प्रवासी महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में बच्चे (इक्कीसवीं शती के संदर्भ में)

मधु संधु

मधु संधु

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिन्दी विभाग,गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।

                जीवन की चार अवस्थाएँ मानी गई हैं- बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था। एक मास तक बच्चे को नवजात कहते हैं। एक मास से तीन साल/ आठ वर्ष तक वह शिशु कहलाता है और किशोरावस्था से युवावस्था तक पहुँचने तक(18) उसे बच्चा ही माना जाता है। बचपन जीवन का प्रथम चरण है। जीवन का स्वर्णिम काल है। यह शारीरिक और बौद्धिक विकास का काल है। चिंता और तनाव से बचपन मुक्त होता है। इसी समय भविष्य को आकार मिलता है। नैतिक और सामाजिक चरित्र का विकास होता है। संतान के लिए भी बच्चा शब्द ही प्रयुक्त होता है। भोले और सीधे मनुष्य के लिए बच्चा व्यंजनात्मक शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है।

            अजन्मे बच्चे के प्रति ही माँ के अंदर असंख्य संवेदनाएं, लगाव, सुरक्षा भाव उमड़ता रहता है। यह सामान्य और प्राकृतिक मन:स्थिति है। उषा प्रिंयंवदा के भया कबीर उदास[1] में अजन्मे बच्चे के प्रति कैंसर पीड़ित माँ की संवेदनाएँ हैं। उपन्यास की पैंतीस वर्षीय लिली कैंसर से जूझ रही है। सर्जरी से पहले जीवन के दैहिक सुखों को जीने की आकांक्षा लिए तीन दिन के लिए अपने एक विद्यार्थी रघु के पिता शैषेद्र राय के संपर्क में आती है। यह एक ऐसा हल्का-फुल्का आवेग और उमंग भरा रोमांस है, जिसका संबंध न स्मृति से है, न भविष्य से, न वायदों से। फिर भी उपचार/ कीमो के समय पेट में पल रहे बच्चे को मारने में उसे मानसिक स्र पर बहुत कष्ट होता है।

            माँ बाप के अवैध कृत्य/ सम्बन्धों, नाजायज संसर्ग से जन्म लेने वाला बच्चा जीवन भर अवैध होने का तमगा झेलने के लिए अभिशप्त है, जबकि उसका तो कोई दोष नहीं। नैतिक मान्यताएँ माँ को अपनी बायलोजिकल संतान से दूर कर देती हैं और भारत ही नही, पश्चिमी देशों में भी अवैध संतान के हिस्से में लांछित जीवन ही आता है। ऐसे संदर्भ हमें इक्कीसवीं शती की प्रवासी महिला उपन्यासकारों की रचनाओं में मिलते हैं। उषा प्रिंयंवदा के नदी[2] उपन्यास की कहानी विदेश/ बोस्टन की धरती पर तीन बच्चों और तुनकमिजाज पति के साथ लगभग सामान्य जीवन जी रही, अपने को परिवार का केन्द्र बिन्दु मान रही उस आकाशगंगा की है, जिसके पाँच वर्षीय बेटे भविष्य की ल्यूकीमिया से मृत्यु हो जाती है। क्योंकि गंगा के दो भाइयों की भी ल्यूकीमिया से मृत्यु हुई थी, इसलिए पति सारा दोष गंगा के दूषित रक्त पर मढ़, उसे पीड़ा, आत्म लांछना, अपराध भावना से भर, उससे मुक्त होने या दंड देने के रास्ते पर चल पड़ता है। पति डॉ. गगनेन्द्र बिहारी सिन्हा मकान बेच, सामान समेत, नौ और सात वर्षीय दोनों बेटियों सपना और झरना को ले भारत चला आता है। पासपोर्ट, वीज़ा, गहने, रुपए पैसे- सब कुछ सहेज और उस ठंडे, पराये, गैर भाषाई देश में उसकी झोली में अपराधी जीवन डाल उसे नि:सहाय सी छोड़ देता है। यहाँ पिता का पुत्र प्रेम माँ के जीवन को वीभत्स बना रहा है। प्रिय पुत्र को माँ ने भी पल- पल मरते देखा है। वह भी बुरी तरह टूटी हुई, थकी हुई और हताश है। भारत आने पर बेटियों का प्यार उसे मोह लेता हैं। लेकिन उसके गर्भ में पल रहा एरिक एरिक्सन का अवैध अंश गंगा को रास्ता बदलने के लिए विवश करता है। वह स्टीवेन को जन्म देती है। वह उसका बायलोजिकल पुत्र है। विवाह की पवित्रता, दांपत्यगत मूल्यवत्ता, भारतीय मानसिकता से जुड़ी है। इसी के कारण गंगा अपने देश से विस्थापित होती है। इसी के कारण उसे चाहते हुये भी बेटा स्टीवेन डॉ. कैथरीन बसबी को देना पड़ता है। स्पष्ट है कि अवैध गोरे बच्चे को सिन्हा अपनाएगा और प्रवीण जी। नियति देखो ! जिस बच्चे के कारण उसने अपनी बेटियों को छोड़ा, उसी को किसी का दत्तक बनाना पड़ा ।

