोयम स्थिति की ओर इशारा करते हुए मैंने पूछा, “लेकिन डॉक्साब, आप एक और तरह से इस बात को देखें, मेरा कहना है कि आलोचना में यह तो होगा ही। रचना की तुलना में आलोचना में एक तरह का अधूरापन लगेगा ही। यह आलोचना की नियति है कि उसमें रचना की तरह का पूरापन कभी नहीं होगा और यही अतृप्ति या असंतोष शायद आगे के काम के लिए प्रस्थान-बिंदु भी बनता है।...नहीं?”
नामवर जी ने मेरी बात से सहमति जताई। बोले, “जी!...आपकी यह बात बिल्कुल सही है और मैं इसे बिल्कुल ठीक मानता हूँ...लेकिन ज्यादा बड़ा असंतोष तो इस कारण है कि ज्यादा बड़े काम जो सचमुच बड़े काम हैं—और मुझे करने ही थे, जिन्हें कोई दूसरा नहीं कर रहा, छूटे जा रहे हैं!”
आगे उन्होंने बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी कुछ विवशताओं की ओर भी संकेत किया, जिनके कारण न चाहते हुए भी उनके पसंदीदा काम पीछे छूटते चले गए। नामवर जी ने बताया कि प्रारंभ में ही, जब वे आलोचना में आए थे, तभी तय किया था कि उन्हें कुछ काम करने हैं। लेकिन वे बीस वर्षों तक जिस विश्वविद्यालय में रहे, वहाँ अध्यापन की व्यस्तताएँ, और फिर महानगर की आपाधापी, इसमें वे काम एक ओर ही रह गए। 
“प्रकाश जी, ये आधे किए हुए काम मुझे बहुत सालते, बहुत दुख देते हैं। मेरे असंतोष का मूल कारण ही यही है। मुझे मालूम है कि ये बड़े काम हैं और होने ही चाहिए। लेकिन तात्कालिक दबावों में ये छूटते जाते हैं और असंतोष और गहरा हो जाता है।” अपनी बात को पूरा करते हुए नामवर जी ने कहा।
इसी सिलसिले में नामवर जी ने बताया कि उनकी अधूरी आकांक्षाओं में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखना भी शामिल है। और यह आकांक्षा एक आलोचक के रूप में उनकी रचना-यात्रा के प्रारंभ से ही निरंतर उनका पीछा कर रही है। इसकी कुछ और विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा—
“उदाहरण के लिए मेरी यह शुरू से आकांक्षा रही है कि मैं हिंदी साहित्य का इतिहास फिर से लिखूँ, यानी हिंदी साहित्य के इतिहास का बिल्कुल नई दृष्टि से पुनर्लेखन किया जाए। आप मेरा पहला आलोचनात्मक लेख देखेंगे तो उसका शीर्षक है, ‘इतिहास और आलोचना’। ये दो चीजें हैं जो शुरू से मेरी चिंता कि केंद्र में रही हैं। इतिहास के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि और फिर इस इतिहास का आलोचना के प्रतिमान की तरह प्रयोग।...” 
नामवर जी हिंदी साहित्य का इतिहास लिखें तो यह कैसी अद्भुत बात होगी! मेरे लिए यह कल्पना ही खासी रोमांचक थी। और केवल मेरे लिए ही क्यों, अगर नामवर जी का यह इतिहास सामने आता तो पूरे साहित्य जगत के लिए यह एक सुखद विस्मयकारी बात होती। नामवर जी का साहित्य इतिहास लिखना शायद खुद ही एक इतिहास बन जाता।
मैं अपनी भावनात्मक दुनिया में गुम था, तभी नामवर जी का स्वर सुनाई दिया। वे कुछ सोचते हुए से आगे की अपनी योजनाओं के बारे में बता रहे थे।  बोले, “इसी तरह मेरी एक इच्छा यह भी है कि मैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर एक पूरी पुस्तक लिखूँ। उसके लिए सामग्री मैंने इकट्ठी कर ली है। उन्नीसवीं शती के पुनर्जागरण पर भी पूरी एक पुस्तक की सामग्री तैयार है।...”
