‘पथ सूना है तुम हो, हम हैं, आओ बात करें...!’

रामदरश मिश्र की कविताएँ, जिनमें जीवन का सच्चा दर्द और करुणा है
डॉ. रामदरश मिश्र

प्रकाश मनु


15 अगस्त को रामदरश जी का सौवाँ जन्मदिन था। एक ऐसे चैतन्य और कृती व्यक्तित्व का सौवाँ जन्मदिन, जिसने जीवन भर बस, लिखा, लिखा और लिखा। और इसके अलावा कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं पाली। देश के तमाम-तमाम मामूली लोगों की तरह खुद को एक सीधा-सादा, मामूली इनसान मानकर उन्होंने जीवन जिया, और जो जिया, जो देखा-भाला, भीतर तक महसूस किया, उसे पूरी आकुलता के साथ लिखा।

यों बरसों बीते। दशकों पर दशक गुजरते गए, और लिखते-लिखते जाने-अनजाने कब उन्होंने साहित्य के सबसे बड़े शिखर को छू लिया, इसका न उन्हें कुछ भान हुआ, न दूसरों को। वे साहित्य के हिमालय बन गए, पर बिना कोई भरम पाले वे लिखते रहे, और आज भी लिख रहे हैं।

आज भी वे एकदम चैतन्य होकर लिखते हैं, पढ़ते हैं और अपने बाद की पीढ़ियों से निरंतर संवाद भी साधते हैं। यहाँ तक कि एकदम नवोदितों से भी वे प्रसन्न होकर, और खूब धधाकर मिलते हैं, और उनका खूब हौसला बढ़ाते हैं।
रामदरश जी ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा, और हर विधा को अपनी रचनात्मकता के ताप से समृद्ध किया। खासकर उनके उपन्यासों की तो धूम रही। उनकी कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, डायरी, निबंध सभी अनूठे हैं। पर मूलतः तो वे कवि ही हैं, और स्वीकार भी करते हैं कि वे पहले कवि हैं, फिर कुछ और।
प्रकाश मनु
कहना न होगा कि रामदरश मिश्र हिंदी के एक बड़े कद के मूर्धन्य कवि हैं, जिन्होंने सही अर्थ में कविसिद्धता हासिल कर ली है। बेहद सीधे-सरल और सम्माननीय कवि। वे कविताएँ लिखते ही नहीं, कविताएँ जीते भी हैं। कविता उनका जीवन है, उनकी साँस-साँस में बसी है। इसलिए और कवियों की तरह कविता लिखने के लिए उन्हें किसी खास वातावरण या मूड की दरकार नहीं है। बल्कि कविता है जो उनके भीतर से बहती है, किसी झरने की तरह अजस्र झरती है, और जो कुछ उनके भीतर चलता है, वह सहज ही शब्दों में उतरता जाता है। इसीलिए रामदरश जी की कविताएँ केवल उनकी कविताएँ नहीं, बल्कि एक पूरे युग की कविताएँ हैं, समय की कविताएँ, जिनमें उनके समय का इतिहास अपने तमाम रंग-रूप और परिवर्तनों के साथ बहता चला जाता है।

रामदरश जी की कविता-यात्रा आज से कोई अस्सी बरस पहले शुरू हुई थी, और आज तक थमी नहीं है। उनकी कलम में एक गहरी प्यास, गहरी तड़प है वह सब कहने की, जो उन्होंने बड़ी विकलता के साथ अपने आसपास देखा-भाला और भीतर तक महसूस किया। किस्म-किस्म के अनुभवों से पगी अपनी सीधी, सहज जीवन–यात्रा में जो कुछ उन्होंने जिया, वह खुद-ब-खुद उनकी कविताओँ में ढलता जाता है, और वे कविताएँ इतने सहज रूप में सामने आती हैं कि हर किसी को वे अपनी, बिल्कुल अपनी कविताएँ लगती हैं। हजारों दिलों में वे दस्तक देती हैं और होंठ उन्हें गुनगुनाए बिना नहीं रह पाते।

आठ दशकों तक फैली रामदरश जी की सृजन-यात्रा कई मामलों में विरल है। इस बीच साहित्य की नदी में बहुत पानी बहा। बहुत कुछ बदला, बदलता चला गया। बहुत नाम उभरे, जिनकी चमक-दमक और शोरशराबे ने बहुतों को हैरान किया। पर उनमें से कइयों की लेखनी बहुत थोड़े समय में ही थकने लगी। दूसरी ओर, ऐसे लोग भी थे, जो मन की सच्चाई और आब के साथ सामने आए। रामदरश जी ऐसे सीधे-सच्चे लोगों को प्यार और अपनत्व बाँटते हुए आगे बढ़ते गए। और समय के साथ-साथ उनके लेखन की गति ही नहीं बढ़ी, बल्कि उसमें निरंतर निखार आता गया।

हालाँकि रामदरश जी ने सिर्फ कविताएँ ही नहीं लिखीं। उनका गद्य भी बहुत प्रभावशाली है। कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और आलोचना साहित्य—बहुत कुछ उन्होंने लिखा और हर विधा को अपनी लेखनी से समृद्ध किया। पर थोड़ा गौर से देखें तो इनमें भी उनके कवि रूप का ही विस्तार ही दिखाई पड़ता है। उनकी कहानियाँ हों या उपन्यास, संस्मरण हों या यात्रा-वृत्तांत, सबमें उनके कवि मन की उपस्थिति नजर आ जाती है। यहाँ तक कि उनकी आलोचना भी एक तरह की सर्जनात्मक आलोचना है, जिसे एक बड़ा सहृदय कवि ही लिख सकता है।
रामदरश जी की कविता से मेरा नाता दशकों पुराना है। याद पड़ता है, कोई पचास बरस पहले जब मैं साहित्य की जमीन पर डरते-डरते अपने कौतुक भरे पाँव रख रहा था, तब इसकी शुरूआत हुई थी अपने कस्बाई शहर की लाइब्रेरी में दस्तक देने से। उस लाइब्रेरी में निरंतर आवाजाही करते हुए जो भी अच्छी किताबें मिल सकीं, उन्हें पढ़कर मैं अपनी पसंद की चीजों को स्मृति में सँजो लेता। फिर उन साहित्यिक कृतियों को बार-बार मन ही मन दोहराना मेरे लिए बड़े आनंद की बात थी। उन्हीं दिनों मेरे हाथ लगी थी भारतीय ज्ञानपीठ से छपी नवगीतों की एक बेहतरीन पुस्तक ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’, जिसका संपादन चंद्रदेव सिंह ने किया था। इस नवगीत संचयन में बहुत अच्छे और एकदम अलग तरह के गीत थे, निराला से लेकर बहुत बाद तक के कवियों के।

मेरा खुद का मिजाज गीत का नहीं था। पर जाने क्यों इस संग्रह के बहुत-से गीत मन पर छा गए थे। उनमें केदारनाथ अग्रवाल, ठाकुरप्रसाद सिंह, नरेश सक्सेना और शलभ श्रीरामसिंह के गीतों के साथ-साथ रामदरश जी के भी कुछ गीत पढ़े थे, जिनमें एक गीत कुछ इस तरह मन में नक्श हुआ कि इतने बरसों बाद, आज भी उसकी स्मृति मन में धुँधली नहीं पड़ी। उस गीत के शुरुआती बोल थे, “उमड़ रही पुरवैया कुंतल-जाल सी, लहर रहे अंबर में काले-काले बदरा!”

इतना सुंदर, सघन और दृश्यात्मक गीत था यह कि लगता था, इसमें जीवन की प्राकृतिक सुंदरता अबाध बही चली आ रही है। एक साथ सुंदर, सुकुमार और उदात्त भी, और इसका भाषिक सौंदर्य और लय-विधान तो सचमुच आज भी मुझे ‘जादुई’ लगता है। इसे आज भी जब-तब मन में दोहरा लेना अच्छा लगता है—

हरी-हरी छाया वन में लहरा रही
धरती नभ में उड़ी-उड़ी जा रही,
झुके हुए घन बहे जा रहे व्योम में
झम-झम रस-बुँदिया में धरा नहा रही।
धूप लजीली उड़ी जा रही पाल-सी
गरज रहे सागर से छाया वाले बदरा,
उमड़ रही पुरवैया कुंतल-जाल सी
लहर रहे अंबर में काले-काले बदरा!

इस गीत को पढ़कर लगा था, किसी गीत में लोक-शैलियों का हलका-सा स्पर्श उसे कितना पुष्ट, मांसल और रसपूर्ण बना सकता है कि हम उसमें भीग जाएँ और साथ-साथ उड़ने लगें।

मुझ सरीखे एक नए-नए कस्बाई कवि का रामदरश जी से यह पहला परिचय था, जिसने उन्हें जानने तथा और-और जानने की खासी उत्कंठा मन में भर दी थी।

फिर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आया तो मैं आधुनिक कविता के सौंदर्यशास्त्र पर अपने शोधकार्य में उलझ गया। उस दौरान बहुत सारे कवि जिनकी बहुत चर्चा थी, पास आते गए और मैं उनसे परचता गया। रामदरश मिश्र कुछ पीछे छूट गए। शायद इसलिए कि न उनकी चर्चाओं का शोर कभी था और न उन्होंने कभी वैसा चाहा ही!

