पाँच कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

(1) रामविलास जी से हुई एक अद्भुत मुलाकात को याद करते हुए 
.....................................................................................

अभी-अभी निराला से हाथ मिलाकर आए थे वे 
सुनाने लगे हाल
कि कैसे मिले थे पहली दफा
और कैसा था रोमांच
तब निराला लगते थे बिल्कुल यूनानी देवताओं जैसे
पुष्ट कंधे, तनी छाती, आँखें बिन कहे बहुत कुछ कहती सी

सुनाने लगे कि जब पार्क में बैठकर सुनी थीं उनसे कविताएँ 
टैगोर की तो कैसा था समाँ
उतर आया जमीं पर दिक्काल 
चकित, विभ्रांत सा
बहतीं तीव्रवाही नदियाँ हरहराती चारों ओर...

सुना रहे थे तो बीच में ही दिलचस्प एंट्री लेते
चले आए कहीं से टहलते-टहलते नागर जी
दोनों मिले धधाकर और होने लगा नाटक बड़ा प्यारा सा 
नागर जी बोले हम तुमसे बड़े हैं आप कहो 
क्या तुम-तुम लगा रखा है! 
मगर रामविलास जिद पर हैं कि आप हमसे न कहा जाएगा।

यह नाटक कुछ और दूर तक चल सकता था
कि इतने में खरामाँ-खरामाँ कहीं से चले आए केदार
अपने बाँदा शहर की धज और केन नदी की
की भरपूर आर्द्रता लिए आँखों में
बोले केन पर कुछ नई कविताएँ लिखी हैं रामविलास जरा सुनो

फिर तीनों के मिलने पर तीनों की पुरानी स्मृतियों ने मिलकर 
वो मचाया गुलगपाड़ा कि भूलकर
इंटरव्यू
भूलकर सारी चुस्ती-फुर्ती जमाने की
मैं देखता रहा
एक अथक फिल्म जो मेरे सामने चल रही थी और
अभी चलनी थी अनंत काल तक!
*

(2) छुन्नू महाराज के लिए एक कविता
.................................................

बनारस है तो छुन्नू महाराज भी हैं
छुन्नू महाराज हैं तो उनकी होरी भी 
कि खेलें मसाने में होरी दिगंबर
खेलें मसाने में होरी...

उमग रहे हैं स्वर उनके भीतर से
जैसे उमगती हैं लहरें गंगा की
शिव की जटाओं से विचित्र लास्य के साथ
वे बैठे हैं और गा रहे हैं
नहीं-नहीं, बैठे हैं और नाच रहे हैं
नाच रहे हैं उनके स्वर भी साथ-साथ—
खेलें मसाने में होरी दिगंबर,
खेलें मसाने में होरी...
चिता भस्म भर झोरी, दिगंबर खेलें मसाने में होरी...

नाच रहे हैं बोल छुन्नू मिश्र के
मसाने में नाच रहे 
परम कौतुकी नटराज शिव की तरह
और हम सबके सब अवाक

अहा, छुन्नू महाराज अब छुन्नू महाराज नहीं हैं
अपने स्वरों में घुलते जा रहे हैं वे हर पल
केवल देह है जो सामने है...
और स्वरों के साथ-साथ नाचती मुक्त केशराशि
वे जैसे हैं भी और नहीं भी
वे भी जैसे मसाने में होरी खेलते शिव में समा गए हों
शिव में शिव होकर...

और उनके साथ-साथ हम सब भी
जो मसाने में खेल रहे थे होरी
और बनारस में
बनारस की आत्मा का देख रहे थे
यह सम्मोहक लीला नृत्य

गायन पूरा होते ही जैसे सब नींद से जागे हों
मंच से उतरे हैं छुन्नू महाराज
और उनके साथ-साथ हम सब भी 
बँधे किसी जोदू की डोर से
बतियाते हुए मन की आनंद लीला में मगन
कि अचानक क्लिक,
किसी ने उनके साथ मेरा फोटो खींचा है

किसने खींचा फोटो मुझे चाहिए,
मैं कहना चाहता हूँ 
भीड़ में गर्दन उठाए
पर देखा तभी सब हँस रहे हैं 
हँस रहा बनारस भी मस्ती में खुदर-खुदर
साथ-साथ गंगा मैया हँस रही है—
तुम्हें तो साक्षात छुन्नू मिश्र ही मिल गए
तो अब फोटो का क्या करोगे प्रकाश मनु?

