“अहम” और “पर” का अहिंसक तात्पर्य

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


जीवन में जब अहंकार का अंधकार छाता है तो वह जीवन उस व्यक्ति का नहीं रह जाता। ऐसे व्यक्ति का जीवन अहंकार के वशीभूत हो जाता है जो उसके लिए बोझ बन जाता है। दुनिया में अहंकार के अनेक दृष्टांत हैं कि जिसने भी अहंकार पाला और उसका पतन हो गया। अहंकार आच्छादित होने के बाद व्यक्ति के अंतस में करुणा और प्रेम नहीं रह जाता। गोस्वामी तुलसीदास ने तो यहाँ तक लिख दिया है कि ‘नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं, प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं’। तुलसीदास जी ने प्रभुता को इसका कारण बताया है। धन, संपदा और ऐश्वर्य ऐसे कुछ साधन और अनुभूति हैं जिसे मनुष्य जीते ज़रूर है लेकिन अहंकार धीमे से इसके साथ दस्तक दे देता है और वह फिर व्यक्ति के सिर पर विकृति की तरह छाने लगता है। अहंकार जब बढ़ जाता है तो मनुष्य स्वयं के वश में नहीं होता।

स्व से पर की यात्रा साधक करते हैं। अहम् व्यक्ति के भीतर क्रोध, मोह, लोभ, इच्छाओं को प्रज्ज्वलित करते हैं जिससे जो व्यक्ति सहजमना था वह अपनी शक्ति में समाहित ही नहीं होता। उसकी इच्छाएँ और उसके भीतर के क्रूर मुदिता उसे जीने नहीं देतीं। वह सभी को हेय दृष्टि से देखता है। तुच्छ समझता है। अपने से कमतर उसे हर व्यक्ति, व्यवस्था लगने लगती है। उस पर प्रभुत्व का भूत सवार हो जाता है। अहम् की इस अनचाही किन्तु एक समय के बाद उस पर प्रभुत्व कायम कर लेने वाली प्रवृत्त्तियां व्यक्ति के लिए ही अब पीड़ा का कारण बनने लगती हैं। अहम् छोड़ ‘पर’ की इस पीड़ा को हमारे धर्माचार्यों ने समझा। हमारे ऋषि मुनियों ने समझा। इसकी विसंगतियों पर प्रकाश डाला। अहम् के साथ जीने वालों के भीतर भय की अनेक संभावनाएँ भी देखीं। उन्होंने महसूस किया कि यह अहम् व्यक्ति को खा जाता है। हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित अनेक दृष्टांत हमें बताते हैं कि अहम् ने उन्हें सबसे ज्यादा हानि पहुंचाई जिन्होंने अहम् को अपने जीवन में आने दिया। इसके उलट जिसे हम ‘पर’ के रूप में सोच रहे हैं, उससे उत्कर्ष हुआ। ‘पर’ की कामना करने वाले मनुष्य उदारमना, करुणानिधि, शीलवान कहलाए। ‘पर’ की चिंता वस्तुतः उदात्त लोग करते हैं। उन्हें प्रेम होता है अपने साथ जीने वाले लोगों के प्रति। वे जीवों की ही क्यों, प्रकृति की सभी चीजों को ईश्वर कृति मानते हैं, और वे सभी के कल्याण की कामना करते हैं। ‘पर’ की चिंता करने वाले लोग सह-अस्तित्व में विश्वास करते हैं। सह-अस्तित्व में विश्वास करने वाले सदैव प्रेम करते हैं। प्रेम वह जिसमें त्याग की भावना हो। प्रेम वह जो अपने हित के साथ दूसरों के हित को ज्यादा महत्व देता है। त्याग, प्रेम, उदात्त होना ही तो अहिंसक होना है। 

