मुस्कान बिखेरती कहानियों का गुलदस्ता: मुस्कान के लिए

समीक्षक: राम सिंह 'साद'


पुस्तक: मुस्कान के लिए (कहानी संग्रह)
कहानीकार: आचार्य नीरज शास्त्री,
प्रकाशक: एक्सप्रेस पब्लिशिंग, चेन्नै (तमिलनाडु)
संस्करण: प्रथम-2022
मूल्य: ₹ 180/-
पृष्ठ संख्या 74
ISBN-479-888-717-888-2


एक सुबह वरिष्ठ कहानीकार आदरणीय आचार्य नीरज शास्त्री से मुलाकात हुई तो उन्होंने अपनी नव प्रकाशित कथाकृति 'मुस्कान के लिए' भेंट की।कलेवर देखते ही इसे पढ़ने की जिज्ञासा हुई। सुन्दर आवरण और संग्रह के शीर्षक के कारण सोलह कहानियों के इस गुलदस्ते पर नजर ठहर गई। संग्रह की कहानियों के अंदर निहित भावना एवं उद्देश्य की सार्थकता ने समीक्षा लिखने के लिए मन में जिज्ञासा उत्पन्न की। इस 'मुस्कान के लिए' कहानी संग्रहमें प्रस्तावना स्वरूप महान विद्वानों एवं विदुषियों ने कथाकार के विषय में अपने उत्कृष्ट विचार व्यक्त किए हैं जिनमें डॉ. विष्णु प्रभाकर जी, डॉ. राजेन्द्र अवस्थी जी, डॉ. विष्णु विराट जी, डॉ श्री भगवान शर्मा जी, डॉ.राजेन्द्र मिलन जी, डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ जी,श्री ब्रिजेंद्र उपाध्याय जी, डॉ.किरन बेदी जी, डॉ.जय कुमार 'जलज' जी एवं श्रीमती लता श्री जी आदि प्रमुख हैं। इन सभी विद्वानों ने अपने विचारों में लेखक के सकारात्मक राष्ट्रवादी चिंतन, सशक्त उद्देश्यपरकता, समाज की दशा व दिशा बदलने की पहल के साथ साहित्य में अनंत सम्भावना , सच को सच कहने का साहस आदि कूट-कूटकर भरे गुणों को व्यक्त करते हुए उन्हें सफलतम साहित्यकारों में शामिल किया है।

राम सिंह 'साद'

इस कहानी संग्रह की भूमिका महान साहित्यिक विभूति डॉ. दिनेश पाठक 'शशि' जी द्वारा बड़े ही वैचारिक ढंग से सटीक एवं निष्पक्ष लिखी गई है। यह कहानी संग्रह आदर्श व्यक्ति,आदर्श परिवार,आदर्श राष्ट्र एवंआदर्श समाज की स्थापना का एक प्रामाणिक दस्तावेज है जो व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र एवं समाज हित के लिए भविष्य निधि के रूप में निहित रहेगा। कथाकार ने इस कहानी संग्रह की पहली कहानी 'दर्द के रिश्ते' में एक ऐसे परिवार के विषय में लिखा है जो मानवता से दूर दहेज के लोभी भेड़िये हैं। इनके कारण ही आत्महत्या जैसी दुर्घटनाएँ जन्म लेती हैं। बेटी को मांाँाँ-बाप का साथ न मिलना तथा उल्टे बेटी पर ही पैसा मांगने का इल्ज़ाम लगाना आदि बेटी को आत्महत्या के लिए मजबूर करते हैं। इसीलिए इस कहानी की नायिका सुजाता आत्महत्या कर लेती है। परिवार में मुख्य पात्र सुजाता के पिता अरिदमन, पति आदित्य तथा आदित्य के पिता रनवीर है। बाड़मेर में सुजाता सुजाता का पालन-पोषण करने वाले बुआ-फूफा कल्पना राठी और स्वदेश राठी का निस्वार्थ प्रेम भी दृष्टिगोचर होता है। इसमें पुलिस वालों का गन्दा चरित्र भी दिखाया है। वे रिश्वत लेकर केस को रफा-दफा करने से भी गुरेज नहीं करते। यह वर्तमान युग में जीती- जागती सजीव कहानी है जो रिश्तों के दिए दर्द को बयाँ करती है। यह सरल भाषा में लिखी हृदयविदारक कहानी है।