फिर एक लंबे अरसे बाद मैंने खुद को प्राध्यापक के रूप में एक कॉलेज में विद्यार्थियों को एक कविता पढ़ाते हुए पाया। एक लंबी कविता, जिसका शीर्षक था ‘साक्षात्कार’। कई दिनों तक वह कविता मेरे और विद्यार्थियों के बीच घूमती रही। कई दिनों तक मुझे लगता रहा कि इस कविता को पढ़ाते वक्त मेरे और विद्यार्थियों के बची कुछ ऐसा वातावरण निर्मित होता है, जिसमें जीवन की बड़ी से बड़ी सच्चाइयाँ और एक विराट हाहाकार धधकता हुआ चला आता है। और अकादमीय पढ़ाई की औपचारिकताएँ खुद-ब-खुद पीछे छूट जाती हैं! कविता के शब्द खुद-ब-खुद मेरे समय का एक आईना बनते जाते हैं, जिसमें कुछ भी छिपा नहीं रहता। चंदन वनों से लिपटे हुए साँपों का बिंब उसमें बार-बार आता है। धरती अनगिनता ऐंठे हुए कंठों, उलटी हुई नदियों, तालाबों और कुछ सपनों भरी ठंडी आँखों से पटी दिखाई देती है।

मुझे हैरानी हुई कि इतनी सख्त कविता जो इतने ज्यादा असुविधाजनक सवालों पर सवाल पूछती थी और हर किसी को भीतर से खँगालती थी, उसी कवि की लिखी हुई थी जिसने बरसों पहले अपना वह सुमधुर गीत लिखा था, जो बार-बार मेरी स्मृतियों में घुमड़ता था, “उमड़ रही पुरवैया कुंतल जाल-सी, लहर रहे अंबर में काले-काले बदरा...!” और तब मैं उस गीत से इस लंबी और बेहद खुरदरी कविता को जोड़कर देखने लगा। मुझे लगा, ये दोनों दो भिन्न मिजाज की चीजें हैं, पर यह जो बड़ी सख्त और यथार्थ की लंबी मार करने वाली कविता है, वह कहीं न कहीं उस गीत से ही निकलकर आ रही है। इसीलिए इसके शब्दों में एक बेधक सच्चाई है, जिससे आप आँख नहीं चुरा सकते। यह नई कविता दौर की उन तमाम कविताओं से अलग थी, जिनमें ‘पोस्चर’ ज्यादा और अंतर्भावना कम थी। यह अपने दुख को फुला-फुलाकर कहने वाली कलाबाजी से भी एकदम अलग कविता थी। और उसे गाँव का वही सादा आदमी लिख सकता था, जो मुलम्मों और नकली चमक-दमक के प्रलोभन में नहीं आता और चीजों को हर हाल में असली सूरत में देखना चाहता है—यानी हिंदुस्तानी जमीन का कवि, जनता का अपना कवि।

फिर तो रामदरश जी की कविताओं की एक खोज-यात्रा मेरे भीतर शुरू हुई। उनके कई संग्रह खोजकर पढ़े और लगा कि उनकी कविता-यात्रा मेरे भीतर तमाम-तमाम कवियों से परे एक अलग और विश्वसनीय पहचान बना रही है। यह एक सादा लेकिन आत्मविश्वासपूर्ण बड़े कवि की आभ्यंतरिक दुनिया की यात्रा थी, जो खुली आँखों से जिंदगी को देखता है और जिसे आसानी से धोखा नहीं दिया जा सकता, भरमाया भी नहीं जा सकता। वहाँ भाषा की फालतू चमक-दमक, चतुराइयाँ कम हैं, लेकिन भीतर का अहसास कहीं ज्यादा बड़ा, कहीं अधिक गहरा है और उससे मुँह चुराना मुश्किल है।

रामदरश जी को पढ़ते हुए पहला अहसास मन में यही जाता था कि यह कवि जो कह रहा है, वह सच कह रहा है—एक खरा सच। उस पर यकीन करो! और कोई कवि अगर यह विश्वास अर्जित कर लेता है, तो मैं समझता हूँ, उसने कवि होने की सिद्धता हासिल कर ली है! अलबत्ता उनमें से कुछ कविताएँ तनिक फीकी भी लग रही थीं, पर वे नि:संदेह वाग्वैग्ध्य वाली उन तमाम-तमाम कविताओं से अलग थीं, जो नई कविता के दौर में फैशन के तौर पर लिखी जाती थीं और जिनमें यह ढूँढ़ना पड़ता था कि यह अटरम-पटरम, ये लटके-झटके और आपकी विचित्र फूँ-फाँ—यह सब तो ठीक है, मगर यह तो बताइए जनाब, कि आप कहना क्या चाहते हैं! यह राहत की बात है कि जैसे रामदरश जी के यहाँ न लिखने का कारण जैसे नकली लेखकीय संकट नहीं हैं, वैसे ही अर्थ-न्यूनता की बेचारगी वाला यह कवियों का खुद का बनाया हुआ संकट भी नहीं है।

फिर जब चौदह खंडों में रामदरश जी की रचनावली निकली—बगैर किसी बाजे-गाजे, इश्तहार और शोर-शराबे के निकली तो बाकियों का तो नहीं पता, पर मेरे जैसे पाठक को फिर से उन्हें पढ़ने और दोहराने का सुख मिला। खासकर उनकी कविताओं के दोनों खंड तो मैं पूरे-पूरे पढ़ गया हूँ। और अब के पहले से कहीं ज्यादा विस्मित हूँ कि मैं इतना जानने के बाद भी, अपने समय के एक बड़े कवि को सचमुच कितना कम जानता हूँ।


[2]

रामदरश जी की सीधी-सादी लगने वाली कविता-यात्रा असल में इतनी सीधी-सहज भी नहीं है कि उसकी सिधाई के लिए आप उसकी उपेक्षा कर दें। गौर करें तो उसमें शक्ति और ऊर्जा के कुछ ऐसे उल्का-पिंड आपको तैरते नजर आ सकते हैं, जो बहुत चुपके से यह समझा जाते हैं कि रामदरश मिश्र का सीधा होना एक बड़ी काव्य-मेधा या कवि शख्सियत का, एक बड़ी सामर्थ्य से कमाया हुआ धीरज और संयम है, जिसके भीतर आपको काफी उथल-पुथल मिलेगी। रामदरश जी की इस कविता-यात्रा की शुरुआत खुद में खासी बुलंद रही होगी, यह उनके शुरुआती संग्रह ‘पथ के गीत’ के गीतों पर एक नजर डालते ही पता चल जाता है। ये गीत उनकी आगे की कविता-यात्रा की बड़ी तैयारी का पता देते हैं और उनमें ऐसे गीत भी हैं, जिनका मिजाज और रंगत गीतों के प्रचलित ढाँचे से एकदम अलग है।

संग्रह का पहला ही गीत “चल रहा हूँ, क्योंकि गति से पंथ का निर्माण होगा” कई मायनों में एक दमदार गीत है और उसे लिखते समय शायद रामदरश जी को भी यह आभास न होगा कि एक दिन उनका यह गीत चौदाह खंडों में छपी उनकी पूरी रचनावली का खुद-ब-खुद एक सटीक बिंब...या कहिए कि एक ‘सिगनेचर ट्यून’ बन जाएगा। चलते-चलते और अपने आत्मविश्वासपूर्ण कदमों से राह बनाते हुए भी रामदरश जी आज वहाँ आ गए हैं, जहाँ होना किसी रचनाकार की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा और अभिलाषा हो सकती है।

इसी से मिलता-जुलता एक और सुंदर गीत है, “क्षितिज की धूसर डगर पर एक जीवन चल रहा है” जिसमें कहीं न कहीं दुख और विषाद की एक हलकी सी छाया भी है। इसे एक प्रतीक के रूप में देखें, तो कल की धूसर डगर आज साफ हो चुकी है और तमाम निराशाओं, हताशाओं और संघर्ष-यात्राओं को अपने उत्कट धीरज से पार कर आए रामदरश जी को हम अपने बीच पूरे आत्मविश्वास के साथ उपस्थित पर रहे हैं, यह कहीं न कहीं हम सभी के लिए आस्था और गर्व की चीज है। अलबत्ता ‘पथ के गीत’ में शामिल कुछ गीतों, “संध्या में बादल डूबे हैं, मन डूबा सन्नाटे में...” या “खेतों की सिकुड़ी साड़ी में तिजहरिया अलसाई है...”, “मैं अषाढ़ का पहला बादल, मेरी राह न बाँधो”, “यह फागुन की रात रे, मन उड़-उड़ जाए” तथा एक और सुंदर गीत “डूब गया दिन धीरे-धीरे...!”—इन गीतों को याद कर लें, तो पता चलेगा कि रामदरश जी के कवि का निर्माण किस तरह के ईंट-पत्थर और गारे से हुआ है। और क्यों दिल्ली में इतने बरस रहने के बावजूद आज भी वे गाँव के हैं। गाँव उनमें और उनकी रचनाओं में किसी अक्षय-स्रोत ही नहीं, बल्कि प्राण-शक्ति की तरह बहता है।

रामदरश जी के ये गीत न तो छायावादी गीत हैं और न उत्तर-छायावादियों के-से कवि-सम्मेलनी गीत हैं। ये वे गीत हैं जिनमें गाँव अपनी पूरी लोक-संस्कृति, लोकगीतों, आख्यानों और सुख-दुख-अभाव के विविध रंगों के साथ मौजूद है। लिहाजा गीतों की उनकी राह भी कुछ अलग ही है, जो जल्दी ही यथार्थ के गझिन रंगों से मिलकर उन्हें नई कविता की ओर ले आई।


[3]

रामदरश जी के अगले कविता संग्रह ‘बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’ की खासियत यह है कि वह उनकी कविता-यात्रा का एक महत्वपूर्ण संधि-स्थल है और गीत और कविता के अनोखे मेल के कारण इसका अध्ययन साहित्य के किसी पाठक को खासा दिलचस्प लग सकता है। इसलिए कि इसे पढ़ना एक इतिहास को टटोलना है कि कैसे एक गीतकार खुद को कवि या कविताकार में बदल रहा है। नहीं शायद मैंने गलत कहा। असल में एक गीतकार कैसे खुद-ब-खुद अपने समय के भीतरी और बाहरी थपेड़े खा-खाकर कविताकार हुआ जा रहा है, ‘बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’ को पढ़ना इसका गवाह होना है। लिहाजा कहाँ-कहाँ गीत में कविता और कविता में गीत घुला-मिला है और कहाँ चलकर वे अलग होते हैं, मुझे कुछ-कुछ वैसा ही रहस्यमय और रोमांचक लगा, जैसे शायद इतिहास की कुछ अंतर्गुहाओं के भित्ति-शिल्प का अध्ययन करते हुए किसी इतिहास-प्रेमी या खोजी को लगेगा।

