कहानी: एक तवे की रोटी

दीपक शर्मा

- दीपक शर्मा


               उस शाम संतोष बुआ मुझे जब अपने चौबारे के छज्जे पर दिखाई न दीं, तो उनकी खबर लेने में ऊपर उनके पास पहुँच ली।
 अपने बिस्तर पर लेटी वह थरथर काँप रही थीं। शीत से ठंडे शरीर के साथ। रज़ाई और कम्बल ओढ़े रहने के बावजूद।
             “सुधीर,” छज्जे पर खड़ी होकर मैंने छोटे भाई को पुकारा। उससे बड़ा, सुशील चार से छह बजे तक कंप्यूटर सीखने जाता है।
             “क्या है?” सुधीर हमारे आँगन में चला आया।
            “वालिया अंकल को बुला लाओ। बुआ को तेज़ सर्दी लग गई है...।”
           वालिया अंकल डॉक्टर हैं और हमारे पड़ोस में उनका अपना क्लीनिक है। वे पापा के अच्छे दोस्त भी हैं और हमारे फैमिली डॉक्टर भी।
          “इनकी हालत बहुत नाजुक है,” वालिया अंकल ने आते ही बुआ का निरीक्षण किया,”नब्ज़ बहुत धीमी चल रही है और लगता है, इन्होंने काफी दिनों से खाना-पीना एकदम छोड़ रखा था। अपने भाई-भाभी के गम में क्या?”
          संतोष बुआ मेरी नहीं, पापा की बुआ थीं और पिछले ही महीने मेरे दादा और दादी की मृत्यु हुई थी। बल्कि दादी की मृत्यु तो नाटकीय भी रही थी। पत्थरी का ऑपरेशन कराने अस्पताल गए दादा मृतावस्था में घर लौटे थे और उनकी उठावनी के बाद दादी, जो अपने कमरे में सोने गईं, तो फिर कभी न जागीं...।
        “मालूम नहीं,” मैंने कहा, “दादी के बाद बुआ इधर चौबारे में खुद पकाती-खाती हैं...।”
          दादी के रहते बुआ के खाने-पीने का सामान कई बार मैं खुद यहाँ पहुँचाती रही थी, लेकिन दादी के बाद ममा ने उन्हें खाना भेजना कतई ज़रूरी न समझा। असल में खाना बनाने से ममा जी चुराती हैं और रसोई के लिए नौकर रखने की अपनी फरमाइश जब-तब पापा के आगे रखती भी रहती है। दादी की वजह से उनकी यह फरमाइश हर बार रद्द हो जाती थी। शायद इसीलिए प्रतिक्रियास्वरूप दादी की मृत्यु के बाद से ही ममा होटल से खाना मँगवाने लगी हैं। पापा की नौकरी इन दिनों लखनऊ की बजाय बरेली में है और उन्हें यह खबर तक नहीं थी कि संतोष बुआ अब अलग तवे की रोटी खाती हैं। एकाध बार मैंने ज़रूर ममा से बुआ के खाने का उल्लेख किया था, मगर ममा ने फौरन मुझे टोक दिया था, “सुधीर को मैंने उनके पास भेजा तो था, हम लोग होटल से खाना मँगवा रहे हैं, आपको मँगवाना हो तो रूपया दे दीजिए, मगर उन्होंने साफ मना कर दिया था...।”
           “हैरत है,” वालिया अंकल ने मुझे डपटा, “खुद पकाने-खाने की इनकी कोई उम्र है भला? तिस पर दिसंबर की यह तीखी सर्दी। हो-न-हो इन्हें हाइपोथरमिया हो गया है...।”
           “हाइपोथरमिया?”