आचार्य नीरज शास्त्री

'स्वाभिमान' कहानी नायिका सौम्या व नायक मनोज की कहानी है। मनोज केन्द्रीय विद्यालय रोहतक में गणित के प्रवक्ता हैं। सौम्या वहाँ के एसएसपी कमल सिन्हा की बेटी और बड़े भाई प्रशांत की लाड़ली है। मनोज और सौम्या का एक लाइब्रेरी में प्रेम संबंध स्थापित होता है। सौम्या का भाई मनोज को हर तरह बेइज्जत करता है किंतु सौम्या मनोज के स्वाभिमान पर चोट नहीं आने देती।वह अपने पति के सम्मान की रक्षा के लिए भाई की बेइज्जती करने से नहीं चूकती । अंत में भाई अपनी ग़लती की माफी मांगता है।इस प्रकार स्वाभिमान कहानी भावुक कर देने वाली मार्मिक एवं संजीदा कहानी है। इसमें सच्चे प्रेम के लिए दहेज को नकारा गया है।

'टूटते सपने' एक प्रतिष्ठित व्यक्ति डॉ. भास्कर के परिवार की कहानी है। डॉ साहब के दो बेटे राघव और विनय एवं पत्नी सुनयना हैं। डॉ.भास्कर समाज में सभी के झगड़ों का समाधान करते हैं, लेकिन अपने ही परिवार में अपने बड़े बेटे का समाधान नहीं कर पाते हैं और पुत्र द्वारा अपमानित भी होते रहते हैं। जिसके पालन- पोषण में दिन- रात एक किए, पढ़ाई- लिखाई पर ख़र्च किया, भविष्य के लिए अनेक सपने देखे थे, वही जैसे शत्रु हो गया। उसके कारण डॉ साहब टूटकर चूर चूर हो जाते हैं। इस तरह कथाकार ने समाज में व्याप्त गम्भीर विसंगति पर लेखनी चलाई है। सही अर्थों में लेखक ने पुत्र की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर चिन्तन किया है। यह बहुत ही उत्तम विचार युक्त एक मार्मिक कहानी है।

'सामाजिकता' कहानी में समाज में फैली क्षुद्र विकृतियों पर लेखक ने विष्लेषण किया है। संजय शुक्ला एवं अरविंद अस्थाना बहुत दिनों बाद मिलने पर बातें करते हैं। संजय शुक्ला की पत्नी लक्ष्मी की बहिन सुधा अपनी मर्जी से प्रेम विवाह कर ले लेती है। इस बात से उसका भाई सुधा से बहुत नाराज़ रहता है। वह अपनी बड़ी बहन तथा बहिऩ़ोई से सुधा से बातें न करने को बोलता है। शुक्ला जी भी इस विचारधारा के व्यक्ति हैं कि वे अन्य भारतीय लोगों की तरह संभवतः हत्या को भी उतना घिनौना अपराध नहीं मानते जितना कि विवाहपूर्व स्त्री और पुरुष के प्रेम संबंध को। वो अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं कि सुधा बहुत प्रेम करती थी।अब हम उसे भुला चुके हैं, तब अरविंद अस्थाना उन्हें सामाजिकता का बोध कराते हैं। इस कहानी में कथाकार एक सामाजिक बुराई पर कुठाराघात कर एक पवित्र समाज की स्थापना करने के उद्देश्य में सफल रहे हैं। यह एक बहुत ही प्रभावशाली कहानी है जो सभी तथ्यों पर खरी है।

