कहानी समीक्षा: नारी संवेदनाओं की कहानियों का संग्रह 'जड़ से उखड़े हुए'

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: जड़ से उखड़े हुए (कहानी संग्रह)
कहानीकार: वंदना शांतुइन्दु
मूल्य: ₹ 175/-
प्रकाशक: डायमंड पाकेट बुक्स, नई दिल्ली

साहित्य में करुणा, संवेदना और प्रेम की प्रधानता जरुरी है। हिन्दी कथा साहित्य भरा पडा है इन भाव-संवेदनाओं से और इसकी जड में लोक मंगल की कामना समाहित है। यह कोई नई अवधारणा नहीं है, हमारे जीवन के लिए, हमारे साहित्य के लिए इसके बिना कोई अधूरापन महसूस होता है। कथा लेखन या कथा साहित्य की यात्रा आज पहचानी जा रही है और यह साहित्य के चरमोत्कर्ष को छू रही है। साहित्य समाज का चेहरा दिखाता है और उसकी हर विधा इस दायित्व संवहन में सक्रिय है। कौन आगे, कौन पीछे यह चिन्तन का विषय नहीं है, सब के चिन्तन के केंद्र में मनुष्य ही है। मनुष्य की सारी जटिलताएँ, सारे पराभव, सारे उत्कर्ष और बहुत कुछ, कहानियाँ समेट लाती हैं। उनके संघर्ष को समझे बिना साहित्य अधूरा ही है। रचनाकार अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करता है, परत-दर-परत जटिलताओं को खोलता जाता है और कोई सुखद आलोक दिखा देता है। वह समाज को उसका आईना दिखाता है, व्यक्ति को उसका चेहरा दिखाता है और साहित्य मार्ग-दर्शन करता है।

कुछ महीनों पूर्व गुजराती मूल की जानी-मानी लेखिका सुश्री वंदना शांतुइन्दु जी का कहानी संग्रह "जड़ से उखड़े हुए" मिला। अत्यधिक व्यस्तता के चलते तुरन्त पढ़ना संभव नहीं हो पाया। वंदना जी कहानीकार व लेखक के साथ-साथ अनुवादक भी हैं। इस संग्रह की कहानियाँ मूलतः गुजराती में लिखी गई हैं और स्वयं शांतुइन्दु ने उनका अनुवाद हिन्दी में किया है। अनिल शर्मा जोशी लिखते हैं, "कहानी संग्रह "जड़ से उखड़े हुए" की कहानियाँ न केवल दिल को छूती हैं बल्कि दिमाग को भी झकझोरती हैं। इन्हें सिर्फ नारी संवेदनाओं की कहानियाँ नहीं कहा जा सकता। ये मानवीय संवेदनाओं में रची-बसी ऐसी कहानियाँ हैं जो हमारा परिचय एक ऐसी नई दुनिया से करवाती हैं जो हमें एकबारगी चौंकने पर मजबूर करती है। यही इन कहानियों की सफलता भी है।" क्षमा कौल की भूमिका "पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए" बहुत कुछ कहती है। वे लिखती हैं-"जीवन की उन स्थितियों, पलों, लोगों, स्थलों को पात्र बनाया गया है जो सांस्कृतिक और राजनीतिक-आर्थिक संक्रमण से दो चार हैं। उस संक्रमण के दुख से गुजर रहे हैं अथवा तो संक्रमण काल की स्मृतियों से दुख विभोर हैं। किसी न किसी रूप में हर कोई अपने सन्दर्भ (जड़) से कटा दिख रहा है।" उन्होंने विस्तार से कई कहानियों को लेकर चिन्तन किया है। डा० अतुल कोठरी ने 'खोयी जड़ें' शीर्षक से इस संग्रह को लेकर छोटा-सा सारगर्भित लेख लिखा है। उनका मानना है, इस संग्रह में संकलित कहानियाँ नारी संवेदनाओं को केन्द्र में रखकर लिखी गई है लेकिन उनका सन्दर्भ सम्पूर्ण भारतीय है।

