व्यंग्य: बर्फ में गिरना भी भला कोई गिरना है!

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


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बाहर बर्फ गिर रही है और मैं घर में दुबक कर बैठा हूँ। अलाव की जगह फायरप्लेस कमरे को गर्म कर रही है और टीवी दिमाग को। ऐसा नहीं होता कि शरीर गर्म हो जाए पर दिमाग ठंडा रहे। अक्सर होता यही है कि दिमाग कुलबुलाने लगता है और शरीर ठंडा पड़ने लगता है, अभी भी यही हो रहा है। मौसम की पहली बर्फबारी का आनंद ऐसा है जैसे घर में नई बहू के आने पर होता है। असली रंग बाद में दिखते हैं, तौबा! जो हिमकण दो-चार कैरेट के हीरे जैसे चमकते थे, जो हिमकण जीभ पर बैठते ही शीतल मिठास का आभास देते थे, जो हिमकण हथेलियों में आकर ही पिघल जाते थे, दिसंबर-जनवरी के महीनों में आँखों में चुभने लगते हैं! यह समय सर्दियों का यौवन काल होता है। इन दिनों हिम पुरवा हवा के साथ आती है तो लगता है थपेड़े मार रही हो और पछुआ के साथ आती है तो लगता है आगे धकिया रही हो। कटीली हवा नासिका के अग्र भाग को गुलाबी रंग रही हो और नाक से प्रोटीन बह रहा हो। इतनी शरारतों पर ही बर्फीला मौसम मान जाता तो मैं आपसे शिकायत थोड़े ही करता। यहाँ पाँव बर्फ में छह-आठ इंच धँसे हैं और कुछ आगे की बर्फ सिल्ली जैसी कठोर लगती है। उस पर गलती से पाँव रख दिया तो फिसलकर चारों खाने चित्त गिरना तय है। इसलिए बर्फ में चलने के पहले मैं खुद को कई बार समझाता हूँ, ऐ बाहुबली, यह चिकनी बर्फ है, किसी की सगी नहीं है। पतली-सी सतह है तो क्या! इसका दाँव लग जाए तो ऐसे फिसलवाती है कि नाजुक हड्डियाँ चटख जाएँ। कहीं 'हेयर लाइन' फ्रेक्चर हो तो कहीं हड्डी क्रेक हो जाए। बस इसी डर से घर में दुबक कर बैठा हूँ।

वैसे तो बर्फ पर चलने का तीस साल से ज्यादा का अनुभव हो गया है, पर ऐसी डींग मारने का कोई मतलब नहीं है। सही कहूँ तो मुझे बर्फ में गिरने और गिर कर बिना शर्माये उठने का तीस साल का अनुभव है। राणा सांगा की तरह मैंने भी एक ही ड्रेस पहनी होती तो उसमें अस्सी से ज्यादा छेद होते। इस सदी में छेद वाले जींस के कपड़े “रिप्ड” कहे जाते हैं और वह युवा लोगों का पहनावा है, इसलिए मैं ठेठबुजुर्ग ऐसे कपड़े नहीं पहनता। जानबुझकर युवा दिखने की नौटंकी करो और कभी बर्फ में फिसल कर गिर पड़ो तो कोई उठाने वाला या उठाने वाली नहीं मिलती। आप बर्फ से भरे मैदान में घायल पड़े हो और कोई सहानुभूति नहीं मिले तो गिरने का दर्द दोगुना हो जाता है। गिरकर उठने के बाद टेढ़े-मेढ़े चलते हुए जब घर लौटता हूँ तो पत्नी और बच्चे समझ जाते है कि मैं गिरा हुआ हूँ, या तो मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं है या मैं “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना” की तर्ज पर बर्फ में चल रहा था। यह बड़ी विकट स्थिति होती है। बर्फ पर गिरने का दर्द उतना नहीं सालता जितना परिवारजनों के उपालंभ टीस देते हैं।

यूँ तो मैं स्कीईंग सीखते-सीखते गुलमर्ग की बर्फ में कई बार गिरा था, पर वहाँ बर्फ नर्म होती थी। वहाँ प्रकृति की गोद में शहीद होने की नौबत नहीं आई और न ही बर्फ में गिरने पर दर्द महसूस हुआ। इसलिए मैं यही मानूँगा कि पहली बार मैं न्यूयॉर्क के उपनगर फ्लशिंग में बर्फ में गिरा, गिरा क्या ढेर हो गया। उस दिन बहुत बर्फबारी हुई थी। सेल्सियस में बताऊँ तो तापमान शून्य से नीचे था। दोपहर हल्की-सी धूप में ऊपरी सतह पिघली होगी और शाम ढलते-ढलते पानी से बर्फ की चादर बन गई होगी।  घर लौटने की जल्दी में अनायास उस पर मेरा पाँव पड़ गया। चलते की गति सामान्य थी, पर वहाँ फिसलने की गति चार-छः गुना हो गई। पीठ के बल गिरा। भारी-भरकम जूतों में एड़ियाँ सुरक्षित रहीं, पर मुड़ गईं। कूल्हे जमीन पर ऐसे गिरे जैसे हवाई जहाज लैंड कर रहा हो। मैं कुछ समझ पाता, उसके पहले कोहनियाँ कठोर बर्फ से टकरा गई थीं। शरीर एक-आध फीट घिसट गया था। सिर और कंधे समतल हो गए थे। सिर वाकई चकरा गया था। इतना सब होने में दो-तीन सैकंड लगे होंगे। पीछे चलते राहगीरों ने सहारा देकर उठाया। मैं सम्हलते-सम्हलते खड़ा हुआ जैसे पहली बार खड़ा हो रहा होऊँ। जब कदम उठाने की बारी आई तो आत्मविश्वास डगमगा गया। वह कदम इस तरह से उठा जैसे नील आर्मस्ट्रांग चांद की अनजानी धरती पर पहला कदम रख रहा हो।

पहली बार का गिरना भी क्या गिरना था, खुद पर शर्म आती रही और झेंपता रहा। दूसरे दिन तक दिमाग पर यह 'गिरना' छाया रहा। सहकर्मियों को 'गॉसिप’ के लिए शानदार विषय मिल गया था, और मेरे अधीनस्थों की खुशी की कोई सीमा नहीं रही। वे जैसे ही मुझसे मिल कर मुँह फेरते, उनके आनंद में उनकी तल्ख हँसी की भंगिमाएँ मुझे दिखने लगतीं। फिर मैं कई बार बर्फ में गिरा। हर बार नए कोण और नई शैली में गिरा, पर बाद के गिरने में कोई किस्सागोई नहीं बनी। बर्फ में गिरना भी भला कोई गिरना है! गुरुत्वाकर्षण के चक्कर में भारी चीजें तेजी से और हल्की चीजें धीमे-धीमे गिरती हैं, पर आदमी के गिरने का कोई नियम नहीं है, वह जहाँ फायदा देखे वहीं गिर जाता है। जब सरकारें गिर जाती हैं, डॉलर और रुपया गिर जाते हैं, पुल गिर जाते हैं तो जीवन-मूल्यों के गिरने पर चिंता क्यों! राजनेता गिरता है तो मंत्री बन जाता है, मीडिया गिरता है तो उसका बैंक बैलेंस बढ़ जाता है। आज के जमाने में जो जितना गिरता है उतना महान बनता है। पर मैं महान बनने के चक्कर में नहीं हूँ। मैं बर्फ में गिरूँ तो कोई बात नहीं, नज़रों से नहीं गिरूँ बस।


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