कहानी संग्रह की पाँचवीं कहानी करुणाकंद' है , जिसमें देवदत्त भारद्वाज के पिता चंद्रदेव मथुरा के प्रसिद्ध करुणाकंद मंदिर के पुजारी थे। वह देवदत्त को देव कह कर पुकारते थे। देव कालीदास के साहित्य पर पी,एचडी कर रहा होता है। लेखक राकेश एक आर्टिकल के लिए उनसे मुलाकात करते हैं।तब देव अपनी दर्द भरी पीड़ा लेखक को सुनाते हैं कि मैं, माँ और बहिन सिद्धि कुंभ के मेले में गये थे। साधुओं की भीड़ में अचानक सिद्धि लापता हो जाती है। देव पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करते हैं, उन्हें कार्रवाई का आश्वासन मिलता है परंतु जब सिद्धि नहीं मिली तो वह निराश होकर नकारात्मक हो जाता है। लेखक भी सिद्धि का फोटो लेकर मदद की कहकर चला जाता है। तीन साल बाद मित्र शरद का फोन आता है कि सिद्धि आगरा के सेब बाजार में विंदुबाई के कोठे पर है। पुलिस की मदद से उसके साथ पंद्रह अन्य किशोरियों को भी मुक्त करा लिया जाता है। विंदुबाई के साथ उसके एजेंट को भी जेल भेज दिया जाता है।एस एस पी शुक्ला सिद्धि से बिना दहेज के करुणाकंद के मंदिर में ही शादी कर बहुत खुश होते हैं। इस प्रकार कहानी में विंदुबाई और उसके साथियों के घिनौने चरित्र पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने महान चरित्र वाले एस एस पी साहब का भी समुचित रेखाचित्र खींचा है। बहुत ही उत्तम विचार युक्त कथानक में कहानी का ताना-बाना बुना है तथा यह कहानी यथार्थ पर आधारित है।

'महत्वाकांक्षा' कहानी अमित व उसकी पत्नि नीता की कहानी है। यह नीता के चाल- चलन एवं चरित्र के कारण परिवार की दुरावस्था पर आधारित है। घर के सारे काम अमित करता है , उसकी पत्नि नीता को पार्टियों से ही फुर्सत नहीं है। उनकी एक प्यारी सी बेटी बुलबुल है जिसका अमित ही लालन- पालन करता है। नीता अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में व्यस्त रहती है। दीपावली के दिन खुशी में पटाखे चलाते समय तीन साल की बेटी बुलबुल बुरी तरह झुलस जाती हैं। इलाज के दौरान उसकी मौत हो जाती है ।नीता अपनी पार्टियों में ही व्यस्त रहती है।जब उसे यह घटना मालुम पड़ती है तो अमित से बुरा भला कहते हुए उसे बेइज्जत करती है। अमित को छोड़कर अपने नए प्रेमी श्याम रतन बजाज जो एक बहुत धनवान ज्वैलर है,के साथ वह शादी करती है। अमित को चिढ़ाने के लिए शादी की सूचना के साथ मंगलसूत्र को वापिस कर बसे बसाये घर का सत्यानाश कर जाती है। इस प्रकार कथाकार ने वर्तमान सामाजिक स्थिति पर गहरा चिंतन किया है। ऐसे महत्वाकांक्षी लोग समाज में अभिशाप हैं। संपूर्ण कहानी सार्थक है।

'सुबह का भूला'कहानी राजेश और आरूषि की एक विचारात्मक कहानी है।राजेश की माँ उसकी शादी से पंद्रह साल पहले गुजर जाती है तथा आरुषि को अपनी बेटी समान मानते हैं। आरुषि पिता समान ससुर रमेश पाण्डेय पर घूरने का झूठा इल्जाम लगा देती है। राजेश अपने पिता से बहुत प्रेम करता है फिर भी वह पत्नी के साथ अलग फ्लैट में रहने लगता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि बात और अधिक बिगड़े। बिजली विभाग के कर्मचारियों द्वारा उसके अकेलेपन का फायदा उठाकर बलात्कार किया जाता है। इस अवसाद की स्थिति में वह राजेश से माफी मांगती है और अपनी गलती का अहसास करती है। पिता समान ससुर से घर आकर उनके पैरों में पड़कर अपनी गलती की माफी मांगती है। इस प्रकार आरुषि ससुर व पति की लगन से सेवा करने लगती है। कहानी बहुत ही रोचक तथा सारगर्भित है। वृद्धों की भावनाओं को समझने का मापदंड स्पष्ट झलकता है। पात्रों के चरित्र स्पष्ट दर्शाये हैं।कहानी के भावनात्मक परिदृश्य आँखें सजल कर देते हैं।

