समीक्षा: रिश्तों की बुनियाद पर टिकी "गहरे पत्तों की आदतें और अन्य कहानियाँ"

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: गहरे पत्तों की आदतें और अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)
कहानीकार: अंतरा करवड़े
मूल्य: ₹ 400/-
प्रकाशक: राइजिंग स्टार्स, दिल्ली

जब हम गद्य साहित्य पर विचार करते हैं, कहानी विधा महत्वपूर्ण और अपने सशक्त स्वरूप में उभरती है। यह प्रभावित और आकर्षित करने वाली विधा है तथा इसका विस्तार जोड़े रहता है। अक्सर विद्वतजन इसे साहित्य के केन्द्र में मानते हैं और शायद इसके बिना साहित्य अधूरा ही है। यह चिन्तन का विषय है, सहमति-असहमति हो सकती है परन्तु कहानी विधा को किसी भी रूप में छोड़ा नहीं जा सकता। कभी-कभी कविता के मृत्यु की घोषणा की जाती है परन्तु कहानी हमेशा जीवन्त रहती है। हालांकि कविता भी कभी मर नहीं सकती। ये सब साहित्य के विखंडनवादियों के चोंचले हैं, जब मन करता है, विधाओं पर प्रश्न उठाते रहते हैं और अपने को चर्चा में बनाए रखते हैं। कवि या कहानीकार अपने आसपास को, अपने भीतर-बाहर के संसार को, उसमें व्याप्त संगतियों-विसंगतियों को बहुत गहराई से समझता है और दूसरों को समझाना चाहता है। समाज-हित, देश-हित, आनन्द आदि रचनाकार के चिन्तन में होता है, वह स्वयं सुखी होना चाहता है और सम्पूर्ण मानवजाति, जीवजगत की चिन्ता करता है। अपने अनुभूत संसार की अभिव्यक्ति के लिए वह सर्वाधिक अनुकूल विधा का चुनाव करता है और लेखन शुरु कर देता है। कहानी शायद हर कहानीकार के लिए सर्वाधिक अनुकूल विधा है इसलिए कहानियाँ खूब लिखी जाती हैं और पाठक भी खूब पढ़ते हैं। कथा बुनने व सुनने-सुनाने की शैली ने इसे ग्राह्य और सहज बनाया है।

इन्दौर, मध्य प्रदेश की चर्चित कथाकार, अनुवादक, सम्मानित व पुरस्कृत साहित्यकार अंतरा करवडे का कहानी संग्रह "गहरे पत्तों की आदतें और अन्य कहानियाँ’’ मेरे सामने है। करवड़े अनेक विधाओं में साहित्य-सेवा कर रही हैं, सतत सक्रिय हैं और उनकी अपनी पहचान बन चुकी है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत डा० दीपक पाण्डेय ने इस संग्रह की भूमिका "नए भावबोध की कहानियाँ" शीर्षक के अन्तर्गत लिखी है। उन्होंने गहराई से संग्रह की कहानियों पर चिन्तन किया है और उनके निष्कर्ष सटीक व उपयुक्त हैं। वे लिखते है, "इस संग्रह की लगभग सभी कहानियों मे नारी के विविध प्रसंगों से संबंधित भावबोध गंभीर होने के साथ-साथ भावाभिव्यक्ति में सशक्त हैं और समाज को आज के परिवेश से जोड़ने का उपक्रम है।"

