फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मैला आंचल' में लोककथा के तत्व

चौहान अनुराधा

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद 56
चलभाष: +91 960 197 8235; ईमेल: annulovesmom@gmail.com


प्रस्तावना:-

         फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी के प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार है। जो प्रेमचंद की परंपरा से जुड़े होने के बावजूद अपने क्षेत्र का एक विशिष्ट एवं विकसित संस्करण उद्घाटित करते हैं। साथ ही सीमित अंचल की घटना,भाषा, बोलचाल से संबंध रखते हुए भी एक विलक्षण सांकेतिकता द्वारा संपूर्ण राष्ट्रीय जीवन को ध्वनित एवं व्यंजित करते हैं। इस विशिष्ट गुण के कारण उनके उपन्यासों को महाकाव्यात्मक उपन्यासों की संज्ञा दी जा सकती है। मैला आंचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कलंकमुक्ति, जुलूस पलटूबाबू रोड, रेणु जी के प्रमुख उपन्यास हैं। ठुमरी, अगिनखोर और आदिम रात्रि की महक, अच्छे आदमी आदि उनकी प्रमुख कहानियाँ है। ऋण-धनजल, वन तुलसी की गंध जैसे रिपोतार्ज का लेखन भी रेणु जी ने किया है। इनके उपन्यास भारत के पिछड़े गाँवों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो वर्तमान समय में उपेक्षित हैं। उन्होंने समग्र गाँव के अच्छे-बुरे पहलुओं को, ग्रामजीवन की दैनिक वास्तविकता को, लोकसंस्कृति के उपादान जैसे लोकगीत, लोककथा, लोकउत्सव, पर्व, त्योहार, मेले, गाँव के प्राकृतिक दृश्यों को अपने उपन्यास में अंकित किया है।

रेणु जी ने अपने उपन्यास मैला आंचल के बारे में कहा है कि - “इसमें फूल भी हैं, शूल भी हैं, धूल भी हैं, गुलाब भी, कीचड़ भी हैं, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी- मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।”1 मैला आंचल को केवल एक आंचलिक उपन्यास की श्रेणी में नहीं रखा गया है, बल्कि उसे हिंदी व भारतीय उपन्यास साहित्य की  श्रेष्ठतम कृतियों में एक माना गया है। मैला आंचल उपन्यास को गोदान के बाद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक माना जाता है। प्रस्तुत उपन्यास में रेणु जी ने पूर्णिया जिले के मेरीगंज गाँव में प्रचलित अनेक लोककथाओं का वर्णन किया है। इन लोककथाओं में ज्ञान व उत्साह वर्धक तत्व होते हैं, तथा उपदेशात्मकथा भी सर्वत्र दिखाई देती हैं। ये मानवता की प्राचीन परंपरागत प्रथाओं और उनके विभिन्न मूल्य और विश्वासों का प्रतिनिधित्व करती हैं। 'रेणु' के उपन्यास 'मैला आंचल' में अनेक लोककथाएँ समाहित हैं, जैसे सुरंगा-सदाबृज की कथा, ठूमर-बिज्जेमान की कथा, कमला मैया की कथा, जाट-जट्टिन की कथा। आदि विविध रूपों में प्रस्तुत होकर लोकरंग की छटा बड़े अनूठे ढंग से उभारते हैं।

1. कमला मैया की लोक कथा:-
     
           मैला आंचल का कथानक पूर्णिया जिले के मेरीगंज गाँव पर आधारित है। मेरीगंज एक बड़ा गाँव है; जिसमें अलग-अलग वर्ण के लोग रहते हैं। गाँव के पूर्व में कमला नदी बहती है। वर्षा ऋतु में वह पूरी लबालब भरी रहती है। अन्य ऋतुओं में उसके बड़े-बड़े गड्ढे में पानी भरा रहता है। उन गड्ढों में मछली व कमल पुष्पों से भरे रहते हैं। “पौष पूर्णिमा के दिन इन्हीं गड्ढों में कोशी-स्नान के लिए सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती है। गाँव वालों के अनेक आस्था-विश्वास कमला मैया के साथ जुड़े हुए हैं, जो उन्हें आत्म बल प्रदान करते हैं।”2 कमला मैया के 'महातम' के बारे में भी गाँव के लोग अनेक कहानियाँ कहते हैं जिनमें से एक इस प्रकार है-