'इंतजार'कहानी में नमन,सरला व भुवनेश का बड़ा बेटा है तथा अमन। वे नमन की पढ़ाई-लिखाई के लिए कर्ज भी कर लेते हैं। नमन विदेश में नौकरी करता है, वहीं शादी कर लेता है। उसके घर आने की खुशी में माँ एक शानदार पार्टी करती हैं परंतु उनका इंतजार करते- करते रात बीत जाती है सभी मेहमान विदा हो जाते हैं लेकिन नमन और उसकी विदेशी पत्नी भारत नहीं आते क्योंकि नमन की पत्नी भारत को पसंद नहीं करती इसलिए वे भारत लौटने के लिए मना कर देते हैं। माता-पिता और छोटा भाई इंतजार करते ही रह जाते हैं।

इस प्रकार यह कहानी उन पर निशाना साधती है जो आधुनिकता की चकाचौंध में और विदेशी आकर्षण के प्रभाव में आकर अपने परिवार को भी भूल जाते हैं।कहानी आधुनिकता की सोच में नैतिकता के विरुद्ध परिवर्तन पर कटाक्ष करती हुई राष्ट्रप्रेम की भावना को ठेस पहुँचाने वाली गतिविधियों पर चोट करती है। कहानीकार यहाँ भी अपने उद्देश्य में सफल रहे हैं।

'एक शाम की मुलाकात' कहानी का नायक पुष्पेश जयपुर से मोटिवेशनल सेमिनार से वापिस घर आकर माँ-बाबूजी से अबोध बालक की तरह लिपट जाता है। उसकी शादी मीनाक्षी से हुई थी जो असमय ही साथ छोड़ गई थी। एक दिन उसके बारे में सोचता हुआ वह पुष्कर रोड पर घूम रहा था। वहीं पर तेजस्विनी से उसकी मुलाकात हो जाती है। ये दोनों पहले एक ही महाविद्यालय में पढ़ते थे और आपस में प्रेम भी करते थे लेकिन तेजस्विनी की शादी शशांक से हो जाती है। दोनों युगल एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। हार्ट अटैक से शशांक की मृत्यु हो जाती है। और शादी के पाँच साल बाद मीनाक्षी की असमय मौत हो जाती है।तब पुष्पेश और तेजस्विनी मिलते हैं तो दोनों की आंखों से अश्रु निर्झर बनकर झरने लगते हैं। पुष्पेश तेजस्विनी से सहमत होकर उसके दोनों बेटों को स्वीकार कर उससे शादी कर लेते हैं। इस प्रकार भावनाओं को अहमियत देते हुए टूटे-बिछड़े परिवारों को आपस में जोड़कर वर्तमान परिस्थितियों को सुलझाने का एक अच्छा विकल्प सुझाने का लेखक ने उत्तम प्रयास किया है। लेखक ने बहुत ही उत्तम मनोविश्लेषणात्मक मार्मिक चित्रण किया है। कथाकार उद्देश्य में यहाँ भी सफल है।

'फैसला'कहानी में राजन बाबू कनाडा के माँ काली रेस्टोरेंट से लौटते हैं। आते ही अपने प्रिय मित्र रमन से मिलने उनके घर जाते हैं। जहाँ उनकी पत्नी संध्या बताती है कि रमन संन्यासी होकर सिद्धेश्वर मंदिर चले गए हैं। अतीत के बारे में सोचते हुए वे सिद्धेश्वर मंदिर जा रहे होते हैं, रास्ते में रोशनी काकी से बातें करते हैं।वह संध्या की सारी बातें बताती है कि किस तरह संध्या अपने पीहर पक्ष को अधिक महत्व देती है जबकि रमन से कोई बात तक नहीं करता। वह रमन को दो टूक जबाव देती है कि तुम कान खोलकर सुन लो कि मेरे घर कौन आता है और कौन जाता है, इससे तुम्हारा कोई मतलब नहीं होना चाहिए। यह सुनकर वह घर छोड़कर चले जाते हैं। इसीलिए मैं भी वह घर छोड़कर चली आई हूँ। राजनबाबू मंदिर पहुँच कर रमन से मिलते हैं, जहाँ उन्हें सत्य का उपदेश मिलता है कि ईश्वर सत्य है , संसार मिथ्या है। यह सुनकर वह अपने घर लौट आते हैं।इस प्रकार पारिवारिक सम्मानहीन समाज में सब कुछ ठीक करने पर भी धिक्कार ही मिलता है तो रमन ने भी प्रसंगानुसार सही फैसला लिया है। इस तरह मध्यम वर्गीय परिवार में नैतिकता विहीन पत्नी की स्थिति को उजागर किया है। कथाकार ने ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक कहानी रची है। सामाजिक सरोकारों को अधिक महत्व दिया है।