इस संग्रह में नि:संदेह ‘बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘नींव के पत्थर’, ‘देहाती टीसन’, ‘आत्मशोध’, ‘कालयात्री’, ‘निशान’ जैसी कुछ बढ़िया जानदार कविताएँ हैं। बेहद संवेदनात्मक कविताएँ, जो मिलकर वह नींव बनाती हैं जिस पर आगे चलकर रामदरश जी की कविता की पूरी इमारत खड़ी नजर आती है। लेकिन इस संग्रह में कुछेक ऐसी भोली, अल्हड़ कविताएँ भी हैं, जिनकी मसें अभी भीग रही हैं। कविता की तैयारी की कविताएँ। लेकिन दूसरी ओर इस संग्रह के गीत देखिए, तो उनमें कुछ ऐसी पूर्णता है कि उनकी सफाई और सुघराई आपको मोहे बगैर नहीं रहती! वहाँ सादगी ऐसी है कि उसका जादू सिर चढ़कर बोलता है, कुछ-कुछ मीर की गजलों की तरह। इनमें से एक गीत है—

तुम बिन कुछ खोया-खोया सा
कुछ सूना-सूना लगता है,
रीते घर का हर रीतापन
कुछ दूना-दूना लगता है।

ऐसे ही एक और गीत देखें। इसमें बगैर बादलों की चर्चा किए बादलों की बात उठाई गई है, बहुत खूबसूरती से—

आते घिर-घिर
जाते फिर-फिर,
धरती के आँगन में इनका
क्या जाने क्या छूट गया है।

संग्रह के एक और गीत में बहुत कम कहकर बहुत कुछ कह देने का लाघव है। बात फूलों की है, मगर फूल यहाँ जलते हैं—
जलते हैं फूल
घाटी में जलते हैं सेमल के फूल।

क्या ‘जलने’ की जगह कोई और शब्द आप सुझा सकते हैं? नहीं, यहाँ जलने की सुंदरता है, जिसे किसी सिद्ध गीतकार की आँख ही देख सकती है। और फिर एक और गीत पर हमारा ध्यान जाए बगैर नहीं रहता, जिसका उस्तादाना एक्सप्रेशन उसे एक बड़ी दार्शनिक ऊँचाई दे देता है—

यह भी दिन बीत गया,
पता नहीं जीवन का यह घड़ा,
एक बूँद भरा या कि एक बूँद रीत गया।

यानी अस्तित्व की निष्फलता और उदासी का गीत। मगर यही अस्तित्व की निष्फलता या उदासी जब किसी गाँव की स्त्री के दुख और आँसुओं से जुड़ती है, तो उसकी रंगत ही बदल जाती है। और गीत एक टेर की शक्ल ले लेता है, “बादल घेर-घेर मत बरस कि मेरे लाज-वसन डूबे।”

ये गीत देखने में सीधे, सरल लग सकते हैं, लेकिन मुझे कहने दीजिए कि इनकी सरलता कुछ-कुछ धोखेभरी सरलता है। इसलिए कि ये बहुत-कुछ सहकर, पचाकर और एक बड़ी काव्य-सामर्थ्य को हासिल करने के बाद लिखे गए गीत हैं। ये देखने में सरल इसीलिए लगते हैं क्योंकि एक सिद्ध कवि ने इस गीतों के दर्द को अपना, बिल्कुल अपना बनाकर लिखा है। ‘बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ’ की कविताएँ मैं नहीं कहता कि हलकी हैं, लेकिन उसके गीतों का कद उसमें शामिल कविताओं की तुलना में निस्संदेह बड़ा है।

हाँ, ये कविताएँ एक देहाती मन की झिझक के साथ-साथ बड़ी पुख्तगी से यह कहती लग सकती हैं कि रामदरश जी की कविताओं की यह गाड़ी जो आज ‘देहाती टीसन’ पर खड़ी है, कल हो सकता है राजधानी पहुँचे। मगर राजधानी पहुँचकर भी वह शहराती उतरन पहनने से इनकार करेगी और अपना ‘देसीपन का ठाट’ हर हाल में बचाए और बनाए रखेगी। और हम देखते हैं, यह चीज अक्षरश: सही साबित हुई।


[4]

‘पक गई है धूप’ में निस्संदेह रामदरश जी की काव्य-यात्रा के शुरुआती कच्चेपन की जगह एक तरह की पुष्टता और गांभीर्य नजर आने लगता है। इस लिहाज से ‘पक गई है धूप’ का मुहावरा रामदरश जी और उनकी काव्य-यात्रा पर इतना खरा उतरता है कि मैं चकित हूँ। इसमें ऐसी ढेरों कविताएँ हैं जिन्हें हिंदी की अच्छी और याद रह जाने वाले कविताओं में शामिल किया जा सकता है। इनमें भी कोई कोई दर्जन भर कविताएँ तो बेहतरीन और अद्वितीय हैं—अपने आप में एकदम मुकम्मल! यह रामदरश जी की रचना-यात्रा का समृद्ध काल है। एक भरा-पूरा यौवन!
संग्रह की पहली कविता ‘होने न होने के बीच’ ही नजर को पकड़ लेती हैं और बार-बार इसे पढ़े बगैर आप आगे नहीं जा सकते। लेकिन गौर करने की चीज यह है कि यह होना न होना किसी अस्तित्ववादी चिंतन की चिर-पहेली का-सा नहीं हैं, ‘टू बी आर नॉट टू बी...?’ न, नहीं! यह वो चीज नहीं है। यह उससे अलग है। यह एक सही आदमी के गलत जगह आ जाने की छटपटाहट है, अपने गलत ढंग से होने और इससे भी साफ शब्दों में कहूँ, तो गलत ढंग से समझे जाने की पीड़ा है। और कहीं न कहीं जैसा होना चाहिए, वैसा न हो पाने की मर्मांतक पीड़ा है। अगर मैं कहूँ कि यह रामदरश जी की अपनी पीड़ा है, निज का दर्द, जिसमें कहीं न कहीं उनकी आत्मकथा के पन्ने भी फड़फड़ाते नजर आ सकते हैं, तो कुछ गलत न होगा।

दूसरे शब्दों में कहें, तो वह गाँव और शहर के बीच का तनाव है। गाँव शहर में आकर कुछ ठिठक गया है, मगर गाँव अपने ठेठपने को भी हरगिज छोड़ने को तैयार नहीं है। और इस तरह अगर इसमें अस्तित्ववादी सोच की एकाध भूली-भटकी सोच है भी, तो वह भारतीय जमीन पर आकर, भारतीय सोच और बेचैनी के महासमुद्र में जा मिली है। ‘महासागर’, ‘आकाश में फसल लहलहा रही है’, ‘बाहर-भीतर’, ‘तलाश’, ‘एक और पृष्ठ’, ‘रचना’, ‘अजनबी’, ‘ठंडी हवाएँ’, ‘सुखी लोग’, ‘पक गई है धूप’ संग्रह में ऐसी एक से एक बेहतरीन कविताएँ हैं, जिनमें रामदरश जी का कविता गढ़ने का अपना मौलिक तरीका और औजार नजर आते हैं। हालाँकि “छाँह गलियों में भटकती है”, “एक बहकी हवा फागुन की” जैसी गीतात्मकता अभी बरकरार है जो मिश्र जी के अपने मुक्त स्वभाव की तरंग की तरह हमें अपने संग बहाए लिए जाती है।

यों इस संग्रह में ‘आकाश में फसल लहलहा रही है’ समेत कुछ और कविताएँ इसलिए भी याद की जा सकती हैं कि उनमें भारत-पाकिस्तान युद्ध और तबाही की बहुत उग्र छायाएँ मौजूद हैं और ये सचमुच एक दस्तावेज की तहर हैं। ‘मेरा आकाश’, ‘गाड़ी जा रही है’, ‘फिर वही लोग’ मिश्र जी की लंबी महत्त्वाकांक्षी कविताएँ हैं जिनमें उनके युवा मन की पूरी ऊर्जा और बेचैनी हमें नजर आती है। मगर एक खास तरह के धीरज, संयम और खुली दृष्टि के साथ।
इसके बाद के संग्रह ‘कंधे पर सूरज’ और ‘दिन एक नदी बन गया’ रामदरश जी की कविताओं के निस्संदेह बहुत अच्छे संग्रह हैं, जिनकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई है। उनकी रचना-यात्रा का यह शिखर-काल है। इन संग्रहों की दर्जनों ऐसी कविताएँ हैं, जिन्हें बार-बार उद्धृत किया गया है और जिनकी चर्चा के बगैर नई कविता या समकालीन कविता की व्याख्या पूरी नहीं हो सकती। ‘कंधे पर सूरज’ खुद में एक लाजवाब कविता है और उसे हिंदी की शीर्ष उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए। इसी संग्रह में ‘साक्षात्कार’ शीर्षक वह लंबी कविता है, जिसमें समकालीन जीवन-यात्रा के बहुत कठोर बिंब है, और जिसे पढ़ते हुए का समकालीन कविता का साठोत्तरी दौर हमारी आँखों के आगे कौंध जाता है। ‘गठरी’, ‘लौट आया हूँ मेरे देश’, ‘एक जंगल’, ‘वह इसी मौसम में आता है’, ‘छुट्टियों के दिन’, ‘बोध’ शीर्षक से लिखी गई छह कविताएँ, ‘अपने से अपने तक’, ‘रावण का पुतला’, ‘यही होना है’, ‘एक दिन’ इस संग्रह की बार-बार पढ़ी जाने लायक लाजवाब कविताएँ हैं।

