समीक्षा: ‘सूरजमुखी’ की भावना-प्रधान बहुआयामी कविताएँ

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: सूरजमुखी (कविता संग्रह) 
कवयित्री: वसुधा गाडगिल
मूल्य: ₹ 400/-
प्रकाशक: मोनिका प्रकाशन, दिल्ली

कविता कोई हिलोर पैदा करती है, कहीं न कहीं जोड़ती है किसी आभा से, किसी आलोक से और कवयित्री या कवि अपनी अनुभूतियों को हृदय से होते हुए कागज पर उकेरने लगते हैं। हर संवेदनशील व्यक्ति की यह कोई यात्रा की तरह है। कविता के लिए संवेदना जरुरी है इसलिए कविता हृदय की वस्तु है। कविता नाना रसों में व्यक्त होती है और सबको अपने तरीके से प्रभावित करती है। जिन्हें कविता या काव्य प्रभावित नहीं करता, वे स्वयं के लिए भी चुनौती होते हैं, देश-समाज के लिए तो होते ही हैं। हमारे जीवन में साहित्य किसी न किसी विधा के साथ होना ही चाहिए।

इंदौर, मध्य प्रदेश की चर्चित कवयित्री, साहित्यकार डा० वसुधा गाडगिल का नवीनतम काव्य संग्रह "सूरजमुखी" मेरे सामने है। इस संग्रह में उनकी 75 कविताएँ हैं। डा० गाडगिल साहित्य की अधिकांश विधाओं में सृजन-लेखन करती हैं और उनकी पुस्तकें पाठकों को सुखद अनुभूतियों का रसास्वादन करवा रही हैं। उन्हें उनके साहित्यिक लेखन के लिए नाना पुरस्कारों/ सम्मानों से पुरस्कृत/सम्मानित किया गया है। वे अनुवाद भी करती हैं और पत्रिकाओं का संपादन भी। हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा, डा० वसुधा गाडगिल बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न हैं और 'सूरजमुखी' की कविताएँ अपना आलोक फैलाने वाली हैं।

विजय कुमार तिवारी
डा० नूतन पाण्डेय, सहायक निदेशक, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली ने विस्तार से संग्रह की अपनी भूमिका में लिखा है-"वसुधा जी ने अपने जीवन की उन छोटी-छोटी घटनाओं को कविताओं के माध्यम से शब्द दिए हैं जिन्होंने जीवन के विभिन्न मोड़ों पर उन्हें गहराई से छुआ, झंझोरा, संवेदित किया और कविता लिखने के लिए विवश किया।" उनका यह कथन भी ध्यान देने योग्य है- "संग्रह की कविताएँ खुलेआम मुनादी करती हैं कि जब-जब मानवता पर खतरा बढ़ा है तब-तब कविता मानवता की लड़ाई को जीतने में विश्वसनीय और सशक्त हथियार बनकर सृष्टि को संबल देती आई है।" उन्होंने संग्रह की कविताओं पर विस्तार से लिखा है और अच्छी कविता को परिभाषित किया है। इस भूमिका के बाद किसी और के द्वारा कहने के लिए कुछ रह नहीं जाता, उन्होंने विशद और पर्याप्त चिन्तन किया है।

वसुधा जी को साहित्यिक पारिवारिक पृष्ठभूमि मिली है और उनका मन साहित्य में रमता गया। उन्होंने लिखा है-"मैं, कल-कल निनाद करती नर्मदा की लहरों पर सवार होकर निकल पड़ती, कल्पना लोक में घंटों विचरण करती। संगमरमरी वादियों में घूमकर फिर लौट आती वास्तविक जगत में। नर्मदा के किनारों को देखती, अनुभूत करती, किनारों पर बसी संस्कृति को, संस्कारों को। इस तरह धीरे-धीरे प्रकृति से, नदियों से, पृथ्वी पर फैले हरे-भरे जंगलों से, आकाश से, शीतल समीर और प्रकृति के विभिन्न उपादानों से जुड़ गई।" उन्होंने आगे लिखा है-"यह लेखन कर्म मेरे जीवन के विभिन्न अनुभवों की शाब्दिक अभिव्यक्ति है। इन अनुभवों में खट्टे-मीठे, कड़वे-कसैले, कटु-तिक्त आस्वाद हैं जिनमें यथार्थ और कल्पना का सम्मिश्रण है।" वसुधा जी ने वर्तमान जटिल परिस्थितियों, समाज की संगतियों-विसंगतियों का यथार्थ विवरण लिखा है। इन सबका प्रभाव उनकी कविताओं में देखने को मिलता है और संग्रह की कविताएँ उन्हें संवेदनशील कवयित्री के रूप में पहचान दिलाती हैं।

