अहिंसक घोषणा पत्र है हमारा संविधान

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


डॉ. आंबेडकर ने नवंबर 1949 में अपने अभिभाषण में कहा था कि एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। यह संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष का महत्वपूर्ण सन्देश था। यह उन दिनों की बात है जब भारत अपने संविधान के लिए पूरी कसरत करके भारत कब, कैसे किस दिशा में किस माध्यम से आगे बढ़ेगा, इसके लिए रूपरेखा तय कर रहा था। आज पूरी दुनिया भारत के बारे में एक मत होकर कहती है कि भारत एक मजबूत व दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र को जीने वाला लोकतांत्रिक देश है। हम सब जानते हैं कि लोकतांत्रिक देश लोकतंत्र को जीने के लिए अपना एक सुव्यवस्थित संविधान बनाते हैं जिसके माध्यम से वे सबके हित, प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता, बंधुता और नियम-कानून को स्थापित करते हैं। भारत का संविधान भी उसी अनुरूप सृजित किया गया और अंगीकृत किया गया। सच्चे मायने में इसे हम एक अहिंसक घोषणा पत्र कह सकते हैं क्योंकि इसमें निष्ठा, विश्वास और जीवन जीने की प्रत्याशा है, सहयोग-सम्यक जीवन सूत्र और समन्वय है। इसमें जीवन-मूल्यों को बचाए रखने की क्षमता है। इसमें वह ताकत है जो आम नागरिक को भी अपने गरिमामय जीवन की गारंटी देता है।

वैसे भारत विविधता से भरा हुआ है और इसके बारे में पूरी पृथ्वी आज साक्षी है कि यह देश 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित राजों वाला एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य संघ है। यह देश के सर्वोच्च कानून, संविधान द्वारा शासित है। संविधान में संसदीय शासन प्रणाली की संकल्पना की गई है। संसद के दोनों सदनों से कार्यकारिणी के सदस्यों का चयन किया जाता है। वह जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होती हैं। सबसे अहम् बात यह है कि भारत के संविधान का स्वरूप संघीय है पर इसकी प्रकृति में एकात्मकता है।

इसके संविधान के बारे में यह कहा जाता है कि यह एकात्मक विशेषताओं वाला संघीय संविधान है। हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत राज्य के तीन महत्वपूर्ण अंग हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। संविधान उनकी शक्तियों को परिभाषित करता है, उनके कार्यक्षेत्रों का परिसीमन करता है। जवाबदेही सीमांकित करता है। संविधान में राज्य के तीनों अंगों के बीच शक्तियों के विभाजन की संकल्पना की है ये सभी अपनी सीमाओं के भीतर कार्य करते हैं। इनके बीच सौहार्दपूर्ण संबंध की संकल्पना की गई है। कार्यपालिका और विधायिका के बीच अत्यंत घनिष्ठ संबंध हैं जो सरकार के कामकाज में अभिन्न सहभागी के रूप में कार्य करती है। वहीं, न्यायपालिका स्वतंत्र प्राधिकरण है जिसे संविधान द्वारा कार्यपालिका के आदेशों तथा विधयिका द्वारा बनाए गए कानूनों की वैधता तथा संवैधनिकता पर विचार करने की शक्ति है। यह एक लचीला और अंशतः कठोर संविधान है। भारतीय संविधान के बारे में ही यह कहा जाता है कि इसके माध्यम से समतावादी समाज का निर्माण करते हुए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन भारत में हुए हैं। इसका सूत्रपात हुआ तो यह कहा गया कि अब ब्रिटेन की संसद द्वारा संविधान सभा पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न निकाय होगा और केन्द्रीय विधान सभा तथा काउंसिल ऑफ़ स्टेट्स का 14 अगस्त 1947 से अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। जब 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को आजादी मिली तो संविधान सभा को पूर्ण शक्ति मिल गई और इसने स्वतंत्र भारत की विधान सभा के रूप में कार्य करना शुरू किया। जी, उसी संविधान सभा के दो श्रेष्ठ कार्य जिसमें संविधान निर्माण तथा विधि निर्माण को स्पष्ट तौर पर एक-दूसरे से अलग किया गया। 17 नवम्बर 1947 से अपना आकार पायी यह घटना तो संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा प्रारूप समिति के सभापति के रूप में डॉ. बी. आर. आंबेडकर मिले। 2 वर्ष, 11 माह तथा 17 दिन तक चले 11 सत्रों में संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में गहन विचार-विमर्श हुए और उभरते भारत के लिए संविधान की एक उत्कृष्ट पांडुलिपि तैयार हुई। 26 नवम्बर 1949 को संविधान को अंगीकार किया गया तथा 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सदस्यों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किए। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए इस संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ शामिल किए गए और इसे विश्व का सबसे समृद्ध व वृहत् संविधान होने का गौरव प्राप्त हुआ।