इसी तरह ‘दिन एक नदी बन गया’ संग्रह की ‘सड़क’, ‘हम कहाँ हैं’, ‘एक दिन में दो दिन’, ‘धूप’, ‘राजधानी एक्सप्रेस’, ‘खोज’ ऐसी कविताएँ हैं जिनमें रामदरश जी का काव्य-मुहावरा अपने पूरे निखार और तेवर के साथ मौजूद है। हालाँकि इस दौर में भी “खो गई हैं सब यात्राएँ साथ की, रास्ता ही रास्ता अब रह गया” जैसी करुणा गूँजों और नाद वाले गीत उनके साथ चलते रहे और इससे उनकी कविता-यात्रा में कोई अंतर्विरोध नहीं, एक पुख्तगी और भीतरी रस ही जुड़ा।

हाँ, रामदरश जी अपने तमाम आलोचकों को, जो महज उन्हें ‘एक सीधा-सादा कवि’ कहकर एक छोटी पिटारी या खाने में डाल देना चाहते हैं, कभी-कभी बड़े मजे में खिलाते और हड़काते भी रहते हैं। ऐसे ‘श्रीमंत’ लोग कल्पना तक नहीं कर सकते कि रामदरश जी ‘मृत्युबोध’ जैसी कविताएँ भी लिख सकते हैं जो उनके फूले हुए अस्तित्ववादी पेट में बड़ी होशियारी से एक सूई चुभा देती है। और फिर ‘मृत्युबोध’ का विदेशी बोध पढ़े हुए प्यारेलाल का जो नाटक आँख के आगे आता है, वह सचमुच कमाल का है! ‘आनंद-बोध’ कविता में तो वे अपने आलोचकों और पाठकों दोनों को लगभग भौचक्का करते हुए ‘कुकुरमुत्ता’ के साथ एक ‘जुत्ता’ ले आते हैं, उससे अच्छे-अच्छों की साँस उखड़ सकती है, चेहरा फक्क हो सकता है। लगता है, निराला की ‘कुकुरमुत्ता’ कविता को उन्होंने थोड़ा और अर्थ-विस्तार दे दिया हो।

मैं समझता हूँ, रामदरश जी के हर आलोचक को आईने में अपना सही चेहरा देखने के लिए कम से कम एक बार जरूर यह कविता पढ़ लेनी चाहिए। इसलिए भी कि जो रामदरश जी को एक सूखा आदर्शवादी कवि कहते हैं, उन्हें पता चल जाए कि उनके भीतर हास्य-विनोद का कितना माद्दा है—

एक आलोचक को मिला एक पहना हुआ जुत्ता
खुश हुआ
मुफ्त मिल जाए तो क्या कमल, क्या कुकुरमुत्ता!
वहीं खड़ा था एक स्वामिभक्त प्राणी
उसे बुलाया, पुचकारा, पिलाई अमरवाणी—
‘देख प्यारे
तू खोटा है या खरा,
तू खाली है या भरा,
रोज-रोज थोड़ा-थोड़ा इस जूते को चाटा कर
और यहाँ से गुजरने वाले हर आदमी को काटा कर।’
तभी से
हर आने-जाने वाले को
(काट तो नहीं पाया) भूँक रहा है यह कुत्ता...!
जाहिर है, इस कविता में आलोचक से ज्यादा खबर साहित्य के उस ‘बौनों के संसार’ की ली गई, जिसका काम ‘एक’ के जूते चाटना और बहुतों को ‘काटना’ है। और कौन कहेगा कि यह सच नहीं है?


[5]

इससे आगे की रामदरश जी की काव्य-यात्रा जिसमें ‘जुलूस कहाँ जा रहा है’, ‘आग कुछ नहीं बोलती’, ‘बारिश में भीगते बच्चे’, ‘ऐसे में जब कभी’ और गजल-संग्रह ‘हँसी होंठ पर आँखें नम हैं’ शामिल हैं, रामदरश जी के प्रौढ़त्व की काव्य-यात्रा है, जिसमें उनकी कविता की दुनिया बहुत आश्चर्यजनक ढंग से फैलती गई है। आसपास की दुनिया का कोई छोटा से छोटा, मामूली से मामूली अनुभव भी वहाँ प्रवेश के लिए द्वार खटखटाकर दस्तक दे सकता है। मानो रामदरश जी दरशा देना चाहते हों कि अब उनकी कविता एक ऐसी बड़ी परिवारिकता का रूप लेती जा रही है, जिसमें हर शख्स उसी अधिकार से आकर बैठ और बतिया सकता है, जैसे वह उसका अपना घर हो! यह आकस्मिक नहीं कि इस दौर में रामदरश जी की कविता का बीज शब्द ‘घर’ है और उनके जिस काव्य-स्वर की गूँज-अनुगूँज उनकी इस दौर की पूरी काव्य-यात्रा में समाई हुई है, उसे अगर कहना हो, तो उन्हीं के गीत की एक पंक्ति उठानी पड़ेगी, “दिन डूबा, अब घर जाएँगे।”

यह जो घर जाना है, यह जो घर की ऊष्मा भरी पारिवारिकता है, और यह जो इस घर की पारिवारिकता में सारी दुनिया को परिवार बनाकर समा लेना है, इसे अपने दौर के दो बड़े लेखकों में मैंने बड़े आश्चर्यजनक ढंग से देखा। एक डॉ. रामदरश मिश्र, दूसरे डॉ. रामविलास शर्मा। दोनों दो भिन्न प्रकृति के लेखक, लेकिन यह जो घर की मर्यादा और आदर्श है, वह उनके महत् जीवन-आदर्शों में इस तरह घुल-मिल गया है कि उनकी शब्द-यात्रा लगातार अविचलित भाव से और-और बड़े शिखरों तक जाती रही है। इससे मालूम पड़ता है कि घर कोई छोटी चीज नहीं, बल्कि घर भी एक बड़ा आदर्श है और घर के आदर्शों को अपने ऊँचे जीवन-आदर्शों से एकाकार कर देने से ही किसी व्यक्ति या लेखक में वह भीतरी दृढ़ता आती है कि वह अटूट आस्था के साथ अंत तक चलता और आगे बढ़ता नजर आता है।

जाहिर है, इस दौर की रामदरश जी की सबसे अच्छी कविताएँ वे हैं, जो पत्नी, बच्चों, घर और आसपास को लेकर लिखी गई हैं। इस लिहाज से ‘आग कुछ नहीं बोलती’ संग्रह में ‘लड़की’ शीर्षक से लिखी गई आठ कविताएँ बहुत मार्मिक हैं और अपनी सादगी में अद्वितीय भी। ऐसी ही कुल छह लाइनों की एक छोटी-सी कविता यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ—

लड़का बड़ा हो रहा है
लड़की बड़ी हो रही है
लड़का धीरे-धीरे घर खाली कर रहा है
लड़की धीरे-धीरे घर भर रही है
लड़का डरा रहा है सड़कों-चौराहों को
लड़की स्वयं अपने से डर रही है।

कोई छह लाइनों की कविता भी कैसे एक मुकम्मल और भरी-पूरी कविता हो सकती है, इसका उदाहरण देना हो तो इससे अच्छी कितनी कविताएँ मिलेगी आपको?

ऐसे ही ‘तुम्हारी हँसी’ की घुटरुओं चलती यह छोटी-सी बच्ची नहीं भूलती, जो दिन भर की उदासी का कलेजा चाक कर देती हैं और आकाश में चाँदनी निकल आती है। ‘बारिश में भीगते बच्चे’ की ‘घर’ शीर्षक से लिखी गई पाँच कविताएँ या ‘संकु’ के लिए लिखी गई कविता भी ऐसी ही आत्मीय हैं। ‘आग कुछ नहीं बोलती’ संग्रह की ‘मकान’ कविता अपना घर होने का एक और अर्थ खोलती है। सीमेंट और ईंटों से बने इस मकान में जमीन का एक टूकड़ा खाली छूटा हुआ है, जहाँ नीबू का एक छोटा-सा पेड़ और तुलसी का बिरवा है। इसी से यह मकान, मकान न रहकर ‘घर’ हो जाता है।

इसी तरह ‘जुलूस कहाँ जा रहा है’ की ‘औरत’ कविता स्त्री होने के कितने बड़े अर्थ और अस्तित्व को खोलती है, यह इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है। पूरा घर उसकी लय पर चलता है। सभी के सुखों, हँसी-मुसकराहट और गुनगुनाहटों की नींव में वह है। चरखे की तरह वह रात-दिन चलती रहती है। सबके साथ हँसती है और अपने एकांत में बहुत हलके से अपनी कराह को दबा लेती है। सबके होने के पीछे असल में इस औरत का होना ही है। मगर इस औरत के होने को सचमुच किसने महसूस किया है! ‘अकेला कबीर’, ‘रूपांतर’, ‘बात’, ‘तुमने क्यों कहा’, ‘बड़प्पन’, ‘हम दोनों’, ‘कट-फटे पृष्ठ’, ‘गोली’, ‘आलोचक’, ‘चिट्ठियाँ’, ‘माइक’, ‘धर्म’ इस दौर की रामदरश जी की वे कविताएँ हैं, जिनमें बगैर ‘लाउड’ हुए जीवन की बड़ी से बड़ी विसंगतियों को मानो वे खेल-खेल में कह जाते हैं। यह वह दौर है, जबकि उनका गुस्सा, आक्रोश, दर्द, सब-कुछ एक तरह की संजीदगी में ढल गया है। और इनका आस्वाद कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे धरती से जन्म लेने वाले लोकगीतों और लोकाख्यानों का रहा होगा, जिनमें एक भीतर की गहराई खुद-ब-खुद आती चली जाती है।

मजे की बात यह है कि इस दौर में रामदरश जी ने बहुत-सी गजलें भी लिखीं और इनमें कुछ तो इतनी सुघड़ और कामयाब हैं कि लगता है उनके गीतकार का ही एक नया कायाकल्प एक गजलकार के रूप में हुआ है। इसीलिए जब वे कहते हैं—

हम हैं तुम हो, तुम हो हम हैं,
छोटे-छोटे सुख क्या कम हैं!