मेरे लिए ये किस कदर आनंद के क्षण थे, क्या मैं बता पाऊँगा? शायद इसे व्यक्त करने के लिए सही शब्द मेरे पास नहीं हैं। इसलिए कि मुझ जैसा मामूली लेखक नामवर जी सरीखे दिग्गज आलोचक की रचना-यात्रा, और यहाँ तक कि उनकी भविष्य की योजनाओं का भी साक्षी बन रहा था।
क्या जब मैं उनसे बात करने घर से चला था, तो इस बात की जरा भी कल्पना कर सकता था? नामवर जी ने अपने बड़प्पन से मेरे मामूलीपन को ढक लिया था। एक इंटरव्यूकार के रूप में ऐसे खुशी के क्षण कभी-कभार ही मिल पाते हैं।

[5]

इसी सिलसिले में मुझे याद आया कि नामवर जी ने कहीं जिक्र किया है कि वे हिंदी में आलोचना की प्रस्थान-त्रयी पर कुछ लिखने का सोच रहे हैं। क्या इस दिशा में उन्होंने काम शुरू कर दिया है। इस बारे में खुद नामवर जी से बेहतर भला कौन बता सकता था। लिहाजा मैंने उनसे पूछ लिया, “हिंदी में आलोचना की प्रस्थान-त्रयी पर आप लिखना चाहते थे। आपने कहीं जिक्र किया है?”
नामवर जी ने मेरी बात से सहमति जताई। बोले, “जी...! अब भी मेरा इरादा है कि मैं वह काम करूँ। इसी तरह उपन्यास लगभग छूट ही गया। इतने महत्त्वपूर्ण उपन्यास इस बीच आए हैं कि उन्होंने उपन्यास के पूरे ढाँचे, उपन्यास की पूरी परिकल्पना को ही बदल दिया है। मैं उन पर लिखना ही चाहता हूँ। इसी तरह कहानियों पर फिर से लिखना चाहता हूँ। कुछ इतनी अच्छी लंबी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं कि मुझे लगता है कि वे जैसे आलोचना के लिए चुनौती दे रही हों, जबकि दुर्भाग्य से आलोचकों ने उन पर ध्यान ही नहीं दिया। इसी तरह ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पूरा नहीं तो उसके कुछ हिस्सों, कुछ कालखंडों के बारे में ही विस्तार से और व्यवस्थित ढंग से कुछ लिखूँ, यह मैंने सोचा है...जैसे कि कई बार गोष्ठियों में, कार्यक्रमों बोला हूँ। उस पर लगातार सोचता भी रहा हूँ, लेकिन लिखना नहीं हो पाया।...तो संतोष यह है कि मैं गंभीरता से और कुछ योजना बनाकर इस काम में जुटा हूँ। देखिए, कब तक हो पाता है?”
फिर कुछ रुककर अपनी बात आगे बढ़ाते हुए नामवर जी ने कहा, ज्यादा व्यवस्थित ढंग से न लिख पाने का एक बड़ा कारण तो यह है, कि उनकी इतनी ऊर्जा विश्वविद्यालय के कामों में खर्च हुई है, जिसे किसी ने समझने की कोशिश नहीं की। जब आप उसका पूरा रंग-ढंग ही बदल रहे हैं और आपको न सिर्फ अपने विश्वविद्यालय में, बल्कि जगह-जगह जाकर अपनी बात समझानी भी हो तो उसकी गंभीरता और मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। लिहाजा उन्होंने अपने भाषण और वक्तृताओं में भी यही बात लोगों को समझानी चाही कि अब शिक्षा-दीक्षा का पूरा ढंग बदल दिए जाने की जरूरत है। फिर अपनी बात का समाहार करते हुए उन्होंने बहुत भावुक होकर कहा—