विजय कुमार तिवारी
अंतरा करवड़े के लिए कहानी किसी झरने के उपर ठहरे जल की भाँति है। वह ठहरा होकर भी ठहरा नहीं है। वे लिखती हैं-"इस सग्रह की कहानियाँ मन की सरल पुकार पर लिखी गई सहज कहानियाँ हैं। यह सही है कि अपना परिवेश, विचार, अनुभव और मन की आंतरिक उथल-पुथल हमेशा से ही लेखक की रचनाओं में मुखर होती रही है और ये रचनाएँ भी अपवाद नहीं है।" वे यह भी स्वीकार करती हैं कि स्त्री तत्व इनमें प्रमुखता से उभर कर आया है क्योंकि बदलाव और प्रवाह स्त्री जीवन और कहानी दोनों के अभिन्न तत्व हैं। अंतरा करवड़े के इस चिन्तन से असहमत होने का सवाल ही नहीं उठता, वे लिखती हैं-"स्त्री के लिए आसपास का माहौल पिछले समय में तेजी से बदला है लेकिन उतनी तेजी से उस माहौल के अनुरूप स्वयं को ढालती स्त्री की स्वीकार्यता नहीं बढ़ी है।" इस संग्रह में कुल 16 कहानियाँ हैं और ये सारी कहानियाँ भिन्न-भिन्न भाव-भूमि लिए स्त्री को केन्द्र में रखते हुए यथार्थ मनो-धरातल पर खड़ी होती हैं। इनमें स्त्री विमर्श, स्त्री मनोविज्ञान और स्त्री-पात्रों की उड़ान सहज ही दिखाई देती है।

'पाखी' अंतरा करवड़े द्वारा रचित प्रेम की अद्भुत कहानी है। प्रेम किसी के जीवन में ऐसे ही सहजता से जन्म लेता है, विस्तार पाता है और बिना किसी शोर के समर्पित हो जाता है। पंछी और पाखी की कथा में कबीर हैं, गायन है, मेला है, धूप, सूरज, माँ की सूती साड़ी, माला और भावनाएँ हैं--मैं और पंछी भी तो कुछ-कुछ ऐसा ही होना चाहते थे। प्रेमजनित भाव देखिए-पंछी कसमसाता है यहाँ और उसे देखकर मैं भी कसमसाना सीख रही हूँ। प्रेम है, तभी भय होता है-पहाड़ों पर उसे कोई पाखी मिल गई तो? पंछी अपनी प्रेमजनित स्थिति का खुलासा करता है-एक पतला सा धागा है जो यहाँ से जाने नहीं देता। मेला फिर लगने वाला है। नायिका हर अनुकूलता पर खुश होती है, पंछी पर अपना अधिकार समझती है, खुद पर इतराती है। नायिका के मन का उजास देखिए-मैं तो फिर से आसमान हो चली थी। उसने माला दिया और कार्यक्रम में सही समय पर पहुँचने को कहा। नायिका के मन का सारा द्वन्द्व खत्म हो गया और उसने अपना नाम पाखी रख लिया। कथाकार ने सधे हुए अंदाज में, परिपक्व मन की प्रेम कथा लिखी है, उनके शब्द, वाक्य भीतर के मनोभावों से जुड़ते हैं और पवित्र प्रेम सहजता से उतर आया है।

'पापा को देर हो गई है' मार्मिक बाल-मनोविज्ञान की कहानी है। आज के माहौल में यह कोई स्वाभाविक सी कथा है, बच्चों को माता-पिता स्कूल छोड़ने आते हैं और पढ़ाई खत्म होने पर वापस घर ले जाते हैं। स्थिति तब चिन्ताजनक या जटिल हो जाती है जब किसी बच्चे के माता-पिता को, अपने बच्चे को ले जाने के लिए आने में देर हो जाती है। इस कहानी में मिशी के पिता को आने में देर हुई है। अंतरा करवड़े ने मिशी के मन के भीतर की उधेड़बुन को, बाहर घट रही सारी घटनाओं को जिस तरह से बुना है, चमत्कृत करने वाला है। मिशी के मन में नाना चिन्तन उभरता है, भय, साहस, गुस्सा, अकेले पड़ जाने की पीड़ा, घायल पपी जैसी अनुभूति और पिता के न आ पाने के पीछे अनहोनी की चिन्ता उस छोटी-सी बच्ची के लिए असहज करने वाली घटना है। अंत में पिता के देर से आने का कारण जानकर मिशी ने कोई बड़ा सबक सीखा है, नन्ही सी बच्ची बड़ी हो रही है और पापा के लिए यह कोई सामान्य सी स्थिति है।

