घर जलाकर (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: उर्दू
लेखक: इब्ने कँवल
अनुवाद: देवी नागरानी

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


इब्ने कँवल
(15 अक्टूबर 1957 - 11 फ़रवरी 2023)
बस्ती में हाहाकार मचा हुआ था। आग फैलती चली जा रही थी, आसमान धुएँ से भर गया था। आग पर काबू पाने की कोशिश के बावजूद आग काबू से बाहर थी। औरतें सर पीट-पीटकर चीख रहीं थीं। बच्चे खौफ से चिल्ला रहे थे और मर्द आग बुझाने की कोशिश में लगे हुए थे। पास और दूर, ऊँचे ऊँचे पक्के मकानों के आवासी तमाशाई बने धुएँ और तपिश से बचने के लिए अपने घरों की खिड़कियाँ दरवाजे बंद कर रहे थे। शहर के बीच में रामलीला ग्राउंड के नज़दीक करीब 500 झुग्गियों की यह बस्ती न जाने कब से आबाद थी और किस तरह आबाद हो गई थी, किसी को याद नहीं था, लेकिन अक्सर लोग उसे शहर की खूबसूरती पर बदनुमा दाग़ कहा करते थे, जबकि झुग्गियों में रहने वाले उन्हीं हाथों से शहर की गंदगी साफ़ करते थे। उन्हीं के दम से आलीशान घरों में चमक दमक कायम थी। यहाँ के रहने वालों का गंदापन गायब हो गया था।

शायद सबसे पहले यहाँ एक छोटी सी झोंपड़ी थी। फिर एक और... एक और…फिर एक सम्पूर्ण बस्ती। छोटी सी इस बस्ती में सब कुछ था, बिजली हर जगह मौजूद थी। छोटे बड़े ब्लैक एंड वाइट टीवी भी इन झुग्गियों में हर वक़्त चलती रहती थी। गंदे-गंदे बच्चे, नालियों में गंदा और सड़ा हुआ पानी, कूड़े के ढेर, मक्खी, मच्छर, कुत्ते सब कुछ था। वे सब उसके आदी थे। यहाँ मज़हब का बँटवारा न था। हर सम्प्रदाय के लोग मानवता के रिश्ते में बंधे हुए थे। दुख-सुख में एक-दूसरे के साथी, मौत पर सब एक साथ शोक मनाते और खुशी में सब एक साथ मस्त व ख़ुशी से झूमते गाते। शहर के विस्तार में उनकी उपस्थिति को राजनैतिक प्रश्रय भी मिला हुआ था। हर नेता उन्हें वोट बैंक समझता था, राजनैतिक जलसों में भीड़ बढ़ाने और नारे लगाने के लिए उन्हें लोगों की जरूरत पड़ती थी। कई बार उस बस्ती को हटाने की कोशिश की गई लेकिन हर बार कोई न कोई उनकी मदद के लिए आ जाता।

लेकिन अचानक आग लगने से सारा दृश्य बदल गया। आग एक झुग्गी से शुरु हुई थी और देखते-देखते गर्मी और हवा के कारण पूरी बस्ती उसकी लपेट में आ गई। उसकी वजह यह भी थी कि झुग्गियों में जलने का सामान मौजूद था- फूस, सूखी लकड़ियाँ, प्लास्टिक, टायर और केरोसिन। आग जहन्नुम का दृश्य दर्शा रही थी। फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ आते-आते सब कुछ खत्म हो गया। अजीब भागादौड़ी का आलम था। जलते हुए शोलों से लोग कभी खुद को निकालते, कभी सामान निकालने की कोशिश करते, कोई अपने बच्चों को झुग्गी से बाहर धकेल रहा था, तो कोई बूढ़े माँ-बाप को उठाकर आग के शोलों से दूर ले जा रहा था। चारों ओर एक कोहराम मचा हुआ था।

तमाशाइयों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। अखबारों की रिपोर्टर और टीवी के कैमरे से वह भयानक दृश्य दिखाया जा रहा था। लगातार कई घंटों के संघर्ष के बाद जब आग पर काबू पाया गया तो लोग अपनी जली हुई झुग्गियों की सुलगती हुई राख से अपने खोए हुए संबधियों और सामान को ढूंढने के लिए पहुँचे। लेकिन वहाँ कुछ नहीं था, सिवा जले हुए सामान और लाशों के कुछ नहीं मिला। किशोर की बूढी माँ जो कमजोरी की वजह से भाग नहीं पाई, जल गई थी। रामू काका का छोटा बेटा जल गया। वह अपनी बीवी के साथ अपनी बड़ी बेटी के दहेज को बचाने में लगा रहा। लगभग दस लोगों की मौत आग में जलने से हो गई। बहुत से लोग झुलसकर अस्पतालों में पहुँचाए गए। शोले दब गए थे लेकिन राख से धुआँ उठ रहा था। तमाशाइयों की एक अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग मदद भी कर रहे थे और बातें भी हो रहीं थीं। समाज के ठेकेदारों और राजनेताओं का आना जाना शुरू हो गया था।

