व्यंग्य: राम की चिड़िया, राम का खेत

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


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भरत क्षेत्र के पिछड़े राज्य में एक सीएम थे। सीएम थे तो लोग उन्हें राजा मानते थे। चुनाव नजदीक आ रहे थे तो सरकारी सुविधाएँ खैरात में बँट रही थीं। साधु बाबा धर्म-कर्म छोड़ कर मंत्री बन रहे थे। धरती पर स्वर्ग उपलब्ध था तो लोग भगवान को भूल कर सीएम की माला जप रहे थे। साधु बाबा सरकारी सुविधाओं से ऐसे गच्च और प्रसन्न थे कि उन्हें सर्वार्थ सिद्धि मिल गई थी। उन्होंने खुश हो सीएम से पूछा, बोल बच्चा क्या मांगता है?

- बाबा फिर से सीएम बनना है। इसके अलावा अब कुछ अच्छा नहीं लगता। विपक्ष में बैठ कर कलंकित नहीं होना।

- बेटा, तुमने हर तरफ बड़े-बड़े बाजार बना दिए हैं। तीन लाख में मनचाहा ट्रांसफर मिल रहा है और तीन करोड़ में कुलपति पद और तीस करोड़ में सोने का अंडा विधायक। सब नगद, नो डिस्काउंट। राजधानी में रह कर लेनदेन बढ़ाओगे तो असंतुष्ट लोग यहाँ तुम्हारी समाधि बनवा देंगे। तुम राजधानी छोड़ कर बीहड़ में जा बसोगे तो तुम्हारा धंधा बढ़िया चलेगा। वहाँ सबसे नज़रें बचा कर तुम चुनाव जीतने योग्य धन जुटा लोगे। 

- जी गुरुदेव मैं आज ही बीहड़ में चला जाता हूँ।

सब राजसी ठाठ छोड़कर सीएम बीहड़ के भी बीहड़ में घुस गए। सत्ता के लाइसेंस के नवीनीकरण का मतलब है, दुनिया भर में प्रदेश बेचने का ठेका मिल जाना। बड़ा कठिन समय है, सब साम-दाम अपनाओ पर जनता नोट लेकर भी वोट नहीं देती। लोग नशे में धुत्त भी हों तो ईवीएम मशीन पर जा कर होश में आ जाते हैं। यह कड़वा सच जानकर खानदानी सीएम को अपनी गोटी जमाने के लिए बीहड़ में जाना पड़ा। उजाले की बजाय उन्हें घने अंधेरे में साफ-साफ दिखाई देता था। यहाँ उन्हें अपने दल के पिशाच और विरोधी दलों के भूत पूजा करते दिखे। हर कोई चाहता था कि उन्हें बेताल का समर्थन मिल जाए। अंततः एक अंधेरी रात में सीएम को बेताल नजर आ गया। वह पेड़ पर उल्टा लटक रहा था। मिष्ठान व पुष्प समर्पित कर सीएम ने बेताल को विधिवत प्रणाम किया और बोले ‘हे बेताल, मैं आपकी शरण में हूँ। धर्म संकट में है, मेरी कुर्सी संकट में है, आप राजभवन चलिये, आगामी चुनाव की कमान संभालिए और हमें चुनाव में जीत दिलवाइए।’ सीएम ने उसको कई ऑफर दिए, राज्य का राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव भी दिया। पर बेताल को राजधानी में आकर सीधे लटकना मंजूर नहीं था।

‘तुम्हें कितनी बार सीएम की कुर्सी पर बैठाया, पर वैसा सुराज नहीं आया जैसा तुमने घोषणा पत्र में बताया था। राजनीति में ईमानदारों की नस्ल नष्ट हो गई है। तुमने जनता के लिए और मेरे लिए किया क्या जो मैं तुम्हारा समर्थन करूँ?’ बेताल ने पूछा।