'गुलाबी फरवरी' विपरीत परिस्थितियों में रचनाकार के मन-मौसम की गुलाबी उड़ान की मोहक प्रेम कहानी है। रोहिणी अद्भुत प्रेमिका है, सहजता से स्वीकारती है और स्मृतियों में प्रेम के हर झोंके को याद करती है, लिखती है-"मन में हल्का गुलाबी फूल खिला भी था, ब्रांच के सहकर्मी निशांत के नाम से।" आगे लिखती हैं-"उसकी मुग्ध दृष्टि से स्वयं का पिघलना, वह महसूस करने लगी थी।" प्रेम की अनुभूतियों के नाना स्वरूपों को उजागर करती यह कहानी रोमांचित करने वाली है। अंत में नायिका तय कर लेती है-"इस बार के बसंत को तो बाँध ही लेना है मन की पोटली में।" सच ही कहा गया है, प्रेम में कोई आलोक होता है। अंतरा करवड़े उस आलोक को समझती-पहचानती हैं, अपनी कहानियों में छटा बिखेरती हैं और मौसम से जोड़ सबको आलोकित कर देती हैं। भाव-दृश्यों को चित्रित करती शैली और भाषा किसी चमत्कार की तरह उभरता है उनकी कहानियों में। 

कहानीकार पात्रों के मन से तालमेल बना लेता है, उसके मनोविज्ञान से जुड़ जाता है और कोई गहरा भाव जख्मी अवस्था में पड़ा होता है तो ऐसी कहानियाँ आकार लेने लगती हैं। चुनौतियों के बीच राह बना लेना अंतरा करवड़े की कहानियों का सहज संदेश है। 'पत्नी की मौत के बाद" व्यक्ति व समाज का मनोविज्ञान, सारे अन्तर्विरोध और सबकी सोच को लेकर यथार्थ भाव-दशा की कहानी है। कहानी वस्तुस्थिति से दूर कोई आवरण लिए व्यंग्य सी लगती है जिसे सोचना और लिख देना सहज है क्या? कहानी संदेश देती है-ऐसी परिस्थितियों में अच्छे-भले स्वस्थ व्यक्ति को समाज अपनी सोच के अनुसार तब्दील कर देता है। अंतरा करवड़े की स्त्री पात्रों का मन आसमान हो जाता है, इन्द्रधनुषी होने लगता है, ऐसे बिंब-भाव कोई समाँ बाँध देते हैं। कसमसाना उनका प्रिय शब्द है, उनके पात्र कसमसाते रहते हैं और प्रेमाभिव्यक्ति के क्षण जीवन्त हो उठते हैं। 'बर्गर गुझिया' नए तरीके से अपनी पुरातन संस्कृति के साथ जी लेने के उत्साह की कहानी है। शालिनी का सजना-सँवरना, घर में गुझिया, बेसन चक्की बना लेना और वसु के साथ उसके घरों की ओर जाकर होली खेलना, उनका कोई नया अवतार है और सभी प्रसन्न हो रहे हैं। ऐसे ही नहीं हमारी संस्कृति श्रेष्ठ है, उसमें खुशियाँ है, सहभागिता है और मिल जुलकर उत्सव मनाने का जोश है। अंतरा करवड़े ऐसी कहानियाँ लिखकर सबको आमंत्रित करती हैं और इसके पीछे की भावनाओं को दिखाती हैं।

