पुस्तक समीक्षा: व्यंग्य का धर्म और धर्म का व्यंग्य

पुस्तक: चयनित व्यंग्य रचनाएँ 
लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन 
प्रकाशक: न्यू वर्ड पब्लिकेशन, दिल्ली 110012
संस्कारण: 2023 
मूल्य: ₹ 225/-
ISBN: ‎ 97881-19339-600

समीक्षक: राजेश कुमार


साथी लेखक पर लिखना बड़ा दुष्कर कार्य होता है, हर्कूलियन टास्क या भगीरथ प्रयास, जिस भी भाषा से आप देखना चाहें। जब हम धर्मपाल महेंद्र जैन के व्यंग्य पढ़ते हैं, तो पाते हैं कि लेखक के पास व्यंग्य की समझ है। उन्होंने किसी रचना में लिखा भी है कि आजकल “सुरक्षित व्यंग्य लिखने का प्रचलन” हो गया है, जिससे पता चलता है कि लेखक को व्यंग्य लिखने की जानकारी है। धर्म जी के विषयों के चयन और उसकी ट्रीटमेंट, चुटीली सूक्तियों, शीर्षकों के निर्धारण, अभिव्यक्ति के चमत्कार, भाषा के उपयुक्त प्रयोग और मैनीपुलेशन, व्यंग्य के तंज, परिहास, कटाक्ष, वक्रोक्ति, और अन्योक्ति, उपमा, उदाहरण, रूपक आदि अलंकारों की उनकी समझ पैनी है, और इनका वे भरपूर उपयोग करते हैं। 

प्रो. राजेश कुमार
केंद्रीय विशेषता
अगर हम उस एक केंद्रीय विशेषता को रेखांकित करना चाहे, जो धर्म जी की व्यंग्य रचनाओं में मौजूद है, तो मैं उसे उनकी रचनात्मकता कहूंगा। यह रचनाशीलता उनकी रचनाओं की शीर्षकों, विषय के चयन, विषय की प्रस्तुति, शब्दों की उपयुक्तता, अभिव्यक्ति के चमत्कार, पूरे व्यंग्य के समग्र प्रवाह प्रभाव में, आदि में दिखाई देती है। 

शीर्षक
अगर आप धर्म जी के व्यंग्य के शीर्षकों पर ही नज़र डालें, तो आपको रचना पढ़ने जैसा ही आनंद मिल जाएगा। वे न केवल रचनात्मकता से ओतप्रोत हैं, सार्थक हैं, संक्षिप्त हैं, रचना को पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं, व्यंजक हैं, रोचक हैं, बल्कि वे सारगर्भित भी हैं । उनकी रचनाओं के कुछ शीर्षकों के उदाहरण देखिए - कवि करोति सर्जरी, खिसियानी बिल्ली जूता नोचे, लोकतंत्र का इंडियन पपेट शो, महानता का वायरस, चंद्रयान-3 से भारत, परिवार के माध्यम से देश के बजट पर टिप्पणी, हर गड्ढे को उसके बाप का नाम दें।

उनके शीर्षक न केवल विषय के कथ्य की ओर संकेत करते हैं, बल्कि उस कथ्य को बहुत ही आकर्षक और रोचक रूप देते हैं, तथा साथ ही, पूरी बात का खुलासा करने वाले सपाट शीर्षक भी नहीं है, कथ्य कच्चे को इस तरह से इंगित करते हैं कि वह साफ़ छिपता भी नहीं, और सामने आता भी नहीं।

धर्मपाल महेंद्र जैन
विषय चयन
धर्म जी का विषय-संसार बहुत व्यापक है। इसमें संपादक, राजनीति, परिवार, भ्रष्टाचार, देश की स्थितियाँ, सामाजिक संबंध, चुनाव, सरकार बनाना, स्वयं धर्म, दर्शन, विज्ञान, नेता, विद्यार्थी, शिक्षा, साहित्य, ऑनलाइन बैठकें, बुद्धिजीवी, लेखक और यहाँ तक कि व्यंग्यकार भी, पर्यावरण, कोरोना महामारी, चमचागीरी, पुलिस, आदि विषय शामिल हैं, जिनमें से कुछ परंपरागत हैं, और बहुत सारे नए भी हैं। परंपरागत विषयों को भी वे उठाते हैं, तो उन्हें अपनी सूक्ष्म अवलोकन शक्ति, और अभिव्यक्ति कौशल से अभिनव रूप प्रदान करके, विषय की विभिन्न अर्थ छटाओं से उसे मार्मिक बना देते हैं।