तो इस गजल में उनके गीत का दर्द समाया हुआ सा लगता है। लेकिन हाँ, उनके गीतकार की तुलना में उनके इस गजलकार-रूप में मार करने और कभी-कभी शरारती अंदाज में थका डालने का साहस कहीं बड़ा है। मसलन, “सुनेंगे आप जहाँ तक कथा सुनाएँगे, नहीं तो जाके अकेले में गुनगुनाएँगे।” मगर कभी-कभी वे इस बात को पलटकर कहते हैं और जिसे सुनाना होता है, उसे कुछ इस तरह और बेधड़क अंदाज में सुनाते हैं कि दाँतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती है। सिर्फ चार शेर की उनकी एक गजल है। जरा मुलाहिजा फरमाइए—

यह न सोचिए कि आपको सुना रहा हूँ मैं,
बैठे-बैठे यूँ ही जरा गुनगुना रहा हूँ मैं।

रूठ-सा गया है गीत आपकी दुआ से जो,
धीरे-धीरे उसे प्यार से मना रहा हूँ मैं।

पूछते हैं आप, कब तलक न कुछ करोगे तुम,
देखते नहीं हैं, एक बार घर बना रहा हूँ मैं।

आपने जमा किया जो दर्द मेरे नाम से,
काट-काट आँसुओं के चेक भुना रहा हूँ मैं।

मगर इसी के बीच उदासी की एक लहर भी छिड़ जाती है, जब वे देखते हैं कि जो कभी साथ थे, वे अब एक-एक कर विदा हो रहे हैं—

एक-एक जा रहे हैं सभी,
मन बड़ा अकेला लगता है।

इस दौर में रामदरश जी की कई ऐसी कविताएँ हैं, जिनमें अपनी बात को खरे ढंग से कहने का साहस और बोल्डनेस बढ़ी है और वे बिना ‘किंतु-परंतु’ के अपराधी को अपराधी कहने के लिए जैसे विकल हो उठी हों! मसलन ‘बड़प्पन : दो कविताएँ’ में वे उस लेखक के बड़प्पन पर हँसते हैं, जो जहाँ कहीं जाता है, चाहे किसी शोक-सभा में ही, अगली पंक्ति की कुर्सी खोजता है और इस बात के लिए बेचैन रहता है कि पहली प्रतिक्रिया उसकी आनी चाहिए।

‘हम दोनों’ में गाँव से एक ही साथ चले, धूलभरी पगडंडियों से गुजरते हुए शहर आए दो लेखक हैं। इनमें एक जो गाँव को सदा जीता रहा, उसे पहचानने में आपको दिक्कत नहीं होती। ये रामदरश जी हैं। और दूसरा? पहचान आप उसे भी लेंगे, जिसकी नजर अट्टालिका और सत्ता के ऊँचे सिंहासनों पर है। शहर में आकर गाँव से सबसे पहले उसने अपने आपको मुक्त किया। लेकिन जब गाँव के लेखक होने पर जै-जैकार की बारी आई, तो वहाँ भी वह सबसे पहले गाँव के आदमी का अभिनय करता हुआ दिखाई देता है। और यों, “शहर तथा गाँव दोनों उसके पाँव के नीचे आ गए हैं।” मगर क्या सचमुच आ गए हैं?

इसी तरह ‘तुमने क्यों कहा’ और ‘मुट्ठियाँ’ में छद्म मार्क्सवादियों पर प्रहार है। नए-नए ठनठनाते हुए उत्तर-आधुनिकों पर भी, जो अब मानने लगे हैं कि, “अब सत्य को जोड़कर नहीं, तोड़कर कहा जा सकता है।” और इस ‘तोड़ा-तोड़ी मैं और कुछ होता है या नहीं, मगर खुद वे अपने लिए बहुत-कुछ जोड़ लेते हैं।’ हाँ, एक बात साफ कर दूँ। यह जो रामदरश जी का बेझिझक आगे आकर मार करना है, यह उनके स्वभाव में नहीं है। उनका स्वभाव तो है सहना। सहना और सहते-सहते अपनी बात कहते रहना। लेकिन अगर आज उन्हें आगे आकर इतनी बेधक सच्चाई के साथ अपन बात कहनी पड़ रही है, तो इसका मतलब एक सहनशील आदमी की हदों का टूटना है—और इसमें आज के साहित्यिक माहौल का एक बेतरह कड़वा सच भी छिपा हुआ है, जिसे आज बहुत लोग महसूस कर रहे हैं।
सच पूछिए तो रामदरश जी के भीतर कहीं न कहीं इस बात की गहरी विकलता है कि हमारा आज का साहित्यिक माहौल फिर से निर्मल और प्रीतिमय हो। ताकि पूरे समाज में वह प्राण संचरित कर सके और लोग पहले की तरह गहरे आकर्षण के साथ उससे जुड़कर आनंदित हों। साथ ही आस्था, ऊर्जा और जीवन शक्ति हासिल करें।


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इसके बाद आए रामदरश जी के कविता संग्रह ‘आम के पत्ते’ (2004), ‘आग की हँसी’ (2012) और ‘मैं तो यहाँ हूँ’ (2015) उनकी उस सिद्धावस्था की कविताएँ हैं, जिसे चतुर्दिक सम्मान मिला। इनमें ‘आम के पत्ते’, जिस पर रामदरश जी को व्यास सम्मान भी मिला है, कई मायनों में उत्कृष्ट संग्रह है, और उनकी पूरी काव्य-यात्रा की चुनिंदा कविताओं का संग्रह तैयार करना हो, तो संभवतः ‘आम के पते’ की सर्वाधिक कविताओं को आपको सहेजना होगा। खासकर इस संग्रह में मेज, कुर्सी, सूई, चाकू, चम्मच, कलम जैसी निर्जीव चीजों पर लिखी गई रामदरश जी की कविताएँ तो अद्भुत हैं, जिनमें जीवन और जिंदादिली छलछला रही है। इसलिए मेज, कुर्सी, सूई, चाकू, कलम जैसी चीजें रामदरश जी की कविता में आकर केवल कुछ मामूली चीजें नहीं रह जातीं, बल्कि ये एकाएक सजीव हो उठती हैं और उनमें जीवन का सहज प्रवाह फूट पड़ता है। उदाहरण के लिए ‘मेज’ कविता देखें, जिसके साथ जिंदगी का पूरा एक मेला जुड़ा हुआ है, और खुद मेज को भी इसका अहसास है। कविता की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है—

कमरे में नगे पठार सी पड़ी होती हूँ
और बच्चे मुझ पर खेलते हैं साँप-सीढ़ी का खेल
उनके हाथों के स्पर्श से लगता है
जैसे खरगोश का कोई बच्चा मेरे ऊपर से सरक रहा है
कभी गिरे होते हैं उनकी थाली से दाल और सब्जी के पीले-पीले धब्बे
और मैं भूख का स्वाद महसूस करती हूँ
कभी वे मेरे ऊपर बस्ता फेंककर चले जाते हैं
बस्ते में महकती कापियों का दबाव
कितना गुनगुना लगता है जाड़े की धूप सा

इस कविता का अंत भी बहुत संवेदनात्मक है। रात के सन्नाटे में मेज पर रखी किताबों के पन्ने अचानक खुलने लगते हैं और किताबें आपस में बतियाती हैं तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसे लगता है कि वह काठ की मेज नहीं, बल्कि कोई सजीव प्राणी है और समूची दुनिया अपनी पूरी हलचलों और आस्वाद के साथ उसके इर्द-गिर्द सिमट आई है। इसी तरह ‘कलम’ भी बड़ी मार्मिक कविता है, जिसके साथ भावनाओं का पूरा एक रेला है। यही कलम है जिससे हम बचपन में मोटा सा ‘क’ लिखते हैं और हमारा मन जैसे खुशी से चहक उठता है। तब हमारे बचपन की इस चहक के साथ ही कलम भी खिलखिला उठती है और जीवन भर उसका होना हमारे साथ रहता है। जीवन के इस प्रवाह में साथ चलते हुए वह खुश भी होती है, दुखी भी और उदास भी। लीजिए, अब जरा मामूली सी लगती इस कलम की दो बातें तो सुनें, जिनमें उसका हृदय बोल रहा है—

याद है जब तुम बच्चे थे
जब मैं पहली बार तुम्हारी अँगुलियों में फँसकर
मोटा सा क बन गई थी
तो तुम्हारे साथ मैं कितनी उत्फुल्ल हुई थी
वह अक्षर तुम्हारे भीतर-बाहर निहित
अमित उजास का पहला बिंदु था
जो धीरे-धीरे रेखाएँ बनता गया
और रेखाओँ से
न जाने कितने चित्र आकार पाते गए
उस दिन तुम्हारे खेलने में
एक अलग तरह की चहक थी
उस चहक में एक महक थी
और मैं अपनी जगह स्थिर होकर भी
तुम्हारे साथ खेल रही थी खिलखिलाती हुई।