'समानांतर' बाल मनोविज्ञान से जुड़ी मार्मिक कहानी है। उन्होंने इस कहानी में बच्चे और माँ के बीच की दूरी को, जटिलता को पूरी संवेदना के साथ चित्रित किया है। अक्सर लोग अपने बच्चों को हास्टल में भेज देते हैं और बेहतर शिक्षा का दावा करते हैं परन्तु आपसी सम्बन्धों को लेकर हुई हानि नहीं समझते। यह कहानी प्रश्न करती है और उत्तर की मांग करती है। बच्चा तर्कों के साथ माँ से पूछता है-मुझे यहाँ रखने के पीछे क्या कारण था? सुषमा यानी माँ के रूप में ऐसी हर माँ के लिए यह जटिल कहानी है। करवड़े लिखती हैं-"माँ होना और माँ बने रहना, वाकई कितना फर्क है दोनों में।" 'शिखा बोल्ड हो गई है' स्त्री विमर्श के चिन्तन की कहानी है। हर व्यक्ति के जीवन में कोई कोना खाली रहता है जिसे लोग अपने-अपने तरीके से भरने की कोशिश करते हैं। शिखा ने अपने तरीके से स्वयं को ढाल लिया है और सहजता से जी रही है। वह सहकर्मी शौनक को पसंद करती है। शिखर के साथ रहते हुए वह दोयम ही रहती है। शिखर में अहंकार नहीं लेकिन समर्पण भी नहीं है। शिखा कहती है-'मन में ही रखना पड़ता है सब कुछ।' वह जीवन जीने की अपनी परिभाषा बताती है-"शिखर मेरे जीवन की तृप्ति है और शौनक मेरे जीवन की प्यास। मेरी कोशिश है कि यह प्यास बनी रहे।" अंतरा करवड़े ने बड़ी बारीकी से स्त्री मन की उड़ान को कोई सार्थक धरातल दिया है और भीतरी अन्तर्विरोधों को सुलझाने का रास्ता दिखाया है।

वह स्थानीय बोली-भाषा के साथ-साथ उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करती हैं। कहानी जिस पृष्ठभूमि की होती है, वहाँ के दृश्य, वहाँ की परम्पराएँ और भाव-चिन्तन रचना को कोई ऊँचाई प्रदान करते हैं। 'मिरुल' कहानी में वह वैसे ही आलोक में किसी टापू की रहवासी-सी है। धर्मा फूल है, मिरुल चट्टान की तरह उससे सम्बल पाती है और कोई तराशा हुआ नगर बसा लेती है। उसका फूल वाला धर्मा खो जाता है। कहानी मोड़ लेती है। मिरुल को धर्मा मिलता है उससे 10 वर्ष बड़े लड़के के रूप में। दोनों को ट्रैकिंग के लिए पहाड़ पर जाने की छूट मिलती है। मिरुल तितली बन गई है। बर्फीले तूफान में धर्मा सदा के लिए खो गया है। वह न उससे प्रेम कर पाई और न ही अब भी खुलकर उसकी पूजा ही कर पाती है। उसके पियानो बजाने से प्रभावित विकी मिलता है और मिरुल को धर्मा के मिल जाने जैसी संतुष्टि होती है। लेखिका नायिकाओं की मनःस्थितियों व प्रेम का अद्भुत चित्रण करती हैं मानो उन स्थितियों को खुद जी रही होती हैं। अंतरा करवड़े प्रेमिकाओं के मन की परतों को खोलती हैं, भीतरी प्रवाह मूर्त करती हैं और संवेदनाओं से भर देती हैं। किसी को भी सम्पूर्ण प्रेम एक ही बार में नही मिलता, मिलता है, छूट जाता है या मिलते-मिलते रह जाता है। ऐसी भावनाओं को चित्रित करने में उन्हें महारत है। 'मेरा समुंदर' अनाथाश्रम में पली-बढ़ी लड़की की मार्मिक कहानी है। बिन्नी को पता है, उसे समुद्र के किनारे कोई छोड़ गया था और स्वयं समुंदर में जा मिला। बिन्नी के मनोचिन्तन को सहजता से उकेरती कहानी भावुक करती है। कहानी का अंत सुखद है, उसे उसका समुंदर मिल जाता है।