विजय कुमार तिवारी
"आँखन देखी" शीर्षक के अन्तर्गत वंदना जी ने अपने लेखन और अपनी कहानियों को लेकर कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को रखा है। कबीर को याद करते हुए लिखती हैं-"मैं भी आँखन देखी में ही विश्वास करती हूँ।" एक बात और कहती हैं-"कहानीकार जब कहानी लिखता है, तो स्वयं उसका परकाया में प्रवेश हो जाता है। और फिर तो लेखन में सच के सिवा कुछ आ ही नहीं सकता।" उनका कहना सही है-'सर्जना अनायास ही होती है।' अक्सर लोग लेखन को स्वान्तः सुखाय मानते हैं, वंदना जी कहती हैं-"लेखन सिर्फ स्वान्तः सुखाय नहीं हो सकता, यह एक गम्भीर सामाजिक दायित्व भी है। ऐसे गहन चिन्तन-भाव से लिखी कहानियाँ कोई भिन्न आलोक फैलाने वाली हैं। इस संग्रह में भिन्न-भिन्न भाव-बोध की उनकी कुल 15 कहानियाँ संग्रहित हैं।

'जड़ से उखड़े हुए' संग्रह की पहली और विस्थापन का दर्द समेटे मार्मिक कहानी है। इसमें कश्मीरी स्त्री के विस्थापन की पीड़ा है, तिब्बती स्त्री का विस्थापन है और दोनों का एक-दूसरे के लिए खड़ा होना मानवता का उदाहरण है। दोनों के मन में अपनी मिट्टी से दूर होने की पीड़ा छिपी हुई है। कथाकार ने उनके मन की परतों को पूरी संवेदना के साथ चित्रित किया है और विस्थापन में स्त्री पर पड़ने वाले प्रभावों का जीवन्त उल्लेख हुआ है। 'गुजबा-राती' दो स्त्रियों का मनोविज्ञान दर्शाती, विस्थापन का दर्द झेलती भावुक करने वाली कहानी है। अपनी परंपरा, बोली को बचाए रखने की कोशिश झकझोरने वाली है। राती पढ़ी-लिखी बहू है और गुजबा अनपढ़ सास, परन्तु उसके पास पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा, रीति-रिवाज, आस्था-विश्वास और जड़ी-बूटी का ज्ञान है। सास और बहू के बीच का संवाद, तालमेल, एक-दूसरे के प्रति प्रेम व चिन्ता वंदना जी ने अद्भुत तरीके से कहानी को जीवन्त किया है। इसमें सहजता है, समर्पण का भाव है, एक-दूसरे की समझ और ज्ञान को स्वीकारने की क्षमता है। किंचित हास्य-व्यंग्य है, दोनों को अपने-अपने पतियों के खोने का दुख भी है। वंदना शांतुइन्दु की मूल गुजराती कहानी का भाव प्रवाह और बुनावट कुछ अधिक ही प्रभावशाली रहा होगा। कहानी का संदेश यह भी है, हमारी प्राचीन चिन्तन दृष्टि आज के विज्ञान से कम नहीं थी। पौधों से माफी माँगना, प्रकृति से सीखना जैसी बातें अचम्भित करती हैं। औरतें नदी जैसी होती हैं, वनवासियों का बँधना और बाँधना प्रकृति नहीं है, पेड़ रहेंगे तब शहद रहेगा और शहद रहेगा तब तक जीवन रहेगा, जैसे बिंब चमत्कृत करते हैं।। राती खुश है, बच्चे ने जन्म ले लिया है, वह सास को आवाज देती है-'गुजबा बा! आपकी बोली बोलने वाला आ गया है।'