देर तक उनके साथ खाना खाते बतियाता हूँ मैं
साथ में सूर्य भाई
उनकी बातें हैं कि थमती ही नहीं
और हमारी जिज्ञासाएँ अनंत

हम दुनिया के सबसे अलमस्त 
गायक से रूबरू हैं
मैं और सूर्य भाई इशारे से एक-दूसरे से कहते हैं
और छुन्नू मिश्र हमसे बतियाते हुए
उसी आनंद से भोजन का रस ले रहे हैं
जिस रस के साथ गाया उन्होंने अभी-अभी
खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी...
अब तक दिशाओं में गूँज रहे हैं उनके स्वर दूर-दूर तलक
भीतर एक लहर सी उठाते हुए

यह बनारस तो बड़ा अद्भुत है महाराज
इसकी हवाओं में इतनी गूँज क्यों है
क्या हर पुराने शहर मे होती है ऐसी ही पुकार
यह इतिहास की पुकार है कि संस्कृति की...?

मैं पूछना चाहता हूँ
पर इससे पहले ही
किसी बात पर ठहाका लगाकर 
हँस पड़े हैं छुन्नू महाराज
उनके साथ-साथ हँसता है पूरा बनारस
हँसती है गंगा मैया भी 
बड़ी ही निर्मल मिठास से पगी हँसी

पुत्र, बहुत भोले हो...
यह शिव का मृदुल हास्य है
जो पूरे बनारस में व्याप रहा है—
कहीं से कोई स्वर आता है
और मैं चकित सा चारों ओर देखता हूँ

हवाओं में फिर-फिर गूँजता है स्वर,
खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी...
*

(3) हम जो एक साथ चले थे
...................................

हमने एक साथ लिखनी शुरू की थीं कविताएँ
हम थे अभिमानी 
अंदर से जले हुए लोग
कि जैसे जली हुई लकड़ी जला कोयला जली ऐँठ
मगर सपने देखते थे एक सुंदर और हरी-भरी वसुंधरा के

हमारे दिल-दिमाग की सारी कवायदें थीं इसीलिए
और इसीलिए कविता की जड़ों में 
और-और गहरे उतरते जाते थे हम
जब-जब खाते थे धक्के खाते धोखे और पिटते थे 
बाहर दुनिया के छलावों से

और कविता थी एक थरथराता तंबू
हमारे जज्बात का फूला-फूला सा
रात-दिन उसे हम ओढ़ते बिछाते और फुरसत के पलों में
करीने से तहा करके रख देते थे
वह सबसे वफादार दोस्त थी और हमारा सबसे 
सुरक्षित अरण्य भी
जिसमें हमारा सबसे सुंदर और पवित्र सपना
साँस लेता था
एक हरी-भरी खुशदिल दुनिया का सपना।

यों सपने देखते थे हम सपनों में जीते थे
कभी रोते कभी हँसते कभी गुमसुम उदास
सपनों की दुनिया से बाहर निकलते काँपते थे प्राण
दिल में धचका सा बैठ जाता
कि यह कौन-सी दुनिया है और क्यों है
जो कतई मंजूर नहीं हमें

फिर धीरे-धीरे हम बड़े हुए—उतने नहीं थोड़े
मगर थोड़े में ही हमारे चेहरे बदलने लगे
बदली दिशाएँ और नजरें और नजारे
आसपास जो कुछ भी था चमकता चमचमाता हुआ
हमें ललचाचा था
और हम उसे जेबों में भर लेना चाहते थे खूब जतन करके

कविता में अँटे न अँटे मगर दिल में अटक जाता
हर चमकीली चीज का लालच 
और बड़ी खटपट कराता था
कइयों ने तो फिट करवा लिए कुछ बिल्कुल अलग ही 
 नफीस थोबड़े
उठाए फिरते उन्हें अपने चौड़े महत्वाकांक्षी कंधों पर
गर्व और गुरूर से भरकर
खुशी से इतराते हुए