“तो एक छोटा सा विनम्र योगदान मेरा इसमें है कि हमारे विश्वविद्यालय में साहित्य पढ़ाने का ढंग बदला...और निश्चय ही यह काम मेरे अकेले के बस का नहीं है। मुझे इतने अच्छे सहकर्मी मिले और उनका उनका इतना बढ़िया साथ और सहयोग मिला कि हम लोग मिलकर यह काम कर सके और यह ऐसा काम है कि मैं जानता हूँ कि कहीं भी, किसी भी इतिहास में दर्ज नहीं होगा। हाँ कुछ इक्का-दुक्का लोग हो सकता है, मेरे इस योगदान की चर्चा करें, और प्रकाश जी, जब इतना समय और ऊर्जा खत्म हो चुकी है और बाकी बचे, अनकिए या अधूरे कामों को देखता हूँ तो जो तीव्र असंतोष मन में पैदा होता है, उससे भी बच नहीं सकता।”
नामवर जी ने अपनी बात पूरी स्पषटता और ईमानदारी से मेरे आगे रख दी थी। वे इस तरह हृदय खोलकर मुझसे बात करेंगे, मुझे इसकी उम्मीद न थी। और यह बातचीत जो सवाल-जवाब वाले अंदाज में शुरू हुई थी, अब एक गझिन भावनात्मक संवाद, बल्कि निर्मल सहधारा में तब्दील हो चुकी थी।
एक आलोचक के रूप में नामवर जी की निसफ सदी की यात्रा मेरे समने थी। अनेक चकित करने वाली घटनाओं से भरी, बेहद समृद्ध यात्रा। बार-बार उसकी ओर मेरा ध्यान जा रहा था। हम सबके लिए एक आलोचक के रूप में नामवर जी की यह विकास-यात्रा बड़ी रोमांचक थी, और प्रेरक भी। कुछ-कुछ आतंकित करने वाली भी। पर खुद नामवर जी उसे किस तरह देखते हैं, यह जानने की जिज्ञासा मन में थी।
उसे जानने की गरज से मैंने पूछा, “नामवर जी, आपके खयाल से आपके आलोचक का सबसे बड़ा हासिल क्या है और सबसे बड़ी मुश्किल क्या है, जिससे आपको बार-बार टकराना पड़ा हो?”
प्रश्न सुनकर नामवर जी कुछ असमंजय में पड़े गए। “हासिल...!” अपने भीतर झाँककर, कुछ सोचते हुए से वे बोले, “यह तो नहीं जानता—कम से कम अभी तक।”
“लेकिन एक आलोचक के रूप में आप अपने आलोचक को कैसे देखते हैं या उसकी उपलब्धि क्या मानते हैं, यह तो बता ही सकते हैं...!” मैंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।
इस पर नामवर जी बोले, “ठीक है...तो ऐसा है प्रकाश जी, साहित्य-सृजन के क्षेत्र में जो भी नया और सार्थक काम सामने आए, उसको दूसरी चीजों से अलगाकर पहचानना, रेखांकित करना और उसमें यानी उसकी मूल्यांकन की प्रक्रिया में दूसरों को शामिल करना, यह काम पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ मैंने करना चाहा। कितना सफल हुआ या नहीं, कह नहीं सकता, लेकिन इसी अनुभव को अपना हासिल मानना चाहूँगा।”
नामवर जी ने एक सच्चे और गंभीर आलोचक की बुनियादी चिंता मेरे सामने रख दी थी। साथ ही अपने काम करने का ढंग और तौर-तरीका भी। लेकिन मेरे प्रश्न का दूसरा हिस्सा तो अभी अनुत्तरित था। उसकी ओर नामवर जी का ध्यान खींचते हुए मैंने पूछा, “और सबसे बड़ी मुश्किल?”
