कहानी: अपने-अपने कोने

नमिता सचान सुंदर

5/138 विकासनगर, लखनऊ - 226022
ईमेल: namitasachan9@gmail.com



आज मुझे वे कई महीनों बाद दिखाई दीं। मैं उनसे काफी दूर थी और सड़क के दूसरी तरफ वाले फुटपाथ पर थी फिर भी मैंने पहचान लिया था। पर... पर आज वे अकेली थीं। उन दोनों को मैंने हमेशा साथ ही देखा था। मार्निंग वाक हो, मोहल्ले की बाजार हो या मोहल्ले का कोई छोटा बड़ा समारोह हमेशा साथ ही दिखते थे दोनों, पर दोनों का व्यक्तित्व बहुत अलग था। वे होते हुए भी जैसे नहीं होती थीं और उनके पति की उपस्थिति को मिस किया ही नहीं जा सकता था। नहीं नहीं उनके चेहरे पर कोई अरूचि या अनिच्छा के भाव नहीं रहते थे पर वे बस शांत छाया सी अपने पति के संग रहती थीं और एक अजब सुकून सा रहता था उनके चेहरे पर। जब वे दोनों और लोगों के बीच होते थे तो मैंने उन्हें आपस में बात करते बहुत कम देखा पर फिर भी यदि आप बहुत ध्यान से उन पर नजर रखे हों तो आपको अनुभव होता था कि वहाँ संवादहीनता की स्थिति कतई नहीं होती थी वरन् एक ऐसी साझेदारी महसूस होती थी जिसमें संवाद गौण हो जाते हैं। इसीलिए उन्हें अकेले देख कर मुझे किसी अनहोनी की आशंका हुई। उनके स्वभाव से परिचित होते हुए भी मैंने सड़क के इस पार से ही हाथ उठा उनका अभिवादन किया और जब प्रत्युत्तर में झिझकता सा एक हाथ उठा तो मैं सड़क पार कर उनकी ओर चली गई। वे भी रुक गईं थीं।
“आज आपको बहुत दिन बाद देखा।”
“हाँ, बस कल से ही निकलना शुरू किया है।”
“और...”
“उधर पार्क में बैठ कर बात करें...”
ऐसा भोला सा अनुरोध था मेरे चेहरे पर टिकी उन आँखों में कि मना तो शायद मैं वैसे भी न कर पाती और फिर आज तो छुट्टी का दिन था, मेरे घर में तो सब अभी सोये पड़े होंगे और जब तक मैं हिलाऊँ डुलाऊंगी नहीं, कोई उठेगा भी नहीं, तो मैने सहर्ष उनके साथ पार्क की ओर कदम बढ़ा दिए। वैसे सच बताऊँ वे किसी और के साथ चल रही हैं, भले ही वह कोई और मैं खुद ही हूँ तो भी मुझे कैसा तो अजीब सा लग रहा था सोच कर, इतनी आदत पड़ी हुई थी उन्हें बस उनके पति के साथ देखने की। पार्क के अंदर घुसते ही पास की खाली बेंच की ओर कदम बढ़ाया ही था कि मैंने अपने हाथ पर उनकी हथेली का दबाव महसूस किया। देखा कि वे सामने पार्क के दूसरे कोने पर गुलमोहर के बड़े पेड़ के नीचे वाली बेंच की ओर इशारा कर रहीं थीं। छोटी सी पर बड़ी प्यारी सी मुस्कान थी उनके होठों पर। और मुझे याद आया कि उन दोनों लोगों को जब भी पार्क में बैठे देखा है तो उसी बेंच पर। बल्कि अनकहे ही कुछ ऐसा हो गया था कि जब वे लोग टहल चुके होते थे और भ्रमण पथ से हट घास पर आते थे तो यदि उस बेंच पर कोई बैठा भी होता था तो उठ खड़ा होता था। और आज उस बेंच की ओर उनके साथ मैं बढ़ रही थी।
बेंच तक पहुँच उन्होंने बेंच को अपने हाथों सहलाया जैसे उनकी उपस्थिति को भीतर तक महसूस कर रही हों। फिर खुद बैठ मुझे भी बैठने का इशारा किया। अगर उन्होंने बेंच थपथपा कर उस पर बैठने का संकेत नहीं किया होता तो संभवतः मैं घास पर नीचे ही बैठती या फिर शायद खड़ी ही रहती। बेंच को उनके सहलाने और देखने में कुछ ऐसा था कि उस पर बैठना जैसे किसी पावन भाव की निर्मलता को भंग करना होता।
