हिन्दी, भारत, और कैनेडा

एकौर दिन गुज़रा बला टली यारो,
जितना कट जाये बवाल अच्छा है...

हिंदी दिवस आया और उत्सव का माहौल बनाकर अनेक आयोजन करके चला गया। एक परम्परा है, निभा दी गयी। वह सब हुआ जो हर वर्ष होता था। और वह सब नहीं हुआ जो होना चाहिये था लेकिन कभी नहीं होता। हिंदी खाने-पकाने वालों में से किसी ने भी यह निश्चय नहीं किया कि वे अपने बच्चों को हिंदी-शाला में भेजेंगे। थोक में हिंदी-साहित्य लिखने-पढ़ाने वालों ने यह नहीं सोचा कि वे हर वाक्य के बाद दो-चार-सात बिंदियाँ लगाने के बजाय विराम चिह्नों की जानकारी लेंगे। किसी हिंदी अकादमी, निदेशालय, या मुख्यालय ने यह नहीं तय किया कि वे तकनीकी संस्थाओं से मिलकर यह निश्चित करेंगे कि फ़ोन, कम्प्यूटर आदि के सभी कीबोर्ड चंद्रबिंदु जैसे महत्त्वपूर्ण चिह्न की अनुपस्थिति को गम्भीरता से लें। और किसी हिंदी अधिकारी ने यह नहीं सोचा कि वे मेट्रो आदि में हिंदी की उपस्थिति का विरोध करने वालों से भद्र-संवाद में, और हिंदी की तख्तियों पर कोलतार पोतने वालों को सज़ा दिलाने में कोताही नहीं बरतेंगे। प्रसन्नता की बात यह है कि आप सब अपने-अपने तरीके से हिंदी को समृद्ध करने में लगे हैं, और अपने साथ हमें भी निरंतर जोड़ते रहे हैं। आप सब सच्चे हिंदी-प्रेमियों को धन्यवाद, बधाई, और शुभकामनाएँ!

कैनेडा के प्रधानमंत्री के बचकाने बयान के बाद दक्षिण-एशिया और उत्तर-अमेरिका के बीच सुप्त पड़े राजनैतिक तनाव में उबाल आया है। सच यह है कि आतंकवाद, और हिंसा से मानवता का कोई लाभ नहीं होता। किसी भी देश को अपनी भूमि का प्रयोग किसी दूसरे किसी राष्ट्र की हानि के लिये नहीं होने देना चाहिये। दो-चार मुखर उग्रवादियों की आवाज़ को जनसामान्य का प्रतिनिधित्व मानना या तो मूर्खता है, या निहित स्वार्थ, अक्सर दोनों का समन्वय। द्वेष और आतंकवाद ने पहले ही अनेक जीवन हरे हैं। इस पर अंतरराष्ट्रीय सहमति से रोक लगनी चाहिये।

उत्कृष्ट परंतु संख्या में सीमित रचनाओं के साथ सेतु का नया अंक आपके सामने है। पढ़िये और आनंद लीजिये।

आपका शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 सितम्बर 2023 ✍️

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