इस पर नामवर जी का उत्तर मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था। अपने भीतर कुछ गहरे उतरते हुए वे बोले, “पूर्व निर्धारित संस्कार!...मुझे खास तरह का साहित्य पढने से बने हुए पूर्व-निर्धारित संस्कारों से निरंतर लड़ना पढ़ा। यह लड़ाई मेरे लिए सबसे मुश्किल और पीड़ादायक थी...क्योंकि मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति के साहित्यिक संस्कार या साहित्यिक अभिरुचियाँ बीस-पच्चीस वर्ष की आयु तक बन जाती है। उसके बाद यह प्रक्रिया काफी कुछ रुक जाती है—यानी प्रयास करके उसका निरंतर विकास तो किया जा सकता है, लेकिन यह बहुत स्वाभाविक नहीं है। उसके लिए निरंतर अपने आप से लड़ना पड़ता है।”
कुछ रुककर बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “मेरे साहित्यिक संस्कार भी जो हैं प्रकाश जी, वे सन् 50 से 60 के बीच जो साहित्य पढ़ा गया, उससे बने हैं—मसलन जो उपन्यास, जो कविताएँ उस दैरान मैंने पढ़ीं, उनका असर अब तक कहीं गहरे बना हुआ है और उसी से मेरी साहित्यिक अभिरुचियाँ भी बनी हैं। इससे पहले का जो साहित्य था, उससे लड़-झगड़कर कैसे नए साहित्य ने अपनी जगह बनाई, यह मैंने खुद देखा है और उससे मैं मुग्ध भी हुआ हूँ। लेकिन उसके बाद जो नई चीजे आईं, मसलन सन् 60 के बाद जो कविता आई, जो कहानियाँ लिखी गईं, उसमें भाषा को लेकर, काव्य और संवेदना को लेकर इतने बड़े प्रयोग हुए कि उससे कविता-कहानी की काया आमूलचूल बदल गई। आप कह सकते हैं, साहित्य का यह एक बिल्कुल नया कायाकल्प था और उसकी एप्रीशिएट करने के लिए आलोचक के लिए भी अपनी अभिरुचियों से निरंतर झगड़ते रहने और अपना नया कायाकल्प करने की चुनौती थी!...”
फिर एक आलोचक के रूप में अपनी तकलीफ और चुनौतियों, दोनों की एक साथ चर्चा करते हुए उन्होंने बड़ी साफगोई के साथ कहा, “अकसर मैं देखता हूँ कि रचना की तुलना में आलोचना बहुत ठस है तो मुझे बहुत कष्ट होता है। अगर रचना में शिल्प और अनुभव के स्तर पर इतनी क्रांतिकारी तब्दीलियाँ आ गई हैं, तो आलोचना वही बाबा आदम के जमाने की भाषा में कैसे लिखी जा सकती है?...इस मामले में शास्त्र का अनुचर हो जाने को भी मैं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं मानता। शास्त्र के लिए मन में सम्मान हो सकता है, लेकिन शास्त्र क्या सिर पर ढोने की चीज है? मेरे गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मुझे यह दोहरी दृष्टि दी शास्त्र के प्रति...यानी दर्शन की परंपरा का आप सम्मान भी कर रहे हैं, लेकिन उससे आक्रांत भी नहीं हैं। उसका उपयोग और काम हो गया तो उसे पानी में फेंक दीजिए। ढोने से कोई फायदा नहीं, बल्कि उलटे डूबने का खतरा है।...”
तभी अचानक नामवर जी को अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सीधे-सहज और बेबनाव व्यक्तित्व के साथ ही उनकी असाधारण विद्वत्ता, साहित्य और वाङ्मय का स्मरण हो आया। उन्होंने बड़े भावनात्मक लहजे में कहा—
“स्वयं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सारा लेखन इस बात का गवाह है। उनसे ज्यादा शास्त्रों का ज्ञाता कौन था और उनसे ज्यादा सहज और रसात्मक वाक्य किसने लिखे? किसी चीज को भीतर पचाकर कोई आसान बात कहना ज्यादा मुश्किल है...असली पांडित्य तो यह है! ऐसे ही राहुल सांकृत्यायन को लें तो उनसे बड़ा पंडित कौन था? लेकिन उनकी रचनाएँ उठाकर आप देख लीजिए, कितनी सहज, सुबोध भाषा में वे जनता के लिए लिखते रहे। इसी तरह चंद्रधर शर्मा गुलेरी इतने बड़े पंडित थे, लेकिन उनकी एक ही कहानी ‘उसने कहा था’ उन्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है। कितनी सरस और कलात्मक रूप में ऊँची कहानी है कि हिंदी साहित्य का इतिहास उसका जिक्र किए बगैर लिखा ही नहीं जा सकता!...तो मेरा तो सूत्र-वाक्य यह है कि शास्त्र को अपने ऊपर सवारी मत करने दो, शास्त्र पर सवारी करो—फिर चाहे वह भारतीय काव्य-शास्त्र हो या पश्चिमी काव्य-शास्त्र!”