बेंच पर बैठते ही उनकी दृष्टि दूर आकाश पर जा टिकी और उन्होंने बोलना शुरू किया –
“तीन महीने पहले हम और जीवंत अपने बेटे के पास गए थे। हम दोनों के रिटायरमेंट के बाद तो साल में एक बार जाते ही थे। जीवंत उनका नाम है, कितना सटीक नाम रखा था न अम्मा-अप्पा ने... जीवंत।”
आहिस्ता आहिस्ता मुंह के अंदर नाम बोल वे जैसे उन्हें भीतर ही भीतर जी रहीं थीं। अब तक मुझे स्थितियों का हल्का सा अंदाजा तो हो ही गया था। आपको भी हो गया होगा।
उनकी बात सुन मैं भी मुस्कुरा उठी। सच बहुत ही उपयुक्त नाम था। उनकी उपस्थिति ही जीवंतता का पर्याय हुआ करती थी। उनका होना आस-पास को ऊर्जा से भर देता था।
उन्होंने बात जारी रखी, “बेटा हैदराबाद में है इस समय। जीवंत का गाँव हैदराबाद से सात-आठ घंटे की दूरी पर है। इस बार पता नहीं क्यों उनका बहुत मन था गाँव जाने का। बहुत वर्षों से नहीं गये थे। अम्मा-अप्पा ही अप्पा की नौकरी के कारण नागपुर आ गए थे और फिर वहीं सेटल हो गए थे। फिर भी जब तक वे लोग थे गाँव आते जाते रहते थे और हम लोग भी कभी कभार थोड़े समय के लिए हो आते थे। लेकिन पिछले पंद्रह बीस सालों ले तो जाना हुआ ही नहीं था। वहाँ अब कोई है भी नहीं। घर जमीन सब धीरे धीरे बेच दिया गया था, कुछ यूं ही दे दिया गया था। पर इस बार जीवंत का बहुत मन था गाँव का एक चक्कर लगाने का। बेटे ने भी कहा कि अब तो सड़कें अच्छी बन गईं हैं और गाड़ियाँ भी तेज चलने वाली हों गई हैं तो हम लोग गाड़ी कर के चले चलेंगे और देर रात तक वापस आ जाएंगे।
बहुत बदल गया था गाँव। परिचित लोग भी नहीं थे। लेकिन गाँव के मंदिर के पुजारी से जब जीवंत ने बात की और अपने पिता जी, बाबा आदि का नाम बताया तो उसने कहा कि नाम तो सुना हैं, शायद उसके पिता जी जानते होंगे। हम लोग उनके पिता से मिलने गये और बचपन के लोग, जगहें, घटनाओं को याद करते जीवंत के चेहरे पर जो भाव आ जा रहे थे कि मैं एकदम अचंभित थी। जीवंत तो हमेशा ही प्रसन्न रहते थे, हँसते रहते थे पर ऐसी तृप्ति के भाव तो कभी नहीं दिखे। एक दो और लोगों से भी मिलवाया उन्होंने जिन्हें वो समय और लोग याद थे। मंदिर के एलबम में एक बहुत पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फोटो जो धुंधला गई थी पर उसमें मंदिर में हो रहे आयोजन में कर्नाटक संगीत की प्रस्तुति देते युवा अवस्था की दहलीज पर पाँव धरते अप्पा साफ पहचाने जा रहे थे। मंदिर के रजिस्टर में लिखे अप्पा द्वारा भेजे गए रुपए, ऐसी चीजें जीवंत को कहाँ जोड़ रहीं थीं, यह साफ पता चल रहा था। और देखो, हर पल साथ रहते हुए भी मुझे अंदाजा तक नहीं था कि जीवंत के मन में यह सब स्मृतियाँ या कहें उन स्मृतियों को जीने की चाह कहीं भीतर दबी है।” यह कहते हुए उनकी आवाज में जैसे थोड़ा सा क्षोभ का पुट भी आ गया। सब बताते हुए वे संतुष्ट थीं कि जीवंत ने उन स्मृतियों को जी लिया पर जैसे दुखी भी थी, थोड़ी शिकायत भी थी कि जीवंत के जीवन में कहीं कुछ ऐसा था जिसका वे अंग नहीं थीं।
मैंने धीरे से उनकी पथेली पर अपनी हथेली रखी और कहा, “जब यह सब हो रहा था तो आप अपने आपको अकेला अनुभव कर रहीं थीं क्या?”