'मैं' जहाँ मिथ्या है और कल्याण जिसकी आधार भूमि वही ‘पर’ की चेतना है। औदार्य-स्वभाव, विनम्रता, पर दोष-दृष्टि का अभाव और परदु:खकातरता ईश्वरत्व की प्राप्ति के अचूक मंत्र हैं। इस प्रकार ‘पर’ की चिंता करने वाला तो ईश्वर के सन्निकट होता है। इसके विरुद्ध जाने वाले लोग विभिन्न प्रकार के दुखों के भागी बनते हैं। बुद्ध ने सदैव इस जीवन के दुख पर अधिक विचार किया। उनके द्वारा प्रतिपादित चार आर्य-सत्य इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। जो बुद्ध की संवेदना कि समझ सका वह वास्तव में बुद्ध को समझा है। उनके दुख संबंधी विचार की विवेचना अब होती है परन्तु बुद्ध ने अपने बुद्धत्व प्राप्ति से पहले इस दुख को चिह्नित कर लिया था। उसी दुःख की वास्तविकता को जानने के लिए उन्होंने सबकुछ त्याग दिया और फिर उनके अपने प्रकाशमान होने के बाद दिए गए सन्देश पूरी दुनिया के लिए प्रकाश ही बन कर आए। बुद्ध की यह सारी जीवन की खोज ही तो ‘पर’ के लिए चिंतन, मनन और उसके प्रकीर्णन की सच्ची कहानी है जिसके माध्यम से हम समझ सकते हैं कि पराकाष्ठा पर जाकर क्या ‘पर’ की समझ हो सकती है।

आम जीव इस ‘पर’ को समझने में देरी कर सकता है, नहीं भी समझ सकता है। आम जीव इसके बारे में अपनी अविवेकी समझ से इसको नहीं भी समझने की कोशिश भी करता है लेकिन एक वक्त होता है जिसका उदाहरण हम देना चाहेंगे, वह है किसी की मृत्यु के पश्चात् मृतक के साथ लोगों द्वारा की जाने वाली शव यात्रा। प्रायः लोग अपने लोगों, शुभचिंतकों और आत्मीयजन की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होते हैं। उस पूरे अंतराल में जब अहंकारी व्यक्ति हो, पैसे वाला हो, निर्धन हो या विनम्र, उसकी यात्रा में साथ जाने वाले शम्मिल होते हैं तो वे वापसी के समय या उस मृत व्यक्ति के अन्त्तिम क्रिया के समय इस बात को ज़रूर सोचते हैं कि जो हमने भ्रम पाल रखा है वह निरर्थक है। सबकी गति एक ही होनी है। मृत्यु-यात्रा में जाने वाला व्यक्ति जब एकांत में होता है तो उसके मन में बहुत से सवाल खुद से होते हैं। वे क्षण, वे सवाल, उसके बाद के चिंतन ‘पर’ के बारे में चिंता करने को उसे प्रेरित करते हैं। उस समय संग्रह करना, चोरी करना, भ्रष्ट आचरण के साथ जीवन जीने वाला व्यक्ति बहुत कुछ सोचता है। हालांकि कुछेक ऐसे भी हैं जो ऐसे बज्रपात वाले कठिन समय में भी अपने अहम् को नहीं छोड़ते। वे बुरा सा व्यवहार जारी रखते है। अपने षड्यंत्र में शामिल होते हैं। अपनी बुरी योजनाओं को पूर्ण करने के बारे में ही विचार करते हैं लेकिन जो जीवन में नैतिक हैं, संवेदनशील हैं, वे सोचते ज़रूर हैं। वे इस जगत के मित्थ्याडंबर को भलीभांति समझ जाते हैं। ‘अहम्’ दूर होने का एक स्थान मृत्यु-यात्रा भी बनती है। लेकिन यह तो अतिरेक की बातें हैं। सामान्य आदमी क्यों न ‘अहम्’ और पर के बारे में विचार करे?

