नदी केन्द्रित कविताएँ: राकेश ‘कबीर’

राकेश 'कबीर'
सरायन

अरी सरायन!
मेरी प्यारी नन्ही सी नदी
वर्षों बाद तुझे देखा आज फिर
और दिल भर आया
तेरे किनारे बैठ कर
तुझे नदी समझ कर
कुछ पानी सा ढूँढ रहा था मैं
और तू जोरों से रो पड़ी
तेरे काले आँसू छलछला कर
धीरे से ढुलक पड़े
किसानों ने जोत डाला
तुझे खेत बनाकर
शहर वालों ने उड़ेल दिया है
सारी गंदगी और जहर तुझमें
अब तुझे मरने से कौन रोक सकता है
मेरी नन्ही सी प्यारी सी नदी!
***


सूखती नदियाँ

पहली बार सूख गई है सई नदी
दूर तक उड़ता है रेत का बवंडर
फागुन की गर्म तेज बयार से
सरपट दौड़ता है बच्चों का झुंड
नदी के आर-पार बेरोक-टोक।
सीना ताने टीले से नजर बचाकर
गलबहियाँ करने को सिसकती हैं
दोनों तरफ बिछड़ती धार
ऐसे में बेबस मन सोचता है
क्यों नहीं मचती है उथल-पुथल
धरती के सीने में अब
क्यूँ नहीं टकराती हैं परतें परतों से
झीलों ने साध रखी है क्यों चुप्पी
उनके आंगन से क्यों नहीं फूटती है धार
फिर से गोमती, सई, वरुणा की!
***


वापसी

एक सुनसान दुपहरी में
जब हवा के हाथ भी तंग थे
और पेड़ धूप की आँच से जले जा रहे थे
गंगा-जमुना के संगम पर
अपनी उपेक्षा और दुर्दशा से तंग आकर
सारी नदियों ने महाकुंभ लगाकर
एक प्रस्ताव रखा कि
अब हमें लौट जाना चाहिए अपने घर और
छोड़ देनी चाहिए सारी ज़मीन
'पक्के विकास' के वास्ते।

ख़ाली कर देनी चाहिए सारी धरती
खेतों का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए
कचरा-मलबा बहाने के लिए
गाड़ी-मोटर चलाने के लिए
रेत का बवंडर उड़ाने के लिए।

यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर
एक दिन सारी नदियाँ
दुःखी मन से वापस चल दीं।
***


नदी शांत है

बारिशें बीत गईं
उफान पर बहती नदियाँ
अब शांत हो चुकी हैं

छोटी नदियाँ या तो
बादल की बेटी हैं या प्रेमिकाएं
जो उनके प्यार, दुलार और चुम्बन से
इतराती इठलाती बलखाती
गुजरती हैं कल कल ध्वनि से

और बादलों के आसमान से
गायब होते ही
निस्तेज, स्थिर ,
गतिहीन होने लगती हैं
छोटी छोटी नदियाँ

दरख्तों का झुंड तो
खामोश हरियाली ओढ़े खड़ा है
लेकिन उनकी निगहबानी में
बकुलाही ले रही जल समाधि
धीरे धीरे धीरे।
***


नदियाँ ही राह बताएँगी

पहाड़ों के सीने चीरकर
नदियों ने बनाए बहते हुए रास्ते
उन्हीं रास्तों ने जोड़ा
दुनिया भर की इंसानी बस्तियों को
आज इंसान नदियों को दीवारों में कैदकर
बसा रहा है बस्तियाँ दुनिया भर में
बता रहा है नदियों को उनकी हद और
बहने का रास्ता।
***


चंबल

कल शाम जब चंबल
डूबते हुए सूरज की
ललाई हुई चुनर लपेट के
इतरा रही थी और
उसके पुल से गुज़रते हुए
ट्रकों से आवारा रेत
अठखेलियाँ करती हुई
बवंडर रच रही थी
ठीक उसी वक्त
राजधानी में लोकतंत्र
सफ़ेद काग़ज़ों पर मुहरबंद हो
लोहे के कनस्तरों में क़ैद हो रहा था
और छल-कपट के ईमानदार-धंधेबाज
अपनी चालों पर इतरा रहे थे।
टेलीविजन पर चौबीसों घंटे
चप्पर चप्पर करनेवाली चापलूसी
मुँह से फेंचकुर फेंक रही थी।
तभी मेरी नन्ही सी बेटी ने
रोज की तरह पूछा था "पापा, आज घर कब तक लौटोगे?"
और सैकड़ों मील दूर बैठे
निरुत्तर मेरी उँगलियों ने
फोन का लाल बटन छू लिया था
और बातचीत का सिलसिला चाहते हुए भी टूट गया था।
लोग अपनी जीत पर खुश थे
रेत के बवंडर गहराती रात के साथ
और घनीभूत होने लगे थे
हमने गेस्टहाउस के कंबल में
अगली सुबह तक के लिए
खुद की खामोशी से समेट लिया था।
***

परिचय: राकेश ‘कबीर’
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गाँव से संबंध रखने वाले कवि राकेश ‘कबीर’ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘भारतीय सिनेमा में प्रवासी भारतीय जीवन का चित्रण’ विषय पर एम.फिल और ‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरंतरता और परिवर्तन’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वे उत्तर-प्रदेश प्रशासनिक सेवा में एडीएम पद पर कार्यरत हैं। अध्ययन के दौरान से ही देश-समाज और अपने समुदाय के लिए लिखते रहे हैं। उनके अब तक दो कविता संग्रह ‘नदियाँ बहती रहीं’ और ‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ एवं एक कहानी संग्रह ‘खानाबदोश सफ़र’ प्रकाशित हो चुके हैं।

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