            “हाँ, कुपोषण और सर्दी जब एक साथ बुढ़ापे के संग जुड़ जाएँ, तो शरीर का ताप इसी तरह पैंतीस डिग्री के नीचे चला जाता है। अब फैसला यह करना है, ग्लूकोज़ इन्हें यहाँ दिया जाय या मेरे क्लीनिक के पास वाले अस्पताल में...।”
         “ममा से पूछकर आपको बताती हूँ,” मैं तुरंत नीचे चली आई।
           ममा ने संतोष बुआ को अस्पताल भेजना बेहतर समझा और वालिया अंकल ने उसी दिन उन्हें वहाँ दाखिल करवा दिया।
          पाँचवें दिन उन्होंने आँखें खोलीं और सातवें दिन वे पहली बार बिस्तर पर बैठीं।
         "मैं अमृतसर जाऊँगी, हंसराज,” बिस्तर पर बैठते ही बुआ ने पापा से कहा।
           बुआ के दाखिल होने की सूचना मिलते ही पापा बरेली से इधर लखनऊ पहुँच लिए थे और पिछली तीनों रातें उन्होंने बुआ के संग बिताई थीं। अस्पताल में।
           “अमृतसर?” मेरी कनौतियाँ खड़ी हो लीं। दादी तो हमेशा संतोष बुआ को रायविन्ड की बताया करती थीं।
          “आपकी तंदुरूस्ती पहले लौट आए,” पापा ने बुआ का हाथ सहलाया, “मैं ज़रूर आपको वहाँ ले जाऊँगा और सबसे मिलवाकर लाऊँगा...।”
          “मैं इधर लौटना नहीं चाहती,” बुआ ने कहा, “अब वहीं रहूँगी, वहीं मरूँगी...।”
         “डॉक्टर आपको अस्पताल से छुट्टी अगले हफ्ते देंगे,” पापा हँस दिए, “जब तक मैं भी अपनी बरेली में एक हफ्ता अपनी ड्यूटी बजा लूँ...।”
          चौदहवें दिन बुआ की हालत कुछ और सुधरी तो अस्पताल के डॉक्टरों ने बुआ को इंटेनसिव केयर यूनिट के स्पेशल वार्ड के एक कमरे में खिसकाना चाहा। जगह की बदली के वक्त जब उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाया गया, तो उन्होंने वहाँ मौजूद पापा से पूछा, “हंसराज, मुझे अमृतसर ले जा रहे हो क्या?”
       “नहीं, बुआ,” पापा फिर हँस पड़े, “अमृतसर आप ज़रूर जाएँगी। मैं वादा करता हूँ, लेकिन अभी नहीं। डॉक्टर लोग चाहते हैं, इधर अस्पताल में अभी आप सात-आठ दिन और गुज़ार लें...”
        “पिछली बार भी तुमने एक हफ्ता बताया था“ बुआ अधीर हो लीं।
        “एक हफ्ता और बीत जाने दीजिए, बुआ,” पापा ने कहा, “यहाँ सब ठीक चल रहा है। दिन में सरोज आपके पास रहती है और रात में सुधीर और सुशील। इस बीच मैं बरेली फिर होकर आता हूँ...”
        बरेली में एक सप्ताह और बिताकर पापा लौटे तो डॉक्टरों ने उन्हें बुआ के स्वास्थ्य लाभ की सूचना दी, “आप चाहें तो उन्हें आज अस्पताल की व्हील चेयर पर यहीं घुमा लीजिए। छुट्टी मगर हम इन्हें कल ही दे पाएँगे...”
       साढ़े बारह के करीब जब व्हील चेयर दूसरे मरीज़ों से खाली हुई तो पापा ने उन्हें वहाँ जा बिठाया।
       “अमृतसर जा रहे हैं?” बुआ ने पूछा।
        “अमृतसर भी जाएँगे। ज़रूर जाएँगे। अभी आप थोड़ा यहाँ घूमकर देखिए...”
          उन्हें घुमाने का ज़िम्मा पापा ने मुझे दे दिया, “लो, सरोज, बुआ को घुमा लाओ...।”
          अस्पताल का वह स्पेशल वार्ड उसकी तीसरी मंज़िल पर था और घुमाने के लिए वहाँ सिर्फ बालकनी थी, जहाँ पहुँचने के लिए जनरल वार्ड के कमरों से गुज़रना ज़रूरी था।
          जैसे ही हम जनरल वार्ड से गुज़रे, बुआ ने मुलाकातियों द्वारा अपने मरीज़ों के लिए लाए गए खाने के डिब्बे खुलते हुए देख लिए और चिल्लाने लगीं, “मुझे रोटी चाहिए। मुझे रोटी लाकर दो...”