लेखिका को एक विशेष तरह का प्रेम आकर्षित करता है। 'एकांत बाँसुरी' में लिखती हैं-यह अपनापा निष्पाप रहना चाहिए। सोच को पक्का कर लिया-कोई अपेक्षा नहीं, कहीं किसी प्रकार का रुठना मनाना नहीं, एक-दूसरे के लिए एक हमदर्द होने के साथ। राहुल और क्वीनी ऐसे ही हैं। अचानक कहानी मोड़ लेती है और दुर्घटना में क्वीनी का अंत हो जाता है। राहुल को श्रीनिका मिलती है, दोनों के भाव-विचार मिलते हैं। अंतरा करवड़े सहमति का जबरदस्त दृश्य बुनती हैं, दोनों पात्रों में अनुकूलता चित्रित करती हैं और खूब उड़ान भरती हैं। यह सुखद सृजन सबको सुखी करने वाला है, लिखती हैं-'हम सुनेंगे अपने मन के एकांत को।' कहानी यह भी संदेश देती है-हमें अपनी संस्कृति, पर्वत-पहाड़, नदी, गाँव में बसे लोगों के साथ जीना चाहिए और दोनों बाँसुरी सा भाव लिए आनंद में जी रहे हैं। वह स्त्री-पुरुष के मन के भीतर की गांठों को खोलना जानती हैं और अपनी कहानियों में व्यक्त करती हैं। 

कहानी वही नहीं होती जो घटनाओं में उलझी होती है, चित्रांकन के साथ दृश्यों का विस्तार करती है, कहानी वह भी है जो अंतरा करवड़े बुनती रहती हैं और प्रेम को परिभाषित करना चाहती हैं। संग्रह की कहानियों को पढ़ते हुए उनकी भीतरी तलाश, अतृप्ति और पूर्णता को समझने की कोशिश जैसे भाव-विचार अपना उत्तर खोजते हैं। कभी किसी हस्तिनी को देखिए, जल में उतरने के पहले पाँवों से तटीय जमीन के भार सहन करने का थाह लेती है। वैसे ही करवड़े की नायिकाएँ प्रेम के लिए सामने वाले की थाह लेती हैं और धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। शायद यही कारण है, मतभिन्नता या अनुकूल न होने पर सहजता से लौट जाती हैं। जीवन में विकल्पों को लेकर सजग रहती हैं और रोने-धोने के बजाए नए सिरे से जिंदगी शुरु करती हैं। उनकी अपनी शैली है, कभी कथा सुनाती हैं या स्वयं डूबकर पाठकों को डुबा देती हैं। प्रकृति के बिंब, नदी, पहाड़, बर्फीली घाटियाँ, हरियाली सबका स्थान है उनकी कहानियों में और उनका शब्द चयन आलोकित कर देता है। 'स्वेता' कहानी का भाव-प्रवाह अद्भुत है। साधना के मार्ग का, विशेष रूप से युवा स्त्री द्वारा साधना के मार्ग के चयन में आंतरिक व बाह्य अवरोधो, विरोधों, भटकावों का जीवन्त चित्रण हुआ है इस कहानी में। मन तो भटकता ही है परन्तु गुरु का आशीर्वाद हो, संकल्प से भरा मन हो तो सब कुछ संभव है। स्वेता संकल्प के साथ अभीष्ट मार्ग पर चल पड़ी है और उसके आसपास प्रकाश ही प्रकाश है।