            स्वदेश राणा के उपन्यास कोठेवाली[3] में ताहिरा नायक बदरीलाल और गजल गायिका बिनब्याही बदरूनिस्सा की अवैध संतान है। विभाजन के समय भारत आ रहे बदरीलाल रास्ते के खून- खराबे में और बदरूनिस्सा प्रसव वेदना दम तोड़ देते है। मौसी जाहिदा सतमाही बच्ची का पालन- पोषण करती है। ताहिरा अद्भुत सुंदरी है। उसके सौंदर्य का वर्णन करते स्वदेश राणा लिखती हैं-

             ताहिरा एक हुनरमंद कहारिन के पुश्तैनी ओसारे से तपकर निकला बेशकीमती तोहफा है। गूँधती माटी में सर का एक छोटा सा बाल भी रह गया होता तो तोहफे में खोट रह जाता। किसी खानदानी ललारी के सधे हुये हाथों से रंगा सतलहरिया दुपट्टा है ताहिरा। ...गौरी चिट्टी ताहिरा, भूरी नीली आँखों वाली ताहिरा, घनी पलकों और घुँघराले बालों वाली ताहिरा, नाज़ुक अंगुलियों और नर्म हाथ पैरों वाली ताहिरा....[4]

            इस सौंदर्य पर रीझ स्वेच्छा से ताहिरा से शादी करने के वावजूद करन कभी भूल नहीं पाता कि जिससे उसने शादी की वह ताहिरा नहीं, वह सिर्फ बदरूनिस्सा की बेटी है, अवैध संतान है, क्योंकि बदरीलाल बदरूनिस्सा का मुरीद तो था पर पति नहीं। पति करन भारत या लंदन, देश या विदेश कहीं भी उसे सामान्य जीवन, पत्नी का सम्मान नहीं देता।

            अर्चना पेन्यूली वेयर डू आई बिलांग[5] में कहती हैं कि यूरोप में भी अवैध बच्चों को हरामी ही मानते हैं। सुरेश लिंडा से शादी इसी धब्बे से अपनी संतान को बचाने के लिए करता है। वह बात अलग है कि तलाक के बाद वह अतुल विपुल का वीक एंड फादर बनकर रह जाता है।