कथाकार ने कहानी 'यशोदा' में नैतिकता का उत्कर्ष दर्शाया है।जब डॉ. अवस्थी के घर आचार्य विवेक मधुर और मृदुल को ट्यूशन पढ़ाने जाते हैं, तब पता चलता है कि डॉ.अवस्थी की पहली पत्नी कविता थीं जो दो बच्चे मधुर और मृदुल को छोड़ कर दुर्घटना में गुजर गईं। अंकिता कविता की मौसेरी बहन है। वह पहले अपनी बहन कविता के घर पर भी रही थी।वह कविता के बच्चों की परवरिश करने के लिए डॉ. अवस्थी से शादी करती है।वह उन्हें कृष्ण और बलराम की तरह मानती है। आचार्य विवेक को यह बात श्रीमती अवस्थी स्वयं बतातीं है। तब आचार्य विवेक कहते हैं कि मैडम धन्य हैं आप! इस युग में आप जैसी ममतामयी, धैर्यवान एवं कर्मनिष्ठ माँ पृथ्वी पर बहुत कम ही मिलती हैं। बहन के उत्तरदायित्वों को निभाना अपनी जिंदगी को दाँव पर लगाकर यशोदा का होना कथाकार ने बखूबी साकार किया है। कहानी गंभीर भाव से ओत-प्रोत है। बहुत ही गजब की कहानी है।

'दीपावली का महापर्व' कहानी में कहानीकार ने राजेश बाबू के बारे में लिखा है जिनके पिता गजानन बाबू बेटे को सलाह देते हैं कि खूब रिश्वत लेना, खूब पैसा कमाना। वे बताते हैं कि उसके बचपन में दीपावली के महापर्व पर एक गरीब की झोपड़ी में उन्होंने आग लगा दी थी क्योंकि झोपड़ी में गरीब के मरने से रोने की आवाज महापर्व के उत्सव में अवरोध कर रही थी। बाद में राजेशबाबू आइएफएस बन कर फोरेस्ट आफिसर के रूप मे राजस्थान के रावतभाटा में तैनात होकर ईमानदारी से राष्ट्रहित में काम करते हैं। कुछ अराजक तत्व बीडीआर और पुलिस वाले उन्हें रिश्वत का लालच देकर जंगल का अवैध कटान करवाना चाहते हैं। वह इसके लिए तैयार नहीं होते।इसी बजह से वे उन पर रिश्वत लेने का झूठा केस लगा कर तीन माह की जेल करा देते हैं। गजानन बाबू बेटे की जमानत कराकर नसीहत देकर उन्हें घर ले आते हैं। घर रह कर राजेश बाबू सामाजिक कार्य करते रहते हैं। एक रेल दुर्घटना में लोगों की सहायता करते समय वह देखते हैं कि वहीं बीडीआर बुरी तरह घायल पड़ा है।वह राजेश बाबू को पहचान लेता है। पुलिस व मीडिया इकठ्ठे हो जाते हैं। तब वह सही बयान देता है जिससे राजेश बाबू की इज्जत और भी बढ़ जाती है। तब गजानन भी बेटे की प्रसंशा करते हैं। इस तरह लेखक बताता है कि एक ईमानदार व्यक्ति को कितनी ही कठिनाइयों सामना करना पड़ता है किंतु सत्य कभी पराजित नहीं होता। यह बहुत ही उत्तम प्रेरणादायक, समाजहित एवं राष्ट्र हित का विशेष महत्व दर्शाती कहानी है। कहानी का उद्देश्य नैतिकता एवं कर्तव्यनिष्ठा को प्रतिष्ठित करते हुए पात्रों के विभिन्न चरित्रों को उभारना रहा है।