“नहीं, ठीक ठीक अकेला नहीं किंतु थोड़ा ठगा सा जरूर महसूस कर रहीं थीं। थोड़ी शिकायत भी उपजी मन में कि जीवंत ने अपने मन का यह कोना मुझसे क्यों छिपा रखा।” फिर सहज हो थोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं “पर अब मैं समझ गईं हूँ कि जीवंत ने ऐसा क्यों किया। नहीं जीवंत ने ऐसा किया नहीं, वह उनसे हुआ और शायद सबसे होता है।”
“मैं कुछ समझी नहीं...”
“हम सबके भीतर एक कोना ऐसा जरूर होता है जो केवल अपना होता है। उस कोने में कुछ स्मृतियां, कोई व्यक्ति, कोई घटना, कोई बात कहीं जैसे अचेतन में बहुत गहरे दबी रहती है। इतने गहरे कि बहुत सारा जीवन जीते हुए हम खुद उसके वहाँ होने से अनभिज्ञ से रहते हैं, किंतु अनजाने ही वही कोना हमें अपने आप से जोड़े रहता हैं। कठिन दिनों में हमें बनाये रखता है। हमारा और जीवंत का व्यक्तित्व बहुत अलग-अलग था किंतु हमारी पारस्परिक समझ हमें बहुत स्तरों पर बहुत गहनता से जोड़ती थी और इसी के चलते मुझे लगा था कि जीवंत के मन में उन स्मृतियों को जीने की इतनी उत्कट अभिलाषा थी, वे यह सब इतना मिस करते थे यह मुझसे कभी बताया क्यों नहीं। तकलीफ हुई मुझे कि जैसे उन्होंने मुझे काट कर खुद से अलगा दिया हो। पर बाद में मैं समझ पाई कि जीवन के अलग-अलग पड़ाव जीते जीवंत को भी कहाँ फुरसत मिली थी डोर का वह सिरा पकड़ने की। बात फुरसत की ही नहीं है केवल, हमें जरूरत भी नहीं महसूस होती शायद तब।”
फिर एक लम्बी साँस ले कर बोली थीं, “शायद उस अदृश्य शक्ति का ही इशारा था कि जीवंत को इस बार इतनी शिद्दत से वहाँ पहुँचने का मन था। वहाँ से लौटने के हफ्ते भर बाद ही एक मैसिव हार्ट अटैक के बाद जीवंत हमें अकेला छोड़ चले गये हमेशा के लिए। कोई कल्पना भी कर सकता है भला कि उनके तरह के खुले, विस्तृत हृदय में भी अवरोध हो सकते हैं। अच्छा ही हुआ कि हम उससे पहले गाँव हो आये थे। मात्र जीवंत ही तृप्त हो कर नहीं गये, वहाँ के अनुभव मुझे भी उनके बाद जीने का एक तरीका थमा गये। वरना जीवंत के बिना तो जीवन की कल्पना मैं आज भी नहीं कर सकती।”
और फिर अचानक जैसे ट्रांस से बाहर आते हुए बोली, “अरे मैंने तुम्हारा बहुत समय ले लिया। तुम्हें घर में काम होंगे। तुम जाओ।”
“नहीं, अच्छा लगा मुझे भी बात कर के और मेरा भी उठने का मन नहीं कर रहा था पर हाँ घर में काम तो हैं और समय भी हो गया है।” कहते हुए मैं उठ खड़ी हुई।
“आप नहीं चलेंगी?”