            तलाक, पुनर्विवाह भले ही उस जीवन का सहज अनिवार्य अंग हों, लेकिन इस की वेदना बच्चे भी झेलते हैं। जिसे पश्चिम में सिंगल पेयरेंट कहते हैं, भारत में उसे टूटा हुआ घर कहते हैं। टूटे घर का असर ही है कि अर्चना पेन्यूली के उपन्यास पॉल की तीर्थ यात्रा[6] की करीना, जोहाना मानसिक रूप से अस्त-व्यस्त हैं। उनके व्यवहार में उद्दंडता, हठ, आक्रामकता, विद्रोह, अभद्रता, क्रोध, चिल्लाहट, अशिष्टता जैसी बातें समाई हैं। क्योंकि माँ नीना के दूसरे पति यानी हैफ़ फादर पॉल को वे पिता कैसे स्वीकार लें। चुन्नौती यह नहीं कि सौतेले माँ- बाप बच्चों को अपनाएं, चुन्नौती यह है कि बच्चे उन्हें स्वीकार करते हैं या नहीं। करीना तो समय रहते संभल जाती है, पढ़ाई, कैरियर, शादी, बच्चे सब समय पर हो गए, लेकिन जोहाना के अन्तर्मन में बैठ गया कि तीन पुरुषों में से कोई भी उसकी माँ को समझ नहीं पाया और वह लेस्वियंस वृति की ओर झुकने लगती है।

            ऐसी ही एक स्थिति अर्चना पेन्यूली के कैराली मसाज पार्लर[7] में मिलती है। एक- दो- तीन- चार शादियाँ करने वाली स्त्री की समस्याएँ और संघर्ष कहीं दुष्कर है। समाज और परिवार में स्थिति भी सामान्य नहीं रहती। अपनों के साथ ही उसे बार- बार नीम की पत्तियाँ चबानी पड़ती हैं। पति बदलने के साथ- साथ जीवन भी बदल जाता है। अपनी खुशी की तलाश में भटक रही स्त्री नैतिकता के मुखौटे नहीं लगा सकती। नियति ने नैन्सी को द्रोपदी का दूसरा संस्कारण बना दिया। नैन्सी यह भी भूल जाती है कि उसके बेटों की खुशी क्या है। वह कैनेडा जोशुआ के पास आती है, पर महसूसती है कि बेटा उसके पास होकर भी कितनी दूर है। अपने बेटों ने भी उसे कोसने से नहीं बख्शा। जोशुआ अकसर गुनगुनाता रहता है, जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग- - - एक चेहरे पर कई चेहरे चढ़ा लेते है लोग। जोशुआ के लिए कभी लार्स और कभी मार्को- सौतेले पिताओं को माँ के घर में झेलना काफी कठिन है। पापा का अपनी गर्ल्स और दारू में मस्त रहने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि किसी औरत को सौतेली माँ बना वे उसके घर नहीं लाये और बेटे के संरक्षण के प्रति वे अपना पूरा उत्तरदायित्व निभा रहे हैं। छोटा बेटा नील भी माँ के पास नहीं पिता मार्को के पास रहना पसंद करता है। जबकि माँ की स्थिति यह है- कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है। हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है।

 सम्बन्धों के धरातल पर भारतीय और अमेरिकी मानसिकता में भी बहुत अंतर है। सुधा ओम ढींगरा अपने उपन्यास दृश्य से अदृश्य तक[8] में तुलनात्मक अध्ययन करती कहती है कि डनीस और रॉबर्ट अस्सी की उम्र में भी बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते और सम्पदा बच्चों के बिना बहुत अकेलापन महसूस करती है। अमेरिकी पैरेंट्स भारतीयों की तरह बच्चों को बुढापे का सहारा नहीं समझते, अपनी ज़िंदगी को भरपूर जीते हैं और बच्चों को भी उनकी इच्छानुसार जीने का समय और अवसर देते हैं। शादी, मृत्यु, थैंक्स गिविंग और क्रिसमस पर सारा परिवार इकट्ठा होता है।[9]

            अर्चना पेन्यूली के पॉल की तीर्थयात्रा[10] में उस पाश्चात्य संस्कृति की अत्याधुनिक संतान है, जहां बेटियाँ खुद पिता से दूसरी शादी के लिए कहती हैं- ममी ने भी दूसरी शादी कर ली। मगर आप अभी तक अकेले हो तो हमें अच्छा नहीं लगता। [11] भले ही लूसी और ग्रेसी स्वयं भी विरोधाभासों में जी रही हैं। इस कानूनी अस्थायीपन/ टूटन ने रिश्तों को एक नया कड़वा कसैला नाम दिया है- सौतेला पिता, सौतेली माँ, सौतेले भाई-बहन ।