हम सभी जानते हैं कि संविधान लागू होने के ठीक पहले संविधान सभा, भारत की अस्थायी संसद बन गई थी तथा इसी रूप में इसने वयस्क मताधिकार के आधार पर 1952 में हुए पहले आम चुनाव तक काम किया। उसके बाद से ही, संविधान में विहित-विनियमित उत्कृष्ट आदर्श राष्ट्र के लिए कार्य कर रहे हैं और आज भी उत्कृष्ट गणराज्यों के संविधानों में से एक भारतीय संविधान भारतीय नागरिकों, यहाँ की भौगोलिक व सांस्कृतिक धरोहरों व सामरिक महत्व की चीजों का संरक्षक बना हुआ है। हमारे संविधान की खूबसूरती है की वह न्याय, बंधुता और पंथनिरपेक्षता पर आधारित है, जो सभी नागरिकों के हितों व सम्मान के लिए है। डॉ. आंबेडकर ने 299 सदस्यों वाली संविधान सभा में 1946 से 1949 के बीच के उथल-पुथल व झंझावातों से भरे तीन सालों में काम किया था। सौतिक विश्वास की बीबीसी रिपोर्ट ‘आंबेडकर के बारे में वे बातें जो अनसुनी सी हैं’ पढ़ें तो पता चलता है कि जून, 1953 में डॉ. आंबेडकर ने बीबीसी को दिए एक बेहद विस्फोटक इंटरव्यू में ये बातें बड़ी साफ़गोई से कही थी- (सवाल था- भारत की चुनौती: क्या लोकतांत्रिक प्रयोग कामयाब रहेगा?) ‘यहां (भारत में) जनतंत्र कामयाब नहीं हो सकता क्योंकि यहां की सामाजिक व्यवस्था, संसदीय लोकतंत्र के प्रारूप से मेल नहीं खाती।’ हो सकता है यह बातें बहुत मामूली लगें लेकिन डॉ. आंबेडकर का भी कोई आंकलन होगा, यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी। उपनिवेश के बाद अब तक के भारतीय इतिहास का अवलोकन करें तो भारत के संविधान के 75 से अधिक वर्ष हो चुके हैं। भारत अमृतकाल से आगे बढ़ चुका है और संविधान में 100 से अधिक संशोधनों के साथ ही सही भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरे विश्व के लिए मिसाल बनी हुई है। इससे यह पता चलता है कि हमारे संविधान में वह ताकत तो है, जिसकी वजह से आज भारतीय लोकतंत्र की पूरे विश्व में प्रतिष्ठा है।

26 नवंबर, 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा था- 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपना अंतिम भाषण देते हुए डॉक्टर आंबेडकर ने कहा था कि संविधान की सफलता भारत की जनता और राजनीतिक दलों के आचरण पर निर्भर करेगी। भय, प्रलोभन, राग-द्वेष, पक्षपात और भेदभाव से मुक्त रहकर शुद्ध अन्तःकरण के साथ कार्य करने की भावना को हमारे महान संविधान निर्माताओं ने अपने जीवन में पूरी निष्ठा व ईमानदारी से अपनाया था। उनमें यह विश्वास जरूर रहा होगा कि उनकी भावी पीढ़ियां, अर्थात हम सभी देशवासी भी, उन्हीं की तरह, इन जीवन-मूल्यों को, उतनी ही सहजता और निष्ठा से अपनाएंगे। आज इस पर हम सबको मिलकर आत्म-चिंतन करने की जरूरत है। डॉ. आंबेडकर संविधान सभा में इसकी ताकत व्यष्टि में देखते थे जो आज भी देखा जाए तो संविधान की आत्मा को समझते हैं। उन्होंने कहा था- ग्राम समाजों ने अपने देश के इतिहास में यही भूमिका निभायी है। यह मानते हुए हम उन पर कितना गर्व महसूस कर सकते हैं? वे सब संकटों में भी बचे रहे, यह एक तथ्य है लेकिन जीवित रहना मात्र महत्वपूर्ण नहीं है। सवाल यह है कि किस जमीन पर वे जीवित रहे हैं। निश्चय ही, एक निचले और स्वार्थी स्तर पर। मैं यह मानता हूँ कि ये ग्राम गणराज्य भारत के अवशेष रहे हैं। इसलिए मुझे ताज्जुब है कि जो लोग प्रांतीयता और साम्प्रदायिकता की आलोचना करते हैं, वही गाँवों के कट्टर समर्थक बन रहे हैं। गांव क्या है? गाँव स्थानीयता की कोरी अज्ञानता, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता का बसेरा मात्र है। मुझे खुशी है, प्रारुप संविधान में गांव को नहीं अपनाया गया है तथा व्यष्टि को अपनी इकाई माना गया है।’ भारत के बौद्धिकों ने व्यष्टि को अपनी संवैधानिक अभीष्ट स्वीकार जिससे यह पता चलता है कि हमरी एकात्मकता में किस प्रकार रुचि है।