कवयित्री नर्मदा को केवल नदी नहीं मानती, नदी से संवाद करती हैं, बतकही करना चाहती हैं और उसका साज-संगीत, आरती, प्रदेश की जीवन रेखा, प्रेम की सभ्यता, आस्था और भाषा संजोती हैं। 'चंदन' कविता में हमारा सम्पूर्ण जीवन-दर्शन छिपा हुआ है और ऐसी अनुभूतियाँ जीवन का सच दिखाती हैं। कवयित्री प्रकृति से तालमेल बनाती हैं, सौन्दर्य और उसका औदार्य ग्रहण करती हैं। यह कोई बड़ा संदेश है कि हर परिस्थिति में हमारी भलाई है। 'सूरजमुखी' कविता के नाम पर ही संग्रह का नामकरण हुआ है। अत्यन्त सहजता से यह कविता उम्मीद जगाती है क्योंकि नन्ही सी बच्ची समझती है-इस सूरजमुखी जैसा ही/इक दिन/उसका भी जीवन खिलेगा। 'अनुशासन' शीर्षक की दोनों कविताओं में भाव यही है, प्रकृति में अनुशासन है, तभी सब कुछ सहज है, पूर्णता है रंगों में, घटकों में मेल है, सभ्यता-संस्कृति है और बुद्धिमान मानव को अभी रंगों से अनुशासन सीखना है। प्रकृति से हमें सीखना-समझना है, कवयित्री अपने अनुभवों के आधार पर गहन संदेश देती है क्योंकि प्रकृति में सौन्दर्य है, जीवन का सह-अस्तित्व और प्रेम है। प्रकृति हमें त्याग-तपस्या, धैर्य बहुत कुछ सिखाती है।

'उम्मीदें' और 'जीना चाहता हूँ' जैसी कविताओं में उनके भाव सकारात्मक हैं। वह आशावादी और उम्मीदों से भरी हैं। 'महोत्सव' व 'बारिश' कविता में वे प्रकृति के नाना बिंबों के माध्यम से पावस ऋतु के आगमन का उत्सव मना रही हैं। उनके मन के भीतर की सकारात्मकता 'परोपकार' के तितली प्रसंग में उभरती है। ऐसी अनुभूतियों का चित्रण विह्वल करने वाला है। 'दीपस्तंभ' में उन्होंने बचपन की डरावनी अंधेरी रातों में दादा जी द्वारा कंदील जलाना याद किया है जो डरी-सहमी बच्ची को सूरज का निर्भय करने वाला प्रकाश लगता है। 'महत्व' कविता में बरसात की बूँद को वे अपने तन-मन में महसूस करती हैं और उसके महत्व को समझाती हैं। 'दृष्टि' में जल के स्पर्श मात्र से नदी के साथ संवाद कर लेने का भाव अनुपम है जो कवयित्री को जीवन-दृष्टि दे रही है।'साथ' कविता आपसी विश्वास के बढ़ने का संकेत देती है। नर्मदा में डुबकी लगाकर उनको दिव्यानंद की अनुभूति होती है और सारे द्वेष, कलह, क्लेश मिट गए हैं।