और यहाँ तक आते-आते कलम सिर्फ कलम नहीं रह जाती, बल्कि उसमें जीवन की पूरी कथा चल पड़ती है और पाठक चकित सा छूट जाता है। भला इस नन्ही सी कलम के सबसे खुशी के पल कौन से हैं, यह भी कविता की गहरी रागात्मकता से भरी इन पंक्तियों में दर्ज है। लीजिए, जरा सुनिए तो—

मेरे सबसे अच्छे दिन वे होते हैं
जब मैं आज की धरती पर
कल का आकाश रचने वाली
अँगुलियों में फँसी होती हूँ
मुझमें
बहने लगती है फागुन की अल्हड़ हवा
और मैं घाटी-घाटी में पलाश सी दहक उठती हूँ
खेतों-खेतों में पकती फसल सी बज उठती हूँ
उमड़ने लगती है सावन की घटा
और मैं लहराते धान की तरह
किसान की आँखों में सपने बुनने लगती हूँ

रामदरश जी की कई कविताओं में उनके बचपन के साथ-साथ माँ और पिता की बड़ी आत्मीय छवियाँ आती हैं। ‘आम के पत्ते’ में भी ऐसी दो बड़ी संवेदनात्मक कविताएँ हैं। इनमें ‘पहचान’ में बचपन के एक छोटे से प्रसंग के साथ माँ चली आती हैं—

बाएँ हाथ की कलाई पर जब-जब घड़ी बाँधता हूँ
तुम दिखाई पड़ जाती हो माँ
चोट के इस निशान में
समय और तुम
दोनों साथ-साथ बहने लगते हो मुझमें

और कविता का अंत इन पंक्तियों से होता है, “अब यह निशान मेरी पहचान बन गया है / जो मेरे भीतर से लेकर / पहचान-पत्रों तक में दर्ज है / और इसमें पड़ी-पड़ी तुम मुसकरा रही हो माँ!”

ऐसे ही पिता पर लिखी गई ‘पिता तुम्हारी आँखों में’ इतनी मार्मिक कविता है कि पढ़ते हुए आँखें भीगने लगती हैं। कविता छंद में है, पर उसमें जीवन का इतना सहज प्रवाह है कि शब्द मानो खुद-ब-खुद आपस में जुड़कर एक करुण भाव की सृष्टि कर देते हैं। रामदरश जी का अभावों में बीता फटेहाल बचपन, पिता का कोमल प्यार और बेबसी—सब कुछ इस कविता में इस तरह चला आया है कि इस छोटी सी कविता में मानो रामदरश जी की आत्मकथा का पूरा एक अध्याय सिमट आया है—

जाने क्या-क्या देखा, पाया, पिता तुम्हारी आँखों में।
फटेहाल बचपन था मेरा, हँसती हुई उदासी सा
भूखा-प्यासा दिन आता-जाता था अपने साथी सा,
लगता था मैं हूँ भर आया, पिता तुम्हारी आँखों में।
कहाँ-कहाँ से तुम आते थे थके हुए तन में, मन में,
एक बेबसी चुप-चुप आकर सो जाती थी आँगन में,
हिलता था रातों का साया पिता तुम्हारी आँखों में।
भहराकर गिरती थीं जल में घर की दीवारें कच्ची,
नंगा हो उठता था आँगन, रोते थे चूल्हा-चक्की,
कैसी थी भादों की छाया, पिता तुम्हारी आँखों में।

ऐसे ही संग्रह की एक और खूबसूरत कविता ‘मेरे मकान में एक आँगन भी है’ पढ़ते हुए, मन भीगने लगता है। यों तो ज्यादातर बंद कमरों में सिमटकर ही शहर का सुरक्षित जीवन बीतता है। पर जब कभी हम आँगन में आकर बैठते हैं, तो एकाएक बहुत कुछ बदलने लगता है और जीवन अपनी सहज उत्फुल्ल चाल में चलने लगता है। जरा पढ़ें इस कविता की ये भावपूर्ण पंक्तियाँ, जो हमें कहीं न कहीं भीतर-बाहर से बदलती भी हैं--

लेकिन कभी-कभी जब यों ही
मैं अपने आँगन में जा बैठता हूँ
तो लगता है
खुला आकाश भर आया है मेरी आँखों में
...........................................
..........................................
धूप की कितनी ही लिपियाँ
अंकित हो जाती हैं मेरी त्वचा पर
हवा के विविध स्पशों के अंकुर
मेरे रोम-रोम में उग आते हैं
आँगन में पैठने लगते हैं धीरे-धीरे
पड़ोस के सुख-दुखों के स्पंदन
और मैं बाहर निकलकर जाने लगता हूँ
पड़ोस से पड़ोस तक, पड़ोस से पड़ोस तक

और यह अहसास इतना आत्मीयता से सराबोर कर देने वाला है कि रामदरश जी को लगता है, “बहुत दिनों बाद मैंने नदी में स्नान किया है, और मेरे अंग-अंग में जल थरथरा रहा है!”

रामदरश जी की कविताएँ मनुष्य से संवाद की कविताएँ हैं और संवाद की यह बेकली उनकी बहुत सी कविताओं में व्यक्त हुई है। हालाँकि ‘आम के पते’ संग्रह में शामिल ‘आओ बात करें’ कविता इस लिहाज से मुझे अन्यतम लगती है, जिसमें कहीं एक गहरी पुकार है, जो हमें भीतर तक मथने लगती है—

पथ सूना है तुम हो, हम हैं, आओ बात करें।
गुमसुम-गुमसुम सा है मन, आँखें खोई-खोई,
दिशा-दिशा चुपियों बीच लगती सोई-सोई,
देखो गई हवाएँ थम हैं, आओ बात करें।

इस प्रगीतात्मक कविता का एक और पद इतनी सघन संवेदना लिए हुए है कि एक बार पढ़ने के बाद ये पंक्तियाँ बार-बार मन में गूँजने लगती हैं—

कहते-सुनते, सुनते-कहते दिन कट जाएँगे,
हँसी, हँसी से, आँसू से आँसू बँट जाएँगे,
साथ सफर की घड़ियाँ कम हैं, आओ बात करें।
सच पूछिए तो यह नए जमाने के नए बोध का गीत है, जो गीत और कविता के बीच की दूरियों को पाटकर, एक भावनात्मक पुल सरीखा बन जाता है। कहना न होगा कि रामदरश जी की ये प्रगीतात्मक कविताएँ कल के गीत की सही दिशा की ओर भी इंगित कर रही जान पड़ती हैं।
*

साहित्य अकादेमी पुरस्कार से अलंकृत कविता संग्रह ‘आग की हँसी’ में भी ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं, जो रामदरश मिश्र जी की आज की मनःस्थिति को बहुत गहराई से व्यक्त करती हैं। इनमें ‘मन तो’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता में मन और शरीर के बीच की बड़ी विचित्र सी द्वंद्वात्मक स्थिति है। मन पहले की तरह समय के साथ बहना और निरंतर यात्राएँ करना चाहता है, पर शरीर थकने लगा है। रामदरश जी दोनों को महसूस करते हैं और इस द्वंद्व को बड़े शांत भाव से जीते हैं—

चुप बैठा रहता हूँ मैं अनभीगा सा,
सामने समय का जल बहता रहता है।
है चहल-पहल कितनी तो दाएँ-बाएँ,
पर भीतर सन्नाटा दहता रहता है।
लंबी यात्राओँ के कुछ मीठे लम्हे,
मेरी तनहाई में आते-जाते हैं।
अनसुनी किया करता है थका-थका तन,
मन तो जाने क्या-क्या कहता रहता है।

ऋतुओं का चक्र निरंतर चलता है और अपने साथ मनुष्य को भी बहाए लिए जाता है। क्वार आया तो हरसिंगार पर फूल आ गए, पर रामदरश जी की जीवनसंगिनी सरस्वती जी नर्सिंग होम में हैं। इसके बावजूद हरसिंगार के टप-टप टपकते फूलों की महकती पुकार और चिड़ियों की चह-चह तो रुकती नहीं है। सरस्वती जी घर में नहीं हैं, पर सबसे ज्यादा कमी उन्हीं की महसूस होती है। ‘फिर आ गया क्वार’ इस लिहाज से बड़े आत्मीय रंगों वाली कविता है—

फिर क्वार आ गया
और सरस्वती जी फिर नर्सिंग होम में
आँगन में
उनके द्वारा लगाया गया हरसिंगार
रात भर महकता है
और सुबह-सुबह फूलों की बारिश कर देता है
पुकारता है सरस्वती जी को—
“कहाँ हो,
मेरे फूल तुम्हारी अंजलि की प्रतीक्षा में
जमीन पर बिखरे पड़े हैं!”
गिलहरियाँ इस डाल से उस डाल तक फुदकती हैं
मानो कुछ खोज रही हों
चिड़ियाँ शोर मचाती हुई उड़ती रहती हैं
कहती हैं—
“कहाँ हो, कहाँ हो, हमें दाना-पानी चाहिए।”

‘कितना अच्छा लगता है’ इस संग्रह की एक बड़ी सुंदर प्रगीतात्मक कविता है, जो बहुत थोड़े से शब्दों में बहुत कुछ कह देती है। रामदरश जी कभी आगे बढ़ने की दौड़ में नहीं रहे। चुपचाप लिखना-पढ़ना ही उन्हें अच्छा लगता है। ऐसे में यह सीख देने वाले बहुत हैं कि अगर आगे बढ़ना है तो घर छोड़ो। लेकिन रामदरश जी चुपचाप घर की छाँह में लिखते-पढ़ते हुए अपने और दूसरों के सपने गढ़ते रहते हैं, और आश्चर्य, तभी अचानक उनके स्वर दूर-दूर तक जा पहुँचते हैं और हर किसी का हृदय झंकृत करने लगते हैं—