सरकार ने मरनेवालों को एक लाख रुपये और घायलों को ₹50,000 देने का ऐलान किया। आग लगने के कारण की जाँच के लिए कमीशन बिठाया गया। जबकि सब जानते थे कि आग सबसे पहले बरपा की झुग्गी में स्टोव फटने से लगी थी, लेकिन सब अपनी-अपनी राय दे रहे थे- 
“ये सब ज़मीन खाली करने का चक्कर है, यह ज़मीन सेठ दौलतराम की है। सुना है उसने इसे जसल बिल्डर के हाथ बेच दिया है।”
“मैंने तो सुना है कि इसमें कोई राजनैतिक चाल है, चुनाव होने वाला है।”
 “आग लगाकर मदद करके हर पार्टी हमदर्दी और वोट हासिल करने की कोशिश करेगी।”
“कारण कुछ भी हो लेकिन मरने वाले अपने खानदान को लखपति बना गए।”
“हाँ भाई किशोर की माँ तो मरे बराबर ही थी, चल फिर भी नहीं सकती थी और दीनू का बाप भी अपाहिज था।”
“अरे मियाँ एक लाख रुपया कभी देखा भी नहीं होगा। यह तो मरा हाथी सवा लाख वाली बात हो गई”
बहुतों को इस बात का अफसोस था कि उनके घर का कोई सदस्य जल क्यों नहीं गया। दामाद अपनी सासों के न जलने, और बेटे अपने बूढ़े माँ-बाप के बचने पर अफ़सोस कर रहे थे।
“बुढ़िया मर जाती तो घर में खुशहाली आ जाती।”
“ऐ यार, मेरा बुड्ढा आग देखकर लौंडो की तरह झुग्गी से बाहर भागा, वैसे उठकर पानी भी नहीं पीता था।”

इस दुर्घटना पर कई दिन तक मेला सा लगा रहा। दूर-दूर से तमाशाई जली हुई बस्ती को देखने आ रहे थे। खोमचेवाले भी वहाँ पहुँचे हुए थे, कोई छोले-पूरी बेच रहा था, कोई आइसक्रीम का ठेला लिए खड़ा था, कहीं भुट्टे भुने जा रहे थे, कोई पान-बीड़ी सिगरेट बेचने में व्यस्त था। वह गंदी झुग्गियों वाली बस्ती आग लगने से सबके लिए प्रकाश बिंदु बन गई थी। बड़े-बड़े लोग, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ वहाँ आ कर रुक रही थीं। असीम उदारता का दिखावा करते हुए बेघर लोगों की सूची के अनुसार जरूरी सामान बँट रहा था जिसमें मदद का जज्बा कम और उसके बदले खुदा के यहाँ से 10 लाख लेने का लालच ज़्यादा था। दो-तीन दिनों में ही इतना घरेलू सामान और खाना जमा हो गया, जितना उन गरीबों ने पूरी जिंदगी नहीं देखा था। पहले से अच्छे कपड़े उनके बदन पर थे। पहले से अच्छा खाना बिना किसी मेहनत के मिल रहा था। जिंदगी की यह बदली शक्ल देखकर वे शोलों की तपिश भूल गए। झुग्गियाँ फिर बन गईं, जिंदगी उसी रफ्तार से चलने लगी। वक्त गुजरता गया। धीरे-धीरे जिंदगी की वही गन्दगी, बदबूदार और लाचार शक्ल फिर उभर आई। अभाव और बेचारगी का अहसास फिर उस बस्ती में लौट आया। सबकी वक्ती हमदर्दियाँ खत्म हो गईं। बस्ती फिर से शहर का बदगुमाँ दाग कहलाई जाने लगी। चूल्हे फिर ठंडे हो गए, बदन पर फिर फटे पुराने कपड़े नज़र आने लगे। सबकुछ पहले जैसा हो गया। नज्जू ने बड़ी आशा से अपनी माँ से पूछा, “माँ हमारी झुग्गियों में फिर कब आग लगेगी?”
***

लेखक परिचय: इब्ने कँवल (वास्तविक नाम: नासिर महमूद कमाल)
1984 से 2015 तक उर्दू में 22 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित 
चलभाष: 09891455448
ईमेल: ibnekanwal@yahoo।com

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