‘हे देव, मैंने तो हर दिन नई-नई लुभावनी योजनाएँ लागू कीं और शिलान्यास के पत्थर जड़वाए। मीडिया को विज्ञापनों का चंदी-चारा खिलाया और हाईकमान की जय-जयकार करवाई। सरकारी, गैर-सरकारी और हरामी लोगों के लिए खजाने खोल दिए। उन्हें लूटने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं दिया। विरोधियों को भी चोरी छुपे सगे से बढ़कर साधा, वे फूफकारते नाग दिखते रहे और दूध-मलाई चट करते रहे।’ एक साँस में इतना कहने के बाद सीएम ने लंबी साँस ली और फिर शुरू हो गए – ‘मैं भोलेपन में मारा गया देव। ठेकेदारों के चाहने पर मैंने हर जगह हाथियों की प्रतिमाएँ लगवाईं, उनकी लीद उठवाने में राजकोष खाली कर दिया। मैंने सोचा था लीद खाद का काम करेगी और वोटों की अच्छी फसल आएगी, पर देव लीद-घोटाले का मामला बाढ़ जैसा उफान पर है। यह अच्छे कामों को भी बहा ले जा रहा है। इस बार चुनाव जीत गया तो गाँव-गाँव में आपके लटकने के लिए संगमरमर के पेड़ लगवा दूँगा। सरकारी खजाने से आपकी पूजा-अर्चना, अर्घ्य सबकी व्यवस्था करा दूँगा। आप मेरे साथ राजभवन चलिए और सिद्धि यज्ञ शुरू कीजिये।’

‘चलो राजन, पेड़ से उतारो मुझे और लाद लो अपने कंधों पर। तुम रास्ते में ही सो नहीं जाओ इसलिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। मेरे प्रश्न का जानबुझ कर गोलमाल उत्तर दोगे तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।’ सीएम ने हामी भरी, बेताल को लादा और राजभवन की तरफ चल दिया। बेताल कहानी सुनाने लगा।

दशपुर गाँव में धनीराम नामक किसान रहता था। गुजरा करने लायक खेती थी, बारिश समय पर होती तो जो बोया होता वह उग आता। बारिश नहीं होती तो सहकारी बैंक का समिति सेवक बड़ा काम आता।  रिश्वत स्टैंडर्ड रेट पर लेता पर काम पक्का करता। पुराना खाता बंद करके नया कर्जा चढ़ा देता। देश की प्रगति के साथ-साथ उसके कर्जे में भी वृद्धि हो रही थी। उसे कर्ज चुकाने की चिंता नहीं थी। जो भी सरकार आती, छोटे किसानों का कर्जा जरूर माफ करती। इसलिए नहीं कि राजनेताओं को छोटे किसानों से हमदर्दी थी, पर छोटे किसानों की आड़ में वे अपने बड़े-बड़ों के कर्जे एक झटके में माफ कर सकते थे। राम की चिड़िया राम का खेत, खा ले चिड़िया भर-भर पेट। जब चिड़िया पूरे देश को खा रही थी, तो धनीराम को काहे की शर्म। बाप-दादा की तरह उसने अपना पेट नहीं काटा, कर्जा ले-ले कर के भर पेट खाया और बच्चे को पढ़ाया। कालांतर में उसका बेटा फूड कॉर्पोरेशन के डिपो का इंचार्ज बन गया। धनीराम के खेत में पाँच मन अनाज होता तो उसके बेटे की टेबल बिना खाद-बीज-पानी के ही पाँच टन अनाज पैदा कर देती। धनीराम को लगता सभ्य दुनिया ने जितनी व्यवस्थाएँ बनाईं, उनमें फूड कॉर्पोरेशन सबसे निकम्मी पर सबसे कमाऊ व्यवस्था थी। अच्छा खासा पौष्टिक अनाज उनके गोदामों और खुले मैदानों की हवा खाकर जानवरों के भक्षण योग्य भी नहीं बचता। इनके कागज पर जितना अनाज सड़ता, सूख जाता या चूहे खा जाते, वाकई उतना अनाज उगाना भी कठिन होता। रजिस्टरों में जो इंदराज होता उसके अनुसार गोदाम से हजारों ट्रकों पर अनाज लाद कर भेजा जाता। राज्य में इन ट्रकों के खाली होने की रिपोर्टें भी दाखिल होतीं। फिर भी, वहाँ सैकड़ों लोग भूख से मर जाते या आत्महत्या कर लेते। पर जाँच में ये खबरें सच नहीं निकलती। डॉक्टर लिखते कि मरने वालों की विसरा रिपोर्ट से खास खुलासा हुआ कि मृतकों के डूम-पूप पेट थल-थल भरे थे। इससे सिद्ध होता कि अन्न संकट के बावजूद यहाँ कोई भी ग़रीब भूख से नहीं मरा।