'वापिसी का एहसास' कहानी में रितिका की शादी दी सुधीर से होती है। सुधीर की माँ उसकी शादी से तीन साल पहले गुजर चुकी होती हैं। शादी के कुछ दिन बाद ही सुधीर का एक दुर्घटना में देहाँत हो जाता है।तब रितिका अपने ससुर की शादी अपनी विधवा कामवाली कमला से करवा देती है। कमला को एक पुत्र रजत होता है जिसे रितिका पालती- पोषती है।जब वह बड़ा हो जाता है तो वह बैंक में अधिकारी बन जाता है। वह रजत रितिका को देवी मानता है।जब रजत इक्कीस साल का तथा रितिका पैंतालीस साल की होती है,तब सबकी सहमति से रजत की शादी रितिका से करा दी जाती है। उसके बाद रितिका एक पुत्र को जन्म देती है और बहुत खुश होती है। वह अपने अतीत में खो जाती है, तव उसे सुधीर की वापिसी का एहसास होता है। यह एक आदर्श कहानी है, जिसमें रिश्तों को सम्मान दिया गया है। समाज में ऐसे लोग बहुत ही कम मिलते हैं। पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता एवं पवित्रता बनाए रखने के लिए ऐसे स्वछंद विचारधारा वाले लोगों की आवश्यकता होती है। कथाकार का चिंतन एक आदर्शवादी समाज बनाने का है।

'मुस्कान के लिए' कहानी में दीपा अपने पिता से परेशान हो कर आत्महत्या करने के लिए फांसी का फंदा लगाने वाली होती है कि उसका स्कूल का साथी व प्रेमी रंजन वहाँ पहुँच जाता है और उसे बचा लेता है।वह आप बीती रंजन को सुनाती है तो वह दीपा को समझाता है और दीपा को लेकर एस एस पी अग्निहोत्री के पास पहुँचता है। अगले सुवह ही दीपा के दुराचारी पिता को गिरफ्तार कर लिया जाता है। एस एस पी खुद गवाही दे कर दीपा और रंजन की शादी करा देता है। इस प्रकार दोनों के चहरे पर मुस्कराहट आती है। कथाकार ने समाज में व्याप्त अपनों के द्वारा अपनों पर अत्याचार के कारण होने वाली आत्महत्याओं पर अंकुश लगाने का रास्ता सुझाया है जिससे एक आदर्श परिवार एवं समाज की स्थापना हो सकेगी। पारिवारिक अत्याचारों से मुक्ति मिल सकेगी।

'तपस्या' कहानी में कहानीकार ने एक ऐसी लड़की का वर्णन किया है जिसने अपने जीवन में कठिन तपस्या कर तीन छोटी बहनों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाया है।वह लड़की है मीनू। जब उसके माँ-बाबा चार पुत्रियों मीनू,सुमन, कुसुम और सरोज को घर सोते हुए छोड़ कर चले जाते हैं।वह अपनी छोटी बहनों के प्रति पूरी जिम्मेदारी निभाती है। अपनी पढ़ाई छोड़ देती है। उसका एक भाई भी है जो गाँव छोड़कर शहर में किराए के मकान में पत्नी के साथ रहता है।उसे परिवार से कोई ताल्लुक नहीं है। मीनू के प्रयासों से दो बहिनें शहर में पढ़ाई के लिए होस्टल में रहती है।सुमन आई पी एस में सलेक्ट हो जाती है और ट्रैनिंग के लिए चली जाती है। पड़ोस का एक लड़का सूरज उसका दोस्त है जो उसे बहुत प्यार करता है। उसका भी फारेस्ट आफीसर के पद के लिए सलैक्सन हो जाता है।वह एक महीने की ट्रेनिंग पर चला जाता है। मीनू अकेले रहने लगती है। इसी बीच एक रात को गाँव का ही भीकम कर्ज की धमकी देकर उसे जबरन उठा ले जाता है और दाता के आश्रम में पहुँचा देता है। सूरज और सुमन ट्रेनिंग से लौटते हैं। पुलिस की मदद से दाता के आश्रम पर छापा मारकर पैंतीस लड़कियों को आजाद कराने में कामयाब हो जाते हैं।डी एस पी आफिस में सुमन और मीनू होती हैं, वही पर सूरज आ जाता है। सुमन मीनू की शादी सूरज के साथ करा देती है। इस प्रकार कहानी का अंत जटिल परिस्थितियों के बाबजूद सुखद होता है। मीनू की तपस्या सफल हो जाती है। कहानी वर्तमान कलेवर में यथार्थ लगती है। कथाकार ने समाज में फैली घिनौनी विकृतियों पर चिंतन किया है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की चेतावनी भी दी है। कहानी का कथानक सुखांत और सार्थक है।