“गाँव में किसी के यहाँ शादी-ब्याह या श्राद्ध का भोज हो, गृहपति स्नान करके, गले में कपड़े का खूंट डालकर, कमला मैया को पान-सुपारी से निमंत्रित करता था। इसके बाद पानी में हिलोरें उठने लगती थी, ठीक जैसे नील के हौज में नील मथा जा रहा हो। फिर किनारे पर चांदी के थालों, कटोरो और गिलासों का ढेर लग जाता था। गृहपति सभी बर्तनों को गिन कर ले जाता था और भोज समाप्त होने पर कमला मैया को लौट आता था। लेकिन सभी की नियत एक जैसी नहीं होती। एक बार एक गृहपति ने कुछ थालियाँ और कटोरे चुरा रखें ।  बस उसी दिन से मैया ने बर्तनदान बंद कर दी और उस गृहपति का तो वंश ही खत्म हो गया - एकदम निर्मूल।” 3

           उस बिगड़ी नियत वाले गृहपति के बारे में गाँव में दो रायें हैं- राजपूत टोली वाले कहते हैं वह गृहपति कायस्थ टोली का था। कायस्थ टोली वाले उसे राजपूत टोली का बताते हैं। कमला मैया के प्रति बदनियति का दुष्परिणाम इस लोककथा में अभिव्यक्त किया गया है।

2. सारंगा सदाबृज कथा:

     मेरीगंज गाँव अलग-अलग टोलियाँ में बँटा हुआ है। कायस्थ टोली, राजपूत टोली यादव टोली। इनमे भी अन्य छोटी-छोटी टोलियाँ मौजूद है। जैसे पोलिया टोली, तंत्रीमां टोली, धनुषधारी टोली, ब्राह्मणटोली, कुशवाहा छत्री टोली आदि। सारंगा-सदाबृज की कथा तंत्रिमाटोली में खलासी जी द्वारा महंगू दास के घर पर गाँव के लोगों को सुनाई जा रही है। इस कथा में सारंगा नामक स्त्री सदाबृज पर मोहित हो जाती है। तथा अपने मन की बात वह सदाबृज को जाकर सुनाती है। इसका वर्णन किया गया है।

नहीं तोरा आहे प्यारी तेग तरबरिया से
नहीं तोरा पास में तीर जी!

एक सखी ने पूछा कि हे सखी, तुम्हारे पास में न तीर है न तलवार।
 
…नहीं तोरा आहे प्यारी तेग तरबरिया से कौनही चीजवा से मारलु बटोहिया के
 धरती लोटाबेला बेपीर जी ई ई ई।4

यह सुनकर जो औरत सदाबृज पर मोहित थी बोली-

…. सासु मोरा मरे हो, मरे मोरा बहन से
   मरे ननंद जेठ मोर जी 
  मरे हमार सबकुछ पलिबरबा से,
फसी गइली परेम के डोर जी।5

  ….. इतना कहकर वह सदाबृज के पास आई और पानी पिलाकर प्रेम की बातें करने लगी । ….

आज की रतिया हो प्यारे, यही बिताओं जी ! …..

गाँव के सभी नर-नारी शौक से सारंगा सदाबृज की कथा का रसपान करते हैं। कथा श्रवण के दौरान स्त्रियाँ आपस में झगड़े करती है। पर इन झगड़ों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। सभी मंत्रमुग्ध होकर इस लोककथा का रसपान करते हैं।

3.जाट-जट्टिन की कथा:-

     प्रस्तुत लोककथा में मेरीगंज गाँव की ततमाटोले, पासवानटोला, धनु कुर्मीटोला तथा कोयरीटोला की औरतें हरसाल बरसात के मौसम में इंद्र महाराज को रिझाने के लिए, बादल को सरसाने के लिए जाट जट्टिन खेलती हैं। ….ततमा टोली की औरतों ने बाबू टोला की औरतों को निमंत्रण दिया है- “एक साथ सब मिलकर जाट-जट्टिन  खेलें जरूर बरखा होगी। “6

