काव्य: अरुण कुमार प्रसाद

अरुण कुमार प्रसाद
स्नातक (यांत्रिक अभियांत्रिकी)। कोल इण्डिया लिमिटेड में प्राय: 34 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्यरत, अब सेवा निवृत्त।
साहित्यिक आत्मकथ्य: सन् 1960 में सातवीं से लिखने की प्रक्रिया चल रही है, सैकड़ों रचनाएँ हैं, लिखता हूँ जितना, प्रकाशित नहीं हूँ - यदा कदा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ हूँ।


(1) अपना तन अपने ही क्रोध में खाते जाना

चेहरा अपना खुद न पहचान पाना। 
अपना तन अपने ही क्रोध में खाते जाना। 
दोस्तों की दुश्मनी का बस वही दस्तक। 
परिस्थितियों के सामने 
मेरा झुका मस्तक। 

आस्था से भरे फूल-मालाओं की थाली 
बजा, गाकर नदी में डालने, ताली। 

क्रियाओं की प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ। 
स्नेह बड़ी करती निरीह, दरिद्र माँएँ। 

जीव-जंतुओं के, प्रदूषण से निकलते दम । 
प्रदूषित आतंक का बड़ा हो जाता हुआ भय, हरदम।

उसीके द्वारा विज्ञापनों का समझ न आनेवाला 
परसा जाता मिथ्या बाजार।
आदमी जिसने, मूर्खतावश 
‘विशिष्ट’ उसे बनाया यार।

धूल से अंटे सूरज की रौशनी में
फूलों की मद्धम चमक। 
अनपढ़ नेताओं का अनहद विस्तृत ज्ञान। 

न राजनीति न राष्ट्रनीति 
बस नेतानीति की धमक। 
अर्थात राष्ट्र को देश में 
कैद कर देने का संकल्प। 

धर्म को राष्ट्र या सत्ता समझने वाले लोगों का 
महिमा मंडन। 
सत्ता के लिए ‘स्वच्छता’ धारण किए लोगों द्वारा 
हमारा मानसिक अपहरण। 

समाज के असामाजिक नेतृत्व से 
बढ़ता हुआ सिर दर्द। 

भीड़ तंत्र को प्रजातन्त्र 
बताने को रास्तों का नया-नया ‘मान-मर्दन’। 

चुनावी नारों में वायदों की लंबी सूची। 
वायदों में राष्ट्रीय आस्थाओं की
हत्या की संख्या निरंतर होती ऊंची।

जन-कल्याण को राष्ट्रधर्म से उतार। 
उपक्रम बताने इसे परोपकार। 

हरदम हो जाना उसके कृत्यों से क्षुब्ध। 
और बार-बार होते रहना 
अपनी निरीहता पर क्रुद्ध।

अराजक प्रजातन्त्र की पैरवी करते 
स्वयंभू नेताओं के समूह पर उभरता आक्रोश। 
अपने ही देश का हर बात पर 
करना विरोध, करना विद्रोह। 
चेहरा अपना खुद न पहचान पाना। 
अपना तन अपने ही क्रोध में खाते जाना। 
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(2) नारायणी, हँसो

हँसोगी नारायणी?
हँसो।
हँस सकोगी प्रियदर्शिनी?

हँसती थी तुम बहुत। 
गलियों में भागती-दौड़ती। 
गुड्डों की माँ बनकर 
ब्याह के रस्म निभाती।
तुम्हारी हँसी से उछलती थी
गाछों-वृछों की टहनियाँ।
जब तुम डाल लेती थी झूले।

हँसते थे फसल और क्यारियाँ 
तुम्हारे मृदुल स्पर्श से, 
जब मेड़ों पर दौड़ती तुम थी 
और तुम्हारे पिता हो उठते थे उल्लसित 
तेरी बाल सुलभ जिज्ञासाओं से। 

हँसो। 
हँस सकोगी मूक-भाषिणी। 
जन्म का दर्द छिपाये
प्रतिदिन के अपने होने में
संशयित। 
आतुर निगाहों में इच्छाओं से 
पराजित। 
कातरता की परिभाषा!
हँस सकोगी, हे आशा? 

तुम हंसी थी जब ब्याही गयी थी 
मण्डप की भव्यता सी। 
ब्याह के मण्डप निर्माण से नहीं, 
किन्तु, आशय से भव्य ही होते हैं। 

फिर कब हँसी कहो, योगिनी। 
तानों को जीती गृहस्थिन। 
नमक से ले रस्म-रिवाज निभाने तक
कोप-भवन में भी, कहो मानिनी। 

वह उन्मुक्त हँसी 
फिर कब हँसोगी!
जानता मैं हूँ 
कि 
कभी नहीं। 
इस अनाचारी समाज में 
हँसना ही चाहोगी नहीं 
हंसाने का सब उपक्रम करते हुए भी। 

तुम्हें अधिकार है, हँसने का। 
अधिकार से आगाह होना 
तुम्हारा भी अधिकार है। 
अधिकार नहीं मांगा, चाहा भी नहीं
विनम्रता या अदृढ़ता!
पराजय का भय गुलाम बनाता है। 
पराजित हो जाना योद्धा। 
तुम भयभीत हो। 
अधिकार की समझ पैदा करो
और हँसो, तुम मर्दानी।   
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(3) मातृ-दिवस पर व्यक्त दु:ख 

मातृत्व जन्म देने से है जुड़ा?
या वात्सल्य के वरदान से गढ़ा?
वात्सल्य कर्तव्य है या करुणा से उपजी प्रतिक्रिया?
स्वाभाविक रक्षण की प्रेरणा, अनुवांशिक अभिक्रिया?
जैविक कोशिकाओं का गुण-धर्म?
या सभ्यता, संस्कृति का बचा-खुचा शर्म?
अनुत्तरित है विध्वंस के अंत तक रहेगा। 
जब पूछोगे, ईशारा तुम्हारी ओर करेगा। 

तुम्हें क्या पता! तुम प्रातक्रियावादी हो या पदचारी। 
होती माँएँ ही है क्यों! शिशु की प्रथम प्रहरी। 

देह के अंश से ईश्वर द्वारा है यह प्रायोजित लगाव। 
या आत्म-सुख का हिलोरें मारता मानसिक विकार।  
 
मातृ-दिवस के इस अवसर पर प्रश्न है एक स्वाभाविक। 
माँओं के दायित्व पर प्रश्न, और माफ करने का मन आंशिक।
 
माँएँ तन तंदुरुस्त रखने डालती है एक फुल्का अतिरिक्त।
मन मनोहर रखने आदर्श की एक और घुट्टी पिला देती काश! स्वच्छ। 
 
युद्ध को ललकारती हैं माँएँ।
दूध का कर्ज मांगती हैं माँएँ। 

रणों में ह्त्या कर लौटे पुत्रों का तिलक करती हैं माँएँ। 
बलात्कार कर मर्दानगी की घोषणा करते पुत्रों का बचाव करती है माँएँ। 
भ्रष्टाचार कर अर्जित साम्राज्य की राजमाताएँ, गर्व से, होती हैं माँएँ।  

ऐसा न कह दो कि संतान की फिक्र करती हैं माँएँ।
वात्सल्य और कर्तव्य का जिक्र करती हैं माँएँ। 
मातृ-दिवस की परम्पराएँ हैं माँएँ। 
लगाती थप्पड़ यदि खुद जन्म लेने उनमें, तब होती माँएँ।
गांधारी, कुंती, कैकसी पुत्रों को
कैकयी मंथरा को 
और मुसोलिनी, हिटलर को, माँएँ। 
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