        “आप अभी बालकनी में चलिए,” मैंने उनका गाल थपथपाया, “पापा से कहकर अभी रोटी मँगा दूँगी...”
        अस्पताल की अपनी टिकान के दौरान वे केवल दूध, चाय और बिस्कुट, डबलरोटी ही लेती रही थीं।
      “नहीं,” हाथ फैलाकर वह चीखने लगीं, “मुझे रोटी चाहिए...अभी चाहिए...”
      “हाँ, बुआ,” व्हील चेयर रोककर उनके हाथ उनकी गोदी में वापिस रखने का मैंने प्रयास किया, “आपको रोटी अभी मिली जाती है...”
      “नहीं,” वह बेकाबू हो गईं, “देखो लोगो, मेरी बदकिस्मती देखो। मुझे रोटी खानी है और मुझे रोटी देने वाला कोई नहीं। मुझे बताओ मैं क्या करूँ?”
       हिचककर फिर मैं बालकनी न जाकर उन्हें उनके बिस्तर पर लौटा लाई।
      “मैं अमृतसर जाऊँगी, हंसराज,” बिस्तर पर लौटते ही बुआ ने फिर ज़िद पकड़ ली।
      “अच्छी बात है। मैं आज ही टिकटें बुक कराता हूँ, लेकिन लोहड़ी के इन दिनों में हावड़ा मेल में रश बहुत रहता है। हो सकता है, टिकटों में अभी एक-दो हफ्ते लग जाएँ।”
     “तुम फिर टाल रहे हो, हंसराज,” बुआ रोने लगीं, “मैंने अब सब सोच लिया है। मैं अब वहीं रहूँगी, वहीं मरूँगी...”
      “बस, टिकटें आ जाने दीजिए, बुआ,” पापा ने उनके कंधे थपथपाए, “मैं वादा करता हूँ, अमृतसर मैं आपको लेकर जाऊँगा। इन्हीं तीन-चार हफ्तों के बीच, जब तक आप गाड़ी के सफर लायक भी हो लेंगी...।”
        “मैं हलवा-पूरी खाऊँगी,” अपने चौबारे के बिस्तर पर लेटते ही अगले दिन, अस्पताल से लौटने पर, संतोष बुआ फिर ज़िद कर बैठीं।
       “हलवा-पूरी आपको नुकसान कर जाएगी बुआ,” पापा ने उनकी बाँह सहलाई, “स्वर्णा आपके लिए धुली गूँग की हलकी खिचड़ी तैयार करेगी। आप खिचड़ी खाना...”
     “नहीं, मैं हलवा-पूरी खाऊँगी...”
       “आप इन्हें हलवा-पूरी ही मँगवा दीजिए,” ममा ने पापा से कहा, “इस उम्र में बड़े-बुजुर्गों के साथ ज़िद नहीं करनी चाहिए। उन्हें अपनी मर्ज़ी चला लेने देनी चाहिए। क्या मालूम उनकी कौन-सी ख्वाहिश उनके सीने में कब से दबी पड़ी हो?”
        और पापा ने सुधीर को बाज़ार भेजकर हलवा-पूरी मँगवा दी ।
          संतोष बुआ ने दो ग्रास में ही पहली पूरी खत्म कर ली और बोलीं, “एक और लाओ..”
