संस्मरण: पिताजी और उनकी चिट्ठी पत्री

नमिता राय

नमिता राय

गोमतीनगर, लखनऊ

कबाड़ी वाला आवाज दे रहा था,"पुराने अखबार,गत्ता ,कागज दफ्ती ,लोहा लक्कड़ दे दोऽ! पुराना फ्रिज,टी.वी., कूलर, गैस चूल्हा, हीटर दे दो। कबाऽड़ी, कबाऽड़ी वाले! ओऽ बहन ,सुन रही हो ?" "रोज ही तो सुनती हूँ ,सड़क पर यह आवाज! कौन सी नई बात है? पर, पता नहीं क्यों! आज अपनी बड़ी बहनों की बात याद आ गई।

इधर कुछ महीनों से वे रोज़ कहती थीं कि घर का सामान हल्का करो। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, गृहस्थी समेटनी चाहिए। यह सब इतने बक्से क्यों रख रखें हैं? इनको निकालो कहाँ तक सहेजोगी। मैं चौथी कमरे में गयी और लकड़ी के पटरे पर लाइन से रखे हुए लोहे की मोटी चादर के बक्सों को देखने लगी। एक बार मन में आया, कि यह सारे बक्से और उसमें रखे कागज पत्तर निकाल दूँ। आखिर अब किसके काम के हैं! कौन संभालेगा मेरे बाद? किन्तु इतने सालों से इनको देखने की आदत सी पड़ गई थी। फिर ख्याल आया, बेचारे चुपचाप तो पड़े हैं, किसी का क्या बिगाड़ रहे हैं? सालों से इन बक्सों में पिताजी की फाइल्स, चिट्टियाँ, प्रार्थना पत्र और डॉक्यूमेंन्ट्स, तस्वीरें,फोटो एलबम, उनके स्पोर्ट्स सर्टिफिकेट्स ,जीते हुए मेडल्स रखे हुए थे। माँ कभी-कभार पिताजी की चिट्टियाँ लिखने की आदत, और टीवी पर समाचार सुनने पर, अक्सर विनोदीय स्वभाव मे कटाक्ष करतीं , कहती थीं, "सरकार आपको दस्सियों बार टी. वी. पर समाचार सुनने का क्या देती है? चिट्ठी पर चिट्ठी लिखते जा रहें हैं! दूर भाषासंचार विभाग को। लेकिन, अभी तक लैन्ड लाइन टेलीफोन नहीं लगा है। इतना काम करते हैं सरकार को खबर है कि नहीं? लगता है सारे विभाग का जिम्मा आपने अकेले उठा रखा है।"

हाँ, माँ का यह व्यंग्य उसी आंदोलन पर था, जो पिताजी ने मजदूरों को बोनस दिलाने के लिए लड़ा था। आखिर क्या मिला पिताजी को, उसके बदले, उल्टे उनके प्रमोशन रोक दिए गये! किन्तु पिताजी के लिये वह आन्दोलन किसी तीर्थ से कम नहीं था। पिताजी ने तो "सत्यकाम" सिनेमा के हीरो के जैसे ईमानदारी का व्रत जो ले रखा था। ऊपर से सख्त और कड़क, अन्दर से दिल था नारियल की तरह मुलायम। किसी का दुख नहीं देख पाते थे। माँ का प्यार से कसा गया जाना पहचाना कटाक्ष सुनकर पिताजी मुस्कुरा कर बोले," तुम क्या जानो देश में क्या-क्या नया हो रहा है ।देश कितनी तरक्की कर रहा है ।अगर हम लोग हाथ पर हाथ रख कर बैठ जायेंगे , तो काम कौन करेगा?" माँ पुन: अपना पक्ष रखती , "हर बात पर हरिश्चंद्र बन कर काम नहीं चलता है। सारी दुनिया आपकी तरह सीधे नहीं चलती है।" पर इसका यह मतलब नहीं था, कि माँ पिताजी के इस व्यक्तित्व पर गर्व नहीं करती थी।यह सब तो उनका रोज का डायलॉग था। असल में उनकी जीवन के हीरो तो यही हरिश्चंद्र थे। जिन पर उन्हें बड़ा नाज़ था। वे गर्व से कहती थीं कि हमारे जीवन के हीरो और कोई नहीं हमारे हरिश्चंद्र हैं।''

पिताजी भी मुस्कुरा कर नोकझोंक खत्म करने के लिए चिढ़ा देते थे, "तुम जाओ रसोई में बटुली चड़ाओ और बटुली उतारो। तुम्हें यह सब नहीं समझ में आयेगा।''

