चार कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
(1) फूलों की घाटी में एक बच्चा
(एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाचते हुए बच्चों को देखकर)

सिर पर सुनहले फूलों का ताज
रंगारंग फूलों का गुलदस्ता
लिए हाथ में
आता है बच्चा

बच्चा
हाथ पकड़कर मुझे ले जाता है वहाँ
जहाँ इस धूसर दुनिया के भीतर
रंगों में खिलखिलाती एक और दुनिया है।

यहाँ तालाब हैं खूबसूरत और लहरें
और कमल और सीपियाँ और मछलियाँ
यहाँ रंगों के भीतर रंग हैं
परतों के भीतर और और परतें
यहाँ हवाएँ इठलाती, दरख्त झूमते
तितलियाँ नाचतीं
और फूल खिलखिलाते हैं

खिलखिलाता है
बरसों से दबा मुरझाया मन यहाँ
पुलक-पुलककर
मुसकराते हैं सितार पर नग्मे

यहाँ बच्चा एक रूप छोड़कर 
एक और रूप लेता है
फिर एक और रूप
हर बार कुछ नया, कुछ और और नया

लहरें
लहरों में मिलती हैं
कुछ और हो जाती हैं
हर बार रंगों की झलमलाहट और लय और नाद
कुछ ऐसे
कि जैसे दूर से ही शोर मचाता आता है वसंत।

अब ताल नदिया में है नदिया समुद्र में
बच्चा तैर रहा है नदी में, नदी से सुमुद्र
और लो,
बच्चा समुद्र में है
रंगों के समुद्र में गोते खा रहा है
और मुसकरा रहा है

और मैं हैरान
कि सितारों से भी अधिक चमकीली
हो चली है उसकी मुसकान
सुगंध से भी महीन उसकी काया
फूल से भी कोमल उसका स्पर्श
उसकी पहचान

बच्चे के होठों से
किरणीली मुसकानें फूटती हैं
फूटते हैं नई सदी के गाने
उसके गीतों में अजब सी तुतलाहट है
और कभी न जाने वाले वसंत की नरमी, 
वसंत की दस्तक

अजब सा आनंद है उसके गीतों में
जिसमें सारी की सारी दुनिया 
एक नए ढंग से खुलती है

और में देख रहा हूँ
पत्थर के बीच—पत्थर को
फोड़ता
अभी-अभी उगा है एक हरा पौधा
नहीं, तिनका हवाओं में थरथराता...
वह मैं हूँ!

और मैं फूलों की घाटियों में
उछाल दिया जाता हूँ
नृत्यरत खुशबुओं के बीच
जहाँ नामों और पहचानों से अलग एक दुनिया है
जहाँ मुझे खुद को नए सिरे से ढूँढ़ना है।
*

(2) चलो ऐसा करते हैं

चलो, ऐसा करते हैं
अपनी-अपनी पीठ पर से उतारकर
उम्र की गठरियाँ
बरसों का भारी बोझ
फिर से हो जाते हैं हलके और तरोताजा
हवा से खींचते हैं भरी-पूरी साँस
और हाथ में हाथ पकड़कर सामने के खुले मैदान 
में दौड़ लगाते हैं

दूर, इतनी दूर तक अँधेरे और उजाले की हदों को छू आते हैं
कि फिर कभी किसी के हाथ न आएँ,
कुछ नए ही अचंभों भरे क्षितिजों पर चले जाएँ
चलो, ऐसा करते हैं!

चलो, ऐसा करते हैं
सामने की सड़क पर से कुछ बढ़िया गोल
सुडौल कंकड़ बीनते हैं
और आज दिन भर कुछ और नहीं, बस गुट्टे खेलते हैं
नहीं, गुट्टे नहीं, पतंगें...
तुम्हें पतंग उड़ानी आती है सुनीता?
अच्छा, चलो छुड़ैया ही देना
इतना तो सिखाया ही होगा तुम्हें तुम्हारे बचपन ने!

