सेतु साहित्य सम्मान की हार्दिक बधाइयाँ!

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:
(2.35 - साधन पाद 2.35 - पातञ्जल योगसूत्र)

उत्तराखण्ड के निर्माणाधीन राजमार्ग की सुरंग में 17 दिन से  फँसे 41 कर्मियों को स्वस्थ और सुरक्षित निकाला जाना निःसंदेह इस मास की एक बड़ी, स्फूर्तिदायक खबर है। जिस किसी को इस घटना की जानकारी थी, वही उनकी सकुशल निकासी की प्रार्थना करता दिखा। और जो लोग उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में सहायक बने, उन नायकों का तो कहना ही क्या। जिस काम में विशालकाय विदेशी मशीनें असफल रहीं उसे 12 सदस्यों के मूषक-खुदाई दल ने 24 घंटों में कर दिखाया।

भारतीय सेना के बारे में इंटरनैट पर एक नयी फैलती अफ़वाह देखी तो याद आया कि अफ़वाहों के विश्व-व्यापी प्रवाह के बारे में पहले भी हमारी  बात हुई है। इस नयी अफ़वाह का स्वरूप कुछ ऐसा है - किसी आरटीआई द्वारा यह पता चला है कि भारतीय सेना की सेवा में प्रयुक्त कुत्तों को सेवानिवृत्ति होने पर इसलिये गोली मार दी जाती है ताकि कोई बाहरी इंसान उनके सहारे सेना के गुप्त अड्डों तक न पहुँच जाये।

भारत में कुछ नगरपालिकाओं द्वारा आवारा कुत्तों के साथ किये गये दुर्व्यवहार और उनकी हत्या तक के छिटपुट समाचार मेरी नज़रों से गुज़रे हैं। इसके अलावा, किसी असाध्य रोग के कारण भयंकर रूप से पीड़ित पशुओं को यूथेनाइज़ करना भी पश्चिमी जगत में असामान्य नहीं है। लेकिन भारतीय सेना के बारे में इस प्रकार का आधारहीन जनरल स्टेटमेंट देना एक ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकत है। सच यह है कि भारतीय सेना में कुत्तों का जनन, पालन-पोषण, प्रशिक्षण आदि मेरठ स्थित आरवीसी (Remount Veterinary Corps) केंद्र में होते हैं। इसी केंद्र में सेवानिवृत्त कुत्ते भी रखे जाते हैं। वृद्ध और अशक्त कुत्तों तक को मारा नहीं जाता है, हर सेवानिवृत्त कुत्ते को मारने की बात तो असम्भव है। जब भी मैं पढ़े-लिखे, अच्छे-खासे व्यवसाय में रत लोगों को इस प्रकार की अफ़वाहों को फैलाते, या उनपर सहमति जताते देखता हूँ तो मुझे वास्तव में इस बात पर बहुत दुःख होता है कि हमारे समाज को हाँकना-ठेलना कितना सरल होता जा रहा है। अफ़वाहों का मनोविज्ञान एक बात है, लेकिन दूसरी महत्त्वपूर्ण बात अफ़वाह बनाने वालों की बदनीयती की है। ज़्यादातर लुभावनी अफ़वाहें कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में या तो देश के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ती दिखती हैं, या फिर किसी राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था, या किसी राष्ट्रनायक का अपमान करती हुई नज़र आती हैं। इस विषय में सचेत रहने की आवश्यकता है।

समय के साथ सेतु की पहुँच बढ़ी है। स्थापित लेखक तो सेतु से जुड़े ही हैं, अनेक नये लेखकों को भी यहाँ अवसर मिलता रहा है। फिर भी कई लेखकों में "लेखकों से अनुरोध" (submission guidelines) पढ़ने का धैर्य नहीं है। प्रकाशन के उद्देश्य से "अप्रकाशित" बताकर भेजी गयी अनेक रचनाएँ पहले से अन्यत्र प्रकाशित होती हैं। कुछ लेखक तो आदतन अपनी हर रचना हर सप्ताह हर उस पत्रिका को भेज देते हैं जिसका ईमेल-पता उन्हें मालूम है। यह प्रवृत्ति न केवल हमारा काम बढ़ाती है, यह पठन-पाठन और पाठकों के प्रति अनादर भी दर्शाती है।

दिसम्बर दस्तक दे रहा है। इस वर्ष के सेतु सम्मान की घोषणा का अवसर है। इस बार के सम्माननीय साहित्यकारों के नाम ये हैं:
  • संतोष श्रीवास्तव (भारत)
  • सुकृता पॉल कुमार (भारत)
  • संजीव सेठी (भारत)
  • प्रीत नम्बियार (भारत)
  • कन्हैया त्रिपाठी (भारत)
  • धर्मपाल महेंद्र जैन (कैनेडा)
  • जैक कैरअडग (संयुक्त साम्राज्य)

 यह अंक बड़ा और वैविध्यपूर्ण है, आशा है आपको पसंद आयेगा। अपनी राय से अवगत कराइये, संवादरत रहिये।

आपका शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 नवम्बर 2023 ✍️

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