कथाकार की कहानियाँ प्रकृति, हरियाली व पहाड़ियों के बीच जन्म लेती हैं, कोई न कोई संदेश देती हैं और विस्तार पाती हैं। 'सफलता का आयाम' संघर्ष करने, चुनौतियों को स्वीकार करने और वनवासियों के जीवन में सुधार लाने की कहानी है। इसमें जीवन-दर्शन छिपा हुआ है और पलायन करने वालों को सीख दी गई है। अंग्रेजी, हिन्दी और वनवासियों की भाषा के बीच संवाद कोई अलग प्रभाव पैदा करता है। इस कहानी में नैतिक शिक्षाएँ, पात्रों में स्वतन्त्र चेतना की बात, समस्याओं से टकराने का संदेश, आसपास को देखने-समझने के साथ खुद को समझने का उपदेश और सफलता को भिन्न तरीके से परिभाषित किया गया है। आयाम का सारी व्यवस्था के बावजूद चोरी न करना उसका पुरुषार्थ है और वह उसकी ताकत है। यह कहानी देश की सीमा के भीतर रहकर वनवासियों, देशवासियों की सेवा को भी देश सेवा के रूप में स्वीकार करती है।'खून में धँसी कील' जातीय विद्वेष से समाज में होने वाले दुष्प्रभाव की मार्मिक कहानी है। रमण के लिए दुखद प्रसंग है, जाति की जानकारी होते ही लोगों का विचार-व्यवहार बदलने लगता है और वह असहज हो उठता है। धर्म परिवर्तन के बावजूद भीतरी संस्कार नहीं बदले हैं, कृष्ण की भक्ति बनी हुई है। राजी पढ़ी-लिखी समझदार पत्नी है और पति को समझाती रहती है। कहानी वर्ग-संघर्ष की चिन्ता तो करती है परन्तु समान वर्ग के बीच के संघर्ष को भी रेखांकित करती है। रमण का स्वीपर को डांटना वह स्वीकार नहीं करती और रमण को सहज होने की सलाह देती है। कहानीकार ने जाति को लेकर गाली वाले शब्दों का प्रयोग किया है, शायद उसके बिना भी काम चल जाता और कहानी की गरिमा बनी रहती। रमण की मां ने पूरी कहानी सुनाकर सच्चाई बतायी और सभी के भीतर करुणा-प्रेम जाग उठा।

वंदना शांतुइन्दु के पास स्त्री संवेदना की नाना कहानियाँ हैं, उनके दृश्य चौंकाते हैं और विस्थापन से जुड़े कथ्य-कथानक किसी अबूझ दुनिया में ले जाते हैं। 'मोक्ष' कहानी कारगिल से शुरु होती है, पाकिस्तान में हो रही मीटिंग में दोनों देशों के कमांडर अभयसिंह सोलंकी और युनुस खान को मिलवाती है, दोनों के पास अपनी सनातन संस्कृति की धरोहर है और दोनों कभी एक ही कुल-खानदान के रहे हैं। जिसने धर्म नहीं छोड़ा, जमीन छोड़ दी, भारत आ गए, जिसने जमीन नहीं छोड़ी, धर्म छोड़ा वह वहीं बसे रह गए। अभयसिंह के पास पुरखों का फूल है जिसे पाकिस्तान स्थित किरिया के जलकुंड में विसर्जित करना है और उधर युनुस खान के पास हजारों पीढ़ियों की अमूल्य विरासत कुलदेवी की छोटी सी मूर्ति है जिसे अभयसिंह के गाँव जलोया पहुँचा देना है। युनुस खान कहता है-"हम मुसलमान बने, आप हिन्दू रहे, पर हम दोनों की रगों में दौड़ता खून एक ही है। कहानी एक और संदेश देती है, भले ही लोगों ने धर्म बदल लिया है, भीतरी आस्था अभी भी बनी हुई है, धर्म बदलने से पूर्वज थोड़े ही बदल जाते हैं। 'जय जगन्नाथ' विस्थापन के बड़े कैनवास की कहानी है, हमारे समाज का क्रुर चेहरा उभरता है, कला की लोगों को सही समझ नहीं है, लोग वासना में डूबे हुए हैं और अपनी सभ्यता-संस्कृति के प्रतीकों को समझना-बचाना नहीं चाहते। कहानीकार पुरजोर सच्चाई लिखती हैं-"कोणार्क-खजुराहो में नीच लोगों को केवल नग्नता दिखाई देगी। ----जिंदगी उसी में से होकर गुजरती है, तब जाकर मोक्ष को पाती है।" उन्होंने एक सच्चाई और लिखी है-रोजाना औरतों की होती छेड़खानी से, बलात्कारों से जो गर्म नहीं होते थे, वह इन पेंटिंग्स से गर्म हो गए थे। किशन भाग खड़ा होता है गुजरात से और उड़ीसा में आ बसता है। नीलू उसकी बहन सुभद्रा अपना हनीमून मनाने कोणार्क व पुरी आती है और भाई -बहन की मुलाकात होती है। कलात्मक चित्रण, भाव-चिन्तन और गहन दृष्टि बहुत कुछ है इस कहानी में। कहानीकार ने गुजरात से उड़ीसा तक का अद्भुत दृश्य संयोजन किया है और गहन भाव उकेरा है। 

