बाल साहित्य समालोचना की एक उत्कृष्ट पुस्तक: बाल साहित्य विमर्श

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक: बाल साहित्य विमर्श (बाल समालोचना संग्रह) 
लेखक: देवी प्रसाद गौड़
आईएसबीएन: 978-93-91454-80-7
प्रकाशक: जवाहर पुस्तकालय, मथुरा
प्रकाशन वर्ष: 2023 
मूल्य: ₹ 250 रुपये 
पृष्ठ: 80 

किसी भी राष्ट्र का सुदृढ़़ होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसके भावी कर्णधार यानि उस देश के बच्चे कितने सुसंस्कारित हैं। 
बच्चे चूंकि कुम्हार के चाक पर रखी मिट्टी के लौदे सरीखे होते हैं, कुम्हार अपने चाक को घुमाकर, अपने हाथ के सहारे से उस मिट्टी को जो रूप देना चाहता है, दे देता है, उसी प्रकार बच्चें के भोले और निर्दोष मन पर हम जो इबारत लिखना चाहें, सहज ही लिख सकते हैं यानि बच्चे के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक सर्वांगीण विकास के लिए उसे बचपन से ही सुसंस्कारित करना परम आवश्यक होता है। इसके लिए माता-पिता, शिक्षक और बाल साहित्य की भूमिका अहम् होती है।
दिनेश पाठक ‘शशि’
वर्तमान अतिभौतिकतावादी इस युग में एकल परिवारों में विभक्त होते जा रहे परिवार, बच्चों को नाना-नानी और बाबा-दादी के संरक्षण और सहज ही चरित्र निर्माण के कार्य से उनको वंचित कर रहे हैं। शिक्षक भी कॉन्वेंट संस्कृति के दबाव में बच्चों को पूर्णरूपेण वे संस्कार देने में अक्षम हो रहे हैं जो उनके द्वारा दिए जाने चाहिए। ऐसे में बाल साहित्यकार का दायित्व  महत्वपूर्ण हो जाता हैं।
साहित्य, संगीत और कला से हीन प्राणी पूंछहीन पशु जैसा कहा गया है। इसका आशय यही है कि साहित्य, संगीत और कला मनुष्य को संवेदनशील, भावुक और राष्ट्र के प्रति सजग बनाते हैं। और इसके लिए बाल्यावस्था से ही बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
बाल साहित्य कैसा लिखा जाना चाहिए? इसके लिए समय-समय पर बाल साहित्य लेखन पर विमर्श होना महत्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि बाल्यावस्था ही वह सीढ़ी है जो मनुष्य के पूरे जीवन का निर्धारण करती हैं। 
बाल साहित्य और प्रौढ़ साहित्य दोनों की ही विविध विधाओं में अपनी लेखनी से साधिकार लेखन कर, अनेक पुस्तकों का सृजन करके हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि करने वाले, वरिष्ठ साहित्यकार श्री देवीप्रसाद गौड़ जी ने पूरे मनोयोग से निरन्तरता बनाये हुए, लगनशील एवं आगे बढ़ते जाने की उत्कट अभिलाषा के साथ ‘बाल साहित्य विमर्श’ पुस्तक का सृजन किया है।

पुस्तक में बाल विमर्श सम्बन्धी सात आलेख समाहित किए गये हैं। प्रथम आलेख -‘बाल साहित्य और पर्यावरण’ में श्री देवी प्रसाद गौड़ ने बाल मन को पर्यावरण के प्रति सचेत एवं आकर्षित करने वाले साहित्य की पक्षधरता की है। वह ऐसे बाल साहित्य की अपेक्षा करते हैं जो बच्चों को बृक्षारोपण, घर-परिवार और मौहल्ला-पड़ोस, नदी-नाले आदि के साथ-साथ स्वयं की स्वच्छता की ओर भी उन्मुख करे-
“पर्यावरण को दूषित करने वाला कोई और नहीं क्षुद्र स्वार्थवश इन वृक्षों को काटकर हम स्वयं ही अपनी कब्र खोदने में लगे हैं।“ (पृष्ठ 17)

ऐसी विकट स्थिति में बाल साहित्य की भूमिका एक विचारणीय प्रश्न है। बच्चों को इन सब विसंगतियों के सम्भावित समाधान के लिए जागरूक करते हुए दूषित र्प्यावरण से उत्पन्न संकट कालीन परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए तैयार भी करना चाहिए। (पृष्ठ 22)