इसकी कथा कुछ इस प्रकार हैं। जाट के पास हजारों-हजार  भैंसे हैं। वह उन्हें चराने के लिए कोशी के किनारे जाता है। जट्टिन घर में रहती है; दूध, घी और दही की बिक्री करती है, हिसाब रखती है । सास व पति से झगड़कर, रुठकर, जट्टिन नैहर चली गई । जाट उसे ढूंढने जा रहा है। जट्टिन बड़ी सुंदर थी , उसकी सुंदरता की चारों ओर चर्चा होती थी।

“सुनरी हमरी जटिनियाँ हो बाबूजी,
पातरि बांस के छौकीनया हो बाबूजी,
गोरी हमर जटिनियाँ हो बाबूजी,
चांननी रात के इंजोरिया हो बाबूजी!
नान्ही-नान्ही दंतवा, पातर ठोरवा….
 छठके जैसन बिजलिया….।”7

इसलिए जाट को गाँव के हरेक मालिक, नायक या मंडल पर संदेह ।…. जट्टिन नैहर नहीं जा सकेगी, किसी ने जरूर उसे अपने घर में रख लिया होगा ।…..रास्ते में कितने गाँव हैं, कितनी नदियाँ हैं, कितने घाट है और घटवार हैं। वह रास्ते के हर गाँव के मालिक मड़र, और नायक के यहाँ जाता है:

नायक जी हो नायक हो,
खोले देहो केवरडिया हो नायक जी,
ढूंढे़ देहो जटिनियाँ हो नायक जी….8
     
     'जाट-जट्टिन' अभिनय के साथ-साथ  सभी औरतें और भी सामाजिक अभिनय तथा व्यंग्य नाट्य बीच-बीच में करती हैं। और उनकी मंडली हँसते-हँसते लोटपोट हो जाती है। मर्दों को 'जाट-जट्टिन' देखने का एकदम हक नहीं है। अगर किसी ने छिपकर देखा तो उसके बाद पंचायत में चली जाएगी।  अंत में औरतें मिलकर हल जोतती हैं। हल और बैल किसी का ले आती हैं और जोतते समय गाँव के बड़े-बूढे़ किसानों को गाली देती हैं-

“अरे विश्वनाथ तहसीलदरवा ! जल्दी पानी ला रे ! पियास से मर रहे है रे !”
“अरे ! सिंघवा सिपैहिया रे ! पानी ला रे ! “
“अरे रमखैलोना रे ! पानी ला रे ! “9

इस गाली को कोई बुरा नहीं मानते। बल्कि किसी बड़े किसान का नाम छूट जाए तो उसे तकलीफ होती है।…बहुत दुख होता है। इस बार डॉक्टर को भी गाली दी जाती है।-

“ अरे डककरवा रे ! अरे परसंतो रे, जल्दी बोतल में पानी ले के आ रे !...”10

आसमान में काले बादल घूमड रहे हैं ।…. बिजली भी चमक रही है। गाँव की स्त्रियों का मानना है कि सब स्त्रियाँ एक साथ मिलकर जाट-जट्टिन खेल खेलेंगी तो बरसात अवश्य होगी।


निष्कर्ष:-
       
          रेणु जी के उपन्यास मैला आंचल में अनेक लोककथाओं का वर्णन किया गया है। जिसमें कमला मैया की कथा में  कमला मैया प्रति बदनियति का दुष्परिणाम अभिव्यक्त हुआ है। सारंगा-सदाबृज कथा में सारंगा नामक स्त्री  का सदाबृज पर मोहित हो जाने कि कथा का वर्णन किया गया है। जाट-जट्टिन कथा के  विषय में गाँव की स्त्रियाँ यह मानती हैं  कि जब हम स्त्रियाँ एक साथ मिलकर जाट-जट्टिन खेल खेलेंगी तो बरसात अवश्य होगी। इस प्रकार इन लोककथाओं के माध्यम से रेणु जी ने मेरीगंज गाँव की लोकरंजक झांकियों को विविध रूप में हमारे सामने प्रस्तुत किया है‌।


संदर्भ:-

1. मैला आंचल, फणीश्वर नाथ रेणु, राजकमल प्रकाशन, (भूमिका से)
2. वही पृष्ठ 14
3. वही पृष्ठ 14
4. वही पृष्ठ 57
5. वही पृष्ठ 57
6. वही पृष्ठ 180
7. वही पृष्ठ 181
8. वही पृष्ठ 181
9. वही पृष्ठ 182
10.वही पृष्ठ 182

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