कहानी: विदुषी दादी

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com

अंग्रेजों का जमाना था और सर्दियों के दिन थे। शाम पाँच बजे के बाद सूर्यास्त हो जाता था। आठ बजे के बाद तो रास्ते सुनसान हो जाते थे। इन दिनों ठंड इतनी बढ़ जाती थी कि बारिश के दो-चार बूँद गिरते ही दाँत किटकिटाने लगते थे। झारखंड का शिमला कहे जाने वाले हजारीबाग में अन्य जिलों की अपेक्षा कुछ अधिक ठंड थी। सूती-ऊनी गर्म कपड़ों के बावजूद कंबल-चादर की आवश्यकता होती थी। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि सुबह-सुबह झील और कैनरी हिल का चक्कर लगाने वाले भी सूर्योदय होने का इंतजार करने लगे थे। बूढ़े-बुजुर्गों ने अभिजीत को बताया था कि ऐसे ही सर्द भरे दिन में एक सुबह विदुषी दादी अपने तीन बच्चों के साथ अपने एक करीबी रिश्तेदार के यहाँ आयी थी। फिर, ऐसा दुर्योग हुआ कि वह कभी वापस नहीं गयी।
आज आधी रात के बाद अच्छी बारिश हुई थी। पूस का महीना था। वैसे भी हजारीबाग में पूस की रात ठंड के मामले में यूरोप के ठंड को भी मात देनेवाली होती है। सुबह कोहरे के कारण लोग घरों से कम निकले थे और जो निकले भी वे चाय की गुमटियों में जलते चूल्हे में हाथ सेंकते नजर आये या किसी कोने में दुबक कर गरमा-गरम चाय की चुस्कियां लेते दिखे। धूप खिलेगी भी इसका कोई अनुमान नहीं था। न्यूनतम तापमान 02 डिग्री तक पहुँच गया था। शायद आज की रात इस वर्ष की सबसे ठंढी रात थी। पिछले कई सालों से हजारीबाग में पूस के महीने में इसी तरह की ठंड और न्यूनतम तापमान रहा है। जो ठंड है, वह हाड़ कँपाने वाली है। बीते सप्ताह से ही लोग इस तरह की सिहरन महसूस कर रहे थे। दिन के दस बजते-बजते कुहरा कुछ कम होने के बाद थोड़ी देर के लिए धूप निकली भी; इसके बावजूद कनकनी में कोई कमी नहीं थी। शाम होते ही शीत-लहरी शुरू हो गयी थी और उसका आलम यह था कि आम आदमी घरों में दुबकने के लिए मजबूर हो गया था। सड़कें सुनसान हो गयीं थीं और रात आठ बजे बंद होने वाली दुकानों के शटर शाम पाँच बजे ही गिर गए थे। लगभग पंद्रह दिनों तक इसी तरह हजारीबाग और आस-पास के इलाकों में कोहरे की चादर से ढँकने का अनुमान हो गया था। हजारीबाग और आस-पास के लोग इस तरह की सर्दी के आदी थे। अभिजीत उनमें से एक था। सर्दी का मौसम आते ही पूरे क्षेत्र में एक तरह से ठंड का जलजला आ जाता था। सूखे पेड़ों की टहनियाँ काटकर पूरे इलाके में चौक-चौराहों पर अलाव जलाने की व्यवस्था की जाती थी।
गाँव में सड़क के किनारे एक जामुन का पेड़ करीब सौ-सवा सौ वर्षों से खड़ा है। अभिजीत उसी गाँव की युवा है, जहाँ यह जामुन का पेड़ है। अभिजीत की माँ उससे कहती थी कि इसे विदुषी दादी ने रोपा था। तब सड़कें इतनी चौड़ी नहीं थीं, जितनी आज है। फिर भी, एक भविष्यद्रष्टा की तरह भविष्य का अनुमान कर सड़क से सत्तर-पचहत्तर फीट की दूरी देखकर ही दादी ने इसे रोपा था। गाँव के कुछ बूढ़े-बुजुर्ग बताते थे कि दादी ने जब जामुन के इस पेड़ की रोपाई की थी तब यह सूई की तरह पतला और बीते भर का था। दादी ने समर्पित भाव से इस पेड़ को बचाया था। पेड़ की सुरक्षा-घेरे में दादी ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। इन सौ वर्षों में यह पेड़ अपनी जवानी लाँघ कर पुरनिया पेड़ का तमगा पा चुका है।