दूसरा आलेख-‘आधुनिक बाल साहित्य में सांस्कृतिक परिवेश’ है जिसमें श्री देवी प्रसाद गौड़ जी ने संयुक्त परिवारों एवं अपनी संस्कृति से जुड़ाव के लाभ, बताते हुए एक राष्ट्रहित में इन्हें आवश्यक बतलाया है। वह अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के उन्नयन की बात को बाल साहित्य में समाहित करने की पैरोकारी करते हुए कहते हैं -
“हर प्रकार से मंगल करने वाली अपनी संस्कृति के मर्म को न समझ कर विदेशी संस्कृति से प्रभावित हो जाना, गंगाजल छोड़ किसी ऐसे प्रदूषित तालाव का पानी पीने जैसा है जिसे पीकर बीमार होना प्रायः निश्चित है।“ (पृष्ठ 26)
तीसरे आलेख में विद्वान लेखक ने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए स्वच्छता के महत्व को प्रतिपादित करते हुए बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों में जागरूकता उत्पन्न करने का आह्वान किया है।
बाल मनोविज्ञान को समझे बिना लिखा हुआ साहित्य अनुपयोगी,नीरस एवं बच्चों को उपदेशों की घुट्टी पिलाने जैसा ही होगा अतः एक बाल साहित्यकार को बच्चों के मनोविज्ञान को भली भाँति समझकर ही बाल साहित्य की रचना करनी चाहिए तभी उसका लेखन सार्थक लेखन होगा। इसी बात की पुष्टि करता हुआ है पुस्तक का अगला आलेख जिसका शीर्षक है-‘वर्तमान बाल साहित्य और बाल मनोविज्ञान-
“बाल्यकालीन वृत्ति और रुचियों का अध्ययन कर, तदनुसार विषयवस्तु को परोसना ही बाल साहित्य के उद्देश्यों की सफलता का द्योतक होगा। बाल साहित्यकार की अपनी बाल मनोवैज्ञानिक समझ ही बच्चे में सद्गुणों को स्थापित कर विकास की प्रिߠया में सहयोगी बनती है।“ (पृष्ठ 45)

अगले आलेख में बाल साहित्य में पारिवारिक-सामाजिक संस्कारों के समावेश को अति आवश्यक बताते हुए बच्चे की नियमित दिनचर्या को महत्वपूर्ण बतलाया है। वह रामचरित मानस का उद्धरण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं-
प्रातकाल उठि कैं रघुनाथा
मातु-पिता, गुरु नावहि माथा।
पुस्तक बाल साहित्य विमर्श का छठवाँ आलेख-‘आधुनिक बाल साहित्य में राष्ट्रीय चेतना’ बहुत ही महत्वपूर्ण आलेख है। बाल मनोवैज्ञानियों का ऐसा मानना है कि बालक के अन्दर सब कुछ निहित है, बाल साहित्य के माध्यम से आपको उसके भावों को उकेरने की आवश्यकता है। देवी प्रसाद गौड़ जी ने भी इस आलेख के माध्यम से यही विमर्श प्रस्तुत किया है-
“राष्ट्रीयता से तात्पर्य केवल सेना में भर्ती होकर सीमा पर युद्ध करने से ही नहीं है अपितु व्यवहारिक जीवन के उन सभी घटकों के प्रति बच्चे में विश्वास स्थापित करने से है जिनसे देश का विकास और मान मर्यादा प्रभावित होती है।“ (पृष्ठ 65)

सातवाँ आलेख हिन्दी की पक्षधरता करते हुए बाल कविताओं में हिन्दी के अधिकाधिक प्रयोग द्वारा राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित करता है-
“बच्चों के लिए हिन्दी की विभिन्न प्रतियोगिताएँ, अंत्याक्षरी, निबन्ध आदि आवश्यक रूप् से आयोजित कराई जायें। बच्चों को हिन्दी के लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए और भी नये-नये प्रयोग किए जा सकते हैं।“ (पृष्ठ 79)
वरिष्ठ साहित्यकार श्री देवी प्रसाद गौड़ ने इस पुस्तक में समाहित सभी आलेखों के माध्यम से जिन-जिन विषयों पर विमर्श किया है वह महत्वपूर्ण है। निश्चित ही बाल साहित्यकार इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे। पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

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