कहानी सुना कर बेताल ने कहा – ‘राजन, तुम्हारे एक विभाग में करोड़ों का खेला होता है पर तुम्हें कुछ पता नहीं। तुम्हारे पास जो सैकड़ों विभाग हैं, उनकी हकीकत तुम क्या जानो! ये सब विभाग मिलकर खेला करने में ओलंपिक कमेटी को भी मात देते हैं। बताओ राजन, यह कैसा राजधर्म है? यदि तुमने जानबूझकर इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।’

सीएम धर्म संकट में फँस गए, कहने लगे – मेरा एकमेव लक्ष्य है सीएम बनना और देश सेवा करना। बिना सीएम बने मैं सड़कछाप बन जाउँगा। बस सीएम बनने के लिए अब बड़ी ‘मार्जिन मनी’ चाहिए। सबका पेट भरना पड़ता है। हमारे प्रदेश में सोने के झाड़ नहीं लगे हैं किंतु सब भर पेट सोना खाना चाहते हैं। उद्योगपतियों को कहा, पैसे ले आओ और यहाँ लगाओ। एनआरआइयों को कहा डॉलर अपने प्रदेश में रोपो, तो हम यहाँ डॉलर के बगीचे लगा दें। अब बाहर से पैसा आता नहीं है, तो ओवरड्राफ्ट का माल कब तक चलाएँ! राजधर्म निभाना पड़ता है। गेहूँ फ्री, चावल फ्री, कंबल फ्री, बिजली-पानी फ्री, दवाइयाँ फ्री, बेरोजगारों को भत्ता, वरिष्ठों को पेंशन और निठल्लों को वेतन। जनता का पैसा है, अंततः जनता में ही जाता है। सीधा बैंक खाते में जाता है। हम वादा करते हैं, देश का सब कुछ बेच देंगे पर जनता को हर चीज़ मुफ्त में देंगे। बस बदले में जनता से एक वोट ही तो मांग रहे हैं। वैसे भी उस कागज के टुकड़े का वे क्या करेंगे? गलत लोगों को देंगे, वे तो हमसे ज्यादा भ्रष्ट हैं, खा जाते हैं पर डकार भी नहीं लेते। बेताल तुम्हें हमारा खेला दिखता है, जनता का खेला भी तो देखो। वह हमें जागीर में मिली कुर्सी दूसरे को देना चाहती है। बोलो, गोलमाल न करें तो क्या करें! सीएम की बात सुनकर बेताल ने कहा – ‘राजन, मैं तुम्हारी साफगोई की दाद देता हूँ। तुमने सच को स्वीकारा, विजयी भव। जाओ टुकड़े-टुकड़े गैंग तुम्हारे टुकड़े नहीं कर पाएगी। तुम अपनी तिजोरी भरो, बिचौलियों को उनकी भरने दो और जनता को फ्री का प्रसाद खाने दो, प्रजातंत्र की यही नियति है।’ बेताल पेड़ पर जाकर वापस उल्टा लटक गया।

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