अहिंसा परमो धर्म: - राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, और गांधी का भारत

🪔 नहीं दीप तक हाथ सभी के, 🪔
🪔 मन रौशन सब कर सकते हैं 🪔

भीष्म देसाई जी मेरे मित्र हैं। मेरे अधिकाँश मित्रों की तरह ये भी उम्र, अनुभव, ज्ञान सभी में मुझसे बड़े हैं। उन्होंने सारी दुनिया घूमी है। गांधी जी के भक्त है। मगर अंधभक्ति के सख्त ख़िलाफ़ हैं। वे बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार सुना कि आइन्स्टीन ने ऐसा कुछ कहा था कि भविष्य की पीढियों को यह विश्वास करना कठिन होगा कि महात्मा गांधी जैसा व्यक्ति सचमुच हुआ था तो उन्हें अजीब सा लगा। सोचने लगे कि यह बड़े लोग भी कुछ भी कह देते हैं।

बात आयी गयी हो गयी और वे अपने काम में व्यस्त हो गए। काम के सिलसिले में एक बार उन्हें तुर्की जाना पड़ा जहाँ एक दिन एक अजनबी से भेंट हुई और अंग्रेज़ी में बात होने लगी।

नव-परिचित ने जब उनकी राष्ट्रीयता पूछी तो उन्होंने गर्व से कहा "भारत।" उन्हें लगा कि वह व्यक्ति उछलकर कहेगा, "वाह, इंडिया!" लेकिन उनकी आशा के विपरीत उसे देश का नाम समझ नहीं आया। ऐसा लगा जैसे उसने कभी भारत का नाम नहीं सुना था। देसाई जी को आश्चर्य हुआ और वे उसे भारत के पर्यायवाची नाम बताने लगे। फिर ताजमहल, हिमालय और गंगा के बारे में बताया। उसके बाद मुग़ल वंश से लेकर कोहिनूर तक सभी नाम ले डाले मगर उस व्यक्ति को समझ नहीं आया कि वे किस देश के वासी हैं।

राम, कृष्ण, महावीर और बुद्ध से होते हुए जब देसाई जी ने कहा, "गांधी" तो अजनबी ने उचककर पूछा, "गांधी, फ़िल्म वाला गांधी?"

"हाँ, वही गांधी, वही भारत।" उन्होंने खुश होकर कहा।

कुछ देर में अजनबी की समझ में आ गया कि वे उस देश के वासी हैं जिसका वर्णन गांधी फ़िल्म में है। उसके बाद अजनबी ने पूछा, "फ़िल्म का गांधी सचमुच में तो नहीं था न! कभी नहीं हो सकता? है न?"

तब मेरे मित्र को आइंस्टाइन जी याद आ गए और उनके कथन का भाव भी।

अक्टूबर में गांधीजी के जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाना न केवल उनका सम्मान है बल्कि भारत की अद्वितीय अहिंसक परम्परा की अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी है। विश्व अहिंसा दिवस हमारा ध्यान अहिंसा, शांति एवं सहयोग की ओर आकृष्ट करता है।

इस्राएल में उत्सव मनाते निर्दोष नागरिकों पर हमास के ताज़ा आतंकी हमले और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप गज़ा में छिड़े युद्ध ने एक बार फिर मानवता को आहत करना शुरू किया है। दुनिया भर से युद्ध के विरोध में बहुत आवाज़ें सामने आयी हैं। मानवता के इन निर्मल स्वरों के बीच कुछ जातिवादी, द्वेषवादी मौकापरस्त सक्रिय होकर भारतीय, इस्राइली, यहूदी, हिंदू, ब्राह्मण, आदि विभिन्न वर्गों के विरुद्ध घृणा फैलाकर समस्या के मूल से ध्यान हटाने में लग गये हैं। द्वेष कभी भी किसी समस्या का हल नहीं हो सकता और न ही आतंकवादी दानवों की तुलना किसी नियमबद्ध और अनुशासित सेना से की जा सकती है, बात चाहे कश्मीर की हो या इस्रायल की। गज़ा में भोजन, दवा, पानी, बिजली कुछ नहीं है लेकिन मानवता और आस्था के नाम पर संसारभर से दान में आने वाले धन से बनाये गये रॉकेटों और अन्य असले की कोई कमी नहीं है। आयरन डोम को छकाने के लिये आतंकियों ने सिविलियंस पर आक्रमण करने से ठीक पहले के अल्पकाल में अगणित रॉकेट दागे थे और बाद में भी दागते रहे।