'वंशज' कहानी जातिवादी व्यवस्था पर करारा चोट की तरह है और कहानीकार ने कड़वी सच्चाई के साथ कठोर भाव-शब्दों में विस्तार दिया है। पहाड़ियाँ हैं, जाम्बुघोड़ा का विशाल जंगल है और आदिवासी आश्रम का संचालन कर रही सिंधु है। पिता की मृत्यु के समाचार का पत्र छोटी बहन कावेरी ने भेजा है। सारा विगत स्मृतियों में मूर्त हो उठा है-वह पिता से नीरव के प्रति अपने प्रेम की सूचना दे रही है, पिता अस्वीकार के साथ-साथ बहुत कुछ अशोभनीय बातें करते हैं, पिता-पुत्री के बीच का संवाद जातिवादी रुढ़ियों की जकड़न में आकार नहीं ले पाता। नीरव को भी इसका अहसास है, वह गुरुदक्षिणा में गुरु के जीवन पर्यन्त सिंधु से दूर रहना स्वीकारता है। वंदना शांतुइन्दु के तर्क अपनी जगह हैं, कहानी बेहतर तरीके से बुनी गई है और सिंधु पूरे विद्रोह के साथ अपना तर्क रखती है-"पिता जी! रिश्ते हमारे कहने से खत्म नहीं होते और न ही शुरु होते हैं; मैं आपकी बेटी और--नीरव की प्रेमिका रहूँगी, यह अटल सत्य है मेरे लिए।" कहानी सुखद अंत की ओर मुड़ती है, वंदना जी की पंक्ति देखिए-"कुएँ की दीवार तोड़ कर उगने की कोशिश करते हुए पीपल जैसा नीरव सामने खड़ा था।"

"मानवता की मां" स्त्री विमर्श के साथ-साथ उसकी पीड़ा, उसके साथ धोखा, अन्याय, धर्म-मजहब का दुष्चक्र आदि अनगिनत दुखो से भरी कहानी है। यहाँ भी विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है। दुख स्त्रियों को ही झेलना है, बदलना या समझौता स्त्री ही करती है। यदि नहीं करती तो उसे दुख के दलदल में धकेल दिया जाता है। रेवा कबीर के साथ प्रेम-विवाह करती है, पुत्र का नाम मानव रखती है। सब कुछ अच्छा चल रहा है। दुबई से कबीर का चाचा आता है और रेवा के सहज-शांत जीवन में जहर घुलता चला जाता है। कबीर रेवा को त्याग, दुबई जाकर रेशमा से शादी रचाता है, पुत्र मानव को भी बहला-फुसला कर बुला लेता है। रेवा अपने पिता के पुश्तैनी घर में सब कुछ लुटाकर वापस आ गयी है। वंदना शांतुइन्दु ने कहानी में सामाजिक-मानसिक अन्तर्विरोधों के साथ स्त्री विमर्श चित्रित किया है। धर्म को लेकर, मजहब को लेकर और पैसे के लिए ईमान बेचकर पलायन करने वालों पर प्रश्न उठाती कहानी स्त्रियों की आँखें खोलने वाली है। रेवा रेहाना चाची से कहती है-" पाठशाला मैं संभालूँगी, मैं बच्चों को पढ़ाऊंगी। ----मैं अब अनेक मानवों की माँ बनूँगी, चाची! मैं मानवता की माँ बनूँगी।"