कहते-कहते नामवर जी खुलकर हँसे तो मेरे लिए भी अपनी हँसी को रोक पाना मुश्किल हो गया।
मैंने पूछा, “आपने नामवर जी, ‘कल्पना’ के अपने एक लेख का जिक्र किया था जो रूप और वस्तु के द्वंद्व की समस्या पर था। आपकी पस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ को पढ़ते हुए भी मुझे लगा था कि इसके पीछे की आपकी मुख्य चिंता रूप और वस्तु का द्वंद्व ही है। इसमें मुझे यह भी लगा कि कभी आपका पलड़ा रूप की और कभी अंतर्वस्तु की ओर झुक जाता है। आपने अपने इंटरव्यू में कई जगह कहा भी है कि अब कलावाद नए तौर से संगठित हो रहा है तो इसका मुकाबला करने के लिए अंतर्वस्तु पर जोर देना ज्यादा जरूरी है।...कहीं-कहीं इसका उलटा भी मेरे खयाल से हुआ है, जैसे ‘कविता के नए प्रतिमान’ में श्रीकांत वर्मा तो बहुत महत्त्व पा गए हैं, लेकिन केदारनाथ अग्रवाल की लगभग चर्चा ही नहीं है। रामविलास जी के यहाँ मुक्तिबोध इसलिए उपेक्षित हैं कि वहाँ रूप का झमेला है और आप केदारनाथ अग्रवाल को इसलिए एक किनारे कर देते हैं कि ये सीधे-सादे कवि हैं, इनमें कोई उलझाव नहीं है।...तो क्या इस पूरे चक्कर में कवियों के साथ कुछ खामखा बेइंसाफी नहीं हो जाती?”
सवाल सुनकर नामवर जी एक क्षण के लिए रुके। फिर कुछ सोचते हुए से बोले, “केदारनाथ अग्रवाल के बारे में मैं आपको बताऊँ, प्रकाश जी, कि मैं उनकी कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ। मेरी जो किताब ‘आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ’ हैं, उसमें प्रगतिवाद वाले खंड में केदारनाथ अग्रवाल की प्रमुखता से चर्चा है। वे मेरे बहुत पुराने मित्र हैं और उनसे मेरा लगातार पत्र-व्यवहार भी चलता रहा है।...मेरी यह इच्छा भी रही है कि उन पर मैं अलग से स्वतंत्र रूप से एक निबंध लिखूँ। वह अभी तक लिखा नहीं गया, यह अलग बात है।...मैं मानता हूँ, केदारनाथ अग्रवाल की उपेक्षा बहुत हुई है, लेकिन साथ ही यह भी तय है कि उनकी गलत ढंग से या गलत कारणों से प्रशंसा भी बहुत हुई है।...उनकी जिन कविताओं की ज्यादा प्रशंसा हुई, जिनमें सीधे-सीधे वक्तव्य या प्रगतिवाद का स्थूल रूप है, उसके बजाय मैं उनकी दूसरी कविताओं को ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानता हूँ...”
“प्रकृति की कविताएँ...? मैंने पूछा। फिर प्रश्न को और स्पष्ट करने की गरज से कहा, “उनके संग्रह ‘फूल नहीं, रंग बोलते हैं’ में प्रकृति—खासकर केन नदी को लेकर लिखी गई कुछ कविताएँ अद्भुत हैं...!”
नामवर जी ने मेरी बात से सहमति प्रकट की। बोले, “जी, प्रकृति को लेकर उनकी कुछ बहुत अच्छी कविताएँ हैं—केन नदी को लेकर अनूठी कविताएँ उनके यहाँ है। प्रेम को लेकर भी उन्होंने लिखा और अच्छा ही लिखा है...उन पर मैं अलग से एक स्वतंत्र लेख लिखना चाहता हूँ और यह काम जल्दी ही होगा। उसमें मैं ये सभी बातें उठाऊँगा—यानी आलोचनात्मक ढंग से उनके कवि-व्यक्तित्व, उसकी शक्ति और सीमाओं की परख की यह एक कोशिश होगी—एक अलग ढंग की कोशिश।...मेरी बेहुत सी आकांक्षाओं में से एक यह भी है।”

[6]

नामवर जी से मेरी यह बातचीत उस समय हुई, जब एक सदी ढलान पर थी और तेजी से अंत की ओर जा रही थी, और दूसरी जन्म के लिए प्रतीक्षारत थी। लगभग दो सदियों का यह मिलन स्थल था। इस मायने में यह एक चुनौती भरा समय था, कुछ रोमांचक और स्तब्धकारी भी।
इसकी चर्चा करते हुए मैंने कहा, “नामवर जी, हम समय के जिस दौर में हैं उससे एक सदी खत्म हो रही है और एक नई सदी जन्म लेने जा रही है।...तो नई सदी के आदमी का चेहरा क्या होगा या नई सदी में साहित्य और कलाओं का रूप आपके खयाल से क्या होगा? इस बारे में आपकी परिकल्पना...?”