या फिर तुम बताओ जरा तफसील से अपने बचपन के खेल
और मैं अपने
याद कर-कर के वही खेलते हैं

तुम्हें याद है एक होती थी पंचगुट्टी
ईंट के जरा-जरा से टुकड़ों पर टुकड़े जमाकर
तुमने खेली थी कभी
कभी गेंद मारकर गिराई थीं पंचगुट्टियाँ?
चलो, तनिक छोटी सी नीली एक गेंद ले आए
जो छूट गई थी कहीं बचपन में

चलो, आज वही खेलते हैं।

चलो, ऐसा करते हैं कि
धीमे-धीमे ताप से धीमी करते बातें
टहलते हैं
और टहलते-टहलते कहीं दूर निकल जाते हैं
समय की सारी सरहदें पीछे छोड़ जाते हैं

पीछे छोड़ जाते हैं दुनिया के सारे नियम 
और कायदे
और बौने लोगों की बौनी दुनिया के नुकसान और फायदे
किसी और दुनिया में चलते हैं जहाँ भाषा इतनी थकाने वाली न हो
लोग इतना अधिक बोलते और घूरते और
इधर-उधर सूँघते और किकियाते न हों
न हो इतने चिड़चिडे़पन का बोझ आत्मा पर
चलो कहीं चलते हैं।

चलो, ऐसा करते हैं कि घूमते-घामते
शहर से बाहर इतिहास के उस खँडहर में
आ जाते हैं
(राम जाने वह कोई किला था, महल या बावड़ी!)
उसकी सामने की जो उजड़ी हुई भीत है
चूने और ककैया ईंटों की
उस पर किसी गँवार बच्चे द्वारा उकेरी गई
बुढ़िया-बुड्ढे की शक्लों में
हम बदल जाते हैं
और वहीं टिककर बरसों जमाने के
हवा, पानी, धूप और मेंह का सामना करते हैं

वहीं देखते हैं काल को कालातीत होते
और फिर एकाएक मिट्टी के एक ढूह में बदलते
वहीं तुम मेरी ओर कोई छिपा इशारा
करके मुसकराना
मैं तुम्हें सुनाऊँगा किसी पुरानी सी
नज्म का कोई टुकड़ा
कोई शेर मीर कि गालिब का, अपनी पसंद का!

समय के साथ धीरे-धीरे खिरेगी दीवार
समय के साथ धीरे-धीरे हम ढहेंगे
और मिट्टी में मिट्टी होकर समा जाएँगे
घास में घास
पत्ती में पत्ती
आकाश में आकाश
धूप में धूप
और मेंह में मेंह होकर समा जाएँगे।

और फिर हम न होकर भी
इसी दुनिया में रहेंगे
इसे भीतर से सुंदर बनाएँगे।
*

(3) त्रिलोचन—एक बेढब संवाद

अजी त्रिलोचन जी
आज तो आदमी ही हैं कुछ विचित्र
अजीब—बड़े ही अजीब
और प्रगतिशील तो कहीं से भी नहीं
मैं फिर कहता हूँ साफ-साफ—प्रगतिशील तो
कहीं से भी नहीं, आई स्वेयर...!

सचमुच बड़े अजीब हैं आप
बहुत खँगालो तो भी झलकता नहीं कोई प्रोग्रेसिव तेवर
झल्लाई मुद्रा...
नहीं आग, अंगार विस्फोट कोई धमाका फाँ-फूँ
नहीं मार्क्स ऐंजेल्स समेत बड़े-बड़े नाम
कोटेशन उपजाते त्रास

बस योँ कि धीमी-धीमी धीमी-धीमी सी कुछ बातें
कभी-कभी जोश (हा-हा-कार)
जैसे जड़ें धँसती हैं चटियल जमीन में
कि जैसे जड़ों में
धँसता है पानी...!

पूछता हूँ उछलकर उन दिनों
का खाका
जब कई-कई दिनों तक चला फाका—
वह दौर कि भीख माँगते त्रिलोचन
को देखा जिसने कल...
फटा पजामा
कुरता तार-तार!