अभिजीत दादी द्वारा रोपे गए जामुन के इस पेड़ की सैकड़ों कहानियाँ सुन चुका है। गर्मियों में राहगीरों के आरामगाह से लेकर लालटेन की धुंधली और कभी-कभार पेट्रोमेक्स की भकभक रोशनी में लगे सैकड़ों चौपाल और पंचायती-निर्णयों का तो वह स्वयं साक्षी है। इसकी घनी टहनियों में लदफदाये पत्तों की छाँह में ही चौपाल लगते थे और निन्यानबे फीसदी गाँव की पंचायतें इसी जामुन की छाँव तले हुई हैं। इतना ही नहीं जामुन के छाँव तले ही गर्मी के दिनों में नजदीक में चलने वाले प्राइमरी स्कूल की कक्षाएँ भी चलती थी। मास्साब के बैठने के लिए एक लकड़ी की कुर्सी होती थी और बच्चे अपने साथ जूट की बोरी लाते थे। यह सिलसिला तबतक चला जबतक कि गाँव वालों ने श्रमदान से खपरैल स्कूल भवन नहीं बनवा दिया। तब, जामुन की छाँव में खुला विद्यालय यानी ओपन विद्यालय चलता नहीं दौड़ता था।
दादी इस गाँव की नहीं थी। पड़ोस के गाँव में उनका ससुराल और दूर के गाँव में मायका था। वह अपने उन तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ आयी थी जो अभी चार माह से लेकर चार साल के थे। दादी़ बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी। उन्हें स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली थी। पर, स्वाध्याय से उन्होंने बहुत ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह कई भाषाओं की जानकार थीं। हिन्दी, उर्दू, अरबी, संस्कृत और अंग्रेजी फर्राटे के साथ बोलती थी। संस्कृत के सैकड़ों श्लोक और उर्दू की पचासों गजलें उन्हें कंठस्थ थे। शिक्षा के प्रति उनका अद्भुत लगाव और प्रेम था। सचमुच वह एक विदुषी स्त्री थीं। दादी चाहती थीं कि उनके बच्चे खूब पढ़ें और आगे बढ़ें। इसी बात को लेकर उनकी दादा जी से अनबन हो गयी थी। दादा जी वणिक-बुद्धि के आदमी थे। वह चाहते थे कि उनके बच्चे रोजगार में लग जायें और व्यापार में उनकी सहायता करें। दादा जी के इसी सोच से उन्हें चिढ़ थी। अतः उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य की खातिर दादाजी का घर छोड़ दिया था और पड़ोस के गाँव में अपने मामाजी के यहाँ आ गयी थी। कुछ ही दिनों में अपने मधुर व्यवहार से वह गाँव भर की बुआ-काकी-मौसी आदि और समय के साथ वह सबकी प्यारी दादी हो गयी थीं। अपने उस व्यवहार से उन्होंने पूरे गाँव को अपना बना लिया था।
दादी का कद औसत से थोड़ा अधिक था। रंग गोरा और दोहड्डा बदन था। अभिजीत ने दादी को उनके चौथेपन में देखा था। चौथेपन में भी शरीर में झुर्रियां नहीं आयी थी। गठीले शरीर की स्वामिनी थी वह। दादी का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था वह हमेशा चकचक खादी की सफेद धुली साड़ी और ब्लाउज पहनती थीं। चांदी की तरह सफेद बाल दादी के सरल व्यक्तित्व को गंभीर बना देता था। उनके गंभीर व्यक्तित्व से सबके लिए स्नेह बरसता था। बच्चे उनकी एक पुकार पर ऐसे दौड़े चले आते थे जैसे धेनुओं के रंभाने पर उसके बछड़े दौड़े चले आते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को वे चावल की लोरी से बनी रोटी जिन्हें स्थानीय भाषा में छिलका कहा जाता था, बड़े प्रेम से खिलाती थीं। ऐसे समय में वह ममता की मूरत बन जाती थीं। दादी दृढ़-विश्वास, संकल्पवान और धर्मपरायण महिला थीं। पूरे गाँव में वह एकमात्र साक्षर थी। इसलिए उन दिनों गाँव-घर में आई चिट्ठियों को पढ़कर वही सुनाती थीं। इस कारण गाँव ही नहीं पूरे इलाके में उनका बड़ा सम्मान था। दादी की प्रसिद्धि इतनी थी कि दूर-दराज के लोग भी विदुषी दादी ही कहने लगे थे।
दादी के स्नेह और सुरक्षा घेरे में ही यह बीते भर का जामुन पेड़ पला-बढ़ा और छायादार बना। दादी को समीप पाकर अपने पत्तों की खिलखिलाहट से यह खुशी का इजहार कर देता था। इसकी घनी टहनियों में लदफदाये पत्ते राहगीरों को केवल छाँव ही नहीं देते थे बल्कि इसकी छाँह में गाँव की पंचायतें लगती थी जिसमें सभी तरह के छोटे-बड़े विवादों का निपटारा और सुलहनामा होता था। इतना ही नहीं रात में इसके नीचे चौपाल भी लगती थी। इस चौपाल में गाँव भर के बिना पढ़े-लिखे युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को अक्षर ज्ञान सिखाया जाता था। अक्षर-ज्ञान सीखे युवा और बुजुर्ग घर जाकर अपने-अपने घरों की स्त्रियों को भी साक्षर करने की कोशिश करते थे। दादी के बेटे और उनके कुछ ग्रामीण सहपाठी स्कूल और कॉलेज के बाद रात्रि-पाठशाला के तर्ज पर अपने ग्रामीण-बंधुओं को भी साक्षर करने की कोशिश कर रहे थे। दादी की प्रेरणा और महती भूमिका से शाम होते ही लालटेन की धुंधली रोशनी में सायंकालीन ओपेन-स्कूल जामुन की छाँव में लग जाता था।