कवयित्री नदी के कल-कल 'संगीत' से जीवन के बेसुरे ताल, राग, स्वर, लय में नव ताल, नव स्पंदन रचती हैं। 'उनका प्रेम' आपसी प्रेम की सहज कविता है। उन्हें प्रकृति की हर-एक वस्तु से प्रेम है। उनका भाव देखिए-और मैं!/मैं डूबी हूँ आकंठ/उनके इस प्रेम में। 'पुनर्नवा' धरती की सम्पूर्ण जीवन यात्रा पर अनूठे चिन्तन-भाव की कविता है। वह चकित होकर प्रश्न करती हैं-धरा!/तुम कैसे घूम लेती हो/ अपनी धुरी पर/और/आग उगलते सूरज के चारों ओर। मनुष्य तुम्हारा शोषण करता है, फिर भी तुम बन सँवर कर आ जाती हो, हरियाली की चादर ओढ़ लेती हो और नई-नवेली दुल्हन सी पुनर्नवा हो जाती हो। माँ और सासु माँ को एक भाव-दशा में अनुभव करती कविता 'एक ही रिश्ता' अद्भुत आदर्श रिश्ता व्यक्त करती है। कवयित्री का हृदय प्रेम से, स्नेह से, सौन्दर्य से भरा हुआ है, वह जीवन की नकारात्मता का चित्रण करना नहीं चाहती। उनकी चाह देखिए-लिखूँगी मैं/एक नई कविता/एक नई कहानी/मिट्टी को नम करती/बारिश की फुहारों-सी/दिलों को भिगोती/फूलों की सुगंध-सी/प्रेम की। ऐसी भावनाएँ किसी सहज, शांत, स्थिर मन में पैदा होती हैं, कवयित्री निश्चय ही प्रेम से भरी हुई है। 'स्वर्ग सूना है' उम्मीदों के भाव से भरी धरती के स्वर्ग की कविता है। वहाँ की धरती, हवा, पानी, हरियाली, समाज सर्वत्र त्रासदी है, कवयित्री की उम्मीदें देखिए-फिर भी/कल्हण, मम्मट, बिल्हण की संतानों को/ उम्मीद है, आस है/ वितस्ता कल, कल-कल बहेगी/धरती खिलेगी अंबर धवल होगा/आज अंधेरा है कल उजाला होगा/कल सूरज के साथ 'नवरेह' भी आयेगा।

वसुधा गाडगिल कविताएँ कहानी की तरह लिख डालती हैं और उसका प्रभाव चमत्कृत करता है। 'जिंदगी' कविता में माँ और बच्चा डरे-सहमे भागे जा रहे हैं, इंसानी बस्ती तलाश रहे हैं, युद्ध चल रहा है, गोलियों ने माँ के शरीर को छलनी कर दिया है, खून से लथपथ जमीन पर गिर-पड़ी है और बच्चा रो रहा है। शत्रु देश का सैनिक बच्चे को गले लगाता है, बच्चा मुस्कराता है, सैनिक माफी माँगता है, कहता है-तुम्हारी निर्मल मुस्कान में/बसा है मानवता का पाठ/तुमसे विश्व में है/प्रशांति और आह्लाद। 'महक पुरानी' कविता में एल्बम के सहारे पुरानी स्मृतियाँ जाग उठी हैं। 'वारी जाऊँ' कविता में पुरुष के आदर्श कार्यों को देखते हुए कवयित्री की धारणा अद्भुत है-हे पुरुष!/तुम्हारे आंतरिक सौंदर्य पर/मैं वारी जाऊँ। 'सुभोर उदय' साहस करके उठ खड़े होने के संदेश की कविता है।

