कहानी: कामवाली बाई

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


पन्द्रह अगस्त का दिन। राष्ट्रीय पर्व। स्वतंत्रता दिवस। गली-मुहल्ले से लेकर हर चौक-चौराहे में प्रभात-फेरियाँ चल रही हैं। देशभक्ति गीतों और जयकारों से कॉलोनी का कोना-कोना गुंजायमान है और इन गूँजते हुए स्वरों के बीच शशांक चालीस वर्ष पहले की अपनी स्मृतियों में लौट आया है। उन स्मृतियों में उसने देखा कि उसका बालसखा और सहपाठी गुरुवचन भारतमाता की जय, स्वतंत्रता दिवस जिंदाबाद, सबसे प्यारा तिरंगा हमारा जैसे नारे लगाता हुआ हाथ में कागज का छोटा-सा तिरंगा और कागज का ही तिरंगे छापवाली टोपी पहने पूरी कॉलोनी में गर्व से सीना ताने घूम गया। स्वतंत्रता दिवस क्या है? आजादी किसे कहते हैं ? शायद उस अबोध गुरुवचन को मालूम नहीं है। गुरुवचन ने स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर लोगों को कॉलोनी में प्रभात-फेरी करते हुए देखा तो उसने उसका अनुकरण किया। लेकिन, उसके इस अनुकरण में भी गजब का उत्साह, जोश और शक्ति थी। इस समय अन्य लोगों की तरह उसका भी सीना गर्व से चौड़ा था क्योंकि कल ही उसने अपने स्कूल के वर्ग-शिक्षक से सुना था कि आज ही के दिन अंग्रेजों की गुलामी से इस देश को मुक्ति मिली थी और देश आजाद हुआ था। वह कॉलोनी के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय में तीसरी कक्षा का छात्र था। सरकारी संस्थानों और स्कूलों में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी स्वतंत्रता दिवस बड़े धूम-धाम से मनाया जा रहा था। प्रभात-फेरी के बाद वह भी अपने स्कूल के झंडोत्तोलन कार्यक्रम में शामिल हुआ। झंडोत्तोलन के उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत रंगा-रंग कार्यक्रम हुए। बच्चों ने राष्ट्रीय गीत गाए। गुरुवचन को भी एक गीत गाने का अवसर मिला, जिसके बोल थे- 
आजादी की खुली हवा में, निकले सीना तान के,
हम बच्चे हिन्दुस्तान के। हम बच्चे हिन्दुस्तान के।।
गुरुवचन के गायन की तान में गजब की लोच और सुरीली आवाज में अंतर्मन को छू लेनेवाला जादू था, जिसने उपस्थित जन-समूह को मंत्र-मुग्ध कर दिया था। अनगढ़ गुरुवचन के जादुई आवाज से सभी आश्चर्यचकित थे। गायन समाप्त होते ही उपस्थित जन-समूह ने तालियों की गड़गड़ाहट से न केवल गुरुवचन का स्वागत किया बल्कि पूरी भीड़ को यह महसूस हुआ कि हमारे पूर्वजों ने कितनी कुर्बानियों के बाद इसे हासिल किया है। प्रधानाचार्य के द्वारा गुरुवचन को उसकी शानदार प्रस्तुति पर खास तौर से पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार पाकर गुरुवचन गर्वित महसूस कर रहा था।
समय के साथ गुरुवचन कॉलोनी की झोपड़पट्टी में बड़ा हुआ। उसकी माँ कॉलोनी में झाडू-पोछा करती थी और पिता अपार्टमेंट में गार्ड थे। अभाव और गरीबी के कारण समय से पहले उसकी पढ़ाई छूट गयी। मिडिल से आगे वह नहीं पढ़ सका। इक्कीस वर्ष का होते-होते उसकी शादी मालती नाम की एक सुंदर-सुशील कन्या से हो गयी। उसे अपना घर सम्हालना पड़ा। माता-पिता के अशक्त होने के बाद उनके कार्य का दायित्व गुरुवचन और मालती को उत्तराधिकार के रूप में मिला। दायित्व सम्हालते ही वह मालती से कामवाली बाई हो गयी। जीवन की गाड़ी खींचते हुए कब उन दोनों की जवानी बीत गयी और वे युवा से अधेड़ हो गए, पता नहीं चला।