'वो लड़की' कहानी स्वयं कहानीकार से संबंधित प्रतीत होती है। यह एक प्रेम के अजीब रिश्ते की डोर की कहानी है। इसमें लेखक ने स्वयं अपना यथार्थ अनुभव व्यक्त किया है। रजनी नाम की लड़की से छह साल पहले मुलाकात हुई थी वह रावतभाटा की रहने वाली थी। कथाकार अपने खास मित्र ललित की बहिन की शादी में जयपुर जाते हैं। वहाँ एक फाइव स्टार होटल में शादी होती है। वहीं वह लड़की रजनी अपने पति राघव का लेखक से परिचय कराती हैं। वह भी कथाकार आचार्य नीरज शास्त्री जी को पहचान लेते हैं और पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं तथा उन्हें अपने साथ अपने घर ले जाते हैं जहाँ वे पति- पत्नी आलीशान बंगले में रहते हैं। रजनी लेखक की बहुत आवभगत करती है। सोते समय वह अतीत में चले जाते हैं जब रजनी के पिता रजनी के रिश्ते के लिए कहानीकार के मित्र अनुराग के साले शिशिर को देखने उनके घर आये थे। तब उन्होंने घर आने की जिद की थी। रजनी के जन्मदिन पर लेखक रावतभाटा पहुँचे थे। रजनी ने उनकी आदर के साथ अच्छी आवभगत की थी। पैंतीस लाख की मांग होने से शिशिर से रजनी का रिश्ता नहीं हो पाया था। पुनः वे जब छह साल बाद रजनी से मिलते हैं तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है। यह लेखक के साथ घटित मार्मिक कहानी पाठक को भावविभोर कर देती है शैली बहुत ही रुचिकर है।

इस प्रकार 'मुस्कान के लिए' संग्रह में कुल सोलह कहानियाँ है। सभी एक से बढ़कर एक उच्च स्तरीय कथानक एवं चरित्र चित्रण से युक्त हैं।शीर्षक सार्थक हैं। सरल भाषा में लिखी ये कहानियाँ स्थान- परिस्थितियों एवं देश-काल,वातावरण के आधार पर भी श्रेष्ठ हैं। सभी कहानियों के उद्देश्य वर्तमान समाज की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर घर- घर की कहानी में परिलक्षित विद्रूपताओं को दूर करने की कोशिश नजर आती है। कहीं कहीं मुहावरे व लोकोक्तियों का भी यथा स्थान समुचित प्रयोग हुआ है। सभी कहानियाँ वर्तमान परिदृश्य में प्रेरणादायक, ज्ञानवर्धक व सामाजिक परिवर्तन की मिसाल हैं। कथाकार की सभी कहानियों में आत्म चिंतन है। सामाजिक क्रांति के लिए क्रांतिकारी कहानीकार आचार्य नीरज शास्त्री की लेखनी निरंतर व्यक्ति, परिवार,समाज एवं राष्ट्र के हित में चलती रहे। इसी प्रकार अन्य कहानी संग्रह भी हिंदी साहित्य के भंडार में श्री वृद्धि करें तथा लेखक का भविष्य उज्ज्वल हो,ऐसी शुभ कामनाएँ करता हूँ।

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राम सिंह 'साद'
88, प्रभुनगर, लाजपत नगर, एन. एच-2, मथुरा 201004
चलभाष: 97600 35037


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