'कवयित्री के भाव 'साहित्यकार' कविता में साहित्यकार के लिए सार्थक, सही और श्रद्धा जगाने वाले हैं। उन्होंने सहज मन से लेखन-कर्म को बड़ी ऊँचाई दी है। 'मुदित आशा उर्जित भाषा' कविता में आज व्यवहृत हो रही भाषा को लेकर उनकी चिन्ता ध्यान आकृष्ट करती है और वे ऐसी कविता लिखना चाहती हैं जिसमें प्रीति, अहिंसा, मन से मन के जुड़ने और प्रेम की भाषा होगी। 'मेरी कविता' में उनके भाव-विचार, प्रक्रियाएँ और प्रभाव प्रभावित करते हैं, लिखती हैं-शब्दों की यह है जादूगरी/मैं बनती निमित्त मात्र/ले जाती वह तम से प्रकाश की ओर/बन जाती उम्मीद और आस। 'बूँदें' कविता में बारिश के समय पत्तों के साथ संवाद कवयित्री के मन का उत्साह और ज्ञान दिखाता है। 'आस' और 'वर्षा संगीत' के भाव वैसे ही निराले हैं। वह अपनी रचना में सहज शब्दों का चयन करती हैं जिनमें उल्लास, प्रफुल्लता और कोई सौंदर्य उभरता हो। उनके हृदय में करुणा और प्रेम भरा है जो कविताओं के रूप में निःसृत होता रहता है। 'सृजन' में देखिए, लिखती हैं-मैंने पत्थरों को हौले से छुआ/विज्ञान के अनुसंधान को/जानने का यत्न किया। अंत में उनका निष्कर्ष देखिए-प्रस्तर/निर्माण करते हैं ध्वंस नहीं/सृजन करते हैं/विध्वंस नहीं। 'गोविंदा आला रे आला' प्रकृति प्रेम, मनुष्य श्रम की भावनाओं से भरी, सुन्दर दृश्य दिखाती, ईश्वरीय भाव की कविता है। उनकी पंक्ति देखिए-यहाँ/साक्षात दर्शन हुए तुम्हारे, हे ईश्वर! 'नवजीवन' कविता में उन्होंने वृद्ध माँ को लेकर यथार्थ मार्मिक चित्रण किया है। आजकल ऐसा ही हो रहा है। वृद्ध माँ घर भर के लिए समस्या बनी हुई है। एक दिन सबको जाना है, वह भी चली गई, परिवार को एक कर गई। मृत्यु के बाद/कडु़वाहट हटा/कलह-क्लेश मिटा/घर में प्राणवायु फूँक गई/घर को जीवित कर गई/वह माँ थी/परिवार को नवजीवन दे गई। 'क्योंकि' कविता में स्त्री के लिए बहुत सुन्दर भाव की पंक्ति है-जीवन में/सप्त शक्तिधारिणी स्त्री/हाँ/जगत की/आदिशक्ति है। 

वसुधा गाडगिल देश के सबसे स्वच्छ शहर में रहती हैं और 'सत्रहवाँ संस्कार' कविता के माध्यम से शहर की गंदगी से स्वच्छता की यात्रा का बखान करती हैं, उनकी पंक्तियाँ देखिए-इस नमकीन शहर/की पहचान और नाम/शुद्धता और सौंदर्य/का पर्याय बन गया है/और स्वच्छता!/स्वच्छता, मेरे शहर का/ 'सत्रहवाँ संस्कार' हो गया है। हम भी सीखें प्रकृति से/कायाकल्प करना, 'अनुगमन' कविता के भाव सुखद अनुभूति देने वाले हैं। 'मुक्ति' कविता में समाज में व्याप्त ईर्ष्या, निंदा, द्वेष, लालच आदि बुराइयों से मुक्ति का संदेश है। 'मौन संवाद' को उन्होंने सहजता से समझा है, लिखती हैं-मौन संवाद/हौले से कहते हैं, अपनी बात/रंगहीन जीवन में/उदास जीवन में/भर देते हैं/उमंग भरे रंग। 'अस्तित्व में है' कविता की पंक्तियाँ सब कुछ कह रही हैं-मेरी ओर देख मुस्करा दिए/मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया/ लगा/संबंध, मृतपाय नहीं है/जीवंत है, अस्तित्व में है।'गुरुवर' कविता 'व्यर्थ प्रयास का कानून' जानवर, जीव-जन्तु, पेड़-प्रकृति के माध्यम से समझाती हैं और कर्म करते रहने का संदेश देती हैं। 'प्रेम' कविता में आज की स्थिति प्रकट हो रही है। अक्सर सहज उपलब्ध प्रेमियों, सुहृदजनों की पहचान नहीं हो पाती और हम झुँझलाते रहते हैं।'आश्वस्ति जैसी कविता भिन्न परिस्थितियों में भी उम्मीद जगाती है। 'मुस्कराना' पीड़ित मन की कविता है। वर्षों से उसका हँसना-मुस्कराना नहीं हुआ है। आज बलात्कारी के आजीवन कैद के समाचार को सुनकर वह मुस्करा पड़ी है। नाना बिंबों में वह नमी की तलाश करती है, प्रेम, अपनापन, शीतल छाँव और प्रेमासिक्त भावनाओं का प्रवाह खोज रही है। डा० गाडगिल की कविताओं में आत्मीयता है, लगाव है और संवेदनाएँ भरी पड़ी है।