वंदना शांतुइन्दु की भविष्य की कल्पना, वर्तमान की दशा-दिशा देखते हुए भविष्य में मनुष्य के जीवन के तौर-तरीके, रहन-सहन, विज्ञान की हर क्रिया-कलाप में पकड़ आदि के दृश्य चौंकाने वाले हैं। आज जो स्थिति है, सारी परिकल्पनाएँ संभव होती दिख रही है। रचनाकार ने हास्य-व्यंग्य परोसा है और मानवीय स्वभाव की कल्पना रोचक है। औरतों की जीभ रचना पर कटाक्ष और डाक्टर द्वारा बताया गया उपचार कुदरत से जोड़कर देखा गया है। उत्क्रान्ति का नियम अपनी जगह सही है, इसलिए बलाशी को अपनी जिह्वा का व्यायाम करना है। उन दिनों केवल गोलियाँ होंगी, खाने की गोलियाँ, नींद की गोलियाँ, संवाद अपने-अपने पीसी से होगा और घर मे रोबोट सब कुछ करेगा। सबसे बड़ा संकट यह होगा, कोई भावना, करुणा, संवेदना जैसी चीज नहीं होगी। यदि किसी को इंसानी भावनाएँ जागने लगेंगी, चुमने, प्यार करने आदि तो उसे डाक्टर के पास ले जाया जायेगा। वंदना जी ने अद्भुत कल्पना की है अपनी इस 'फाॅसिल' शीर्षक वाली कहानी में और तदनुरूप भाषा, शब्द, शैली आदि का जीवन्त प्रयोग किया है।

'देहली' की भाव-संवेदनाएँ, खेत-खलिहान, बाँस, झोपड़ी, घर के आगे-पीछे के पेड़-पौधे, खिड़की, कमरे, तापी नदी, अपना गाँव और सारे रिश्तों को समेटती है। उसे अपना मछुआरन होना पसंद है, वह पति को मछली मारते देखना चाहती है। कहानी का यह विस्तार रचनाकार का व्यापक अनुभव दर्शाता है और स्त्री की स्थिति-मनःस्थिति का सजीव चित्र खींचता है। गिलहरी व चिड़िया के साथ उसका संवाद भावुक करने वाला है। चंदन के जीवन से सब कुछ छिनता जा रहा है, वह हौसला बनाए सह रही है। सब में जीव व जीवन का संदेश यथार्थ है। मां-पिता नहीं रहे। वह तापी नदी, अपने गाँव के साथ-साथ मां-पिता को याद करती है और विह्वल होती है। ऐसी भावना प्रधान कहानियाँ हर पाठक को झकझोरने वाली हैं। सारा विवरण सजीव व दर्दनाक है। रचनाकार ने मिश्रित शब्दावली के साथ दृश्यों, भावनाओं को जीवन्त किया है और मार्मिक कहानी लिखी है।

हर कहानीकार के पास कोई अपनी दृष्टि होती है, उसी के आधार पर वह अपने आसपास को, लोगों को, उनके सम्बन्धों को देखता, समझता है और दुनिया के सामने कहानी विधा के माध्यम से रखता है। वंदना जी ने साहस पूर्वक विजातीय सम्बन्धों या एक कौम से दूसरे कौम के बीच हुए प्रेम सम्बन्धों पर गहन छानबीन की है। एक तरह से देखा जाय तो 'जाले से छनती धूप' दो कौमों-हिन्दू व मुसलमान के बीच हुए, प्रेम के चलते बने वैवाहिक सम्बन्ध की पड़ताल करती है। कहानी ऐसी परिस्थितियों में अनेक मौलिक प्रश्न उठाती है और चरित्रों के द्वारा दृश्य, घटनाएँ दिखा पूरे समाज को आगाह करती हैं। प्रेम पर किसी का वश नहीं चलता, कब, किसके साथ हो जाए। हर लड़की को यह भी समझना होगा, ऐसे सम्बन्धों को हमारा समाज सहजता से स्वीकार नहीं करता। यदि सामने वाला या उसके लोगों में कट्टरता है तो लड़की या स्त्री को त्रासदी झेलनी पड़ती है। आयुषा जावेद से प्रेम करती है और शादी होती है। सुखद है, जावेद कट्टर नहीं है परन्तु उसका पिता खुश है, कहता है, "शा--बा--श जावेद, तू हिंदू की लड़की को भगा लाया। तू एक सच्चा मुसलमान है।" उसकी सोच देखिए, कहता है, "तू काफिरों की इज्जत से खेलेगा। तू सच्चा मर्द है। पर तुझे अपने धर्म वाली लड़की से शादी करनी ही पड़ेगी, अपनी बुआ की बेटी से।" लड़कियों को सावधान तो होना ही चाहिए। पूरी कहानी में सारे विवरण आयुषा को सुखी नहीं होने देते, वह जिल्लत झेल रही है। दंगाइयों से बचाते हुए जावेद आयुषा को अपनी बुआ के घर पहुँचा देता है जहाँ नसीम, बुआ की बेटी उसे व्यथित करती रहती है। आयुषा को पिता की बात याद आती है, "हमने कितनी हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से शादी करके पछताते हुए देखा है क्योंकि वे बाद में दूसरी शादी कर लेते हैं या पहले से ही शादीशुदा होते हैं। ऐसी लड़कियों की जिन्दगी त्रिशंकु बन कर रह जाती है।" बुआ भी औरत की स्थिति को  लेकर कोई सच्चाई व्यक्त करती हैं-"देख बेटी, औरत कभी भी आयुषा या आयशा नहीं होती है। औरत--- सिर्फ औरत होती है। बदला लेने का साधन मात्र। हर युद्ध के बाद जीत का जश्न या हार का बदला औरतों के साथ ही लिया जाता है।" हालांकि यहाँ जावेद वैसा नहीं है। वह दंगाइयों से बचाकर अपने अब्बू-अम्मी को लाता है तो आयुषा के मम्मी-पापा को भी ले आता है। लेखिका ने आज की सच्चाई लिखी है और समाज को सचेत किया है। स्थिति-परिस्थिति का चित्रण, भाव-संवेदनाओं का वर्णन और त्रासदी यथार्थतः मूर्त हुई है इस कहानी में।