यह संकल्प भारत की समष्टिगत सोच का प्रतीक है। यह भारत के लोगों के उन्नयन व सबके जुड़ाव का प्रतीक है। यह उसी देश में प्रतीकात्मक और अनुप्रयोगात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है जो प्रेम, करुणा और मैत्री से जुड़ते होंगे। जो भारतीय अहिंसक वैचारिक दृष्टिकोण का प्रमाण है।

भारतीय सामाजिकी, सांस्कृतिक मूल्य, सामरिक विरासत और भविष्योन्मुखी समस्त आधार इसी संविधान के आलोक में संरक्षित होंगे और संवर्धित होंगे। इसमें मानव के समस्त अधिकारों को सक्षम तरीके से सुरक्षित करने की क्षमता है। हमारा संविधान न्याय की कुंजी है। इसके आलोक में कोई भी जीवन अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकता है। सबसे अहम् बात यह है कि इसके माध्यम से संचालित भारतीय व्यवस्था सनातन मूल्यों से सनी-गुथी है तो इसलिए भी यह संविधान एक लंबी विरासत को जीने वाले महान लोगों द्वारा विनिर्मित है जो यह आश्वासन देता है की उसके अतीत और भविष्य में तादात्म्य होगा। वर्तमान सहेजने की अनिवार्य शर्त भी है इस संविधान में इसलिए इसे एक अहिंसक घोषणा पत्र ही हम समझें क्योंकि अहिंसा की अनिवार्य शर्त सत्य और प्रेम पर आधारित है। यह सत्य और प्रेम की उपस्थिति समरस समाज का भीष्ट भी माना गया है इसलिए हमारे संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर यह कहते थे कि हम समरस समाज के हिमायती हैं।

यदि भारतीय सत्य और प्रेम के अनुष्ठान से अनुप्राणित हों तो यह संविधान एक अहिंसक समाज को निरंतर गतिशील रखने में सक्षम है। आज हमारे देश में यह समझने की आवश्यकता है कि हम अपने जीवन-मूल्यों में किस तरह से मूलभूत निरंतर सुधार करें जिससे हमसे किसी का अतिक्रमण हो ही नहीं। इस सुधार की आवश्यकता है कि हम लालच के वशीभूत न हों और दूसरों के हक को न छीनें। इस बात की आवश्यकता है कि हम संविधान की गरिमा कि समझें और संविधान की मूल आत्मा को अपने देश की आत्मा की आवाज़ बनाएँ।

आज संविधान पर सोचने और समझने के लिए बहुत कुछ है। बदलाव की आवश्यकता जहाँ है, वहां बदलाव होना ही चाहिए। भारत में डॉ. आंबेडकर ने अपनी आत्मा की सुनकर कुछ और भी संविधान में जोड़ना चाहते थे। उन्होंने अपने समय में ही जो परिवर्तन करने के लिए आवाज़ बुलंद की उसका अपना इतिहास है और इतिहास इस बात का गवाह है कि उन्होंने मंत्रीमंडल से क्यों त्याग-पत्र दिया। आज समय यदि इस बात की मांग कर रहा हो कि हमारे देश में संविधान के माध्यम से विकास व सौहार्द की क्रांति और शांति दोनों स्थापित हो सकती है तो उसे करना ठीक है। संविधान का एक बार पुनर्लेखन भी यदि आवश्यक लगे, उसे भी करना चाहिए। भारत में धारा 370 के लिए जितने भी विवाद हुए उनसे हमें सीखने की आवश्यकता है। यदि 370 से भारतीय अस्मिता चाहे वह भौगोलिक हो या सांस्कृतिक उसकी समृद्धि सुनिश्चित होती है, तो निःसंदेह उसे भारतीय रूप में लाना ही देश के नागरिकों का धर्म है। इसके लिए भारत सरकार के प्रधान मंत्री और गृह मंत्री द्वारा लिए जाने वाले निर्णय निःसंदेह स्वागत योग्य हैं।

