गांधी: चार कविताएँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


गांधी रो रहा है

गांधी के चश्मे से गिरा हुआ गूगल
खोज रहा है कहीं जमीन पर गांधी
गांधी की पुतली
नहीं, उनकी माँ नहीं 
आँख की पुतली
जिसमें देखा करती थीं पुतली
छोटे-मोटे घाव
कभी कीड़े पड़ने पर होने वाली दर्द
आँख से निकलती हुई गर्मी या सर्द

गांधी के हाथ से गिरी हुई लाठी
खोज रही है गांधी
गांधी का पोर
जी गांधी के हाथ की पोर
जिसमें थी सत्य और अहिंसा की डोर

गूगल में खोजने से मिला हुआ गांधी
कुछ खोया सा है
कुछ रोया सा है
कुछ स्तब्ध सा है
शायद, गांधी रो रहा है
क्योंकि जो वह चाहता था
शायद वह नहीं हो रहा है।
***


हमारे गांधी जी

जिनसे दुश्मन डरते थे
उनका नाम है गांधी
सत्य अहिंसा के अनुयायी
जी वही महात्मा गांधी।

सर्वोदय के प्रबल समर्थक
विकेंद्रीकरण के वह थे प्रवर्तक
डरते थे उनसे अंग्रेज अन्यायी
उनका नाम है गांधी।

नमक-सत्याग्रह और भारत छोड़ो
नोआखाली में अभियान दिल जोड़ो
सबके लिए थी उनके मन में भलाई
उनका नाम है गांधी

आज़ादी के बाद हमारे देश ने
उन्हें राष्ट्रपिता का सम्मान दिया
उनके संदेशों को जीकर
भारत का सम्मान किया

विश्व शांति और प्रेम का 
उन्होंने बनाया आधार
आज़ पूरा विश्व मानता
गांधी का आभार

बच्चे के वह प्यारे बापू
अब भी दुनिया के सहारे बापू
अच्छी राहों की सीख जो देते
हैं सबसे न्यारे बापू।

आओ उनके बताए राहों पर चलकर
भारत का कुछ भाग्य गढ़कर
स्वच्छता का संसार रचकर
गांधीजी के मूल्यों को हम जी लें

प्रधानमंत्री ने देखो गांधी को याद किया है
स्वच्छता ही सेवा का नया पैगाम दिया है।
***


मुझे बचा लो

मुझे बचा लो बोले गांधी
यूक्रेन से बोले गांधी
सीरिया में बोले गांधी
संघर्षों से बोले गांधी
विमर्शों से बोले गांधी
पूरी दुनिया से बोले गांधी

इन युद्ध-अशांति-संघर्षों से 
तेज-तेज से बोले गांधी
संयुक्त राष्ट्र के आंगन से
करुण क्रंदन से बोले गांधी

लथपथ धरती, लथपथ जन
देखो सब अपने में व्यस्त हैं
लालच गुस्से में भीगे मन उनके
युद्ध के लिए अभ्यस्त हैं

देखो सब हैं चुप, सब हैं मौन
देखो हाथ बढ़ाता है अब कौन
आजमाइश के इस शोर में, 
गांधी को शांत कराता है कौन

पेड़ों ने, कुछ चिड़ियों ने चुपके से
गांधी को बुलाया
बोला-चुप हो, बैठो
अपनी आंखें बंद करो, 
अपना कान बंद करो
ये रोना,
आवाज़ देना बंद करो

हम सब चुप हैं
तुम भी रहो चुप
क्या तुम्हें पता है
इन भ्रमित लोगों के सामने
उजाला नहीं है
है घना अंधेरा घुप।

बस इंतज़ार करो,
जब इनके सामने दुर्भाग्य आएगी
इनका भ्रम चकनाचूर हो जाएगा।
***


बच्चे के मन में गांधी

एक नन्हा सा बच्चा
एक टूटे से पुतले को देखा
मन में सोचता-विचरता
अपने बापू के साथ अगले शहर पहुँचा
चौराहे पर देखा- गांधी जी।

अपने बापू से बोला, कार रोको
मुझे कुछ गांधी जी से बात करनी है
गांधी के सामने खड़ा हुआ 
वह दो-फुटिया बच्चा पूछा-
गांधी बाबा, गांधी बाबा!
आपके पुतले को ये लोग क्यों तोड़ देते हैं?

उस गांधी से जवाब न पाकर
बच्चा हुआ निराश
उसने कहा, बापू!  ये भी बापू
तुम भी बापू, समझो तुम हो गांधी
अब तुम बताओ-
आपके पुतले को ये लोग क्यों तोड़ देते हैं?

गांधी ने दिया उत्तर-
पुतले तोड़ते हैं, मुझे नहीं
मेरे शरीर को मारी गोली, मुझे नहीं
मैं गांधी हूँ, अमृतपुत्र
मेरा लोग अपमान करें
करने दो
जितना गिरना चाहें ये
गिरने दो
बच्चे! मैं गांधी हूँ
कोई आंधी नहीं, जो
एक जगह से उठती है
एक जगह समाप्त हो जाती है
***

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