             हंसा दीप का उपन्यास बंद मुट्ठी[12] कहता है कि संतान से जुड़े खून के रिश्ते से दिल का रिश्ता कहीं मज़बूत होता है। उपन्यास का आरम्भ गोद ली बेटी रिया की 16वीं वर्षगांठ की पूर्वरात्रि से होता है। बहुत पहले तान्या और सैम ने निर्णय लिया था कि रिया के 16वें जन्मदिन पर बता देंगे कि वह कोखजाई नहीं, गोद ली बेटी है। यह रिश्ता खून का नहीं, दिल का है और सचमुच सब के दिल परस्पर जुड़े हुये हैं। हंसा दीप बताती हैं कि बच्चा गोद लेने के लिए भी युगल को ढेरों आर्थिक और कानूनी मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। भारत में तो प्रवासी भारतीयों और विदेशियों के लिए सेरोगेसी निषिद्ध है। केनेडा के अपने नियम हैं। चीन से बच्चा गोद लिया जा सकता है, लेकिन कागजी कार्यवाही में ही तीन-चार वर्ष का समय लग जाता है। आवेदन पत्र, संदर्भ पत्र, रिफ्रेन्स पत्र, साक्षात्कार, निरीक्षण- परीक्षण, आय, रख- रखाव, पासपोर्ट वीज़ा, कस्टम, भाषा, सैंकड़ों जानकारियाँ चाहिए। एडाप्शन और उससे पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए तान्या- सैम के हजारों डॉलर लग जाते हैं। बैंक से, क्रेडिट कार्ड से लिए लोन की रकम भी काफी हो जाती है।

            निम्न वर्ग से उच्च वर्ग में छलांग लगाने वाले संघर्षशील बच्चे का वर्णन हंसा दीप के उपन्यास कुबेर[13] में मिलता है। कुबेर एक निहायत गरीब, ग्रामीण बालक द्वारा अपने आत्मबल, लगन, तन्मयता, दृढ़ इच्छा शक्ति, कठिन परिश्रम और योग्यता से धन्नू से डी. पी. और डी. पी. से डी. पी. सर और डी. पी. सर से कुबेर बन जाने की कथा है। शिक्षिका और बापू की मार तथा भूख उसे शहर जाने वाली सड़क पर ला खड़ा कर देती है। एक गुस्सा है, जो बालक को चैन से बैठने नहीं देता- नेता जी पर, बहन जी पर, माँ-बापू की मजबूरी पर। यही आग उसे गाँव के जर्जर रहन- सहन से ऊपर उठा गुप्ता जी के ढाबे में भर-पेट भोजन तक पहुंचाती है और यही आग उसे जीवन ज्योत के अभिजात जीवन की ओर ले जाती है। यही आग गुरूभाई जॉन के यहाँ अमेरिका रहकर जीवन ज्योत, बच्चों, गाँव आदि के लिए नए द्वार खोलने को उकसाती है। व्यक्ति कहीं भी चला जाये, वह अपनी धरती और अपने लोगों को भूल नहीं सकता। मातृभूमि उसके लिए विटामित है। वह अमेरिका में होकर भी अपने गाँव, अपने ग्रामीण भाई- बंधुयों के विषय में ही सोचता है। वह अपने गाँव का नाम कुबेर रखता है। वहाँ के स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन- सब को कुबेर से जोड़ लेता है। कभी कापी- पैन्सिल के लिए पैसे मांगने पर माँ ने डांटा था, कुबेर का खजाना नहीं है मेरे पास। और आज वह एक नहीं अनेक कुबेर खड़े कर देता है।