ऐसे बेजार वक्त के बारे में पूछता हूँ मैं
‘कैसे थे वे गर्दिश के दिन, बताइए न जरा!’
और लीजिए आप हैं कि एक मामूली से शब्द के
अर्थ की खींचतान में ही उलझ गए
और खींचते हैं तो
खीं...च...ते ही चले जाते हैं
कि उसकी अजीब लय-तान में
कभी कोई पेड़ कभी कोई बिरवा कभी
नागरी प्रचारिणी का प्रांगण कभी आमड़े का बौर
सब समा जाते हैं

यह क्या हुआ आपको कि आप तो पटरी
से ही उतरकर
चल दिए त्रिलोचन जी

यों भी चलते हैं आप जरा तेज-तेज
रुकिए, रुकिए तो जरा
ऐसे भला कैसे आएगा प्रगतिशील कवियों की
‘नई लिस्ट’ में नाम आपका...?

सुनिए!
सुनिए तो जरा—
देखिए, मेरी मुश्किल भी अजीब है
मैं तो आया हूँ लाल तमतमाया चेहरा देखने
जनपद के कवि का
बडे-बड़े बेडौल रक्त के दाग
सोचता था आप बड़ी शिकायतें करेंगे जमाने की
जरा सी फूँ-फाँ समकालीनों पर
और आप हैं कि मुसकराते हैं, बस मुसकराए जाते हैं

बेशक
आपकी वह खुली हुई
सादा आसमानों की सी हँसी लाजवाब!
मगर तेवर...
तेवर वहाँ कहाँ?
जो हम छुटभैयों को भाता है

कोई ढाई-तीन घंटे की मशक्कत के बाद
लौटा तो देखता हूँ
मुसकरा रहे हैं हरिपाल और गुस्सा
मेरी नाक पर :

हद्द है यार, गजब यह त्रिलोचन नाम का शख्स भी,
ये आदमी तो कहीं काबू में ही नहीं आता...!
नहीं खुश होता सुनकर प्रशंसा
नहीं निंदा से नाराज
जैसे-जैसे कहो, मान जाता है आसानी से
आपकी बात
और मुसकराता है यों ही खामखा!

कहो हरिपाल, कहो—
क्या माजरा है?
कहो त्रिलोचन के चहेते दोस्त, चित्रकार!

चलते हुए हरिपाल के कंधे पर रख देता हूँ सिर
आँखों में आसमान...
कि यक-ब-यक
उस साफ लंबी स्लेट पर खिंच आते हैं
मेरे ही कहे हुए शब्द
उछलते बौने!

शब्दों पर त्रिलोचन का हँसना
हँसते हुए से त्रिलोचन के जवाब
बड़ी उस्तादी
बड़े गंभीर उस्तादाना वार
सरल अपनाव...
(कि आह! मेरा गर्व
रास्ते की धूल में जा गिरता है)
.....................
.....................

कहता नहीं अब मैं पहले की तरह
कि वह कौन था त्रिलोचन लिखीं जिसने
कविताएँ प्रगतिशील
जनता के निर्धूम दुखों की
जो था
जो है जनपद का कवि...!

वक्त की राख के नीचे दबी है
जो आँच
बरसों से यों ही सुलगती
बहुत-बहुत मद्धिम फिर भी तेज!...
हरिपाल के साथ बैठे-बैठे टटोलता
रहा मैं
डूबती साँझ तलक।
*

(4) कुबेर की याद में

यह खिला हुआ फूल मैं तुम्हें भेंट करता हूँ 
कुबेरदत्त!
जिस दिन तुम गए उसी दिन यह खिला
पूरे जोम में पूरी लाली और रंगत के साथ
जैसे तुम थे मृत्यु की घाटी में अपनी यकबयक लंबी 
छलाँग के वक्त
अपनी पूरी रंगत और आब में—
कुबेरदत्त, यह खिला हुआ फूल मैं तुम्हें भेंट करता हूँ।

जानता हूँ जहाँ तुम गए हो वहाँ से कोई नहीं लौटता
पर तुम आओगे—यकीनन आओगे
जैसे रात के ग्यारह-बारह के बीच
फोन पर तुम्हारी आवाज—माफ करना, बड़े भाई,
आप डिस्टर्ब तो होगे पर मैं रह ही नहीं पाया
आ रही थी बहुत याद और बात थी कुछ ऐसी कि...!