आतंकियों ने बंधकों की नृशंस हत्याओं और दुर्व्यवहार के विडियो गर्व से जारी किये हैं। सामान्यतः फ़िलिस्तीन और इस्लाम के पक्ष में झुके एक रेडियो स्टेशन पर एक आतंकी की ऑडियो रिकॉर्डिंग चल रही थी, जिसमें घटनास्थल से एक आतंकी गर्व से अपनी माँ को बता रहा था कि उसने कितने यहूदी मार डाले, और वापस गज़ा से उसकी माँ गर्व से अल्लाहो-अकबर चिल्ला रही थी। पीछे से पिता ने कहा कि बहुत हुआ, अब वापस आ जाओ तो बेटे ने उत्साह से कहा कि अब पूर्ण विजय के बिना कोई वापसी नहीं होगी।
 
गज़ा के आतंकियों ने वहाँ अपना अनधिकृत कब्ज़ा बनाये रखने के लिये चुनाव नहीं होने दिये हैं। वे जनसेवा के उद्देश्य से आये दान का दुरुपयोग स्कूलों और अस्पतालों के नीचे अपने लिये सुरक्षित बंकर और सुरंगे बनाकर रहते हैं ताकि वहाँ से रॉकेट फेंक सकें और वापसी हमले की स्थिति में वे खुद सुरक्षित रहें और उनकी जगह निर्बल और निर्दोष नागरिक मारे जायें। इस्राइल द्वारा जवाबी हमले से पहले नागरिकों से सुरक्षित क्षेत्रों में जाने के अनुरोध के उत्तर में इन आतंकियों ने मानव ढाल बनाने के उद्देश्य से  नागरिकों को जबरन रोका। वे पहले भी नागरिकों का प्रयोग मानव-ढाल के रूप में करते रहे हैं। मध्य-पूर्व का आतंकवाद सिर्फ़ यहूदियों का शत्रु नहीं, वह आम मुसलमानों का भी शत्रु है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर में आतंकियों ने हिंदू और सिखों के साथ अनेक मुसलमानों को भी मारा था और खालिस्तानी आतंकियों ने हिंदुओं के साथ सिखों को क्योंकि आतंकवाद के लिये मानवता का, मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है। धार्मिक और/या राजनैतिक मान्यताएँ उनके लिये एक बहाने से अधिक नहीं हैं।

फ़ेक न्यूज़, अदरिज़्म, ध्रुवीकरण और प्रचारतंत्र के युग में यह और भी ज़रूरी हो गया है कि हम हर खबर पर त्वरित प्रतिक्रिया करने के बजाय निष्पक्ष  चिंतन करें और अपने प्रयासों से संसार को आगामी पीढ़ियों के लिये अधिक सुंदर, अधिक सुरक्षित और उल्लासमय बनाएँ।

नवरात्रि और दशहरे के उल्लास के साथ-साथ यहाँ बच्चे तरह-तरह के कॉस्ट्यूम पहनकर हमारे टेसू पर्व की तरह द्वार-द्वार जाकर ट्रिक और ट्रीट कहकर कैंडी मांगते हुए हैलोवीन मना रहे हैं। दीपावली का पावन पर्व भी निकट है। आपको इस प्रकाश-पर्व की हार्दिक मंगलकामनाएँ! सबके मन आलोकित हों!

पिछले कुछ अंकों से सेतु अगले मास के प्रथम सप्ताह में आ रही है। हमारा अथक प्रयास है कि हम मास के अंतिम दिन के अपने पुराने रुटीन पर वापस आ सकें। ऐसा होने तक आपके धैर्य और सहयोग की अपेक्षा रहेगी। 

सेतु के अक्टूबर अंक में आपका स्वागत है। पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराइये।

आपका शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 अक्टूबर 2023 ✍️

1 comment :

  1. Your Editorial of this October,the birthday month of our Mahatma Gandhi, draws our attention to the fact that he made India known and revered the world over by practising and preaching non-violence as the only value worth following to face dire circumstances( his birthday falls on 2nd October).
    How rightly you point out that it is in great contrast to the brutal violence that Hamas used against Israeli people! Leading to attacks on Gaza and initiating a grave war!!
    Very unfortunate indeed.

    Your Dewali greetings at the end of the Editorial are most welcome and we too wish you and the Setu family a very happy n blessed Dewali.
    Looking forward to your next Editorial.
    With warm regards,
    Deepak Sharma

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