व्यंग्य: लास्ट बार धक्का दे दो

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

दो हजार चौबीस के चुनाव का बिगुल अमेरिका में भी बजना शुरू हो गया है। श्रीमान सुशासन गोरे बाबू उर्फ ट्रंप का चेहरा फिर मीडिया में चमक रहा है। वे सतहत्तर साल के क्या हुए और युवा हो गए हैं। लोक-रुझानों में वे राष्ट्रपति बाइडन से दस अंक आगे हैं। उनके अनुसार वे क्लोरोक्वीन खाकर अगले तेईस साल तक युवा और वायरस मुक्त रह सकते हैं। पिछली बार अपने राष्ट्रपति के मनोरंजन कर मुक्त नाटक देख-देख कर जनता इतनी खुश हो गई थी कि उसने सुशासनजी को हाथ जोड़ कर हूट कर दिया था। अंतिम समय तक वे जीत का ऐसा मुगालता पालते रहे कि उन्हें व्हाइट हाउस खाली करना पड़ा। अगले आम चुनाव की आहट गूँजने लगी तो वे फिर मैदान में कूदना चाहते हैं बस एक और बार, लास्ट बार। वे सब तरफ दौलत से भरे हैं। वे वोटरों को उकसा रहे हैं- एक लास्ट धक्का दे दो, फिर देखो अमेरिका के जलवे। श्रीमान ट्रंपजी समझते हैं कि व्हाइट सुप्रीमेसी के नाम पर जनता के एक विशाल वर्ग को बेवकूफ बनाना आसान है। उन्हें आज भी लगता है कि अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर चीन से भी बड़ी दीवार खड़ी कर देने से अवैध इमीग्रेशन रुक जाएगा। ‘मेकिंग कंट्री ग्रेट अगेन’ का केवल नारा लगा देने से अबकी बार ट्रंप सरकार बन जाएगी। गन लॉबी सक्रिय हो रही है पर जनता ने मौन धारण कर रखा है। कभी लगता है अमेरिकी जनता ट्रिक समझ गई है तो कभी लगता है जनता फिर भुलावे में फँस रह है। श्रीमान सुशासन को प्राइमरी चुनावों में अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है। इसलिए श्रीमान जी भावुक हो कर अपील कर रहे हैं। कह रहे हैं – हे जनता जनार्दन, मेरी नैया तिरा दो। लास्ट बार उल्लू बना लेने दो। और चार साल किसने देखे, तब की तब देखेंगे। आज की रात बचेंगे तो ‘अपना शहर वाशिगंटन’ फिर से देखे लेंगे। अपना अमूल्य वोट दे कर इस बार जीता दो, फिर वे कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे।

फर्जी समाचार गढ़ने और फैलाने वाले उनके लोग तैयार हैं। रैलियों में उत्साह फैलाने के उनके लोकप्रिय तरीकों को हकीकत रूप में लाने के लिए उनके अंध समर्थक जुड़ रहे हैं। इस बार व्हाइट हाउस पर कब्जा करके ही वे बच सकते हैं। यदि वे हार कर पुनः बेआबरू हो गए तो वे सत्ता के बजाय जेल में होंगे। बची-खुची इज्जत धूल में मिल जाएगी। वे किसी और देश के नागरिक होते तो ऐसे आरोपों के चलते उन्हें जनता में मुँह दिखाने लायक नहीं समझा जाता। सरकारी शानो-शौकत से उम्र गुजारने का उनका सपना आँखों में रह जाता। सच यह है कि आजकल के युवा अमेरिकियों को ऐसे बुजुर्गों की बिल्कुल परवाह नहीं है। विवादित बयान दे कर ‘एक्स’ सोशल मीडिया में छाये रहने का उनका फॉर्मूला अब फुस्स हो गया है। अदालतों ने श्रीमान ट्रंपजी को जेल तक दौड़ा-दौड़ा कर थका दिया है, वे हाँफ रहे हैं। वे कुर्सी से चिपके रह सकते थे, पर उनकी पार्टी की युवा पीढ़ी उन्हें उखाड़ फेंकने पर तुली हुई है। उनकी चिंता केवल यह है कि वे हार गए तो क्या करेंगे..। उनकी पार्टी मर रही है तो मरे, पार्टी के कुछ नेता पार्टी से बहुत बड़े हो जाते हैं, तो पार्टी सिमट कर छोटी हो जाती है।

अंदर ही अंदर कॉकस के लोग मजबूरी में पूर्व-महामहिम ट्रंप से मैदान छोड़ने की अपील कर रहे हैं। पर ट्रंप अपने पैसे के बल पर अड़े हैं। वे फुटबॉल-हॉकी के ऐसे सेंटर फारवर्ड हैं जो तेज गति से दौड़ते-दौड़ते गोलकीपर के सामने खड़े होकर कह रहे हैं, ओ गोली, बस लास्ट गोल मार देने दे। वे क्रिकेट के ऐसे सलामी बल्लेबाज पोज़ कर रहे हैं जो बॉलर को सलामी देते हुए कह रहा है बस लास्ट चौका मार लेने दे। चार साल और व्हाइट हाउस में रहने मिल जाए तो जनम-जनम के पाप पूण्य बन जाएँ और वे विश्व इतिहास में महान बन कर दर्ज हो जाएँ। वे जनता को कह रहे हैं बस लास्ट बार वोट दे दो। विरोधियों को मुद्दा मिल गया है, वे कह रहे हैं- ‘नौटंकीबाज ने पिछले सुशासन का कच्चा चिठ्टा बताया नहीं। अब वे जो कर गुजरेंगे उसे बताने के लिए वे शायद ही बचेंगे, बच भी गए तो आगे हिसाब बताने आएँगे नहीं। तो ट्रंपजी फिर से कुर्सी क्यों चाहिए?’ फाँसी के फंदे पर खड़े आदमी से भी जल्लाद पूछता है, “बता दे तेरी आखिरी इच्छा क्या है और उसे पूरा किया जाता है।“ बस ट्रंप इसी उम्मीद में हैं कि वे अपना सार्वजनिक जीवन देश को कुर्बान कर रहे हैं, तो क्या जनता उन्हें लास्ट बार एक वोट नहीं दे सकती!

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: +1 416 225 2415
सम्पर्क: 22 फेरल ऐवेन्यू, टोरंटो, एम2आर 1सी8, कैनेडा

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।