अंतरा करवड़े मन को पढ़ती हैं और सहजता से उलझनों को सुलझाना चाहती हैं। हर लड़की का मन वैसे ही डांवांडोल रहता है, माँ भी समझाए तो क्या समझाए? शादी या प्रेम में अक्सर लड़कियाँ आश्वस्त नहीं हो पातीं। रिश्ते-नाते अपना खेल खेलते रहते हैं। शैली को अपने मन को जान लेने के लिए भी मम्मी की मदद चाहिए। विराज का दार्शनिक अंदाज भा गया है। उसने गहरे रंग के पत्तों वाली फ्रेम उपहार में दी थी। उसे लेकर घर में सीलन भरी उथल-पुथल चल ही रही थी कि सड़क हादसे में विराज का अंत हो गया। माँ, पिता और स्वयं शैली सभी चिन्तन कर रहे हैं। करवड़े लिखती हैं-तीनो अपने-अपने द्वीपों पर बैठे हुए चारों ओर से झंझावात का सामना कर रहे हैं। शैली सजग होती है, नए सिरे से जिंदगी को नया रंग देती है, माँ-पिता की शादी की वर्षगाँठ पर मुस्कराती है और गुलदस्ते से हरा पत्ता ले माँ के बालों में खोंस देती है। 'सेकेण्ड हैण्ड' मार्मिक और भावुक करने वाली कहानी है। रिश्ते समय आने पर अपना रंग दिखाने लगते हैं। वाणी अपनी गरीबी से त्रस्त है, दुखी रहती है और कहती है-'अपनी किस्मत से कैसे लड़ सकती है वो?' वाणी की जिससे शादी हुई, वह असाध्य रोगी था। बहुत मुश्किल से उसे मुक्ति मिली। समीर का रिश्ता आया। उसे घर सम्हालने वाली पत्नी चाहिए थी। भाभी के बन-ठनकर आने और उपहास कर जाने की पीड़ा से व्यथित उसका मन उखड़ चुका था। समीर ने सहानुभूति पूर्वक उसे समझाया और खुले मन से उसके संघर्ष की चर्चा की। समीर का यह कोई छिपा हुआ नवीन रूप था। पहली बार वाणी को अपने व्यवहार पर ग्लानि हुई। समीर ने बताया, "माँ ने पूछा था कि तलाकशुदा लड़की ही क्यों? मेरा तर्क था-जो लड़की इतने बड़े दुखों का सामना की है, मेरी मनःस्थिति को बेहतर तरीके से समझ सकेगी।" अंतरा करवड़े ने पारिवारिक मनोविज्ञान को समझा है और सुखान्त कहानी की रचना की है।

'रिपोर्ट' वात्सल्य भाव से युक्त प्रेम के तलाश की मार्मिक, मनोवैज्ञानिक कहानी है। माही चिंतन को लेकर नाना दृष्टिकोण से विचार करती है और उसके आत्महत्या करने के प्रयास के पीछे के कारणों को समझना चाहती है। कहानीकार के पास वह ज्ञान दृष्टि है जो ऐसे रहस्यों की तह तक ले जाती है। माही ने गौर किया कि चिंतन को देखने उसकी माँ नहीं आती। जीवन की इस रिक्तता को वह पकड़ लेती है, जब माही की माँ उसके बालों में तेल लगाती है, उसे सुकून और संतुष्टि मिलती है। वह निष्कर्ष पर पहुँचती है-"वो बस अपने हिस्से का स्नेह चाहता था, बताना चाहता था परिवार को या फिर समाज को भी कि उसका होना भी मायने रखता है। या फिर एक बार जाँच लेना चाहता था सबकी आँखों में अपने लिए मौजूद अपनापन।" अंतरा करवड़े चिंतन की सुखद अनुभूति को तुलनात्मक बिंबों में चित्रित करती हैं। सम्पूर्ण कहानी में संवेदना, वात्सल्य, प्रेम, करुणा का अद्भुत ताना-बाना है जो कथाकार की समझ दर्शाता है। 

