कविता: पापा मैं क्यों डरती हूँ?

मुहम्मद हनीफ़

- मुहम्मद हनीफ़


मैं पढ़ी-लिखी हूँ, पढ़ती हूँ
सोच समझकर कदम रखती हूँ
छाहों में भी खुद को देखती हूँ
परछाइयों से बातें भी करती हूँ
फिर भी मैं क्यों डरती हूँ?
पापा बोलो न मैं क्यों डरती हूँ?
सुनती रही हूँ, सहती रहीं हूँ
सहमी सी, सिमटी सी, कहती रहूँ हूँ
नन्ही गुड़िया हूँ, गुड़िया सी हूँ
क्या सच में गुड़िया जैसी हूँ?
पापा बोलो न, मुँह खोलो न?
क्या मैं तुम जैसी नहीं हूँ?
मुझको मालूम है, मैं एक दिन 
तुम्हें छोड़ चली जाऊंगी
बहुत दूर शायद जहाँ तुम देख न पाओ
तुम्हारी बाँहों के झूले,मीठी यादें
धुंधली आखों में खो जाएगी
और तुम फिर अकेले हो जाओगे
संसार भी तो यही है न पापा?
हम समानांतर हैं सभी 
यहाँ रुकना प्रतिबंध है, रुक जाना अंत है
जीवन गति का नाम है, गति ही जीवन है
बावजूद जीवन में गति नहीं
हम निर्बाध लांघ रहे हैं समय की सीमाएँ
सीमाओं में सिमट गई है मेरी आकांक्षा
सिसक रही हैं मेरी जिंदगी
इसी खामोश पड़ी रेत की तरह
और हम लिख रहे हैं कविता 
पूछ रहे हैं
पापा मैं डरती क्यों हूँ?

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