उनकी 'संवाद' की शैली कोई नया आलोक फैलाती है। 'त्रिदेवस्वरू पा' का विस्तार हर किसी के जीवन की मार्मिक सच्चाई है। बिल्कुल यही तो होता है और हर किसी को माँ के न रहने पर समझ आता है, पंक्तियाँ देखिए-हाँ, देखा मैंने/त्रिगुणों से परिपूर्ण माँ को/देखा मैंने शुद्ध स्वरुपा माँ में/ इस त्रिवेणी-से निर्झर बहते सोते को। वह हर पल प्रकृति को महत्व देती हैं, प्रकृति से पाठ पढ़ती हैं और उसके प्रति आत्मीयता दिखाती हैं। 'वो रात' भूकम्प की रात थी, सब कुछ ध्वस्त हो गया, मानवता कराह उठी और त्राहि-त्राहि का शोर था। कविता संदेश देती है, प्रकृति का रहस्य समझाती है। वह लिखती हैं-ना हो प्रकृति का दोहन/ना हो इसका व्यापार। 'हमारी आदर्श' महापुरुषों की प्रतिमाओं को लेकर यथार्थ प्रश्न करती कविता है। 'महत्वाकांक्षी' कविता में फूलों का मानवीकरण और उनके आपसी संवादों में जीवन की सच्चाई दिखाना आकर्षित करता है। ऐसी अनुभूतियाँ उनके हृदय की करुणा, संवेदना और प्रेम दर्शाती हैं। उन्हें बरसात पसंद है। दो-चार बूँदें पड़ते ही पत्थरों के नीचे से अंकुर फूटते हैं, कोपलें निकल आती हैं, पेड़-पौधों में मंजरियाँ आने लगती हैं और कवयित्री को अपने दरवाजे पर फैली तुलसी वंदनवार सी लगती है।

'प्रभु के नैवेद्य से' कविता में विशिष्टता की नहीं, सहजता, सामान्य होने की चाह है, उपर से खुरदरा, कांटेदार, अंदर से मीठा-रसीला। वह हर व्यंजन का आदर व सम्मान चाहती हैं और मानव से मानव के बीच महीन संबंध व सरोकार। कवयित्री की उपमाएँ हृदय को छूनेवाली हैं। 'सावन आया' में शुष्क, कठोर व हृदय को दग्ध करने वाली भाव-संवेदनाओं की जगह मधुर, कोमल, नन्ही टहनी, अंकुर और सुखद सावन की फुहार की चाह है जो मानवता में प्रेम भर दे। 'आँगन में धूप' कविता भौतिकता से लबरेज और भौतिकता से रहित दो घरों की कविता है। बादल छँटने के बाद दोनों घरों में समान भाव से धूप का टुकडा खिल उठा है। प्रकृति सर्वत्र समान प्रभाव दिखाती है। 'हृदयालय' मार्मिक कविता है। अक्सर हमारे घरों में गौरैया अपना घोंसला बना लेती है। कवयित्री और उस पंछी के बीच का संवाद सारगर्भित और शिक्षा देने वाला है, पंक्तियाँ देखिए-किसी के घर में/अपना घर बनाना आसान नहीं। कवयित्री लिखती हैं-उस पंछी ने सिखाया मुझे/ दूसरों के अंतस में बसना/दूसरों के हृदय को हृदयालय करना। 'सच्चे प्रेमी' कविता शहर और सुदूर गाँव-जंगल में रह रहे लोगों के जीवन का अंतर समझाती है। यहाँ तनिक व्यंग्य भी है परन्तु कविता सच का दृश्य दिखा रही है।