यहाँ पर यह सवाल उठ सकता है कि आखिर धर्म जी व्यंग्य क्यों लिखते हैं, और उन्होंने व्यंग्य लिखना शुरू ही क्यों किया? मुझे भी यह जानने की बहुत उत्सुकता थी। यह बात जानने से हम व्यक्ति के व्यंग्य संसार को और बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। लेखक कई कारणों से लिखते हैं, जैसे किसी ने हिंदी विषय में पढ़ाई की है, और दूसरों का लिखा पढ़ते-पढ़ते उन्हें लिखने में रुचि हो गई। कुछ को उनके पारिवारिक परिवेश ने लिखने की प्रेरणा दी। कुछ लोग इसलिए लिखते हैं कि वे समाज और सिस्टम में फैली हुई विद्रूपताओं से परेशान हो जाते हैं, और उन्हें लिखने में एक तरह के विरेचन की उपलब्धि होती है, जो उन्हें शांति देती है। जब मैंने धर्म जी से पूछा कि उन्होंने व्यंग्य लिखना शुरू क्यों किया, तो उन्होंने बहुत रोचक बातें बताईं। धर्म जी ने बताया कि उनका जन्म झाबुआ ज़िले में हुआ था, जो आदिवासी बहुल क्षेत्र है। उनके परिवार में लेखकीय माहौल जैसा कुछ नहीं था। उनके दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने इंदौर में 1928 के आसपास राजाओं के अत्याचार, कपास, गेहूँ, मक्का, लट्टा आदि पर करारोपण के ख़िलाफ़ आंदोलन किए। वर्ष 1930 में उन्होंने कराची अधिवेशन में भी भाग लिया तथा ‘वाइदर झाबुआ’ नामक किताब प्रकाशित की।

संभवतः धर्म जी का यही अप्रत्यक्ष प्रशिक्षण नहीं उनमें अपने आसपास की बुराइयों, कुरीतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं, असंगतियों आदि का अवलोकन करने, और उसका विश्लेषण करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाया कि उनके आसपास के आदिवासी लोग शोषण और भ्रष्टाचार के शिकार हैं। कुछ आदिवासी बच्चे उनके सहपाठी थे, और फिर उनके परिवारों का हालचाल देखकर उन्होंने अवलोकन किया कि सरकारी योजनाओं का लाभ आदिवासियों तक नहीं पहुँचता, बल्कि बीच के लोग ही उन लाभों को हड़प लेते हैं। उन्होंने देखा कि आदिवासी लोग बहुत पीड़ा और अमानवीय स्थिति में जीने के लिए मजबूर हैं। वे लोग सीलन भरे, बदबू भरे, और अस्वास्थ्यकारी घरों और परिवेश में रहते थे। वे देखते थे कि आदिवासी लोगों को नहाने, सफ़ाई करने आदि की शिक्षा नहीं दी गई थी। वे पसीना आने पर विचलित नहीं होते थे और अपने कपड़े भी प्रायः नहीं धोते थे। धर्म जी देखते थे कि उनके लिए सरकार से आने वाला दूध, दलिया आदि भी बीच के लोग बेच खाते थे।

हमारे यहाँ महाजनी प्रथा होती थी, अगर आदिवासी कर्ज ले लेते थे तो वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता ही रहता था। सरकारी लोग भी बहुत सहज रूप से आदिवासियों का शोषण करते थे, जैसे वे बने ही इस काम के लिए हों, और अगर उनका शोषण नहीं हुआ, तो उनका जीवन निष्फल हो जाएगा। आदिवासी लाल रंग का गेहूँ और मोटा चावल खाते थे, उनके लिए सब्ज़ी जैसी कोई चीज़ उपलब्ध नहीं थी, वे मिर्च, नमक, प्याज़ पीसकर अपना काम चला लेते थे। उनके साथ हर जगह भेदभाव होता था, जिसे वे सामान्य मानते थे। उन्हें इसकी कोई जानकारी भी नहीं थी कि उनके अधिकार क्या हैं। उनके लिए जो चीज़ बड़ी बात मात्रा में उपलब्ध थी, वह बस अभाव था।