जामुन के इस पेड़ की एक खासियत यह भी है कि इसका फल गूदेदार और स्वादिष्ट है। नाममात्र की गुठली होने के कारण आषाढ़-सावन महीने में जब यह पक जाता था, बच्चों की पूरी टोली के साथ युवा, बुजुर्ग और स्त्रियों की एक पूरी जमात जम जाती थी। जामुन का यह पेड़ तब लोकतंत्र कर घर था। अभिजीत उसी जामुन की छाँव तले खेला-कूदा और बड़ा हुआ है। जामुन की छाँव में उसने गाँव के विकास के प्रारूप को बनते और सैकडों पंचायती निर्णयों का निपटान होते देखा है। उन दिनों गाँव की प्रगति के लिए जो योजनाएं बनायी जाती थीं उन योजनाओं पर पूर्व में गाँव के सभी सदस्यों के साथ गंभीर चर्चा की जाती थी और आपसी सहमति के बाद ही उसका एक प्रारूप तैयार किया जाता था। गाँव की विभिन्न समस्याओं पर उन बैठकों में विचार होता था। स्थानीय स्तर पर ही सभी समस्यायें सुलझा ली जाती थी। गाँव के लोग यद्यपि बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई और रास्तों पर विशेष ध्यान दिया जाता था। बीसवीं शताब्दी के मध्य इस गाँव का सामाजिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि बीते साठ-सत्तर वर्षों में कोई केस या मुकदमा थाना-कचहरी में नहीं गया। कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान इसी जामुन के पेड़ की छाँव में हुआ।
दादी में एक खूबी और थी। वह आयुर्वेद की अच्छी जानकार थी। दादी के पिताजी अपने समय के अच्छे आयुर्वेद चिकित्सक थे। बचपन में जड़ी-बूटियों को कूटने, चूर्ण और अर्क बनाने का दायित्व भी उन्हीं का था। पिताजी के साथ रहते हुए मरीजों की नस-नाड़ियों से बीमारियों को परखने का भी गुर सीख लिया था। इतना ही नहीं किस बीमारी में कौन-सी दवा काम करेगी, उसकी मात्रा कितनी होगी और कितने दिनों तक उसका सेवन करना कारगर होगा, यह भी सीख लिया था। पर,  दादी ने पिताजी के रहते किसी मरीज पर उन दवाओं का प्रयोग नहीं किया था। एक तरह से वह शौकिया आयुर्वेद चिकित्सक बन गयी थी। गाँव के अधिकांश जन किसान थे। कृषि उनका मुख्य पेशा था। शाक-सब्जियों के सेवन से कैसे निरोगी जीवन जिया जा सकता है, वह गाँववालों को बताया करती थी। महिलाओं से भी कहती थी कि सभी बीमारियों की अचूक दवाई जैसे- हल्दी, अदरक, काली मिर्च, अजवाइन, सौंफ आदि तुम्हारे रसोई घर में ही हैं। सर्दी, जुकाम, खाँसी, पेट-दर्द, अपच, सिर-दर्द जैसी बीसियों बीमारियों में उनका उपयोग करो और स्वस्थ रहो।
दादी जब इस गाँव में आयी थी, तब उनकी उम्र करीब पच्चीस के आस-पास होगी। शुरू में वह किन्हीं से मिलती नहीं थी और ना ही बातचीत करती थी। स्त्रियों के लिए घूंघट का जमाना था। पर्दे में रहना उच्च संस्कार माना जाता था। पर, दादी इससे परे थीं। खुले विचारों की थीं। एक सीमा के भीतर खुलेपन को वह महत्व देती थीं। फिर भी, अपरिचित जगह और प्रायः अपरिचित लोग थे। इस कारण एक दूरी बनी हुई थी। किंतु, अचानक ही पूरी दुनिया में एक महामारी फैली। वह बीसवीं शती का दूसरा दशक था। उस महामारी को स्पैनिश फ्लू कहा गया था। इस फ्लू जैसी महामारी ने दुनिया को तबाह करना शुरू कर दिया था। यह एक वायरसजनित बीमारी थी जिसके लक्षण इन्फ्लूएंजा वाले थे। इसमें अचानक तेज बुखार आ जाता था। सूखी खाँसी, सिरदर्द, गले में खराश, नजला और ठंड लगना आदि सामान्य लक्षण थे। इसमें साँस लेने में कठिनाई के साथ निमोनिया हो जाता था। इस बीमारी के लिए कोई सटीक दवा या दवाएँ नहीं थी। बीमारी के रोकथाम के लिए कहीं भी कोई कारगर उपाय नहीं था- दादी यह जानती थीं। उसने सुन रखा था कि भीड़ से अलगाव इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय है।