इस पर नामवर जी थोड़ी व्यंग्यपूर्ण मुसकराहट के साथ बोले, “प्रकाश मनु जी, इतिहास मेरे लिए एक कैलेंडर नहीं है कि साल खत्म हुआ और उसे बदल दिया!...तो ऐसा नहीं है कि सन् दो हजार आते ही पिछला सब-कुछ खत्म हो जाए और नया आदमी, नया साहित्य, नई कलाएँ, धरती पर नजर आने लग जाएँ!” 
फिर कुछ क्षण रुककर सोचते हुए उन्होंने कहा, “यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि उन्नीसवीं सदी सन् 1900 में खत्म नहीं हो गई थी, वह खत्म हुई आगे चलकर 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के समय। तो इसी तरह बीसवीं सदी सन् 2000 में नहीं, 21वीं सदी में कही जाकर खत्म होगी।...हो सकता है, उसके दो दशकों बाद खत्म हो।...हो सकता है, इस बीच कोई ऐतिहासिक परिवर्तन लाने वाली घटना घटित हो, जिसके आघात से मनुष्य का विचार, चिंतन, जीवन-पद्धति और नियति ही बदल जाए, तो वह एक नए मनुष्य का जन्म होगा और नई सदी का भी।”
मैंने कहा, “डॉक्टर साहब, कहा तो जाता है कि पिछले कुछ समय में समय की रफ्तार इतनी तेज हुई है कि जितना परिवर्तन पिछले दो दशकों में हुआ है, उतना पिछले दो सौ सालों में नहीं हुआ!...तो इस लिहाज से जो समय हमारे सामने हैं, उससे आने वाले समय के बारे में हम क्या अंदाजा लगा सकते हैं?”
नामवर जी बोले, “हाँ, इधर के बीस-पच्चीस सालों में जो परिवर्तन आए हैं और जीवन का रूप और रंग-ढंग जैसे बदला है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हम एक अतिवादी दौर में जी रहे हैं। और जो लक्षण सामने हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी तो यह अतिवाद रुकता हुआ नहीं दीखता। यानी अभी कुछ समय और हम अतिवाद की ओर बढ़ेंगे और यह अतिवाद जीवन के किसी एक रूप में नहीं, तमाम रूपों में, तमाम शक्लों में फूटेगा। आगे चलकर शायद इन अतिवादों के आपसी संघट्ट से ही इनका शमन भी होगा, कुछ-कुछ वाद-विवाद वाली शैली में।...”
मैंने कहा, “तो नामवर जी, नई सदी को लेकर आपके मन में आशा ही ज्यादा है? या कि आशंकाएँ भी हैं?”
नामवर जी बोले, “नहीं, आशा ही मुझे ज्यादा दिखती है। इस मामले में मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ। अतिवाद आदमी को कभी-कभी खींच तो ले जाता है और उसमें एक दुर्वह आकर्षण भी है, लेकिन अतिवाद में आदमी ज्यादा समय रह नहीं सकता।”
विषय बदलते हुए मैंने एक बिल्कुल अलग तरह का सवाल उनसे पूछा, “एक सचेत और संवेदनशील लेखक होने के नाते जो समय या मौजूदा दौर हमारे सामने है, उस पर आपकी टिप्पणी?”