साथ जीते और मेहनत करते हुए मालती और गुरुवचन को दो बेटे प्रतीक और पल्लव तथा एक बेटी सुनीति हुई। वे जब स्कूल जाने योग्य हुए तो उन्हें कॉलोनी के ही सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया। कामवाली बाई मालती यह जानती थी कि सरकारी विद्यालयों की दशा शोचनीय है। शिक्षा देने की पद्धति में गिरावट और गुणवत्ता में भारी कमी है। किंतु, वह यह भी जानती है कि सरकारी स्कूलों में योग्य शिक्षकों की कमी नहीं है। वे हैं, पर उन्हें शिक्षा देने के काम के साथ-साथ ढेर सारे काम सौंप दिये जाते हैं। मालती के दोनों बेटे और बेटी मेधावी और परिश्रमी थे। मूलभूत सुविधाओं की कमी के बावजूद तीनों ही मैट्रिक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। शहर जाकर स्नातक किया। प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठे और अच्छी नौकरी में चले गए। नौकरी में आने के बाद बच्चे चाहते थे कि माँ-बाबूजी काम छोड़ दें और आराम करें। इसलिए बड़े बेटे प्रतीक ने कहा- माँ! अब आपकी उम्र काम करने की नहीं है। पापा भी अब गार्ड का काम करते-करते थकने लगे हैं। अच्छा होगा आप दोनों हमारे साथ रहें।
दूसरे बेटे पल्लव ने कहा- आप दोनों की सोच और मार्गदर्शन ने हमें यहाँ तक पहुँचाया है। हम आज जो कुछ भी हैं आपके आशीर्वाद से हैं। हमें आपका आशीर्वाद चाहिए।
बेटी सुनीति भावुक हो गयी- कुछ कहती उसके पहले ही आँखों में आँसू आ गए। केवल इतना कह पायी- माँ, मेरे साथ रहो।
अपने बच्चों से इतना लगाव पाकर मालती और गुरुवचन भावप्रवण हो गए। गला भर आया। रूंधे स्वर से मालती ने कहा- मेरे बच्चों, मैं तुम तीनों की भावनाओं का कद्र करती हूँ। अभी हम दोनों के स्वांग चल रहे हैं। इसी पेशे से हमने तुम्हें इतना योग्य अवश्य बनाया है कि तुम अपने-अपने पाँवों पर खड़े हो सको। पर, अभी हमें अपना काम करने दो। जबतक हम यह काम करेंगे, विश्वास रखो कि कॉलोनी में कोई नहीं जान पायेगा कि मेरे बच्चे नौकरी-पेशे में हैं। तुम सब बेफ्रिक होकर अपना-अपना दायित्व निभाओ। मेरा दूध कलंकित न हो, इसका ध्यान रखना। इतना कहकर मालती चुप हो गयी। माँ का मान रखने के लिए बच्चे अपने-अपने कार्य-स्थल में लौट गए।
शशांक ने बचपन से युवा होने तक मालती को अपने फ्लैट में झाडू-पोंछा करते हुए देखा है। वह उसी कॉलोनी में खेला और बड़ा हुआ है। युवा मालती को उसने दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह खटते हुए देखा है। यह उसका दुर्योग था कि एक काम के खत्म होते ही दूसरा काम उसके सामने आ जाता था। कई घरों में वह झाडू-पोछा से लेकर बर्तन मांजने तक का काम करती थी। इसलिए उसे सभी कामवाली बाई ही कहते थे। पूरी कॉलोनी में वह मालती