बैठ छाँह में अपने घर की कुछ लिखना-पढ़ना,
कितना अच्छा लगता है सबके सपने गढ़ना।
मची हुई है रेलपेल महफिल में रहने की,
पाने को तालियाँ, बात मंचों से कहने की।
कहते हैं वे घर छोड़ो, यदि है आगे बढ़ना।
कहाँ-कहाँ से दर्दों के पाहुन आ जाते हैं,
निकल यहाँ से स्वर मेरे बाहर छा जाते हैं,
मैं भूगामी, चढ़ें शिखर पर जो चाहें चढ़ना।

यों रामदरश जी भले ही भूगामी रहे हों, पर उनकी कविता शिखरों पर विराजमान कवियों से कहीं ज्यादा दूर-दूर तक जा पहुँचती है और अपना होना साबित करती है। फिर यह बात भी कम चकित नहीं करती कि इधर की रामदरश जी की कविताएँ ही नहीं, उनके गीत भी बिल्कुल बदले-बदले से हैं और कवि के मन की विकलता के साथ-साथ नए युग की नई परिस्थितियों को भी बड़े सधे हुए अल्फाज में प्रकट कर देते हैं।

इसी तरह हिंदी के अत्यंत प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान से सम्मानित कविता संग्रह ‘मैं तो यहाँ हूँ’ में रामदरश जी की कविताएँ एक बड़ी उठान लिए हुए हैं और गहरी संवेदना के साथ अपनी बात कहती हैं। इस संग्रह की शीर्षक कविता ‘मैं तो यहाँ हूँ’ में कवि ईश्वर को मंदिर में नहीं, वहाँ देखता है, जहाँ प्रकृति का मुक्त वैभव लह-लह कर रहा है तथा धरती और आकाश के बीच एक खुला संवाद हो रहा है—

सभी चले गए थे
मंदिर में अपनी मुरादों के चीथड़े छोड़कर
मैं अकेले बैठा था प्रभु-मूर्ति के सामने
और बातें कर रहा था सुख-दुख की
लेकिन मूर्ति जड़ बनी रही

ऊबकर मंदिर से बाहर निकला तो देखा—
चारों ओर पुष्पित खेत खिलखिला रहे थे
चहचहाती चिड़ियों का महारास मचा था

और प्रकृति के इस मुक्त स्पंदन और आनंदलीला के बीच अचानक कवि को महसूस हुआ, जैसे चारों ओर एक आवाज़ गूँज रही है—“अरे, मैं तो यहाँ हूँ, यहाँ हूँ, यहाँ हूँ!”

इसी तरह संग्रह की एक और बड़ी संवेदनात्मक कविता है, ‘वाणी विहार’। बरसों पहले जिन सुधाकर जी ने अपने सभी मित्र अध्यापकों को बुला-बुलाकर बड़ी सहृदयता के साथ वाणी विहार बसाया था, उनके निधन पर अतीत के कुहासे में झाँकते हुए रामदरश जी को एक साथ बहुत कुछ याद आता चला जाता है। बड़ी तकलीफ के साथ वे कविता में वाणी विहार की यह करुण कथा भी पिरो देते हैं, कि देखते ही देखते वह कैसे वणिक विहार में बदल गया और बाजारवाद ने उस सारी प्रियता को लील लिया, जो वाणी विहार की अपनी पहचान थी। ‘दिल्ली में गाँव लिए’ भी एक अलग सी कविता है। इसमें दो मित्रों की कहानी है, जो एक साथ गाँव से दिल्ली शहर में आए। दोनों एक ही जमीन के थे, एक ही जैसे हालात। उम्मीद थी, कि वे साथ-साथ रहते हुए एक-दूसरे का सहारा बनेंगे। पर एक को दिल्ली की ऊपरी चमक-दमक का आकर्षण अपने में लपेटता चला गया और दूसरे के साथ गाँव अब भी चल रहा है। यों एक ही जगह से वे चले और फिर एक-दूसरे से दूर होते चले गए। रामदरश जी में यह दर्द बहुत गहरे बसा हुआ है और उनकी कई कविताओं में रह-रहकर छलक उठता है, जिसमें उनके ईमानदार गँवई मन की व्यथा है।
‘आभारी हूँ कविते’ भी संग्रह की एकदम अलग सी कविता है। रामदरश जी ने सिर्फ कविताएँ लिखीं ही नहीं, कविताओं को जिया भी है। और बदले में कविता ने भी उन्हें अंदर-बाहर से भर दिया है। अब कविता उनकी पहचान भी है, और जीवन भी—

तुमने मुझे कितना कुछ दिया
मेरी कविते
जो बीत गया,
वह भी मुझमें जीवित है तुम्हारे सहारे
आज के जलते समय में भी
मेरा मन पा लेता है कोई घनी छाँह
और मनुष्यता के प्रति
मरता हुआ विश्वास
फिर-फिर जी उठता है

इसी तरह ‘अँगीठी और मैं’ कविता में रामदरश जी के भीतर का देसी ठाट देखा जा सकता है। दिल्ली की भीषण ठंड में वे अँगीठी के पास बैठे हाथ सेंक रहे हैं और यह आनंद उन्हें एक ऊष्मिल अहसास में लपेट लेता है—

इस भयानक ठंड में
अँगीठी के पास बैठा हूँ
दहकते कोयले की हँसी
ऊष्मा के फूल बन जा रही है मेरी त्वचा पर
मन गुनगुना रहा है
लगता है
मौन भाव से एक आत्मीय संवाद चल रहा है
मेरे और अँगीठी के बीच

यह एक सुखद आश्चर्य है कि रामदरश जी की कविता-यात्रा के प्रारंभ से लेकर अब तक उनकी यह सहजता और देसीपन दोनों बरकरार रहे हैं और कविता की वह सादगी भी, जिससे वह हर होंठ पर चढ़ जाती है और हर दिल में उतरकर गुनगुनाने लगती है। रामदरश जी की कविता की यह सर्वव्याप्ति ही उनकी शक्ति भी है, जिससे उनका कद समय के साथ निरंतर बढ़ता चला जाता है।


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अलबत्ता रामदरश जी की पूरी काव्य-यात्रा का जायजा लें, तो एक बात पर हमारा ध्यान जाए बगैर नहीं रहता कि न सिर्फ गीत से उसकी शुरुआत हुई है, बल्कि यह भी साफ लगता है कि गीत उनसे कभी नहीं छूटा। न वे गीत को छोड़ पाए और न गीत उनको। यह दीगर बात है कि उनके गीत के स्वर शुरू में कुछ पारंपरिक अधिक थे, जिनमें बीच-बीच में नएपन की झलक आती थी। पर बाद में समय के थपेड़े झेलते हुए, वे सघन, मंद्र और गंभीर होते चले गए। उनमें सघनता आई और बहुत कम कहकर या कभी-कभी तो एकदम चुप रहकर बहुत ज्यादा कह डालने वाली संजीदगी भी। हालाँकि उनके शुरू के गीत पढ़ें या बाद में लिखे गए गीत, एक बात तय है कि उनकी सादगी बहुत मोहक है, इसलिए उनके गीत एक बार पढ़ने के बाद कभी भूलते नहीं, कभी पुराने और बासी भी नहीं लगते।
मगर रामदरश जी के गीत क्या सिर्फ रामदरश जी के गीत ही हैं और उनकी कविता से उनका कोई लेना-देना नहीं है? कविता की थोड़ी सी समझ रखने वाला आदमी भी शायद ऐसा न कह पाए, इसलिए कि गीत यहाँ सिर्फ गीत नहीं हैं, वे जमीन की आवाजें हैं। वे जीवन के स्वर हैं, जिनमें जीवन के सुख-दुख का संगीत बहा आता है और कहीं न कहीं लोक जीवन की एक गहरी मिठास भी उनमें हैं। तो रामदरश जी के गीत महज गीत नहीं है, बल्कि जीवन आस्था और लोक जीवन से हासिल हुई संवेदना का पर्याय हैं, जो आज भी उनमें बहती है।

थोड़ा और गौर से देखें तो यह केवल रामदरश जी के गीतों का ही नहीं, उनकी समूची कविता का मिजाज है। संकोच और स्वाभाविक धीरज जो कहीं न कहीं उन्हें गीतों की विरासत से मिला है, वह न उन्हें कहीं ‘बेसुरा’ होने देता है और न ‘बेताल’। उन्हें बेतरह फैलने भी नहीं देता। वे कम कहते हैं, अपने धीरजवान शब्दों में कहते हैं और आखिर कह ही लेते हैं, जो उन्हें कहना होता है।

रामदरश जी चाहे समकालीन हिंदी कविता के ‘झंडाबरदार’ न रहे हों, लेकिन वे ऐसे कवि हैं जिन्होंने हिंदी कविता को भीतर से माँजा है, उसे बहुत-सी अनावश्यक गुत्थियों से छुटकारा दिलाकर सीधा, सरल बनाया है। साथ ही उसे जनता के ज्यादा नजदीक लाकर, खास और आम सबकी आस्था का केंद्र बनाकर समकालीन कविता का एक नया ‘लोक-संस्कार’ किया है। इसके भीतर गहरे में झाँकें तो उत्स रूप में, ऊर्जा के रूप में, आदर्श के रूप में गाँव का वही धूल से सना किशोर बैठा है, जिसने कभी गीत की करुण पुकार के साथ कविता की टेर लगाई थी!...और तब यह गीत गीत नहीं रह जाता, वाल्मीकि के ह्दय से फूटा ‘मा निषाद प्रतिष्ठां...’ हो जाता है जिसके बगैर वाल्मीकि की रामायण नहीं लिखी जा सकती थी। वाल्मीकि रामायण के महासिंधु को यही एक करुण राग शुरू से अंत तक लहर-लहर करता नजर आता है। रामदरश जी की इस लंबी कविता-यात्रा में गीत का भी कुछ वैसा ही अर्थ, वैसा ही महत्त्व समझना चाहिए।