“नहीं, तुम जाओ मैं अभी थोड़ी देर रुकूंगी। पर हाँ जब भी समय मिले घर आना। मुझे अच्छा लगेगा।”
“जरूर।” चलते हुए मैंने देखा वे बेंच के हत्थे पर एक हाथ रख और पैर पर पैर चढ़ा वैसे ही बैठीं थीं जैसे उनके पति बैठा करते थे। लेकिन पार्क के गेट से निकलते हुए जब मैंने पीछे पलट कर देखा तो वे अपनी वाली जगह पर थोड़ा सा टेढ़ी हो वैसे ही बैठी थीं जैसे अपने पति के साथ होने पर बैठती थीं। पता नहीं यह मेरा भ्रम था या सच में ही ऐसा था पर मुझे पता नहीं क्यों लगा जैसे वे अपने साथ-साथ अपने पति का होना भी जीने की कोशिश कर रहीं हैं। मुझे उनकी थोड़ी चिंता सी होने लगी और मैंने तभी सोच लिया कि जल्दी से जल्दी समय निकाल मैं उनके घर जरूर जाऊंगी। और फिर आठ दिन बाद मैं उनके गेट पर थी। इन आठ दिनों में वे मेरे मन से एक पल को भी नहीं निकली। मेरा मन तो कह रहा था कि दूसरे दिन ही जा कर उनकी घंटी बजा दूँ पर एक तो आप जानते ही हैं ये जिंदगी की रोजमर्रा की चकल्लसें कभी-कभी बहुत उलझा देती हैं और हम चाह कर भी वह नहीं कर पाते जो करना चाहते हैं और दूसरा यह कि मेरे मन में दुविधा भी थी कि मैं कहीं उनके व्यक्तिगत दायरे में अतिक्रमण तो नहीं करूंगी इतनी जल्दी जा कर। हो सकता है उन्होंने ऐसे ही कह दिया हो, कर्टसी के नाते। मैंने उस दिन इतनी देर तक उनकी बात सुनी थी इसीलिए शायद। क्यों कि मैंने तो उन्हें हमेशा से ही एक शांत, अपने में खोये रहने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाना है।
लेकिन फिर सारे संशयों को पीछे ढकेल मैं उस दिन चली ही गई। मैं वैसे तो खुद से कह रही थी कि वे अकेली हैं, मुझे उनकी चिंता है इसलिए मानवता के नाते मैं जा रहीं हूँ किंतु सच बात तो यह थी उनकी उस दिन की बातों ने मेरे मन में पानी में कंकड़ी सी फेंकी थीं और लहरों के भंवर मुझे भी अपने ही भीतर कहीं खींचे लिए जा रहे थे।
हाँ तो उस दिन करीब ग्यारह बजे मैं उनके गेट पर थी। घर के तीन ओर खुली, कच्ची जमीन पर पेड़ पौधे लगे थे और दाहिनी ओर माली बाबा काम कर रहे थे। उन्होंने बरामदे में लगी घंटी की ओर इशारा कर के बताया कि वे घर में ही हैं। किवाड़ खोलते ही उन्होंने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया--- “आओ आओ।”
कमरे में घुसते ही मेरी दृष्टि सबसे पहले दाहिनी ओर की खुली खिड़की को पास रखी आराम कुर्सी पर पड़ी। झूलने वाली आराम कुर्सी अभी भी धीरे-धीरे हिल रही थी। लग रहा था दरवाजा खोलने के लिए वे उसी कुर्सी से उठ कर आईं थीं। कुर्सी की पीठ पर उनके पति की एक कमीज लटकी हुई थी और कमीज की दोनों बाँहें कुर्सी के हत्थों पर रखी हुईं थीं। संभवतः पति के सान्निध्य को रचने की कोशिश की गई थी। मेरी दृष्टि का अनुसरण करती हुई वे बोलीं.. “जीवंत हमेशा इसी कुर्सी पर बैठते थे। धीरे-धीरे कुर्सी हिलाते हुए, आँखे बंद कर मद्धम आवाज में इंस्ट्रूमेंट्ल म्यूजिक सुनना उनका पसंदीदा शगल था।” तब तक मेरा ध्यान घर के भीतर से धीमी आवाज में आते कर्नाटक संगीत पर चला गया।
“और यह कर्नाटक संगीत?”