से कम और कामवाली बाई के नाम से ज्यादा जानी-पहचानी जाती थी। सभी उसे कामवाली बाई के नाम से ही पुकारते थे। कई तो उसका नाम तक नहीं जानते थे। हर घर के लिए उसने काम का समय तय कर रखा था। इतनी मेहनत के बावजूद महंगाई की मार के कारण उसके परिवारवालों को दो जून की रोटी ठीक से नसीब नहीं थी। शशांक अनुभव करता था कि यह इस देश की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का दोष है कि जो श्रमजीवी हैं, अथक श्रम और पसीना बहाते हैं, पसीना बहाने के बावजूद उनकी स्थिति फटेहाल है जबकि कुछ लोग ऐसे हैं जो बिना श्रम के मालामाल हैं। शशांक को लगता रहा है कि आखिर ऐसा क्यों है ? कि, एक आदमी अपने परिवारवालों का पेट भरने के लिए पसीने का मूल्य चुकाता है और दूसरा बैठे-ठाले मस्ती करता है।
मालती कोई बीस बरस से हर सुबह साढ़े पाँच बजे से कॉलोनी के कई घरों में झाडू-पोंछा से लेकर साफ-सफाई के काम में जुट जाती है। क्या जाड़ा, क्या गरमी और क्या बरसात- उसकी दैनंदिनी में कोई फर्क नहीं पड़ता है। शशांक ने प्रचंड गर्मी में पसीने से लथपथ और पसीने के सूख जाने के बाद लुनाईवाली सफेदी उसके सांवले चेहरे में पपड़ी की तरह जमते हुए देखा है, तो बरसात में भीगते हुए और जाड़े में केवल एक पतली-सी सूती साड़ी में ठंढ से ठिठुरते काम करते हुए भी देखा है। वह इतनी स्वाभिमानी थी कि जीने के लिए उसने दया जैसी भीख को कभी स्वीकार नहीं किया। यहाँ तक कि कोरोना जैसी महामारी के दौर में जब पूरे देश में लॉक-डाउन लगा था और कहीं आने-जाने पर भी बंदिश थी तो जैसे दुनिया के सारे कामगारों के लिए काम ठप्प हो गए थे, गरीब लोगों के लिए रोजी-रोटी की किल्लत हो गयी थी वैसे ही मालती की भी रोजी छिन गयी थी और वह एक तरह से बेरोजगार हो गयी थी। ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने किसी के आगे हाथ नहीं पसारा। जो थोड़ी-सी पूञ्जी और खाने के सामान थे, उसी से थोड़ा-थोड़ा करके गुजारा करना सीखा। किसी ने दयावश कुछ देने की कोशिश भी कि तो उसने स्पष्ट मना कर दिया। जिनके घरों में वह काम करती थी उनके जोर देने पर उनका आग्रह इस शर्त पर स्वीकार किया कि महामारी के समाप्त होने के बाद अपनी मजदूरी से इसे चुकता करेगी। इस महामारी से मालती जैसे करोड़ों लोगों के पेट पर मार पड़ी थी और पूरी दुनिया के कामगारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था। ऐसे हालात में जब किसी के पास काम नहीं, रोटी नहीं, पैसे नहीं तब शशांक और उनके कुछ साथी व  सामाजिक स्वयंसेवक मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह किये बिना आगे आये और संकट में घिरे लोगों को यथासंभव सहयोग किया। मालती के मुहल्ले में भुखमरी जैसे हालात थे। उन स्वयंसेवकों के साथ मालती आगे बढ़ी और संकट से घिरे लोगों के प्राण बचाये। राहत कार्य से लोगों के जीवन में थोड़ी स्थिरता तो आयी, पर यह भी ऊँट के मुँह में जीरा के समान ही था। शशांक ने देखा था कि बेबस कामगार-समाज अपनी जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में किस तरह लगा हुआ था। यह संयोग था कि कॉलोनी की झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवालों को वायरस ने अभी तक छुआ नहीं था। बावजूद इसके वे अपनी-अपनी झोपड़ियों में कैद रहने के लिए विवश थे। झोपड़-पट्टी के लोगों के लिए भूख से इतर जान बचाना पहली प्राथमिकता थी क्योंकि अगला संकट किस रूप में आयेगा कोई नहीं जानता था। जान है तो जहान है के तर्ज पर स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ कदम से कदम मिलाती हुई मालती पूरी तरह तत्पर और मुस्तैद थी। मालती का मानना था कि जैसे हमने भूख को हराने के लिए संघर्ष किया है, हम सामाजिक दूरी का पालन करके महामारी को भी हराने का प्रयत्न करेंगे। मास्क-सेनिटाइजर से लेकर वायरस से संघर्ष करने के जरूरी सामान व दवा के लिए वह शशांक और उनके साथी स्वयंसेवकों के संपर्क में रहती थी। अपनी सोच और अपने कौशल से मालती ने पूरे झुग्गी-झोपड़ीवासियों को वायरस की चपेट में आने से बचा लिया था। दो वर्षों की महामारी के दौर में लोग भूख से बिलबिलाये जरूर थे, पर मालती की सूझ-बूझ और तत्परता से किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ था।
मालती भले ही अकुशल कामगार थी, पर कॉलोनी का हर आदमी उसकी कर्मठता, कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी का कायल था। यही कारण है कि हर काम कराने वाले की चाहत होती थी कि मालती को वह अपने यहाँ काम पर रखे। कॉलोनी के बच्चे, बूढ़े स्त्रियाँ और पुरुष उसकी ईमानदारी से काम करने के जज्बे से परिचित थे। शशांक कॉलोनी वालों से कामवाली बाई के कर्म और श्रम की ओर इशारा करते हुए अक्सर उसकी प्रशंसा में कहता था कि ईमानदारी वैभव का मुँह नहीं जोहती। वह तो मेहनतकशों के पसीने पर किलकारियाँ मारती है। कामवाली बाई मालती की ईमानदारी के कई ऐसे किस्से हैं जो कॉलोनीवासियों के बीच सदैव चर्चा का विषय रहे हैं। मालती को काम करते हुए कई घरों में कितने ही रुपये व कीमती सामान गिरे हुए मिले जिसे उसने पलंग या टेबल पर रख दिया और गृहस्वामियों को बता दिया। एक बार की घटना तो शशांक की स्मृतियों में आज भी जीवंत है। उसके घर में काम करते हुए मालती को लाख-लाख रुपये के दो बंडल मिले। मालती ने उसे उठाकर तुरंत शशांक की माँ को दे दिये। शशांक की माँ कामवाली बाई की ईमानदारी देखकर आश्चर्यचकित-अचंभित थीं। ऐसी स्थिति में इतने रुपये देखकर किसी भी आदमी का ईमान डोल जाता क्योंकि यह चीज ही ऐसी है जिससे अच्छे-अच्छों के ईमान डोल जायें। पर, कामवाली बाई ने अपना ईमान नहीं डोलने दिया। कबीर की वाणी में जस के तस धर दीन्ही चदरिया। शशांक की माँ ने मालती की ईमानदारी के एवज में कुछ रुपयों का पुरस्कार देना भी चाहा तो उसने बड़ी विनम्रता से लेने से मना कर दिया। मालती ने कहा पैसा तो हाथ का मैल है मालकिन। आज किसी के पास है, कल किसी के पास होगा। मैं सिर्फ इतना जानती हूँ कि आदमी को ईमानदारी से जीना चाहिए। इसी में सच्ची शांति है। कामवाली बाई की इस ईमानदारी की चर्चा चंद घंटों में ही पूरी कॉलोनी में फैल गयी और वह महीनों तक चर्चा के केन्द्र में रही। कॉलोनी वालों के लिए उसने एक मिसाल पेश किया था, जो किंवदंती के रूप में आज भी प्रचलित है। 
