ओरेलियो एस्कोवार (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: स्पेनिश
लेखक: गेब्रिएल गार्सिया मार्ख़ेज़
अनुवाद: देवी नागरानी


परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 

सोमवार की गर्म सुबह बिना बरसात के शुरू हुई। सुबह जल्दी जागने के आदी ओरेलियो एस्कोवार भी 6:00 बजे उठकर अपनी ऑफिस का कमरा खोलकर भीतर आये। बिना डिग्री के दाँत निकालना उसका पेशा था। 
उसने शीशे की अलमारी से प्लास्टिक के ढाँचे में पड़े कुछ नकली दाँत निकाले और मुट्ठी भर औजारों के साथ ढंग से मेज़ पर रख दिए। ओरेलियो एस्कोवार ने बिना कॉलर के कमीज़ पहन रखी थी जिसका गला सोने के बटन से बंद था। और उसकी पैंट गारटर्ज़, लंबे रबड़ वाली पट्टियों से अपनी जगह पर काबू में रखी गई थी।

 जिस्मानी तौर पर वह दुबला-पतला आदमी था जो अक्सर सीधा ही खड़ा रहा करता था और उसके चेहरे पर हमेशा ऐसे भाव रहा करते, जैसे गूगों और बहरों के चेहरों पर हुआ करते हैं। हालांकि उन भावों का असली सूरते-हाल से कोई तालमेल न था। औज़ारों को मेज़ पर तरतीब से सजाकर, वह दाँतों की सफाई वाली मशीन को अपनी ओर खींच कर कुर्सी पर बैठ गया और नकली दांतों को चमकाने लगा। उस समय उसका दिमाग सोच से खाली था और वह पूरे ध्यान से मशीन के पायदान को अपने पैरों से चलाते हुए दाँतों को चमकाता रहा। आठ बजे वह कुछ देर ठहरा और खिड़की से बाहर आसमान का निरीक्षण करने लगा। पड़ोस के घर की छत पर बनी मीनार पर दो चीलें बैठी थीं। सूरज की तपिश में अपने पंख सुखा रहीं थीं। उसने यह अंदाजा लगाया कि दोपहर तक जरूर बारिश होगी। वह वापस आकर अपने कमरे में मसरूफ हो गया। उसके ग्यारह साल के बेटे की आवाज़ की गूंज उसके कानों पर पड़ी- 
'बाबा।'
'हाँ।'
'बाहर इलाके का मेयर आया है। वह पूछ रहा है कि आप उसका दाँत निकालेंगे?'
'उसे कह दो कि मैं नहीं हूँ।' कहकर वह इत्मीनान से सोने वाला दाँत साफ करने में व्यस्त हो गया। एक हाथ के फासले पर रखे दाँत को एक आँख बंद करके उसने गौर से देखा तो उसे अपने बेटे की आवाज फिर सुनाई दी। 
'पापा वह कहता है कि आप मौजूद हो क्योंकि उसने आपकी आवाज सुन ली है'।
वह दाँत देखने में व्यस्त रहा, कुछ देर बाद साफ़ किया दाँत मेज़ पर अन्य दातों के साथ रख दिया।
'पापा मेयर कहता है कि अगर आपने उनका दाँत नहीं निकाला तो वह आप को गोली मार देगा।'
उसने मशीन चलानी बंद की और इत्मीनान से मशीन दूर की, मेज़ की वह दराज खोली जिसमें रिवाल्वर पड़ा था। 
'बेटा उससे कहो कि वह आकर मुझे गोली मारे!'
 उसने कुर्सी को दरवाजे की ओर मोड़ा और ठीक उसी वक़्त मेयर दरवाज़े से भीतर आया। उसका दायाँ गाल सूजा हुआ था, इसी कारण उसने पाँच दिनों से शेव् भी नहीं किया था। दाँत वाले डॉक्टर ने मेयर की आँखों में नाउम्मीदी और बेबसी देखली। उसने दरवाजा बंद करके मेयर को बैठने के लिए कहा। 
'शब्बा खैर,' दाँत वाले डॉक्टर ने कहा।