बरसात, बूँदें और पानी के छींटे कवयित्री के लिए आकर्षण है, वैसे ही जीवन में नमी, प्रेम की कोई फुहार खुशियों से भर देती है। 'खुशियाँ' कविता में बारिश है, नन्हा-सा बच्चा और उसकी प्रसन्नता का दृश्य सबको आनंदित करने वाला है। भाव-संवेदनाओं के चित्रण में उन्हें महारत है। खुशियों के बाद 'गुस्सा' कविता भिन्न दृश्य दिखाती है और प्रकृति के रुख को समझा देती है। 'भूख' में इंसान को लेकर प्रश्न है-मुँह फाड़े रहता है हरदम 'भूखा'/वह खास/क्यूँ होता है ऐसा/कि तृप्ति इंसान के नसीब में नहीं/ जानवर के है। जानवर तृप्त हो जाता है पर इंसान नहीं। हिरणों के 'संयुक्त परिवार' को देख कवयित्री का मन प्रफुल्लित हुआ है। 'परायी' अद्भुत चेतना जगाती कविता है, अपनी भाषा में संवाद के बिना परायापन लगता है, भले ही वह माँ ही क्यों न हो। वसुधा गाडगिल सम्बन्धों की जड़ तक पहुँचती हैं, अपना, पराया, मैं और हम का रहस्य समझाती हैं। पड़ोसी ने आम बाँटे हैं और यह भाव 'मैं' से 'हम' की ओर लौटना है। 'अनमोल मिट्टी' गहरे भाव-चिन्तन की कविता है जिसमें वह नमी की उम्मीद करती है, अंकुरण का भाव जागता है, मिट्टी ही माता-पिता है और मिट्टी का गुणगान करते हुए परमानंद में रम जाने की योजना है। 'प्यार' माटी से प्यार को परिभाषित करती जीवन्त कविता है। हँसना, खुश रहना, आरोग्य, स्वस्थ रहना, बुजुर्गों की सेवा करना, शांत व धैर्य धारण किए रहना, सबकी सुनना और विचारों को गुनना, चिन्तन करना यही तो कवयित्री के अनुसार स्त्री के स्वर्णाभूषण हैं। आपसी रिश्तों को लेकर गहरी समझ दिखाती कविता "सेतु" मन को भावुक करने वाली है। असहाय अवस्था में माता-पिता को दुनिया भर की जानकारी कोई अपना ही तो दे सकता है, वे किससे संवाद करें? यह पंक्ति देखिए-एकाकीपन के अवसाद में डूबे/कातर स्वर में/जब उन्होंने कहा/एक तुम ही तो हो/बाहरी दुनिया से/मुझे जोड़ने वाले/'सेतु'। ऐसी भावनाएँ उसी हृदय में उभरती हैं जिसने जीवन की हर दशा को समझता हो और संवेदनाओं से भरा हो।

'सुबह ए बनारस' बनारस की सुबह को चित्रित करती भावपूर्ण दृश्यों से भरी कविता है। कवयित्री को सुबह-शाम की सिंदूरी किरणें बहुत प्रिय हैं, वह बहुत भाव के साथ अपने घर में, जीवन में सिंदूरी किरणों की उपस्थिति महसूस करती हैं। प्रकृति के बीच जीने का सुखद अहसास 'बंद पलकों में' कविता दिखाती है। वह सारा सुखद परिदृश्य अपनी आँखों में बसा लाई हैं जो एकान्त, तनहा पलों में सहारे की तरह है। ऐसे भाव तभी उभरते हैं जब कोई उन पलों को गहराई से अनुभव करता है और ये यादें जीवन पर्यन्त सुख देती रहती हैं। बरसात को लेकर उन्हें अपना बचपन याद आता है, उस समय की चंचलता याद आती है। अब भी बरसात में मन तो करता है परन्तु उम्र आड़े आ जाती है-बचपन और बढ़ती उम्र में/हो रही है खटपट। बेटियों की विदाई को लेकर बहुत गहरी चेतना जगाती है यह कविता "उनके जाने के बाद"। मार्मिक भावनाओं से भरी गहन बोध की रचना में बहुत सुन्दर चित्र खींचा है कवयित्री ने। 'कुशल क्षेम' कविता के संवाद, हित चिंतक की सलाह, अपना शौक और ईश्वर पर विश्वास छोटी सी रचना को बड़ा परिदृश्य दिया है।