मालती का पति गुरुवचन पास के ही एक अपार्टमेंट में गार्ड था। बचपन से ही वह हँसोड़ और दिलेर था। मालती की ईमानदारी की तरह उसके हास्य के किस्से भी दूर-दूर तक मशहूर थे। बाल्यकाल से ही नौटंकी के प्रति उसकी विशेष रुचि थी। मसखरे का अभिनय वह इतनी खूबी के साथ करता था कि लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे। पास-पड़ोस में पर्व-त्योहार के अवसर पर जब कभी नौटंकी होती थी तो नौटंकी में आधी भीड़ तो गुरुवचन के मसखरेपन को देखने के लिए ही आती थी, जिसमें सबसे अधिक संख्या महिलाओं की होती थी। महिलाएँ गुरुवचन का पार्ट देखने के लिए नाटक के सीन के खत्म होने का इंतजार करती थीं। सच तो यह है कि नौटंकी में महिलाओं का आकर्षण नाटक में कम और गुरुवचन के मसखरेपन में अधिक था। नाटक के चलने के समय प्रायः ही वे सो जाती थीं और सीन के खत्म होते ही जाग जाती थीं। उस दिन वैशाखी के अवसर पर आयोजित मेले में नौटंकी का आयोजन था। नौटंकी देखनेवालों की भारी भीड़ जमा थी। इसका एकमात्र आकर्षण गुरुवचन की कॉमेडी और उसका मसखरापन था। आधी रात बीत चुकी थी। नाटक देखते-देखते लोग ऊँघने लगे थे। नाटक-मंडली को लगा कि लोग अब ऊँघने लगे हैं तो सीन के खत्म होते ही उन्होंने मंच पर गुरुवचन को भेज दिया। गुरुवचन के मंच पर आते ही भीड़ में हलचल शुरु हो गयी। ऊँघती हुई महिलाएँ झटके में जाग उठीं। एक स्त्री ने दूसरी स्त्री को जगाते हुए कहा-
अरे, उठो-उठो, देखो गुरुवचन आ गया है।
दूसरी स्त्री आँख मलते हुए उठी। 
तीसरी ने गुरुवचन को मसखरे के रूप में देखा तो हँसकर कहने लगी- इसी को देखने के लिए तो इतनी रात तक डटी हुई हूँ।
स्त्रियों की देखा-देखी और हलचल से ऊँघते हुए पुरुष भी जाग गए।
गुरुवचन का मसखरे का अभिनय शुरु हुआ। सर्कस के जोकर की तरह लोगों को इतना हँसाया कि कुछ ही पलों में उसने उबाऊ माहौल को हँसी के फव्वारे में बदल दिया। उसके इस अभिनय की चर्चा कॉलोनी में बहुत दिनों तक होती रही। शशांक को लगता है कि गुरुवचन यदि थोड़ा भी पढ़ा-लिखा होता और उसे कोई गॉड-फादर मिला होता तो शायद वह चित्रपट की दुनिया में नामी कॉमेडियन होता।
शशांक को पाँच वर्ष पहले की एक घटना पुनः याद आ रही है। कॉलोनी के कुछ कामगारों ने गुरुवचन को सुझाव दिया कि वह उनके साथ काम करने के लिए पंजाब चले। ये कामगार प्रतिवर्ष सीजन में कृषि-कार्य हेतु पंजाब के शहरों में चले जाते थे और छह माह बाद लौट आते थे। गुरुवचन कामगारों के बहकावे में आ गया और गार्ड की नौकरी छोड़कर उन्हीं के साथ पंजाब इस सोच के साथ चल पड़ा कि वहाँ वह खूब मेहनत करेंगा और जो पैसा बचेगा उससे अपने लिए एक छोटा-सा घर बनायेगा। गुरुवचन और मालती का एक सपना अपने ‘घर’ का कई वर्षों से था। इसी सपने की वजह से मालती ने गुरुवचन को जाने