          जिस रस और सुस्वाद के साथ उन्होंने अपने होंठों पर अपनी जीभ फेरी, वह हमारे लिए नितांत अजनबी था। अपने खाने के प्रति इतनी रूचि उन्होंने पहले कभी न दिखाई थी।
        पापा ने दूसरी पूरी उनकी थाली में धर दी, फिर उनके अनुरोध पर तीसरी। लेकिन जब उन्होंने चौथी पूरी की माँग की तो पापा उन्हें घुड़क बैठे, “अब आपकी बात न मानी जाएगी। मैं आपका नुकसान नहीं कर सकता।”
         गुस्से के मारे फिर संतोष बुआ ने रात में सूप के साथ टोस्ट न लिया। सूप भी पापा ने उन्हें ज़बरदस्ती ही पिलाया, वह भी शायद तीन या चार चम्मच।
        रात में पापा ने मेरा बिस्तर भी चौबारे में बिछा दिया, “जब तक हम लोग अमृतसर नहीं जाते, सरोज बुआ के पास सोएगी। वहीं अपनी इंटर की पढ़ाई करेगी और वहीं उनकी हर ज़रूरत पूरी करेगी...”
        “हंसराज...हंसराज!” रात के किसी एक पहर संतोष बुआ एकाएक पापा को पुकारने लगीं।
      “कुछ चाहिए, बुआ?” मैंने पूछा।
       “मुझे मेरा बक्सा चाहिए...” उनका लोहे का बक्सा उनकी चारपाई के नीचे पड़ा रहता।
      “चाबी?” मैंने बक्सा बाहर खिसका लिया।
         बक्से की चाबी वह अपने पास ही रखा करतीं।
       “लो, खोलो,” अपने बिस्तर के तकिए के नीचे से चाबी उन्होंने मुझे पकड़ा दी और तकिए के सहारे बिस्तर पर बैठ लीं।
       उनके बक्से में झाँकने का मेरा वह पहला अवसर था। ममा ने भी उसे केवल खुलते और बंद होते ही देखा था और पापा के सिवा उस बक्से के वरण्र्य विषय हम बच्चों में से किसी की नज़र में न गुज़र सके थे।
      बक्से के बीच वाले हिस्से में कपड़े-ही-कपड़े धरे थे और दाएँ-बाएँ ऊपर ऊँचे उठे हुए लगभग आठ-आठ इंच के जो वे दो दराज़ रहे, सो उनमें दुनिया-भर का अल्लम-गल्लम जमा था।
      “मेरी थैली?” वह बुदबुदाई। सिक्के जमा करने के उनके पुराने शौक से हम सभी परिचित थे और हम जानते थे उनकी उस ’फेमस’ थैली में थे भाँति-भाँति के अनेक नए-पुराने सिक्के, समय-समय पर सरकार द्वारा जारी किए गए विभिन्न नए सिक्के, तरह-तरह के पुराने चौकोर पैसे, गोल पैसे, छेदिया पैसे, सन पचपन से पहले की इकन्नियाँ, दोअन्नियाँ, चवन्नियाँ, अठन्नियाँ इत्यादि…
        बल्कि ममा तो यह भी सोचती थीं कि संतोष बुआ की उस थैली में सोने की दो- एक अशर्फी भी थीं और चाँदी के इक्कीस-बीस रूपए भी।
       “यह कैसे फोटो हैं?” थैली की बगल में कुछ खुले फोटो मेरी तरफ झाँक रहे थे, “आपके हैं? रायविन्ड के दिनों के?”
       कुछ फोटो में बुआ पुराने कपड़ों में विभिन्न अजनबियों के साथ खड़ी थीं। परेशान और उलझी हुई आँखों के साथ। घर में हमें यही बताया गया था, वह पाकिस्तान के रायविन्ड गाँव से आई थीं। भारत सरकार द्वारा सन् उनचास में पाकिस्तान से लाई गईं सिक्ख-हिंदू स्त्रियों के जत्थे में। और जब उनसे बिछड़े उनके परिवारजन में से उन्हें लेने कोई न आया था, तो हमारी दादी ने उन्हें अपनी दूध-बहन बना लिया था। उन्हें बारहवीं जमात पास कराई थी और फिर उसी के बूते पर उन्हें एक स्कूल की नौकरी भी दिला दी थी। उम्र-भर वह यहीं फिर इसी चौबारे में टिक ली थीं...