'अंधेरे का रंग' कहानी तनिक भिन्न तरीके से ऐसा ही मसला उठाती   है और अज्ञानता को अंधेरे से जोड़ती है। कहानीकार को रुमानियत के दृश्य चित्रित करने में मजा आता है। जुबैदा का जीवीभाभी के साथ का संवाद रोचक है। खपड़ैल घर में अंधेरा है। जुबैदा सलीम को लेकर चिंतित है, वह लौटा नहीं है। उसकी हरकतें, मरने-मारने की बातें अधिक परेशान करती हैं। उसके घर की चौथी दीवार गढ़ की है जिसके उस पार मां आशापुरा का मन्दिर है। अक्सर सलीम उधर ही पैर करके सोता है, थूकता है। जुबैदा काँप उठती है, रोकती है और समझाना चाहती है। सलीम पूछता है-"ये तेरे अब्बू को काफिरों के मंदिर के पहलू में घर बनाने का कैसे सूझा?" कहानीकार के संदेश को समझने की जरुरत है, पूरे देश में ऐसे हालात मिलेंगे। मंदिर के आसपास उनकी बस्ती मिल जाएगी। जुबैदा ने सलीम को बेटा मानकर बड़ा किया है। वह जानती है, सलीम मुसलमान का बच्चा नहीं, हिंदू है। वह अक्सर सोचती है-वह इतना कट्टर कैसे हो गया। उसे लगता है ये टीवी पर चल रही बहसें दुनिया को प्रभावित करती हैं। वंदना शांतुइन्दु कट्टरता के कारणों को समझना चाहती हैं और अंधेरे का रहस्य दिखाना चाहती हैं-माता के देहरे में और अपने घर में अंधेरे का रंग तो सरीखा ही है।

अपनी जमीन को छोड़ने के गहरे दुख की कहानी है 'कमु लकड़ी'। स्थानीय भाव-शब्दावली और दृश्यों से भरी कहानी गहन संवेदना उजागर करती है। कहानीकार के पास संवाद रचने की अपनी अद्भुत शैली है। वह हँसाती है, व्यंग्य करती है, खीझती है और प्रेम के भाव चित्रित करती है। तीन पीढ़ियों से घर में लड़कियाँ जन्म ले रही हैं और दामाद घर-जमाई बनकर रहते हैं। दामादों को उस जमीन के प्रति वह लगाव नहीं है जो बेटियों को है। कमु घर-जमीन सब संभालती है और नीलगायों को भगाने के लिए दौड़ती रहती है। वही जमीन सरकार लेने वाली है। कमु को लड़का हुआ है परन्तु उसे भी खेती नहीं करनी, उसे वह धन दिखाई दे रहा है जो सरकार से मिलने वाला है। कमु के लिए यह खेत सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह उसकी आदि माता है। कमु उद्विग्न होती है, प्रश्न पूछती है और खेत की ओर भावुक हो देखती रहती है। अपनी जमीन छोड़ने का दर्द खूब गहराई से उभरा है इस कहानी में।