भी दिया। गुरुवचन जैसे परिश्रमी कामगारों की पंजाब के ईंट-भट्ठा और कृषि-कार्य में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे वहाँ प्रवासी मजदूर कहलाते थे। काम के सिलसिले में बिहार-झारखंड-उत्तर प्रदेश के हजारों मजदूर प्रतिवर्ष पंजाब आते हैं। यदि ये नहीं आयें तो पंजाब के कृषि-कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा। यह पंजाब के किसान भी जानते और मानते हैं। प्रवासी मजदूरों को यहाँ की स्थानीय भाषा में ‘भइया’ कहा जाता है। भइया इनके लिए आपसी संवाद में संबोधन है। समय के साथ अब ‘भइया’ शब्द प्रवासी मजदूरों के लिए रूढ़ हो गया है। फसल की बुआई-कटाई जैसे ही खत्म हुई, ये प्रवासी मजदूर लौट आते हैं। गुरुवचन भी प्रवासी मजदूर बनकर अमृतसर, पंजाब के नजदीक किसी गाँव में अपने साथियों के साथ गया। अमृतसर, पंजाब के मुख्य शहरों में है तथा पंजाब का एक पवित्र आध्यात्मिक शहर है। झेलम, चेनाब रावी, व्यास और सतलज इन पाँच नदियों की भूमि ही आज का पंजाब है। ये सभी नदियाँ सिंधु नदी की सहायक हैं जो एक साथ पंचनद देश यानी पंजाब का निर्माण करती हुई अंततः सिंधु से मिल कर अरब सागर में मिल जाती हैं। गुरुवचन जब यहाँ आया तो चार-पाँच दिनों तक पंजाब के कई नगरों में घूमता रहा। वह गुरदासपुर, भटिंडा, जालंधर, पठानकोट की नैसर्गिक सुंदरता और वहाँ की हरित-भूमि से काफी प्रभावित हुआ। यद्यपि वह बहुत पढ़ा-लिखा नहीं था तथापि प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण की शुचिता के प्रति उसमें काफी अनुराग था। अंत में वह अमृतसर आया। उसे अमृतसर ने सबसे अधिक प्रभावित किया। अपने स्कूली जीवन में वह जालियाँवाला बाग और गोल्डन टेंपल यानी पवित्र स्वर्ण-मंदिर के बारे में सुन रखा था। अतः अपना मत्था टेकने और अपनी मुरादों की खातिर गोल्डन टेंपल भी आया। बाद में खेतों में काम करते हुए उसने खूब मेहनत की। खेत का मालिक उसके श्रम से खुश था। कड़ी मेहनत करते हुए शाम होते-होते वह थक जाता था। अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी करते हुए उसने इस तरह का कठोर श्रम कभी नहीं किया था। अतः उसकी थकावट को दूर करने के लिए खेत-मालिक ने उसे थोड़ी-सी शराब की पेशकश की, जिसे खेत-मालिक स्वयं पीता था। गुरुवचन बचपन से ही नशापान का विरोधी था। इसी कारण उसने नशापान से साफ मना कर दिया। किंतु, खेत-मालिक भी शातिर खिलाड़ी था। वह जानता था कि यदि गुरुवचन ने पीना शुरु कर दिया तो वह दुगुने जोर से हाड़-तोड़ मेहनत करेगा। खेत-मालिक को तो अपने काम से मतलब था। इसलिए उसने गुरुवचन के साथियों को समझाया कि वह काम करते-करते थक जाता है। इसकी घरवाली भी यहाँ नहीं है जो इसकी सेवा-सुश्रूषा करेगी। थोड़ा पी लेगा तो आराम से सो पायेगा। उसने गुरुवचन के साथियों को लालच भी दिया कि यदि वे गुरुवचन को नशापान कराने में सफल होते हैं तो वह उन्हें बतौर इनाम भी कुछ देगा। इनाम के लालच में उसके साथियों ने बड़े प्रेम से घूँट-घूँट करके गुरुवचन को पिलाना