       अनिल प्रभा कुमार सितारों में सूराख[14] में कहती हैं कि अमेरिका की बंदूक संस्कृति ने बच्चों को असामान्य रूप से संत्रस्त कर रखा है। शिक्षण संस्थानों पर बंदूकों से हमले आम बात है। विद्यार्थियों को बचाव का प्रशिक्षण दिया होता है। फायर अलार्म सुनते ही फुर्ती से छिपना/ अदृश्य होना होता है- अलमारियों के अंदर, मेजों- डेस्कों के नीचे। गोलियों की आवाजें, घायल साथी, खून की धाराएँ, धुआं, चीत्कार, लाशें, खौफ, सिसकियाँ, पथराई आँखें, तनाव- मृत्यु से यह सीधा साक्षात्कार है। चिन्नी के स्कूल पर भी ऐसा ही हमला होता है। सत्रह विद्यार्थी अध्यापक मारे जाते हैं। समीर की हत्या इस किशोर बिन ब्याही बच्ची को वैधव्य सा दर्द दे जाती है। साथ की सीट वाला छात्र जब नहीं रहता, तो कैसा लगता है। डैनी की बहन ओब्री मारी जाती है। दहशत का अजगर दिल- दिमाग पर रेंगता है। चर्च के बाहर गोलियों की बौछार, कैसीनो में गोलाबारी, सबवे में लूट- पाट और हत्याएं, अश्वेतों या मैक्सिकन मूल के लोगों की हत्या। पराये देश में जब अपने गोलियों के शिकार हो जाते हैं, तो कितना बेगानापन, फालतूपन महसूस होता है। कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है- कैलिफोर्निया, टैक्सास, ओहाओ, इलीनायस, फ्लॉरिडा, लासवेगन, ओरलेन्डो।

       माँ -बाप वयस्क संतान भी बच्चा ही कहते- मानते है और बहुत बार संवेदनशील कर्तव्य सजग बच्चे अभिभावक भी बन जाते हैं । नीना पॉल का उपन्यास कुछ गाँव गाँव, कुछ शहर शहर[15] में ऐसी ही स्थिति हमें मिलती है। पश्चिम में भी स्नेह सम्बन्ध भावनाओं से ओत– प्रोत हैं। लिंडा अपनी पढ़ाई छोड़ यूनिवर्सिटी से माँ के पास इसलिए आ जाती है क्योंकि उसकी सिंगल पेरेंट माँ को भावात्मक स्तर पर बेटी की जरूरत है। माँ तलाक़शुदा है, तलाक वहाँ भी असहज स्थिति है और माँ डिप्रेशन में चली जाती है।

            स्वदेश राणा के कोठेवाली में भी माएँ बच्चों में संरक्षण खोज रही हैं। यहाँ बदरीलाल और उसकी विवाहिता पत्नी चांदरानी के दो बेटे हैं - इकबाल गोपाल। परस्त्रीगामी पति के बावजूद चांदरानी सोचती है कि बेटों की माँ कभी अकेली नहीं होती। फिर भी कैंसर उसे लील जाता है।

            बच्चों चाहे कितनी भी दूर हों, पेयरेंट्स के दिल के आस- पास ही रहते हैं। अर्चना पेन्यूली के पॉल की तीर्थ यात्रा का पॉल नितांत अकेला होकर भी बेटियों की उपस्थिति महसूसता रहता है। किचन की गोल मेज बेटी लूसी ने ऑन-लाइन खरीद कर दी। मात्र दोनों बेटियों की तस्वीर खींच कर उसने अपने खरीदे फ्रेम में लगाई है। घर जो मन में एक साकारात्मक अनुभूति देता है, घर जो मंदिर की तरह होता है, घर जिसे माय स्वीट होम कहते हैं, उसे वही कभी नसीब नहीं होता, हाँ! बेटियों का आना अवश्य ताज़े हवा के झोंके सा लगता है।

            बच्चों का प्रवास माता- पिता ही नहीं बच्चों को भी नितांत अकेला- असहाय कर जाता है। हंसा दीप के केसरिया बालम[16] में इकलौती बेटी को विदेश भेजते वक्त यही सोचा गया था कि टेक्नोलोजी ने हर दूरी पाट दी है। रोज़ बेटी के साथ बात भी हो जाती थी। नवासिन को भी देख लिया जाता था, लेकिन न माँ बेटी की जचकी पर पहुँच सकी और न बेटी अस्वस्थ, मरणासन्न पिता के लिए कुछ कर सकी।