और अब जब आखिरी ढलान पर हैं हम
कोई नहीं जिसे कविता की जरूरत
कोई नहीं जिसका रह गया हो उस सुंदर पवित्र 
और मासूम सपने पर विश्वास
जिसे हर घड़ी आँखों की कोर में छिपाए रखते थे हम
और लिखते थे कविताएँ
और उस पवित्र सपने और अपने जले हुए वजूद को
एक साथ प्यार करते थे।

आज सभी के हाथों से फिसल गई कविताई
और संजीदगी से पुराने मित्रों और दोस्तों के साथ गाए गए
आवारा नग्मों की याद नहीं आती किसी को
याद नहीं आती सपनों में डूबी-डूबी सी शामों की बेसुध खुमारी
और जिंदगी के कुछ पुराने गुमनाम पन्नों की महक
कुछ आर्द्र सी
भीगी आँखों की कोरों में छिपी

दोस्तों अदीबों और किताबों के साथ बतकही से 
ज्यादा याद रहते हैं हमें
इनकम टैक्स के अफसर बिजली-पानी और हाउस टेक्स के बिलों 
की अदायगी की तारीखें और सरकारी बाबू
पुरानी नौकरी के दिनों के कुलीग नेता यूनियन के
और बाबा रामदेव के कपालभाती सरीखे व्यायाम और उनके फायदे

उम्मीद है, इनसे सेहत रहेगी ठीक दिल-दिमाग की
काम-काज होते रहेंगे अबाध बिना अड़चन के
और जिंदगी चलेगी अपनी रफ्तार में
जैसी कि चलनी ही चाहिए हर हाल में

अच्छा हुआ कि छूटी कविताई की दुनिया एक फिजूल सी 
उससे मिलता भी क्या है फूटी कौड़ी तक नहीं
न नाम न नामा न पहले की तरह गली-मोहल्ले या शहर में
कमजकम यह चर्चा ही कि फलाँ जी कवि हैं पता है तुम्हें

भाड़ में गए कवि जी भाड़ में कविताई
हम तो जी आदमी बड़े हैं वीआईपी किस्म के जो कि हैं तो हैं
नहीं किसी की कृपा से हम बने 
कि वह तो हमें होना ही था...
कहते हैं डनलप के गुदगुदे नफीस गद्दों पर बैठे दोस्त
और हँसते हैं चाय की प्यालियों की खनन-खन के साथ
सुड़कते हुए फिल्मी गाने दोगाने

और जिंदगी चल रही है...
यों ही चलती रहेगी जब तलक जिंदा हैं।
*

(4) आज पहली बार
.......................

आज सुबह उठकर मैंने 
देर तक देखा आसमान को 
और देखे उगते सूरज के सुनहले रथचक्रों 
के निशान 
दूर-दूर तक धूल भरी पगडंडियों
फूलों दरख्तों तालाब और खिलखिलाते टीलों पर। 

देखा सुबह-सुबह बगीचे में
फूलों के हाथों में सजे अनगिनत
कुसुंभी तीर-कमान,
नर्म खरगोश जैसी हलकी गुनगुनी धूप में
हँस रहे थे गुलाब
और ओस में नहाया पूरा बगीचा महमहा रहा था

धूसर पगडंडियों पर 
चलते-चलते अचानक मैंने महसूस किया
कि साथ मेरे रास्ते नई उमंगों से गमक रहे हैं 
फूलों पर ओसकण प्यार के छलछला रहे हैं
और सुनहली हैं दिशाएँ

धूप में चिड़िया 
को घास की नन्ही फुनगी पर फुदकते 
और अलमस्त उड़ानें भरते 
मैंने देर तक देखा और कहा
नमस्ते ओ प्यारी चिड़िया,
नन्ही दूत सुबह की,
तुम ऐसे ही खुश रहना दिन भर 

कुछ आगे चला तो नदी के चंचल पानियों
को दी मैंने
एक अच्छी खुशनुमा भोर की नमस्ते
किनारे के लाल-पीले वनफूलों को हौले से सहलाया
और देर तक बेखुदी में नहाया मन
बचपन की भूली-बिसरी मासूम यादों में 