शुरु किया। फिर तो छह महीने की इस छोटी अवधि में गुरुवचन को शराब की ऐसी लत लगी कि बिना पीये उसे नींद ही नहीं आती थी। वह पूरी तरह पियक्कड़ हो गया था। नशे के कारण अब उसे खेत में काम करने में भी दिक्कत होने लगी थी और धीरे-धीरे आलस्य ने उसके भीतर घर कर लिया था। अब गुरुवचन को न नहाने-खाने की चिंता थी और ना ही काम करने की। चारों पहर नशे में डूबा रहता था। खीझकर एक दिन खेत-मालिक ने उसके साथियों से कहा था- ई गुरुवचन नहांदां नहीं, खांदां नहीं। यानी यह नहाता नहीं, खाता नहीं, केवल पड़ा रहता है। अपनी इस बुरी आदत को लेकर गुरुवचन थोड़े दिनों में लौट आया।
गुरुवचन की इस हालत पर मालती खूब रोयी थी। उसे रह-रहकर अफसोस हो रहा था कि आखिर उसने गुरुवचन का जाने क्यों दिया ? मालती ने क्या सोचा था और क्या हो गया ? उसकी अपने घर की चाहत गुरुवचन को देखते ही काफूर हो गयी और सपना चूर-चूर हो गया। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। थोड़ी देर के बाद उसने खुद को संयत किया। गुरुवचन के शराबी बन जाने के बाद वह अपनी समस्याओं को जितना सुलझाने का प्रयत्न करती उतना ही उसमें उलझती जाती। पर, मालती में गजब का धैर्य था जो उसे साहस दिये हुए था।
समय ने पलटा खाया। मालती की कड़ी निगरानी और निरंतर उपचार से गुरुवचन के शराब की लत छूटी। अब तक मालती काम करते-करते थक चुकी थी। उसने काम छोड़ने का मन बनाया तो कॉलोनीवालों ने कामवाली बाई की कर्मठता, व्यवहार-कुशलता, निष्ठा और ईमानदारी के पुरस्कार के रूप में ‘सामाजिक सम्मान’ देने की घोषणा की। मालती को जिस दिन और जिस समय सम्मानित किया जा रहा था उस समय समारोह स्थल पर तीन गाड़ियाँ आकर रुकीं। उन गाड़ियों से दो जिलाधिकारी उतरे और एक पुलिस कप्तान उतरीं। तीनों ने मालती के पाँव छुए, पाँव के नीचे की मिट्टी को माथे पर तिलक किया और उपस्थित जनसमूह का अभिवादन करते हुए आभार व्यक्त किया कि उन्होंने कभी भी उसकी माँ के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया। कामवाली बाई के बच्चों को ओहदेदार पाकर सभी चकित थे। सबके चेहरे पर आश्चर्य-मिश्रित खुशी थी। कॉलोनीवालों के लिए यह क्षण किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं था। जनसमूह कामवाली बाई की सादगी और ऊँचाई देखकर अचंभित था। यह जानकर कि तीनों अधिकारी कामवाली बाई के बेटे-बेटी है, सभी के कंठ खुशी से अवरुद्ध थे। उन्हें अनुभूति हो रही थी मानो, कोई देवी कामवाली बाई का रूप धर कर वर्षों से उनके साथ रही हो। जाते हुए मालती और गुरुवचन ने अश्रुपूरित नयनों से सभी छोटे-बड़ों से प्रार्थना की कि यदि भूलवंश उनसे कभी कोई गलती हुई हो, तो वे क्षमा कर देंगे। कॉलोनीवाले दूर तक कामवाली बाई को जाते हुए देखते रहे, जबतक कि गाड़ियाँ नजरों से ओझल नहीं हो गयी। शशांक स्मृतियों में आते-जाते दृश्यों से आंतरिक सुख का अनुभव कर रहा था। आँखें बंद थीं, पर यादों का घोड़ा दौड़ता ही जा रहा था।

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