यह आकस्मिक नहीं कि साठोत्तरी कविता के दौर में ‘किसिम-किसिम की कविता’ के आँधी-तूफान में जब हम अच्छे-अच्छे कवियों को अपनी जमीन से हटते और बहकते देखते हैं, जिनमें शमशेर, गिरिजाकुमार माथुर और भारतभूषण अग्रवाल जैसे बड़े कवि भी थे, तब रामदरश जी ही थे जो अविचलित धीरज से, अपने आश्वस्तिकारी कदमों से, अपनी राह पर बढ़ते नजर आ रहे थे। उन्हें जमाने के साथ चलता हुआ दीखने के लिए अपने चेहरे पर ‘मुद्राएँ’ चिपकाने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। गिरिजाकुमार माथुर अपने इस ‘विचलनकारी काव्य-दौर’ के लिए कुछ आगे चलकर शर्मिदा नजर आते हैं। ‘भीतरी नदी की यात्रा’ कविता-संग्रह की भूमिका में उन्होंने इस बात का विस्तार से जिक्र किया है। लेकिन जिस कवि को शर्मिदा होने की कतई जरूरत नहीं पड़ी, वे रामदरश मिश्र हैं। क्योंकि कहीं न कहीं उनका गँवई गाँव का गीतों या लोकगीतों वाला मिजाज ही है, जो उनके कानों में चुपके से कह रहा था, “अपनी राह पर आगे बढ़ते चलो। ये तमाम झंडे थोड़े समय बाद ही हवा में उड़ जाने वाले हैं!”

रामदरश जी तो सिर्फ चलते जा रहे थे। वे जिधर जा रहे थे, वहाँ राह खुद-ब-खुद बनती चली गई। और वे, जिन्हें हम चिढ़ाती हुई मुद्राओं के साथ आगे-आगे दौड़ते, बल्कि ‘उड़ते’ हुए देखते थे, उन्हें भी अंतत: उसी राह पर आना पड़ा। यह रामदरश जी के भीतर बैठे गाँव के साथ-साथ उस गीत की भी विजय थी, जो उन्हें अपनी जमीन से भटकने ही नहीं दे सकता था। असल में ये गीत नहीं, ‘मा निषाद प्रतिष्ठां’ की तरह जीवन की करुणा थी, जो गीत की शक्ल में नजर आती थी।

सच तो यह है कि रामदरश जी के गीतों की यह व्यप्ति सिर्फ उनकी कविता तक नहीं, बल्कि वह उनकी कहानियों, संस्मरणों, आत्मकथा, उपन्यास, यात्रा-वृतांत सभी में फैली और समाई हुई है। चौदह खंडों में छपी रामदरश जी की बृहत् रचनावली किसी एक ‘महासमुद्र’ से कम नहीं है। उसे समूचा मैंने पढ़ा है। पर मुझे याद नहीं पड़ता कि इसके किसी भी खंड को पढ़ते समय मैं कभी उस गीतकार कवि को भूल पाया हूँ, जो कभी लिखा करता था, “चल रहा हूँ क्योंकि गति से पंथ का निर्माण होगा...” या कि “उमड़ रही पुरवैया कुंतल-जाल सी, लहर रहे अंबर में काले-काले बदरा...” या फिर “संध्या में बादल डूबे हैं, मन डूबा सन्नाटे में!”

लगता है, रामदरश जी की समूची काव्य-यात्रा की गूँजें-अनुगूँजें और पद्चिह्न उनकी यात्रा के इस शुरुआती चरण में सुरक्षित हैं और बाद में तो केवल उनका विस्तार भर हुआ है। यानी चौदह खंडों में समाया बल्कि यहाँ भी पूरी तरह न समा सका वह महासिंधु बस करुणा की उसी एक बूँद का रचा हुआ है, जिसने कभी गुहार लगाई थी कि “मैं अषाढ़ का पहला बादल/मेरी राह न बाँधो” और कि “संध्या में बादल डूबे हैं/मन डूबा सन्नाटे में।”...


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रामदरश जी की यही करुणा घर-परिवार से लेकर सारे संसार को परिवार समझने वाले आदर्श में व्याप्त है। इसके लिए उन्हें दिखावा करने की कभी जरूरत नहीं पड़ी, न कोई ‘पोस्चर’ उन्होंने अपनाया। न शिल्प और भाषा की कृत्रिम भंगिमाएँ। हाँ, जहाँ विरोध करने की जरूरत थी, वहाँ साफ-साफ विरोध दर्ज किया भी।

रामदरश जी की काव्य-यात्रा में ‘आलोचक’, ‘हम दोनों’, ‘मुट्ठियाँ’, ‘उत्तर-आधुनिकता’ सरीखी ऐसी कई कविताएँ हैं जिनमें वे न सिर्फ तमाम सनसनीखेज मुद्राओं वाले लेखकों के भटकाव की ओर इशारा करते हैं, बल्कि बुरे इरादों पर चोट भी करते हैं। कविता की कुछ गिनी-चुनी पंक्तियों में ही वे किसी सिद्धांत के नाम पर अपनाई गई अवसरवादिता और छद्म विद्वत्ता के घमंड को तार-तार कर देते हैं। लेकिन यह सब करते हुए भी उनमें वही धीरज नजर आता है, जो कि उन्हें बता जाता है कि कवि का काम महज साहित्य के अखाड़े में मुट्ठियाँ भाँजना नहीं, बल्कि उसका मुख्य काम तो जनता के दुख-दर्द में शामिल होकर उसकी भीतरी व्यथा को अपने स्वरों में उतारना है।
रामदरश जी के लिए बड़े कवि होने का आदर्श किसी नामीगिरामी आलोचक का सर्टीफिकेट हासिल कर लेना नहीं, बल्कि ‘जनता का अपना कवि’ होना है। बड़ा कवि वहीं है जो जनता के ज्यादा से ज्यादा निकट हो। रामदरश जी इस अर्थ में जनता के कवि हैं और यह जनता का कवि होना उनके समूचे व्यक्तित्व में बिंधा हुआ है। यह इससे पता चलता है कि वे अपनी आत्मकथा लिखें, कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत या ‘जल टूटता हुआ’ और ‘अपने लोग’ जैसे बड़े उपन्यास, हर जगह एक बड़े कवि के रूप में उनकी उपस्थिति नजर आती है। उनकी कविताओं से ज्यादा बड़ी कविता, उनकी आत्मकथा और उनके उपन्यासों में फूटती है। उनके संस्मरणों में बहती है। मैं इसे उनके कवि की कहीं ज्यादा बड़ी सफलता कहता हूँ।

दूसरे शब्दों में, यह वह सच्चा मार्क्सवाद है जो किताबों से कम, जीवन का पाठ पढ़ने से ज्यादा आया है। यह जीवन की खुली भाषा पढ़ने से आया है और इसे हम रामदरश जी में शुरू से आखिर तक लगातार विकासमान देखते हैं। रामदरश जी बगैर दावा किए एक सच्चे और खरे मार्क्सवादी लेखक हैं। यह बात कहनी इसलिए जरूरी है क्योंकि आज के समय में कभी खुद को मार्क्सवाद का ‘अवाँगार्द’ कहने वाले बहुत सारे लेखकों के मुखौटे उतर चुके हैं और उनका व्यवहार देखकर लज्जा आती है। ऐसे में यह साफ-साफ बता देने का समय आ गया है कि यह सारा का सारा प्रपंचवाद न मार्क्सवाद था, न है।

झूठी लड़ाकू मुद्राएँ पहनने से मार्क्सवाद नहीं आ जाता, यह इसी से साबित हो जाता है कि सोवियत संघ का पतन होते ही सबसे पहले यही लोग भाग खड़े हुए थे और मार्क्सवाद को अप्रासंगिक करार देने में जुट गए थे। जबकि रामदरश जी जैसे बड़े लेखक, जिन्होंने कभी दिखावटी घोषणाएँ नहीं की और अपनी मार्क्सवादी समझ को सीधे-सीधे अपनी जनता के संघर्ष से जोड़ा, ठेठ हिंदुस्तानी तहजीब, अपनी जमीन तथा उसकी पहचान से जोड़ा, आज वे उसी तरह अडोल धीरज के साथ अपने रास्ते पर आगे बढ़ते चले जा रहे हैं।

अपनी जनता के विराट सुख-दुख को अपने अंदर समा लेने की कूवत और आत्म-विस्तार के लिहाज से अगर किसी लेखक से उनकी तुलना हो सकती है, तो वे प्रेमचंद ही हैं। प्रेमचंद की जीवन-यात्रा 1936 में थम गई थी और उन्होंने कविताएँ नहीं, गद्य लिखा था। पर रामदरश जी को बार-बार पढ़ते और उनकी कविताओं से गुजरते हुए, मैंने अपने आपसे यह कौतुक भरा सवाल पूछा, “अगर प्रेमचंद आज होते और कविताएँ लिख रहे होते तो वे कैसी होतीं?” इस पर भीतर से जवाब आया कि “वे ठीक रामदरश मिश्र जैसी होती।” मुझे लगा अब कुछ और कहने की जरूरत मेरे लिए रह नहीं गई है।

वे जो ‘कलावंत’ होने या दीखने के लिए कविताएँ लिख रहे हैं, ऐसे तमाम अभिजात किस्म के फैशनेबल कवि क्यों रामदरश जी के आगे आते ही प्रभाहीन और निस्तेज पड़ जाते हैं, उनकी कविताएँ क्यों उन्हीं के चारों ओर चक्कर काटती रह जाती हैं और रामदरश जी की कविताएँ कैसे जनता से सीधा-सच्चा संवाद कायम कर लेती हैं, अगर खोजें तो इस सवाल का जवाब भी हमें यहीं कहीं दिखाई देगा।
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