'उखड़ी हुई जड़' अपनी जड़ों को टटोलती, मार्मिक संवेदनाओं से भरी कहानी है। हम दुनिया में कहीं भी चले जाएं, हमारी जड़ें स्मृतियों में जीवन्त रहती हैं। शशांक ने इसे अपनी माँ द्वारा मायके की राजस्थानी चूंदड़ी पर हाथ फेरते हुए देखकर अनुभव किया है। वैसे ही उसे पूर्वोत्तर की यादें प्रभावित करती हैं, जहाँ वह पला-बढ़ा है। अंतरा करवड़े बड़े मार्मिक अंदाज में इस भाव को स्पष्ट करते हुए लिखती हैं- यह एक यात्रा होती है जो हम कहीं और जाने पर घर की ओर करते रहते हैं हमेशा।' शशांक को पूरे दक्षिण भारतीय परिवेश में खूबसूरती बहुत सारी मिली लेकिन ब्रह्मपुत्र जैसा विशाल कुछ भी नहीं था। अंतरा के भीतर सौन्दर्य के प्रतिमान के रुप में कुछ शब्द रोचकता प्रदान करते हैं। शशांक को कामिनी का साँवला चेहरा फूलों, गहनों से सजा, सादा लेकिन कंटीला अवतार आँखों के सामने झूम सा गया। कंटीला अवतार किसी भी लड़की के लिए जबरदस्त विशेषण है। यह चिन्तन बहुत महत्वपूर्ण है, बाहर की मिट्टी देखकर हम अपनी जड़ों को लेकर संजीदा हो उठते हैं। शशांक मन ही मन अपनी जड़ों को मजबूती से पकड़े रहने के भाव से भरा हुआ है।

अंतरा करवड़े अपनी कहानियों में गहरे भाव लिए शब्द या वाक्य प्रयोग करती हैं और कोई आलोक उभारती हैं। 'आईना देखो गार्गी' का प्रसंग देखिए-शिवेन, पारंपरिक स्नेही पुरुष के खोल में घुसकर गार्गी से अपने समर्पण और प्रेम की कोई कैफियत नहीं मांग पाया। पारंपरिक स्नेही पुरुष का खोल, यह कोई साधारण समझ है क्या किसी स्त्री के लिए? वह पुरुष की गहरी पहचान रखती हैं, उनकी कहानियाँ इसका प्रमाण हैं परन्तु ठहराव नहीं है, भाग-दौड़ है। वह मनोविज्ञान के सहारे स्त्री-मन को रेखांकित करती हैं। माता-पिता गार्गी के पसंद पर सहर्ष तैयार होते हैं तब पता नहीं क्यों गार्गी खुश नहीं हो पाती। यह कहानी आज के युवा स्त्री-पुरुष की सच्चाई है। ऐसे दृश्य बहुतेरे देखने को मिलते हैं। अंतरा करवड़े उस अन्तर्द्वन्द्व को समझना चाहती हैं जो गार्गी के जीवन में है। कहानी बहुत से प्रश्न छोड़ती है और उसका उत्तर उन्हीं युवाओं को खोजना है।

इस तरह देखा जाए तो अंतरा करवड़े की कहानियों में प्रेम को लेकर स्त्री-मन का अन्तर्द्वन्द्व है। उपलब्ध प्रेम अपनी जगह है, उसमें स्थायी-भाव है परन्तु कोई प्यास बनी हुई है। स्त्री-मन के इस पक्ष को स्वीकार करना और लिख देना किसी भी स्त्री कथाकार के लिए साहस की बात है। यह सोच अच्छी है, इन कहानियों के पात्र अपने प्रेमी या प्रेमिका के न रहने, अलग हो जाने या मृत्यु हो जाने पर नए सिरे से जिंदगी शुरु करते हैं। उनकी भाषा में प्रवाह है और भावनाएँ सहजता से व्यक्त होती हैं। शैली चिन्तनात्मक है, अचानक कोई पात्र छलांग नहीं लगाता बल्कि खूब सोचता है, विचार करता है। कथाकार का हृदय प्रेम से भरा है, विपरीत परिस्थिति में धैर्य बना रहता है और प्रेम को लेकर गहरी समझ है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।