आज परिस्थितियां जो भी देश में हैं उसमें हमें उन समस्याओं, जटिलताओं को समझने की आवश्यकता है कि वे क्या हैं और संविधान के माध्यम से उसके शमन के लिए क्या आवश्यक कदम हो सकते हैं। अंततः संविधान का उद्देश्य भारत की अस्मिता, उसका औद्दत्त स्वरूप और उसकी अपनी गरिमा में निहित है और यह गरिमा भारतीय नागरिकों की गरिमा से भिन्न नहीं है। भारत को यदि संविधान का अहिंसक स्वरूप सबके समक्ष प्रस्तुत करना है तो वे बदलाव होंगे जो आज अपेक्षित हैं तभी हमारा संविधान अहिंसक सभ्यता का मूल दस्तावेज़ बन सकेगा। हमारे भारत का अहिंसक घोषणा पत्र बन सकेगा। अब संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के बहुत से देश भारतीय संविधान की उस मूल अवधारणा पर भी चर्चा करने लगे हैं जिसमें प्रभु राम का चित्र संयोजित है। उस बात पर भी चर्चा करने लगे हैं कि भारतीय संविधान पकिस्तान बनने के साथ ही अस्तित्व में आया था और वहां कई बार मिलिट्री शासन से समाज और संस्कृति कुचले गए जबकि भारत स्वस्थ लोकतंत्र के रूप में कार्य कर रहा है और सभ्यता के इस पड़ाव पर एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठा पा रहा है। 26 नवंबर, 2019 को संविधान दिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण में कहा था-हम भारतवासियों में, सभी स्रोतों से मिलने वाले अच्छे विचारों का स्वागत करने के साथ-साथ अपनी भारतीयता को बनाए रखने की परंपरा रही है। हमारी यही सांस्कृतिक विशेषता, हमारे संविधान के निर्माण में भी झलकती है। हमने विश्व के कई संविधानों में उपलब्ध, उत्तम व्यवस्थाओं को अपनाया है। साथ ही, हजारों वर्षों से चले आ रहे हमारे जीवन मूल्यों और स्वतन्त्रता संग्राम के आदर्शों ने भी हमारे संविधान पर अपनी छाप छोड़ी है। हमारा संविधान, भारत के लोगों के लिए, भारत के लोगों द्वारा निर्मित भारत के लोगों का संविधान है। यह एक राष्ट्रीय दस्तावेज़ है जिसके विभिन्न सूत्र, भारत की प्राचीन सभाओं व समितियों, लिच्छवि तथा अन्य गणराज्यों और बौद्ध संघों की लोकतान्त्रिक प्रणालियों में भी पाए जाते हैं। संविधान द्वारा हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया गया सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य और आदर्श है- सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराना हमारे संविधान में समावेशी समाज के निर्माण का आदर्श भी है और इसके लिए समुचित प्रावधानों की व्यवस्था भी।

संविधान सभा का गठन 6 दिसंबर, 1946 को किया गया, 11 दिसंबर, 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्‍यक्ष नियुक्त किया गया, 13 दिसंबर, 1946 को 'उद्देश्य प्रस्‍ताव' को प्रस्तुत और अनुमोदित किया गया। इस क्रम में राष्ट्रीय ध्वज अपनाया गया 22 जुलाई, 1947 को, स्वतंत्र भारत की पहली सुबह 15 अगस्त, 1947 बनी। मसौदा समिति 29 अगस्त, 1947 को बनी, भारत का संविधान पारित किया गया और अपनाया गया 26 नवंबर, 1949 को, 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई और 26 जनवरी, 1950 को जब संविधान लागू हुआ तो देश में अपने देश के संविधान में प्रावधान किए गए कानून से देश आगे बढ़ा। इसके बाद पहला आम चुनाव, भारत में आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 21 फरवरी 1952 तक के बीच हुए। यह मताधिकार का पहला प्रयोग था जिस पर हर भारतीय के भीतर गर्व की अनुभूतियाँ थीं। ये अगस्त 1947 में देश की आजादी के बाद लोकसभा के पहले चुनाव थे जिसमें भारतीयजन हिस्सा ले रहे थे और भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत कराए गए थे जिसे 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया था। इस क्रोनोलॉजी के साथ इसे भी समझने की आवश्यकता है कि यह तिथियाँ जितना महत्वपूर्ण रही हैं, उससे कहीं ज्यादा देश के लोगों का बलिदान और इस संविधान निर्माण में लगे श्रम भी महत्वपूर्ण रहे हैं। हमारे देश में यह एक ऐतिहासिक घटना नहीं है बल्कि भारत के लोग जिस विश्वास के साथ जीवन जीते हैं उस भावनाओं की यह अद्भुत गाथा है।

निःसंदेह भारतीयजन अपने संविधान पर गर्व कर सकते हैं लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि हम अपने भविष्य के साथ इस संविधान के सौंदर्य को कैसे कायम रखें और कैसे हमारा आने वाला कल सबकी गरिमा का रक्षक बने।

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