मैंने देर तक याद किया सुख-दुख के सहयात्री 
मित्रों को, 
और पुरानी यादों की कूँची को 
दिल के रंगों में डुबो-डुबो 
आँकता रहा अतीत के चित्रों को।

आज फिर मैंने एक नन्हे नटखट बच्चे को 
गोदी में ले
जी भरकर प्यार किया,
जो भी राह में मिला
सीधे-सादे मन से 
गले लगाकर सत्कार किया।
 
आज बहुत दिनों बाद 
अपने सँवलाए एकांत से बाहर आकर
मैंने खुली हवा में साँस ली 
किसी फूल की टहनी की तरह छू-छूकर करीब से 
हवा के जिद्दी झोंकों का आनंद लिया। 

आज मैंने पहली बार 
एक खुले और निरभिमानी आसमान के नीचे 
प्रसन्न मन से 
जीने की संभावना पर गौर किया।
*

(5) सपने में नाटक
...............................

पूरी रात चलता रहा सपना सपने में नाटक
आज भी याद है ठीक-ठीक कि भारत उसका नाम था
लिखा जिसे रामदरश जी ने एक बड़े फलक पर
भारत में भारत था, इस महादेश की स्वाधीनता का समर 
त्याग वीरता और अनंत बलिदानों का सिलसिला
भारी बेड़ियाँ कराहें नारे गगनभेदी लाठी गोलियाँ और समाधिस्थल 

नाटक और भी थे और होंगे वे भी अच्छे ही, लिखा जिन्हें हिंदी के
नामचीन लेखकों ने बड़े जतन और उत्साह से
उनमें से कोई एक ही होना था मंचित बहुत बड़े राष्ट्रीय फलक पर
जिसके लिए आयोजित किया गया था सम्मेलन नए-पुराने लेखकों 
रंगकर्मियों का 
आए भी सभी और बैठे थे बड़ी धज से सभाकक्ष में 
गंभीरता से हिलाते सिर
कुछ तो पान की गिलौरियाँ चबाते हुए विचारमग्न उस महा सम्मेलन में
जहाँ चुनाव होना था कि भला कौन सा नाटक मंचित किया जाए 
दिल्ली के उस प्रतिष्ठित रंगमंच पर जिसे देखेगा पूरा भारत

एक बड़े से केंद्रीय कक्ष में जमावड़ा था यह साहित्यिकों का
जिसमें शामिल थे अपने समय के सारे जाने-माने लेखक कुछ नए 
और उदीयमान भी...
दबाकर मशीन पर बटन सबको देनी थी अपनी राय
पर पहले हर नाटक पर विद्वानों नाट्य समीक्षकों और रंगकर्मियों की 
चर्चा का दौर चला लंबा
एक-एक नाटक की खूबियों और खामियों पर जमकर हुई बात
और अब वोटिंग की तैयारी थी बड़े स्तर पर
जिसके लिए हुआ वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल जैसे होता है
आम तौर से चुनावी मतदानों में

वे मशीनें अब घुमाई जा रही हैं एक-एक कर हर साहित्यिक के पास
ताकि हर कोई सुविधा से दबा सके बटन
पास मेरे बैठे थे नामवर जी मुँह में पान की गिलौरी दाबे
मुसकराते मंद-मंद कुछ सोचते से
आई बारी तो दबाया बटन उन्होंने भी बड़े उत्साह से
मैंने देखा चोर निगाहों से रामदरश जी के भारत पर ही 
रखी थी उनकी उँगली

अरे, वोट दिया उन्होंने रामदरश जी के भारत को ही
मैं विस्मित कुछ खुश भी
कि तब तक नामवर जी की निगाहों ने भी पकड़ लिया था
मेरी चोर निगाहों को
वे मुसकराए बड़े अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराया मैं भी 
धीरे से हिलाते हुए सिर जिसमें कुछ कहा कुछ अनकहा
ही रहा शायद

देर तक चलता रहा यही दौर उत्सुकता उत्साह और उत्तेजना का
और फिर होनी ही थी मतगणना भी
हुई ठीक वैसे ही जैसे होती है ज्यादातर आम चुनावों में
आखिर चुना गया रामदरश जी के भारत को ही
जिसके लिए सभी ने दबाई उँगली विपक्ष में कोई वोट ही नहीं.