यही सब धर्म जी के साथ हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान हुआ। यह पृष्ठभूमि किसी भी संवेदनशील मन को पीड़ित, विचलित, और उद्वेलित करने के लिए काफ़ी  होती है। अपने इन अनुभवों और विचारों को धर्म जी ने आरंभ में संपादक के नाम पत्र, आदि के रूप में लिखना शुरू किया, उनमें से कुछ छपे, जिससे उनका उत्साह बढ़ा। धीरे-धीरे इस प्रशिक्षण से उन्हें आलेख, और क्रमश कविताएँ और व्यंग्य लिखने के लिए प्रेरित किया, और इस तरह वे लेखन के जगत में प्रवेश कर गए। इसी दौरान कुछ करने की ललक में उन्होंने सोचा कि अनपढ़ आदिवासी लोगों को हस्ताक्षर करना और नाम लिखना सिखाने का काम किया जाए। वे जी-जान से इस मुहिम में लग गए। इस दौरान उन्होंने 1000 से अधिक आदिवासियों को हस्ताक्षर करना, और नाम लिखना सिखाया। उन्होंने अपनी पढ़ाई के वर्षों के दौरान छुट्टियों में अख़बार में काम करने की प्रशिक्षु वृति जैसी भी की, और उसने भी उन्हें लेखन में मदद की।

जब मैंने धर्म जी से पूछा कि आपको कब लगा कि आप व्यंग्यकार हो गए हैं, तो उन्होंने बहुत ही सरल और अपने स्वभाव के मुताबिक उत्तर दिया कि मुझे तो आज तक नहीं लगा कि मैं व्यंग्यकार हो गया हूँ। धर्म जी का पहला व्यंग्य संकलन 1984 में प्रकाशित हुआ। इसके छपने से पहले वे परसाई जी से मिलने गए थे और चाहते थे कि परसाई जी उनके संकलन की भूमिका लिख दें, लेकिन परसाई जी के पास संभवतः इतना समय नहीं था, तथापि उन्होंने पाँच-छह लाइनें लिखकर धर्म जी को गुरु मंत्र दिया कि क्या और किस तरह से लिखा जाना चाहिए। धर्म जी कहते हैं कि शायद उन्होंने अपने मन की संतुष्टि के लिए लेखन कार्य किया है, और उनकी इच्छा है कि वे परिवर्तन में योगदान करें। वे आंदोलनकारी तो नहीं रहे, लेकिन उनकी इच्छा उनके लेखन के माध्यम से प्रतिध्वनित होती है। वे बताते हैं कि व्यंग्यकार के लेखन में प्रायः सत्ता के विरुद्ध बातें आ जाती हैं, जिसकी उन्होंने कभी चिंता नहीं की, और उन्हें उसी रूप में छपवाया, जिस रूप में वे उन्हें पेश करना चाहते थे।

विषयगत प्रयोग
लेखक का वैशिष्ट्य विषयगत प्रयोगों में होता है, जो उसे सपाटबयानी से हटाकर, रचनात्मकता की ओर ले जाते हैं। धर्म जी में ये बहुतायत से मिलते हैं। “बापू का आधुनिक बंदर” में धर्म जी मदारी और बंदर के माध्यम से राजनीति और मानवीय संबंधों की कलई खोलते हैं। “इंडियन पपेट शो” उन्होंने भारतीय राजनीति में कठपुलतीवाद पर प्रकाश डाला है कि कैसे जनता के लिए काम करने के नाम पर चुने गए लोग, दूसरों के हाथों में कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं, और केवल अपने ही हित के लिए काम करते हैं।  जब चंद्रमा पर गया एस्ट्रोनॉट वहाँ से दिखने वाले भारत में फैली ग़रीबी, भुखमरी, बदहाली का बयान करने लगता है, तो प्रधानमंत्री कैसे बेचैन हो जाते हैं, वह “चंद्रयान-3 से भारत” में देखा जा सकता है। प्रेम में एक दूसरे को धोखा देने वाले लोगों की लोक कथा का बहुत कलात्मक उपयोग धर्म जी ने “वैशाली में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर” व्यंग्य में किया है, जिसमें कठिनाई से प्राप्त ऑक्सीजन कंसंट्रेटर को हर व्यक्ति अपने-अपने प्रिय की जान बचाने के लिए आगे करता रहता है, और वह घूमकर पहले देने वाले के पास पहुँच जाता है। पौराणिक कथाओं का रचनात्मक उपयोग भी उनके व्यंग्य साहित्य में दिखाई देता है। 