कुछ क्षण मौन रहकर नामवर जी बोले, ““एक आग का दरिया है और डूब के जाना है...!” कहते-कहते एक हलकी मुसकराहट नामवर जी के पान रँगे होंठों पर नजर आती है। मैं भी मुसकरा देता हूँ।

[7]

थोड़ी देर में अपने कागज-पत्तर समेटकर मैं उठ खड़ा होता हूँ। नामवर जी मुझे दरवाजे तक छोड़ने आते हैं। 
“आज तक मेरे कई इंटरव्यू हुए हैं, लेकिन इतनी देर तक मैं कभी नहीं बोला।...जो लंबे इंटरव्यू हुए हैं, वे कई किस्तों में हुए हैं।” नामवर जी सहजता से कहते हैं।
उस दिन नामवर जी के घर की सीढ़ियाँ उतरकर जब मैं फरीदाबाद की बस पकड़ने के लिए बढ़ रहा था तो अचानक हवा के तेज झोंके के साथ बहुत-कुछ पुराना ढह जाने और नए और विश्रांतिकारी अहसास से लबालब भर जाने जैसा कुछ महसूस हुआ। मेरा मन एकदम हलका और मुक्त था, और मैंने धीरे से फुसपुसाकर अपने आप से कहा, ‘आज का दिन एक बड़ी और आश्चयर्जनक उपलब्धि के रूप में मेरी जीवन कथा में हमेशा दर्ज रहेगा, क्योंकि आज मैंने नामवर जी से बातें की हैं!’
यों इसके बाद भी नामवर जी से बहुत मुलाकातें हुईं, उनकी स्मृतियाँ भी भीतर दर्ज हैं। शायद कभी लिखी जाएँ। पर उनसे हुई उस पहली जीवंत मुलाकात का असर कभी फीका नहीं हुआ। खासकर उनकी सहज आत्मीयता नहीं भूलती, जो पल भर में दूसरे को अपना बना लेती है, और निर्भय होकर एक अनौपचारिक संवाद के लिए न्योतती है। यहाँ तक कि बीच-बीच में दो-तीन बार उन्होंने कहा कि प्रकाश जी, ये बातें आज पहली बार इस बातचीत के क्रम में ही मुझे सूझी हैं। यह उनकी उदारता और बड़प्पन था, जिसने मुझे अभिभूत कर लिया।
और सबसे बड़ी बात तो यह कि नामवर जी बड़े, बहुत बड़े हैं। उनके नाम का आतंक ही बहुत था, पर एक पल के लिए भी उन्होंने मुझे लघुता का अहसास नहीं होने दिया। इसके बरक्स उन्होंने जिस तरह पहली मुलाकात में ही अपना हृदय मेरे आगे खोला और एक आत्मचेतस आलोचक के रूप में अपने असंतोष और चिंताओं में मुझे शामिल किया, वह मेरे जीवन के सबसे दुर्लभ और मूल्यवान अनुभवों में से है। उनकी सहज बतकही में भी एक आलोचक के रूप में उनकी अपार तेजस्विता और विद्वत्ता छिप नहीं पा रही थी, जिसे मैंने लगातार महसूस किया।
आज जब नामवर जी नहीं हैं, उनका होना कहीं ज्यादा समझ में आता है। एक आलोचक के रूप में हर क्षण रचना के साथ चल पाने की चुनौती और लगातार वाद-विवाद-संवाद के बीच बार-बार खुद को पुनर्नवा करने का उद्यम नामवर जी ऐसी खासियत है, जिसे भूल पाना असंभव है। और एक बड़े आलोचक के रूप में उनकी यह चिंता जितने उत्कट रूप में थी, और जीवन के आखिरी चरण तक रही, वैसा उदाहरण शायद ही कोई और मिले। नामवर जी यहाँ अन्यतम हैं और इसीलिए उनसे खुले संवाद का आनंद ही कुछ और था।
इस समय, जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, उनसे हुई बातें ही नहीं, उनके पान रँगे होंठों पर खेलती सहज मुसकान और भंगिमाएँ, कभी-कभी असंतोष, उदासी या व्यंग्य भी—और इस सबके बीच में बिजली की कौंध की तरह प्रकट होती तेजस्विता बार-बार मेरी स्मृतियों में उभरती है—किसी जीवंत फिल्म की तरह, और मैं एक क्षण के लिए अवाक सा रह जाता हूँ! 
नामवर जी आज भले ही न हों, पर एक बड़े आलोचक की सहज आभा और वाग्मिता के साथ वे मेरी स्मृतियों में बसे हैं, और हमेशा रहेंगे।
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प्रकाश मनु, 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: +91-9810602327, 
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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