                  माता पिता का कर्तव्य है कि बच्चों को स्वतन्त्रता देने से पहले उन्हें सही मूल्य दें एडवेंचर और मस्ती तो इस आयु से जुड़ी ही रहती है। तब गलत और सही की न पहचान होती है, न चिंता। कादंबरी मेहरा के उपन्यास निष्प्राण गवाह[17] की कहानी मेयरहैम शहर से तीस- चालीस मील दूर के गाँव लिटिल डाल्टन के टू स्ट्रैग्स एक पब की है, जिसमें वीकएंड पार्टियों के लिए एक बड़ा हाल है। बाद में यहीं माइकल विलियम्स डांस क्लब खोलता है। दोपहर दो से चार तक स्कूली बच्चे बंक मार पब में डिस्को के लिए आते हैं और ड्रग्स का शिकार बनते हैं। यहाँ जुआ और कैसीनो भी चलता है।

                  प्रवासी महिला उपन्यासकारों ने बच्चों के अनेक रूप दिये हैं। यहाँ साहसी बच्चे भी हैं, दुस्साहसी भी, कर्मण्य और कर्त्तव्य सजग भी। अजन्मे बच्चे के प्रति माँ की संवेदनाएँ भी हैं और बच्चे की असमय मृत्यु न झेल पाने वाले पिता भी तथा बच्चा गोद लेने की कठिन प्रक्रिया से गुजर रहे माता- पिता भी। बच्चों से बचपन छीन लेने वाले दुख भी कुछ कम नहीं। अवैध होने के दुख, माता- पिता के स्थान पर हैफ़ फादर या हैफ़ मदर को स्वीकारने की विवशता के दुख, बंदूक संस्कृति के संत्रस्त और असुरक्षित जीवन के दुख। नितांत अकेले पैरेंट्स के मन के आसपास बच्चे संजीवनी बूटी की तरह रहते हैं। त्रासदी है कि बच्चे जब प्रवास को स्थायी आवास बना लेते हैं, तो जीवन के सुख- दुख में कोई एक- दूसरे के साथ नहीं होता। बच्चों को लेकर भारतीय मानसिकता जहां उन्हें पल-पल अपने से अनुस्यूत देखना चाहती है, वहीं पाश्चात्य मानसिकता उन्हें छूट देने के पक्ष में है।

 

संदर्भ:

1. उषा प्रिंयंवदा, भया कबीर उदास, राजकमल, दिल्ली-7, 2007  
2. वही, नदी, राजकमल, दिल्ली, 2014 
3. स्वदेश राणा, कोठेवाली, अभिव्यक्ति, www.abhivyakti-hindi.org
4. वही 
5. अर्चना पेन्यूली, वेयर डू आई बिलांग, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2010
6. वही, पॉल की तीर्थयात्रा, राजपाल एंड संस, दिल्ली, 2016  
7.  अर्चना पेन्यूली, कैराली मसाज पार्लर, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 2020
8. सुधा ओम ढींगरा, नक्काशीदार केबिनेट, शिवना, सीहोर, 2016
9. वही, पृष्ठ 13
10. अर्चना पेन्यूली, पॉल की तीर्थयात्रा, राजपाल एंड संस, दिल्ली, 2016  
11. वही, पृष्ठ, 46  
12. हंसा दीप, बंदमुट्ठी, शिवना, सीहोर, मध्य प्रदेश, 2017
13. वही, कुबेर, शिवना, सीहोर, मध्य प्रदेश, 2019
14. अनिलप्रभा कुमार, सितारों में सूराख, भावना प्रकाशन, दिल्ली- 91, 2021
15. नीना पॉल, hindsamay.com
16. हंसा दीप, केसरिया बालम, मातृभारती, जुलाई 2020
17. कादंबरी मेहरा, निष्प्राण गवाह, शिवना, सीहोर, एम. पी., 2020,

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