संसार में अपनी पीड़ा से सभी दुखी होते हैं, जो दूसरों की पीड़ा को अपना बना ले, 'पोस्ट मास्टर' उसी की कहानी है। बेटी की शादी के बाद अली जिस तरह नित्य पोस्ट ऑफिस में आकर बेटी के पत्र की प्रतीक्षा करता है, कोई भी भावुक हो सकता है। पोस्ट मास्टर इस भावना को समझता है, नित्य व्यथित होता है और अपनी बेटी हंसा को याद करके विह्वल होता है। अली का दुख उसका दुख बनता गया है। अली की बेटी के आने की सूचना पर पोस्ट मास्टर पिता का फर्ज निभाने के लिए तैयार होता है। उसे घर लाता है और अली की कब्र पर ले जाता है। ऐसी कहानियाँ बुनना सहज नहीं होता। वंदना जी ने कौम का भेद मिटा सम्बन्धों को जीवन्त किया है। बहुत सहजता से, मन के भावों, उद्गारों को चित्रित करते हुए उन्होंने इस कहानी को लिखा है। बेटी को भी अपरिचित पोस्ट मास्टर के प्रति पिता का भाव जागता है, वह भावुक होती है और पिता की कब्र पर रो पड़ती है। संवेदना, प्रेम और दूसरों के दुख में शामिल होने की यह तनिक भिन्न कहानी है जिसमें भाव, शब्द, शैली चमत्कृत करने वाली है।

'कडु़आ दरिया' समुद्र के किनारे बसे मछुआरों के जीवन पर आधारित मार्मिक व दुखद कहानी है। दरिया मछुआरों का जीवन है तो कभी-कभी इनका जीवन ले भी लेता है। कड़वी और लीली दोनों सगी बहने हैं और दोनों की शादी एक ही घर में सगे भाइयों के साथ हुई है। दरिया अक्सर विकराल रूप धारण कर, दीव के किले की दीवार पर माथा पटकता रहता है। ऐसे ही किसी तूफान में देश के छः मछुआरे समाचार बन गए। कड़वी का पति कान जी भी उसमें से एक था। उसकी जिन्दगी व मनोदशा का चित्रण विह्वल करने वाला है। ऐसे ही पन्द्रह वर्ष गुजर गए। एक दिन डाक आई, पता चला, कान सहित सभी मछुआरे पाकिस्तान की कैद में सड़ रहे हैं। कड़वी के अंदर एक नई कड़वी उगने लगी। वालजी ने फोन से भाई की बात उससे करवा दी। बड़ी मुश्किल से क-ड़-वी--वी बोल पाया। वालजी ने कहा-"भाई को कफ है। सब ठीक हो जायेगा।" बाद में सूचना मिली, ट्रेन में कानजी की मौत हो गई। वंदना शांतुइन्दु को मछुआरों के जीवन व संघर्ष का खूब अनुभव है, एक-एक विवरण जीवन्त हो उठता है और कहानी के रूप में पाठकों तक पहुँचता है।

वंदना शांतुइन्दु को मछुआरों, आदिवासियों, वनवासियों के साथ-साथ शहरी जीवन की जबरदस्त पकड़ है। वह उनके जीवन के संघर्षों, उनके प्रेम आदि को खूब समझती है और उनकी भाषा-शैली में कहानियाँ बुनती हैं। उनकी कहानी लिखने की कला चमत्कृत करती है, पाठक भीतरी करुणा, संवेदना आदि से प्रभावित होते हैं। उनकी कहानियों का विस्तार बहुत कुछ समेट लाता है। अक्सर विपरीत मनःस्थिति में कहानीकार झुँझलाती हैं, खिझती हैं और अपना रोष प्रकट करती हैं। उनकी शैली उनका साथ देती है और अनेक भाषाओं के शब्द उनकी रचना में स्थान पाते हैं।

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