अब सब उठ खड़े हुए हैं बधाई देते रामदरश जी को
रामदरश जी मुसकराते मंद-मंद एक शालीन प्रसन्नता से खिला चेहरा
जैसे कि वे हमेशा ही नजर आते हैं

(दो)

कट...यहीं कट और फिर हुआ दृश्यांतर
सामने अब एक बहुत बड़ा मैदान है खुला प्रेक्षागार
एक तरफ एक बड़ा सा भव्य मंच खूब ऊँचा लंबा-चौड़ा भी
तीन ओर सीढ़ियाँ बिछाया जा रहा जिन पर कार्पेट
सब कुछ भव्य और आलीशान

सामने ही घर था रमजानी मियाँ का लंबी सफेद दाढ़ी वाले रमजानी
जिनके दिल में विराजता है नाटक
जिंदगी भर नाटक किए हैं उन्होंने जिए भी मन से
कि कोई नाटक कामयाब होता नहीं रमजानी मियाँ के बगैर
साहब, वे तो मूर्तिमान नाटक हैं—
कहा करते हैं मेरे दोस्त रंगकर्मी अकसर बात-बात में

एक-एक को बुलाकर पास अब रमजानी मियाँ 
दे रहे हैं वे उसके रोल के मुताबिक परिधान कई रंगों डिजाइनों के 
चित्र-विचित्र
मंचसज्जा, मेकअप वगैरह-वगैरह की भी पूरी जिम्मेदारी उनकी
कर रहे थे यही सब तो वे बरसोंबरस से
कि करते-करते हो गए अब तो पिचासी पार
बाल दाढ़ी के सारे सफेद हुए गंगा की लहरों से उजले और बेदाग
कि उनमें बहती थीं सदियाँ हरहराती युग नए-पुराने कितने ही
कल्प और कल्पांतर
और किसी अबूझ कालपुरुष से कम न थे वे
इतिहास मियाँ कहते उन्हें सत्यार्थी जी पहली नजर में ही
अगर वे देखते उन्हें यहाँ इस मैदान में

सबकी निगाहें दौड़ती हैं अब बार-बार मंच की ओर 
जहाँ चल रही थीं नाटक की जबरदस्त तैयारियाँ
कब कहाँ क्या हो, वहीं खड़े-खड़े दे रहे थे रमजानी मियाँ निर्देश
सुनता सबके साथ मैं भी चकित विस्मित सा
बार-बार देखता कभी मंच कभी पात्रों के मेकअप संवाद अदायगी 
के अभ्यास और रिहर्सल को, जो चल रही थी जोरों से... 

(तीन)

बहुत कुछ था जो अभी आना था नजरों के सामने
कि अचानक फिर से कट, और दृश्यांतर एक नया...

अब मैं खड़ा हूँ अकेला उस विशाल मैदान में सुनता हुआ
अपने भीतर सर्जना की विकल आँधियों की पदचाप
क्या तुम्हें भी एक बड़े फलक पर कुछ लिखना नहीं चाहिए प्रकाश मनु
जिसमें हो आजादी की लड़ाई का पूरा जोशोजुनून
देश की आत्मा की आवाज पुकारती सी चतुर्दिक

पूछती है पेड़ पर चहचहाती एक नन्ही सी पीली चिड़िया मुझसे
और मैं अंदर से जागता हूँ कुछ निश्चय सा करता हुआ
कि हाँ-हाँ, मैं लिखूँगा उँगलियाँ फड़कती हैं मेरी
पर लिखना चाहूँगा मैं भारत छोडो आंदोलन पर ही कुछ
जिसकी एक जलती हुई लकीर खिंची है दिल में
पूरे देश में फैली थी आजादी की जो लहर उस वक्त
उससे कुछ-कुछ सहम गए थे अंग्रेज भी
कैसा दौर था वह, कैसी आँधियों की तड़प...!