हिन्दू सनातन परंपरा में एक श्रेष्ठ काव्य का सूत्रपात गीता के रूप में हुआ। गीता में निष्काम होने की बात की गयी। गीता में त्याग की बातें हुईं। गीता ने ‘अहम्’ और ‘पर’ की धारणा को भी बदल दिया। गीता में ईश्वर ने सबकुछ को ईश्वरीय बताया लेकिन ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग के माध्यम से कई ऐसी बारीकियों को रेखांकित किया जो हमें ‘अहम्’ और ‘पर’ की समझ स्थापित करने में मदद करती हैं। गीता के अलावा हमारे पास पञ्चतंत्र की ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं जो ‘अहम्’ और ‘पर’ के यथार्थ को स्पष्ट करती हैं। परदुःखकातरता है क्या, उसे बताती हैं। सत्य के अनुशीलन के लिए प्रेरित करती हैं और परोपकार के लिए हमें सदैव निमित्त बने रहने के लिए भी आग्रह करती हैं। यही अभीष्ट की साधना ही तो अहिंसा है। दूसरों तक अधिकतम सुख व प्रेम का प्रसार ही तो अहिंसक होना है। दूसरे के अस्तित्व को ही बनाये रखना ही तो अहिंसा है। हिंसा तो अपने प्रभुत्व के विस्तार के लिए होती है। ‘अहम्’ भाव रखने वाला हिंसा को प्रोत्साहित करता है और दूसरों के सुख की कामना किए बगैर आगे बढ़ने के लिए प्रयास करता है।

परदुःखकातरता को अपनाना उतना ही संयमित कर्म है जितना किसी धनुष को डोर से कसकर बांधना। सभी परदुःखकातर नहीं हो सकते। सभी इसे अपना भी नहीं सकते। इसीलिए हम अपने समाज में ऐसा प्रायः पाते हैं कि अहंकारी अधिक हैं। अहम् के साथ जीने वाले लोगों की संख्या बहुतायत है। गरीब के घर में जितने प्रकार के कष्ट होते हैं, अहंकारी उसे जानकार उसके दुःख को कम करने के लिए आगे नहीं आते बल्कि अपने तेवर में, अपने चालचलन में, और अपने व्यवहार में ऐसा दर्शाते हैं कि गरीब को उनके सामने जीने का अधिकार ही नहीं है। वे दरअसल, ऐसे व्यव्हार करने के साथ अपने भीतर की कुंठा को समाप्त करते हैं। अपने भीतर की पाश्विकता को प्रदर्शित कर रहे होते हैं। ‘पर’ की चिंता करने वाला व्यक्ति तो ‘पर’ में परमात्म का दर्शन करता है। वह दुष्टता कर ही नहीं सकता। विनम्र होगा और उसके स्वाभाव में ही मधुरता होगी। वह तो खुद का नहीं दूसरों की चिंता करता है। उसके लिए व्यक्ति से अधिक समष्टि महत्वपूर्ण होती है। यह समष्टिगत भावना का होना ही अहिंसक होने की कसौटी है। यह उपकार की भावना ही तो उसके करुणावान और शील होने की कसौटी है। वह अपने और पराये की पृथक्करण में विश्वास नहीं करता। उसके लिए हमारे शास्त्रोक्त सन्देश, समष्टिगत उन्नयन और भेदभाव की जगह समदर्शी होना, उसकी नैतिकता की कसौटी होती है इसलिए ‘पर’ के भाव को समझना उसका बोध होना और परदुखकातरता को आचरण में समायोजित करना त्यागी लोगों के वश में होता है, सामान्य लोग ऐसा करने से विचलित होने लगते हैं। इसीलिए मानवता के मूल में ही परदुखकातरता की व्याप्ति आचार्यगण या संतजन मानते हैं।

आवश्यकता आज इस बात की है कि अहिंसक होने के लिए सर्वप्रथम सर्वहितकारी होने की आत्मशक्ति व्यक्ति के भीतर स्थापित हो और वह इसके विभेद को भलीप्रकार करके सबमें खुद को देखने की इच्छा जागृत करे। यही मंत्र तो हमें हमारे अहंकार को समाप्त करेंगे और ‘अहम्’ से ‘पर’ की ओर बढ़ने का प्रथम चरण है। जैसे-जैसे व्यक्ति उदात्त होगा, वह पर-पीड़ा को समझेगा। परहित को समझेगा। निःसंदेह, यह एक अहिंसक व्यक्ति का श्रेयस्कर आभूषण है।

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