'सूरजमुखी' काव्य संग्रह की "योगदान" संभवतया सबसे लम्बी कविता है। अद्भुत ही है, हिन्दी की कवयित्री का मन उलझ गया है-ट्रक व ट्रक चालकों पर, उनके संघर्ष व चुनौतीपूर्ण जीवन पर, उनकी भाव-भंगिमाएं, उनका प्रेम, समर्पण, सुख-दुख, ट्रक पर लिखी शायरी, व्यंग्य, कटाक्ष, भाषा का प्रवाह आदि-आदि बहुत कुछ है इस कविता में। ऐसी भावाभिव्यक्तियाँ हिन्दी कविता में स्थान पा सकी हैं, यह कवयित्री की कोई गहरी संवेदना ही है। बड़ी गहराई से उन्होंने अनुभव किया है और अपनी कविता में भर दिया है। अंत में लिखती हैं-आओ/सड़क पर घूमती/पहियों की दुनिया पर/पुष्पित-पल्लवित कर रहे संस्कारों को/सामाजिक, वैचारिक परिष्कारों को/प्रसारित कर रहे ट्रक चालकों को/समाज के मुख्य घटकों में/दें यथोचित स्थान/दें इन्हें हम नई पहचान/स्मरण करें ट्रक चालकों का/भाषाई योगदान।

वसुधा गाडगिल दैनंदिन जीवन-प्रवाह के सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरणों को अपनी कविता में शामिल करती हैं, उन्हें छूती-सहलाती हैं और बदलाओं, अनुभवों को चुपचाप, सहजता से दर्ज करती हैं, कोई चीज छूटती नहीं है, न घटनाएँ और न अनुभूतियाँ, संवेदनाएँ। उनकी भाषा, प्रयुक्त शब्दावली और शैली सहज ही आकर्षित करती है बल्कि मोहित करती है। आजकल जीवन जीने का ढंग बदल गया है, हम घर बैठे भोजन मँगवा लेते हैं। उन्होंने 'डिलीवरी ब्याॅय' के संघर्ष को अपनी कविता में शामिल करके अपने भीतर की संवेदना, करुणा का परिचय दिया है। भाग्यशाली हैं वे लोग जिनकी दुनिया में करुणा-प्रेम से भरा ऐसा कोई किरदार शामिल है। 'समानांतर जीवन' कविता के बिंब चौंकाते हैं, आत्मीयता का भाव जगाते हैं और हर तरह की स्थितियों-परिस्थितियों का भाव-दृश्य दिखाते हैं। आज की दुनिया आभासी हो चली है, उसके अपने सन्दर्भ हैं, विस्तार है, चिन्तन और प्रभाव है। उन्होंने स्वीकार करते हुए लिखा है-कृत्रिम प्रज्ञा, सुरक्षा कवच बन/होगी मूल्यवान। वसुधा जी अपनी कविताओं में दृश्यों, भावों का मानवीकरण करती हैं और स्वयं को जोड़ती हैं, संवेदित होती हैं, पंक्तियाँ देखिए-अंक में भरना चाहती हूँ/पूनम की चाँदनी को/वसंतोत्सव को/झमकते फागुन को/खड़कते पत्तों को/होली के प्यार भरे इन्द्रधनुषी रंगों में डूबी आँखों को/लहकती फसलों को। सारे बिंबों को थामना चाहती हैं, सहेजना चाहती हैं, अनुभव करना चाहती हैं, बटोरना चाहती हैं, सैतना चाहती हैं और सब कुछ सौंप देना चाहती हैं, उनकी पंक्तियाँ देखिए-सौंपना चाहती हूँ/भावी पीढ़ी को/विरासत के रूप में/संस्कृति औ' संस्कारों का/भव्य-दिव्य संग्रहालय। किसी के भी जीवन के ये उदात्त भाव हैं और हर व्यक्ति को ऐसा करना चाहिए।

वसुधा गाडगिल के लेखन में एक खास तरह की रुझान है, प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की ललक है, अद्भुत जिजीविषा के भाव हैं, कहीं-कहीं विचलन या भटकाव भी हैं, उनकी कविताएँ हमारे आसपास, हमारे जीवन में फैली, जुड़ी उन चीजों तक, उन संबंधों तक गहराई से पहुँचती है। ये कविताएँ चुपचाप अपना काम करती हैं, बड़े बदलाव का कोई आह्वान नहीं है इनमें बल्कि ये हमारे अधूरे संसार को पूर्ण करने का कोई सूत्र थमाती हैं। अंत में इतना तो कहना ही चाहिए, कवयित्री में संभावनाएँ हैं, उन्होंने सही दिशा का चयन किया है और निश्चित ही हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाली हैं।

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