        “रायविन्ड?” उन्होंने अजनबी आवाज़ में मुझसे पूछा।
          क्या अपनी बीमारी में वह इतनी दूर चली गई थीं? पाकिस्तान बनने के पहले के दिनों में? जब पाकिस्तान केवल एक असंभव योजना दिखती थी?
       “मेरा मतलब सन् सैंतालीस के पहले के वक्त से है,” मैंने कहा।
        “सन् सैंतालीस?”
        “हाँ, सन् सैंतालीस में ही तो पाकिस्तान बना था...जब आप रायविन्ड में रहती थीं...”
        “रायविन्ड?” वे फिर हैरान हुई।
         “दादी यही तो बताया करती थी, आप रायविन्ड से अमृतसर लाई गई थीं और फिर अमृतसर से वे आपको इधर लखनऊ ले आई थीं...”
        “वह सब झूठ था...मैंने रायविन्ड वाला इलाका कभी नहीं देखा है...”
         “कैसे?” मैं अधीर हुई।
           “सुबह के समय अभी मैं गर्म हमाम की पुरानी राख समेट रही थी...”
            पानी गर्म करने वाले हमाम को दादी भी गर्म हमाम कहा करतीं। पीतल का वह एक हमाम हमारी रसोई के भंडार में भी धरा है। उस हमाम के बीचोबीच हमाम की ही लंबाई के बराबर एक पाइप बना है, लगभग आठ इंच व्यास का। उस पाइप में गर्म कोयला डाल दिया जाता है और कोयले की आँच से हमाम में भरा पानी गर्म हो जाता है।
          “उन दिनों, राख दो जगह काम में लाई जाती थी,” बुआ बोलीं, “रसोई में, बर्तन चमकाने के लिए और पाखाने में, मल ढकने के लिए। आज जैसे फ्लश वाले बाथरूम तब थे कहाँ? उस मकान में दो पाखाने थे, छत वाला घर की स्त्रियों के काम आता और घर के मेन दरवाजे़ से सटा हुआ घर के पुरूष जन के। हाँ, तो उस दिन मैं नीचे वाले पाखाने की बगल में धरे डिब्बे में हमाम वाली राख अभी रख ही रही थी कि निचली दीवार के उस पार खड़े एक दंपती ने मुझे पुकारा, ’बहन...बहन...बहन! ’ उन दिनों घर में अपनी सौत के आ जाने की वजह से मेरी हालत एक टहलनी से बेहतर न थी और बहन के उस आत्मीय संबोधन ने मेरा दिल जीत लिया। मैं ने जाकर दरवाज़ा खोला। दम्पति ने कहा, जिस रिफ्यूज़ी कैंप में उन्हें ठहराया गया था, वहाँ का पाखाना उस स्त्री के इस्तेमाल के काबिल न था और अपनी गर्भावस्था की उस प्रवर्ती स्थिति में वह यहाँ का पाखाना इस्तेमाल करना चाहती थीं ।”
         “फिर?” मैंने पूछा।
          “उस समय सभी सो रहे थे और मैं पूछती भी तो किससे। मैंने उन्हें न नहीं की। ’कल फिर आ जाऊँ क्या?’ जाते समय स्त्री ने पूछा। ’आ जाना,’ मैंने कह दिया, लेकिन तीसरे ही दिन हम पकड़ी गईं। घर में कोहराम मच गया और मेरी सास और सौत ने मिलकर मेरी पिटाई करवाई...”
        “किससे?”
         “गन्ने की सीठी से। पति से मेरी बोलचाल बंद हुए लंबा अरसा गुज़र चुका था, लेकिन अब भी मेरी शिकायत उन्हीं तक पहुँचाई जाती थी और सज़ा भी उन्हीं के हाथों दिलवाई जाती थी...”
         “यह सब अमृतसर की बातें हैं?”