शब्द प्रयोग
धर्म जी का शब्द-भंडार बहुत विशाल है, और उनमें उचित शब्द-चयन और साथ ही ज़रूरत के लिए शब्द-निर्माण की भी अद्भुत रचनात्मकता है। वे शब्दों का सार्थक उपयोग करते हैं, उनमें नई अर्थ छटाएँ भरते हैं, और अपनी व्यंजना को संप्रेषित करने के लिए नए शब्द गढ़ते हैं, जो अनायास ही उनके कथ्य को बहुत रोचक और प्रभावी ढंग से सामने ले आते हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या की तर्ज पर देखिए कि लोकतंत्र के अलग-अलग देशों में प्रचलित विभिन्न रूपों को समझाने के लिए धर्म जी ने बहुत रचनात्मक शब्दों का सृजन किया है, जो उसके मजाकतंत्र के धागे खोलकर रख देते हैं, देखिए - जोकतंत्र, टट्टूतंत्र, जासूसतंत्र, गनतंत्र, फेकतंत्र, गैंगतंत्र, भ्रमतंत्र, प्रचारतंत्र, भैंसपुरम। केवल ये शब्द ही व्याख्या करने में समर्थ हैं कि कैसे लोकतंत्र में जनता के साथ मज़ाक़ होता है, उन्हें टट्टू बनाया जाता है, उनके ही ख़र्चे पर उनकी जासूसी की जाती है, बाहुबल और गनों का दुरुपयोग किया जाता है, आदि।

इसी तरह उनकी रचनाओं में सम-धन का सिद्धांत, समलंब का सिद्धांत, समभार का सिद्धांत, ग्रेटेटाइटिस का वायरस, हाईकमान का जनादेश, सबै एमेले हाईकमान के, अंदर से घाघ, दबंग और ऊपर से माधो, शालीन गालियाँ, क़िताबभक्षी, गिरगिटिया समाज, भाड़ेतू लेखक, ट्वीटपति, गुंडा-तत्व, फाकालॉजी, वोट कबाड़ना, सम्पूर्ण ब्रह्मांड देवनागरी महासंघ, लम्पट वार्षिक पत्रिका, आदि रचनात्मक शब्द देखने को मिलते हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक न केवल आह्लादित होता है, बल्कि सीधे अर्थ तक पहुँचकर उसका विवेचन भी कर पता है।

इसके अलावा धर्म जी लोकप्रिय शब्दावली को उपयोग करने में भी परहेज नहीं करते, और उसे स्वाभाविक अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की पुष्टि के लिए उपयोग करते हैं, जैसे फट्टू, पुगराना, घरोपे, लगाईवाल, कवेलू, बदरवा, ढिबरी टाइट, आदि।

अभिव्यक्तियाँ
धर्म जी भाषा के सभी उपकरणों पर अधिकार रखते हैं, और उनका सुष्ठु उपयोग करने में माहिर हैं। कहा जा सकता है कि उनके पास हिंदी भाषा का विशिष्ट मुहावरा है, और वे मुहावरे-लोकोक्तियों उपयोग करने में बहुत कुशल हैं। वे कभी-कभी एक ही मूल के मुहावरे का उपयोग करके अर्थ का चमत्कार पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए, “नाक के चौरासी मुहावरे” व्यंग्य में नाक पर आधारित मुहावरों की झड़ी देखिए - स्कूल की नाक, नाक कटना, नाक खींचना, नाक बचाना, नाक फूलना, गुस्सा नाक पर बैठना, नाक घुसाना, नाक में दम मचाना, नाक के नीचे, नाक-भौं सिकोड़ना, नाकों चने चबवाना, नाक में नकेल डलवाना, नाक घर्र-घर्र करना, नाक पर मक्खी बैठना, नाक की सीध में चलना। मुहावरों के इस सार्थक उपयोग से उनका मन नहीं भरता, तो वे नाक बची तो लाखों पाए, गरीबी में नाक गीली, नाक देखो और नाक की धार देखो कहावतें भी गढ़ने में निपुण हैं। इसी प्रकार के प्रयोग उन्होंने भैंस के संदर्भ में भी किए हैं - गई भैंस पानी में, आदि।