आवाज में ऐसी नरमी और लज्जत
कि गुस्सा आए तो पानी हो जाए
और आदमी बहे तो कूल-किनारे तोड़कर
फिर बहता ही जाए

पता नहीं कौन बड़ा था कौन छोटा
पर तुम कहते थे तो मैं ही आहिस्ता से
बड़े वाले गद्दे पर बैठ जाता था
और सहेज लेता था जो कुछ उमड़ता था तुम्हारे भीतर
किसी खिले-अधखिले कविता के फूल की मानिंद
फिर चाहे नंदन जी का नजारा हो
या कलेवला के विष्णु खरे की उधेड़बुन।

बड़े भाई, नंदन जी तो एकदम हत्थे से उखड़ गए
ये सवाल सिर्फ तुम्हीं पूछ सकते थे बड़े भाई,
याद करेंगे नंदन जी भी कि किसी ने लिया था इंटरव्यू
कि उन्हें उतरना पड़ गया पानी में!

आवाज आवाज थी कि गुनगुने पानी का झरना
मालूम नहीं—
पर उसमें कोई हँसी की चटुल मछली उछली थी
कि फिर एकाएक गुड़ुप...
शराब थी कि बह रही थी फोन के तार और चोगे में
और मैं कितनी शराब कितनी संवेदना कितना भीतर तक
जला हुआ लहू—
इस हिसाब में वाबस्ता
घुल रहा था उस आवाज की नरमी में
जो मुझ तक आती थी फिर रुक-रुककर
घूँट भरने लगती थी
घूँट-घूँट जिंदगी को पिया जा रहा था
घूँट-घूँट मृत्यु छलछला रही थी।

और फिर आवाज में घुलता-छनता
खिला एक दिन कलेवला का काला फूल
कि उस कलेवला में विष्णु खरे के आजू-बाजू
औघड़ बाबा नागार्जुन सत्यार्थी त्रिलोचन
आल्हा-ऊदल सिंहासन बत्तीसी और न जाने कौन-कौन 
गल्प और महाकाव्य—
कैसा-कैसा जुड़ता चला गया मेला
और वहाँ लोक का वैभव था वैभव का धरती-आकाश।

वाह, एक मुकम्मल इंटरव्यू बड़े भाई, 
मुकम्मल एकदम
आह, मुझे कितना सुख मिला है आज की रिकार्डिंग में बड़े भाई
काश, मैं बता पाता!

आवाज एक समंदर थी
समंदर शराब और संवेदना से दहकता
समंदर छलक रहा था बार-बार फोन के चोगे से
मेरे छोटे-से कमरे में
कमरे के फर्श पर...
और भीग रहे थे छोटे-बड़े हम चारों प्राणी
और चीजें जो कमरे में थीं
और समंदर जो फर्श पर बह आया था
उससे लहरों पर हिलता-काँपता बन रहा था 
डब-डब एक चेहरा—
कुबेरदत्त!

कुबेरदत्त, फूल खिला है मेरे घर में
ठीक उसी दिन जिस दिन निगमबोध घाट पर
तुम्हें निःशेष होते देख मैं लौटा हूँ
लाल सुर्ख फूल यह गुड़हल का पूरे जोम में है
जैसे तुम थे अपनी सृजन-चेतना में पूरे रचे-बसे जब गए
इस फूल में धीरे-धीरे उतरते जा रहे हैं
बहुत खूबसूरत लिखाई वाले तुम्हारे कैप्शंस
खेल-खेल में बने तुम्हारे अमूर्त रेखांकन और कविता की पंक्तियाँ...

यह फूल अब धीरे-धीरे तुम्हारे चेहरे में बदलता जा रहा है 
कुबेरदत्त,
और चेहरा नहीं, आवाज—
भीतर किसी अनकहे सच को झकझोरती आवाज
जिसमें सारी दुनिया का गम है!

आवाज का चेहरा कि चेहरे की आवाज…?
एक लाल फूल अपने पूरे जोम में खिला हुआ
यह तुम हो कुबेरदत्त!

यह फूल मैं तुम्हें भेंट करता हूँ।

जानता हूँ, तुम अब नहीं रहे
पर तुम आओगे—आओगे जरूर,
जैसे आती है तुम्हारी आवाज कहीं भीतर से
आती रहेगी हमेशा-हमेशा उसी शिद्दत से।
*

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।