         “हाँ, अमृतसर की । पिटाई के समय मेरे दिमाग में अचानक ही तुलसीदास प्रकट हुए:
   स्वार्थ के साथी मेरे हाथी, स्वान ।
   लेवा देई काहू तो न पीर ।।
 और अगली सुबह उस दंपती के आने से पहले ही मैंने दीवार फाँदी और उन्हें सड़क पर जा मिली, ’उधर आज मत जाना। जाओगे, तो वे लोग आपक संग बुरा करेंगे।’ उन्हें जब पता चला, मुझ चातक की आस राम, स्याम, धन की भी खत्म हो चुकी थी, तो उन्होंने मुझे उस नरक को छोड़ देने के लिए कहा। संयोगवश वे उसी दिन इधर लखनऊ के लिए निकल रहे थे...और मैं उनके साथ हो ली...” 
          “आपके बाल-बच्चे? आपके मायके वाले? वे कहाँ थे?”
         “बच्चे मेरे थे नहीं। मैं बाँझ थी और मायके वाले मेरे बहुत डरपोक लोग थे। उन्हें मेरा कष्ट कबूल था, मगर अपने घर में मुझे जगह देना कबूल न था...”
          “वहाँ से भाग आने के बाद आपने वहाँ कभी अपनी खबर भेजी? उनकी खबर मँगवाई?"
         “सच पूछो तो उनकी तरफ मेरा कभी फिर ध्यान ही न गया था। तुम्हारी दादी के प्यार ने मुझे उनकी तरफ से बेपरवाह कर दिया था जैसे...लेकिन जब से मेरी वह हमदर्द गई है, मेरा ध्यान उधर बार-बार पलटता है...”
          “कैसे? क्यों?”
           “तुम्हारी ममा ने मेरा तवा जो अलग कर दिया। उधर अमृतसर में रूलाई थी, बेलिहाज़ी थी, बेइंसाफी थी, मगर रोटी तो इकल्ले तवे की थी...”
            “अब भी आपको एक ही तवे की रोटी मिलेगी, बुआ,” मैं रोने लगी। दादी का बुआ के प्रति रहा स्नेह मेरे कलेजे में उतर लिया, “मैं आपको वचन देती हूँ...।”
         “बदले में तुम मेरी यह थैली ले लो,” बुआ की आँखें भी छलक आईं, “मगर रोटी मुझे एक तवे की ही चाहिए...।”
         “थैली आप यहीं बक्से में रखिए,” मैंने कहा, “पापा से मैं जब ममा की शिकायत करूँगी तो उन्हें पापा का कहना मानना ही पड़ेगा...”
          “हंसराज को कहने से उसे बहुत दुःख होगा। वह बेचारा तो पूरे दम से मेरी सेवा करना चाहता ही है। तुम अपनी ममा से ही बात करना अभी...”
          “हमारा राशन-पानी क्या मुफ्त आता है?” मेरी बात सुनते ही ममा ने अपने हाथ नचाए, “तुम बच्चों की पढ़ाई मुफ्त हो रही है? क्या वह नहीं जानतीं कैसी कमरतोड़ महँगाई है? और न सही, अपना ही खर्चा मुझे दे दें...।”
        “अपनी थैली क्या वह ऊपर ले जाएँगी?”
         “ऐसी जड़ताई का क्या भरोसा? दम तोड़ते समय तुम्हारे पापा से कसम ले लें, यह थैली उधर अमृतसर पहुँचानी है...।”
       “तुम में न धीरज है, ममा,” मैं खीज गई, “न करूणा। जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती...।”
         “जादू-टोना वह बुढ़िया अच्छा जानती है...।”
         “बुआ अब अमृतसर नहीं जा रहीं,” तभी पापा हमारे पास चले आए, “यहीं रहेंगी और उनकी यह थैली भी अब हमारे पास रहेगी, लेकिन बस्स, नाम के वास्ते ।”
         “लाइए,” ममा ने फौरन थैली झपट ली, “मुझे दीजिए । इसे मैं अपनी अलमारी के सेफ में सँभालकर रखूँगी...”
        “लेकिन इसे खोलना नहीं,” पापा ने कहा, “बुआ की यह अमानत है...।”

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