दादी आयुर्वेद की जानकार थीं सो उन्होंने आयुर्वेद में इसके लिए दवा चाहे वह काढ़ा हो या चूर्ण खोजना शुरू किया। उन्होंने तुलसी, बहेड़ा, मुलेठी, गिलोय, दालचीनी, कायफल, पुदीना, अपामार्ग, अर्जुन पिप्पली जैसी जड़ी-बूटियों के मिश्रण से काढ़ा, अवलेह और चूर्ण तैयार किया। गाँव में जो भी व्यक्ति बीमार हुआ दादी ने उनका उपचार स्वनिर्मित देशी दवाओं से ही किया। दादी के उपचार से लोग चार-पाँच दिनों में ही ठीक होने लगे थे। दादी के इन दवाओं की ख्याति इतनी फैली थी कि मीलों दूर से लोग दवा लेने आते थे। दादी उन्हें नुस्खा और दवाई दोनों देती थी। अपने हाथ के यश और ज्ञान से दादी ने सैकड़ों लोगों को रोगमुक्त किया था। दादी इतनी उदार थीं कि दवा के लिए किसी तरह के पैसे नहीं लेती थीं। अपने जीवन-यापन के लिए वह हाथ से स्त्रियों के ब्लाउज और पुरुषों की कमीज़ें सिलती थीं। उसी पैसे से वह अपने बच्चों के कपड़े, स्कूल-कॉलेज की फीस और महीने भर का राशन जुटा लेती थीं। दादी का यह कहना था कि ईमानदारी में भगवान बसते हैं। यह एक ऐसी शक्ति है, जिससे बुराई को दूर करने की ताकत और सामाजिक मुद्दों को हल करने की ताकत मिलती है। अच्छे कल के लिए ईमानदारी से जीना चाहिए। अपने कठिन दिनों में भी दादी ने ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ा। ताउम्र वह त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति बनी रहीं।
दादी जाति, धर्म और रंग-वर्ण से परे थीं। गाँव-समाज के लोग दादी से परामर्श लेने आते थे और दादी उन्हें उचित सलाह देती थीं। वह सकारात्मक सोच की धनी तथा उदार और विशाल हृदय की थीं। जिज्ञासु प्रवृत्ति की होने के कारण उनमें ज्ञान-विज्ञान और प्रकृति के प्रति विशेष अनुराग था। गाँववाले जब कोई जिज्ञासा लेकर आते थे, दादी उनके हर सवालों का उत्तर प्रायः वैज्ञानिक और सुलझे हुए रूप में देती थीं। वह अक्सर कहती थीं कि जिज्ञासा या किसी चीज को जानने की इच्छा ही सृजन का आदि स्रोत है। अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण ही वह प्रकृति के काफी निकट थीं। सादगी से जीवन जीने की प्रेरणा उन्हें प्रकृति से ही मिली थी। हवा, पानी और मिट्टी की शुद्धता पर विशेष जोर देती थीं। वह कहती थीं कि जीवन में सुख और आनंद तभी तक है, जबतक प्रकृति शुद्ध है। प्रकृति के समीप बैठने मात्र से ही आनंद की अनुभूति होती है। हमें खाने के लिए अन्न, पीने के लिए जल और साँस लेने के लिए शुद्ध हवा प्रकृति से ही मिलती है। इस अर्थ में प्रकृति हमारी माँ के समान है- ऐसा दादी गाँववालों को बताती रहती थी। घर के सामने जामुन का पेड़ इसका प्रतीक था। दादी की फुलवारी में किस्म-किस्म के फूल और औषधीय पौधे थे जिसका उपयोग वे औषधियों के रूप में करती थीं। पेड़-पौधों के करीब दादी को आत्मिक संतुष्टि मिलती थी।
विदुषी दादी को लंबा जीवन मिला था। वह लगभग नब्बे वर्ष तक जीवित रही थीं। जब उनकी मृत्यु हुई, पूरे इलाके में शोक की लहर फैल गयी थी। अभिजीत को आज भी याद है कि लोग दादी के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े थे। शिक्षा, संस्कार और ज्ञान-विज्ञान की एक पूरी विरासत देकर वह इस संसार से गयी थीं। उस संस्कार का, विरासत का प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

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