  औज़ार गर्म पानी में उबल रहे थे। मेयर ने कुर्सी की पीठ का सहारा लिया। उसे काफ़ी आराम महसूस हुआ और वह पूरे कमरे का निरीक्षण करने लगा। उसे आभास हुआ कि कमरा बहुत ही सादा और मुफलिसी का प्रतीक था। पुरानी लकड़ी की कुर्सी, पायदान वाली मशीन, शीशे की अलमारी! उसी वक्त दातों वाला उसके पास आया। मेयर ने एड़ियों के बल पर अपने आप पर काबू पाकर मुँह खोल दिया। 
ओरलियो एस्कोवार ने उसका मुँह रोशनी की ओर करते हुए दाँत का निरीक्षण किया। फिर कहा, 'तुम्हें बेहोश किए बिना दाँत नहीं निकाल पाऊंगा।'
'क्यों?' मेयर ने पूछा।
'इसलिए कि दाँत के नीचे पस भर गया है।'
मेयर ने डॉक्टर की आँखों में देखते हुए कहा, 'ठीक है!'
डॉक्टर उबले हुए औज़ारों को बिना चिमटे के बाहर निकालकर टेबल पर रखने लगा फिर हाथ धोकर औज़ारों की ओर मुड़ा।

इस बीच उसने एक बार भी आँख उठाकर मेयर की ओर नहीं देखा, और मेयर ने एक लम्हे के लिए भी उस पर से नज़र नहीं हटाई। खराब दाढ़ हक़ीक़त में अक्ल दाढ़ थी। अपने दाँत भींचकर डॉक्टर ने पैर जमाये और औज़ार से दाँत को मज़बूती से काबू कर लिया। इस वक़्त मेयर पूरी ताक़त से दोनों हाथ कुर्सी की बाहों से थामे रहा और वह सीधा तनकर बैठ गया।

डॉक्टर ने मेयर की ओर देखते हुए कहा कि 'इस वक्त तुम हमारे बीस आदमियों के क़त्ल का हिसाब दोगे।' मेयर ने कुछ बेआरामी महसूस की और उसके आँसू निकल आए। उसे जैसे अपनी सांस रोक ली। जब उसने दाँत को बाहर निकलते देखा तो पिछली पांच रातों की तकलीफ और पीड़ा और इस पल के दर्द का मुक़ाबला करने में वह नाकाम रहा। वह पसीने से तर था और डॉक्टर उसके ऊपर झुककर सफाई कर रहा था। एक साफ कपड़ा मेयर की ओर बढ़ाते हुए कहा कि वह अपने आँसू साफ़ कर ले।

मेयर का पूरा जिस्म काँप रहा था डॉक्टर ने उसे आराम करने की हिदायत दी और नमक पानी से कुल्ले करने की सलाह दी। मेयर ने उठकर उसे फौजी ढंग से सेल्यूट किया और बाहर निकल आया।
'बिल भेज देना!' उसने कहा। 
'किसके नाम, तुम्हारे या टाउन कमेटी के नाम?' 
मेयर ने बिना डॉक्टर की ओर देखे ही क्लिनिक का दरवाज़ा बंद किया। जाली के दरवाजे से, बाहर की ओर से उसकी आवाज आई, 'कोई फर्क नहीं पड़ता, एक ही बात है!
***


गैबरियल गर्शिया मारकुएज: (मार्च 6, 1927  कोलंबिया - अप्रैल 17, 2014  मेक्सिको) 
वे उपन्यासकार, कहानीकार, एक बेहतरीन स्क्रीन लेखक थे और बीसवीं सदी के रौशनमिनार रहे, स्पैनिश और अंग्रेजी में लिखने में वे सिद्धस्त थे। उनकी कहानियाँ जन-जीवन की सजीव चित्रण है। वह मजदूरों और मज़लूमों साथी रहे। कोलंबिया उनका प्रवास क्षेत्र रहा। उनका कहना था, "सब कुछ जो मैंने सोचा है, जो कुछ मैंने जिया है वह मेरी किताबों में है।" 

उनका एक मशहूर अलविदाई ख़त भी बहुत चर्चित है, जिसका मैंने हिन्दी में अनुवाद किया है। 1972 में उन्हें Neustadt International Prize for Literature और 1982 में साहित्य का नोबल सम्मान मिला। उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यास A hundred years of solitude (1969), The Autumn  of the patriarch (1975), Love in the time of cholera (1985) दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुए।

'Un día de estos' was first published in Spanish in 1962. It was translated from the Spanish by Gregory Rabassa and J. S. Bernstein as 'One of These Days'.

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