एक-एक करके मेरी सारी यादें ताजा हो गई। आँखें डबडबा गई। मैंने धुंधली आँखों से बक्सा खोला, और देखा गत्ते की फाइलों पर कीड़े रेंग रहे थे सफेद रंग के पतले पतले। मैंने तुरंत रामविलास को बुलाया और फाइल्स को एक-एक करके बाहर निकाल कर धूप दिखाई और फिनाइल व नैफ़्थलीन की गोलियाँ बक्से में डाली। आखिर माँ के हरिश्चंद्र की मेहनत ऐसे कैसे खराब होने देती मैं। कितने मन से एक-एक सरकारी पत्र और प्रार्थना पत्र पिताजी ड्राफ्ट करते थे, जैसे बस सीधे प्रधानमंत्री ही पढ़ेंगे। हिंदी उनकी ठीक-ठाक थी। किंतु, अंग्रेजी पर पकड़ खासी मजबूत थी, क्योंकि उन्होंने कुछ, अंग्रेजों का जमाना देखा था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा दक्षिण भारत में हुई थी। एक पत्र फाइल से फिसला और मोती जैसे अक्षर मेरी आँखों के सामने झिलमिलाने लगे। इन्हीं अक्षरों में तो उनका अथक विश्वास था कि वह एक रिकॉर्ड हैं जो जरूरत पड़ने पर क्रांति भी ला सकते है। उस समय हमारे घर में टाइपराइटर नहीं था। पिताजी चिट्ठियाँ लिखते लिखते हाथ से अपनी दुखती पीठ को पकड़ लेते थे। तब मैं उनकी पीठ के पीछे एक तकिया रख देती थी और उनकी कलम फिर से मोती उगलने लगती थी।

आज जब मैं पढ़ने लिखने का शौक रखती हूँ तो मुझे इन पीले पड़ गये झीने कागजों की अहमियत समझ में आयी। कितने विश्वास के साथ पिताजी चिट्ठी लिखते थे और सोचते थे यह पत्र सरकारी दफ्तर पहुँचते ही रुका कार्य अवश्य कार्यान्वित कर देगा। उनका कलम की ताकत और ओहदे की जवाबदेही पर अधम विश्वास था। यह पत्र महज कागज न होकर उनके व्यक्तित्व के परिचायक थे। इनको हटा कर मैं स्वयं से अपरिचित नहीं होना चाहती थी। मैं उनकी इस मेहनत और विश्वास की आस्था को नगण्य कैसे कर दूँ? क्या यह माया मोह का जीवन ही सब कुछ है? उसके उपरांत कुछ भी नहीं? मेरी आत्मा को जैसे किसी ने झकझोर दिया हो। पिताजी की फाइल को मैंने बक्से में करीने से एक के ऊपर लगाकर एक पुरानी चादर में लपेट दिया और बक्सों को यथास्थान लाइन से लगवा दिया। मुझे यह प्रतीत हुआ जैसे मैं अपनी जिंदगी भर की कमाई सम्पत्ति या अपनी धरोहर को को घर से निकाल कर फेंक रही थी। वह सिर्फ मात्र चिट्टियाँ,या पत्र ही नहीं थे वह उनका व्यक्तित्व व उनका संसार और व्यक्ति पर भरोसा था। यह सोच कर मैंने बक्सों के ऊपर, अपनी दसवीं कक्षा में काढ़ा हुआ सुंदर मेजपोश निकाला और बिछा दिया और कोठरी से बाहर निकल आयी।

तन का सुख तो व्यक्ति बहुत देखता है, पर यकीन मानिए ,जब आत्मा को शांति मिलती है तभी जीवन सार्थक होता है। आज भी मैं, अपने प्रार्थना पत्र लिखने के लिये पिताजी के पत्रों का सहारा लेती हूँ। निष्काम कर्म ने ही तो मरहम की तरह पिताजी के जीवन के उतार चढ़ावों को आसान किया था। यह पत्र उनके जीवन के ध्येय एवं अगली पीढ़ी के लिये प्रेरणा का द्योतक हैं। इन पत्रों को आज भी मैं पढ़ती हूँ,तो पिताजी का व्यक्तित्व निचुड़ कर मेरे सामने आ जाता है। यही धरोहर मेरे भी व्यक्तित्व को गरिमामय एवं उत्कृष्ट बनाती है तथा प्रत्येक कठिन परिस्थिति में मार्ग प्रशस्त करती है। सपनों की उड़ान के साथ ज़मीनी हकीकत से भी जोड़ कर रखती है। एक तरह से उनके यह पत्र सकारात्मक सोच एवं‌ आशावादी दृष्टिकोण के परिचायक है। जो हर नयी सुबह को बेले के फूल की तरह महकाते हैं। प्रत्येक दिपावाली मैं उन बक्सों पर रोली से स्वास्तिक बनाना नहीं भूलती हूँ।

4 comments :

  1. अति सुन्दर संस्मरण। दिल को छू गया ये लेख

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  2. so beautiful and touching

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  3. Thankyou Ranu . That generation was different

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