“नहीं, यह तो मैंने अभी लौटने के बाद यूट्यूब पर लगाना शुरू किया। पता नहीं क्यों मुझे लगता है जीवंत को अच्छा लगेगा। पहले कभी उन्होंने बजाया ही नहीं, जब कि गाँव में उनकी बातों से ऐसा लगा जैसे उन्हें इस संगीत से लगाव था। शायद वो खुद ही नहीं समझ पाये या ध्यान नहीं दिया, स्म़ृति में कहीं गहरे दब गया होगा।”
रसोई से सटे बरामदे में बैठ चाय पीते हुए बहुत बातें हुई उनसे। बातों के बीच में कहा उन्होंने, “मैं तो जीवंत से हमेशा कहती थी कि अब तो हर काम ऑनलाइन हो जाता है फिर बाजार, बैंक क्यों जाते रहते हो तो जीवंत कहते थे कि सुविधा अलग चीज है पर आदमी को आदमी से जुड़ा रहना चाहिए और फिर रिटायर होने के बाद कौन सी समय की कमी है हमारे पास।” बता रहीं थीं कि अब वे खुद भी बाजार, बैंक आदि जाने लगी हैं। पूछा उन्होंने हमसे, “जानती हो क्यों... क्यों कि अभी भी उन लोगों और मेरे बीच जीवंत हैं। वो लोग हमारा जो इतना ख्याल करते हैं, सीट से उठ-उठ कर आ बातें करते हैं तो किसलिए, जीवंत के ही लिए और फिर हर दूसरी बात में जीवंत तो होते ही हैं।”
बताया था उन्होंने कि उनके पैतृक घर की परिस्थितियाँ और कुछ उनका स्वयं का स्वभाव भी ऐसा था कि वे बहुत जल्दी लोगों से खुल नहीं पातीं थीं। किताबों की दुनिया में ही गुम रहती थीं वे। पिता जी का ट्रांसफर भी बहुत जल्दी-जल्दी होता था तो कहीं से जुड़ पाना उनके लिए और भी मुश्किल था। नौकरी भी की उन्होंने पूरी जिंदगी पर बस अपने काम से काम और जबसे मोबाइल और लैपटॉप आ गया तबसे तो उनकी दुनिया और ही सिमट गई थी। उनके जीवन का एक ही स्थाई सुर है जीवंत और बस जीवंत। जिस ढंग से यह बात कही थी उन्होंने मेरे मन में भी कुछ ललछौंहा सा कौंध गया था पल भर को।
धीरे-धीरे हम सबने उनके व्यक्तित्व में बहुत परिवर्तन देखा – पंखुड़ी दर पंखुड़ी खिलते फूल जैसा। एक दिन शाम को मैं जल्दी-जल्दी डग भरती बाजार से घर की ओर जा रही थी कि उन्मुक्त हंसी की आवाज ने मेरा ध्यान मंदिर की सीढ़ियों की ओर खींचा। देखा तो ये वही थीं मंदिर की बूढ़ी महाराजिन के साथ पलथी जमाये बैठीं थीं और पता नहीं क्या बतियाते हुए दोनों लोग दिल खोल कर हँस रहीं थीं। मुझे देखते ही आवाज दी अरे रुको, इतनी जल्दी जल्दी कहाँ भागी जा रही हो। मैं भी घर चलने को उठ ही रही थी। महाराजिन से राम राम कर फिर आने का वादा कर मेरे साथ हो लीं।
मेरे चेहरे की भाषा पढ़ ली थी शायद उन्होंने, तभी चलते-चलते बोलीं, “बहुत आश्चर्य होता है न मुझे ऐसे देख कर। होगा ही। फिर कुछ  मुस्कुरा कर बोलीं, मैं हमेशा जीवंत से कहती थी कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती। और देखो पहले मैं उसके साथ जीती थी, अब मैं उसको जीती हूँ।” फिर थोड़ा रुक कर एक कौतुक भरी दृष्टि मेरे चेहरे पर जमा एक-एक शब्द तौलती हुई बोलीं “और यही है मेरे भीतर का वह कोना जो मुझे अपने आप से जोड़े रखता है।”
उनकी बात और अंदाज मेरे भीतर फिर से कुछ अनचीन्हा सा जगा गई, शायद एक कसक अपने ही भीतर दूर तलक उतर जाने की, खंगाल डालने को अपना आप। कहीं तो दुबका हुआ मिल ही जायेगा मुझे भी अपना वह कोना।

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