नेपाली कविताएँ: चंद्र गुरुङ

चंद्र गुरुङ
चंद्र गुरुङ की नेपाली कविताएँ उन्हीं द्वारा हिंदी में अनूदित

1. स्वतंत्र खुशी
 
कभी-कभार
आकाश में उड़ते-उड़ते, थकान से पंख गलता है
आकाश में उड़ते-उड़ते, प्यास से गला सूखता है
आकाश में उड़ते-उड़ते, भूख सताती है
आकाश में उड़ते-उड़ते, बरसात भिगोती है
आकाश में उड़ते-उड़ते, धूप झुलसाती है
 
परंतु वह पक्षी एक स्वतंत्र
खुशी से भरी ज़िंदगी उड़ता है।
***
 
 
2.  झुकते-झुकते

 
तुम गोदी के बच्चे को चूमने माँ के होंठ जैसे नहीं झुके
धरती के दर्द को सहलाने बादल जैसे नहीं झुके
घूमते-घूमते थकी पृथ्वी के सिर जैसे नहीं झुके 
 
तुम बोगनविलिया की सुन्दरता से सजी डाली जैसे नहीं झुके
ओस से भीगे शीतल पत्ते जैसे नहीं झुके
टीले पे चांद के जैसा दिलों में प्रेम भरकर नहीं झुके 
 
तुम तो पहाड़ के ऊपर से टूटते पत्थर से झुके
सूखे पेड़ जैसे टूटते हुए झुके
झरने जैसे, चेहरे की चमक गुमाते हुए झुके
 
दोस्त, तुम जब झुके गलत झुके।
***
  

3.  जीवन कविता लिखता है 

जीवन एक कवि है
एक दिन निकलता है नई यात्रा में
छोड़ जाता है 
कविता की जैसे सुन्दर यादें।
 ***


4.  संपन्नता
 
इंसान की तीन आवश्यकताएँ -
रोटी
कपड़ा
मकान 
 
रोटी –
अलग स्वाद की है, जो रोटी मैं आजकल खाता हूँ 
भूल गया हूँ मैं भूख का प्यारा सा चेहरा 
 
कपड़ा -
पहले से अच्छे-अच्छे  कपड़े पहनता हूँ
पर नहीं ढक सका मन का लालच 
 
मकान –
रहता हूँ आजकल भव्य और ऊँचे मकान में
जहाँ से छोटा दिखाई पड़ता है आदमी।
***

(बूढ़े मांझी का देश से साभार)




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