ठीक है तो लिखो न, उसी पर लिखो कोई नाटक प्रकाश मनु
पर लिखो कुछ ऐसा कि जो यादगार हो, याद करें लोग
जिसे सदियों तक
कहा उस नन्ही सी पीली चिड़िया ने धीरे से कुछ गुनसुन करते

हाँ-हाँ, लिखूँगा वह नाटक मैं लिखूँगा जरूर
और अगर वह लिखा गया तो गाँधी जी होंगे उसके केंद्र में 
अपनी भास्वर विराट शख्सियत में
आजादी की एक अकेली आवाज जो गूँजती थी 
देश के एक छोर से दूसरे तक
तो धरती और आसमान काँपते थे 

यों अकेला होकर भी अकेला कहाँ था गाँधी
कि उसके हजारों-हजार अक्स फैले पूरे देश में
जगाते थे कुचली हुई इनसानियत की आवाज
घूमते गाँव-गाँव बस्ती और टोलों में
जैसे कि हरि भाई शिष्य उनके सादा से जो छोड़कर सर्वस्व
 बन गए आजादी के सिपाही
घूमते-घूमते पहुँचे वे हिरनापुर तो मिला यहीं मोहना 
एक बनजारा बाँसुरी वाला वो
जिसके सुरों में थी मर्मपुकार व्यापती पेड़ पौधों पगडंडियों में भी
सुनने दौड़ पड़ते लोग आसपास के
 
फिर यही मोहना बना आजादी का सिपाही
हरि भाई की संगत में
बजा दी रणभेरी जिसने गाँव-गाँव, बस्ती और टोलों में
जगह-जगह जनता को जगाने की मुहिम...
और फिर आंदोलन एक भारी आजादी के परवानों का
जिसमें मारा गया मोहना खाकर लाठियाँ पुलिस की...

और अब उसकी समाधि है आजादी का पावन तीर्थ एक
जिस पर जमा हैं लोग हजारोंहजार
खाते आजादी की कसम
और एक करुण संगीत बेधता हुआ दिलों को
गूँजता धरती आसमान में

ओह, कहाँ से शुरू हुआ नाटक, कहाँ से कहाँ आ पहुँचा वह
मैं हैरान कुछ भौचक्का सा 
कि देखूँ, किन रास्तों पर आगे बढ़ता है अब नाटक
कि तभी अचानक खुली नींद 
परदा गिरता है...

तब से बहुत तरह से की नाटक को पूरा करने की कोशिश
पर नाटक अधूरा ही है रहेगा शायद हमेशा ही
या शायद सपने में जो छूट गया अधूरा वह कभी पूरा हो 
सपने में ही
यह उम्मीद तो अभी खत्म नहीं हुई 

पर वह पूरी होगी क्या कभी
आएगा रंगमंच पर कभी बाँसुरी बजाता मोहना भी
रामदरश जी के भारत की ही तरह 
आपकी तरह मुझे भी है इंतजार
और वह खत्म नहीं हुआ फिलवक्त।
*

4 comments :

  1. बहुत सुन्दर कविताएँ । अपने साथ के और उनसे पहले के कवियों-कलाकारों के लिए भीतर बैठा सम्मान और प्यार किसी किशोर के प्रेम की तरह दर्ज हुआ है। कविता से कौड़ी मिले न मिले दुनिया को देखने और प्यार करने की नजर जरूर मिलती है। प्रकाश मनु जी को बहुत सारी बधाई और शिभकामनायें।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर कविताएँ हैं। अपने प्रिय कवि आ कलाकारों के प्रति सम्मान और प्रेम एक किशोर के सहज प्रेम सा छलका है। कविताएँ कौड़ी दें न दें लेकिन दुनिया को प्रेम करने की नजर जरूर देती हैं। प्रकाश मनु जी को हार्दिक शुभकामनायें।
    सविता

    ReplyDelete
  3. छुन्नू महाराज के लिए एक कविता और हम जो एक साथ चले थे कविताएं अलग ढब की हैं। सेंस ऑफ इन्वॉल्वमेंट का आनंद देने वाली।

    ReplyDelete
  4. अद्भुत कविताएं। एक से बढ़कर एक!

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।