लेखक का एक विशिष्ट गुण होता है कि वह पाठक को अपने साथ रखे, और उसकी समझ का सार्थक उपयोग करते हुए, उसे खुद ही अर्थ निकालने के अवसर देता रहे। ऐसे में धर्म जी संकेतात्मकता का बहुत सार्थक उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, इस उक्ति में देखिए कि कैसे लेखक आगरा के पागलखाने का संकेत करता है –
यह लो हीरे का हार। हीरा व्यापारी लंदन भागते-भागते यहाँ छोड़ गया था, यदि संपादक पर हर कविता पढ़ने की बाध्यता हो तो अधिकतर संपादक नोएडा की बजाय आगरा के आसपास दफ़्तर खोल लें।

इसी तरह की सार्थक, मनोरंजक, अर्थगर्भी, चुटीली, वक्र, तंजपूर्ण, उक्तियाँ आपको धर्म जी के लेखों में मिलेंगी। आपकी सुविधा के लिए कुछ को मैंने नीच सूचीबद्ध किया है, ताकि आपका ध्यान उनकी ओर आकर्षित कर सकूं। पढ़िए और आनंद लीजिए -

1. व्हाट्सऐप पर संदेसे आते – संदेश नहीं संदेस
2. खिसियानी बिल्ली जूता नोचे
3. कविताएँ छाँटने लगूँ तो मैं ही छँट जाऊँ
4. जीवन में कोई एक भाव मिल जाए तो साहित्य की सारी विधाओं में उसे विस्तीर्ण कर दो।
5. दर्शक हाल में खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं, वे और कर भी क्या सकते हैं!
6. यह बिना बात के रो सकती है और हर किसी को धो सकती है।
7. हिंदी में इन्हें कठपुतली मास्टर कहते थे पर अंग्रेज़ी पसंद लोग उन्हें हाईकमान के नाम से जानते थे।
8. छापने के मामले में मर्यादा पुरुषोत्तम हो जाते हैं।
9. यह चिरकाल के लिए लिखा गया है, इसलिए पाठक अनंत समय तक इसे पढ़ना टालते रहते हैं।
10. मैं मारक नहीं लिखता पर मेरा लिखा पढ़ कर वह शर्म से मर जाता है।
11. संज्ञा में व्यंग्य नहीं बने तो क्रिया में व्यंग्य बन ही जाना चाहिए।
12. सो कर उठता हूँ तो सिर्फ मौसम या ख़बरों के रंग ही नहीं बदलते, आदमी की निष्ठा, संवेदना और आत्मा की आवाज़ तक बदल जाती है।
13. मैं - इंक्रेडिबल इंडिया, अतुल्य भारत। सारा देश हरा-भरा लग रहा है। प्रधानमंत्री – हरा-हरा! नहीं, नहीं, आपको ग़लत दिख रहा है। सारा देश केसरिया-केसरिया दिखना चाहिए।
14. कहीं से आवाजें उठ रही हैं, लोकतंत्र खतरे में है। इसलिए राजनेता लोकतंत्र को जेब में लेकर घूमने लगे हैं। वे अपनी जेब में लोकतंत्र को सदा सुरक्षित मानते हैं।
15. माल ने माल बताया
16. बंदर आदमी जैसा गँवार नहीं है कि बिना काम के बोलता रहे।
17. बिना मजूरी किए लोगों से पैसे माँगना पाप है। तू कोई नेता या दरोगा नहीं है।
18. यदि संपादक पर हर कविता पढ़ने की बाध्यता हो तो अधिकतर संपादक नोएडा की बजाय आगरा के आसपास दफ़्तर खोल लें।
19. इस देश की नियति में कैसे-कैसे धृतराष्ट्र लिखे हैं।

प्रिय पाठको, ये कुछ बातें थीं जो मैंने व्यक्ति व्यंग्यकार और साहित्य-सेवी धर्मपाल महेंद्र जैन और उनके व्यंग्य लेखन के बारे में समझी हैं। मुझे उम्मीद है कि इनसे आपको धर्म जी और उनके लेखन को समझने में कुछ मदद मिलेगी, अन्यथा आप स्वतंत्र रूप से भी उनके व्यंग्य का आनंद ले सकते हैं, जो पाठकों के लिए एक दावत या ट्रीट जैसा है।
***

प्रो. राजेश कुमार
drajeshk007@gmail.com

2 comments :

  1. उम्दा। जल्दी से जल्दी पुस्तक पढ़ने की उत्कंठा उठ खड़ी हुई है। समीक्षा ऐसी ही होनी चाहिए। राजेश जी धरम जी दोनों को बधाई।

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    1. हार्दिक धन्यवाद

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