व्यंग्य: बजट की ढपली और छुटभैया राग

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


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वित्तमंत्री हलवा खा कर बजट रखते हैं पर आफत छुटभैये राजनेताओं की आ जाती है। गली-गली में जो सोशल मीडिया चैनल खुल गए हैं, वे बजट पर उनकी त्वरित प्रतिक्रिया पाने के लिए हाथ धो कर पीछे पड़ जाते हैं। बजट बनाने वालों को भी पूरा बजट समझ में नहीं आता लेकिन उस पर हर कोई विशेषज्ञ जैसा भाषण देना चाहता है।  छुटभैये नेता बजट की आँकड़ेबाजी करने से रहे। यदि वे लाखों-करोड़ का आँकड़ा गिन सकते तो मोहल्ले स्तर पर राजनीति क्यों करते! वे सीधे केंद्रीय हॉल में बैठते और लोकसभा टीवी पर अपनी बात रख रहे होते। छुटभैये नेताओं के लिए बजट पर बोलना सरल हो जाए इसलिए मैंने ये जुमले लिखे हैं। कृपया इसे अपनी गली के नेता को दे दें। बजट कितना भी जानलेवा हो सरकारी पार्टियों के राजनेताओं को बजट के पक्ष में बोलना है। और बजट कितना भी उदार हो, विपक्ष वालों को उसकी खाल उधेड़ना है। ये रेडीमेड जुमले विपक्ष और पक्ष की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। जिसे जैसा माल चाहिए उठा लें, और संपादकजी का धन्यवाद करें कि उन्होंने इस रचना को सर्वराजनेता हिताय छापा।


विपक्षी लोगों के लिए जुमले

विपक्ष के राजनेता शुरू से ही आक्रामक मुद्रा बना लें जैसे ब्लैक बेल्ट, कुम्फू वाले और बॉक्सर बना लेते हैं। फिर वे चीख-चीख कर कहे - यह बजट विश्वासघाती है, छलावा है। सपने दिखाने का ढोंग करने वाले इस बजट में महिलाओं, पुरुषों, उभयलिंगियों और जानवरों के लिए कुछ भी नहीं है। यह बजट जनविरोधी, कृषि विरोधी और छोटे व्यापारियों को मार डालने वाला है। सोने-चांदी पर टैक्स कम हुआ तो ये सस्ते हो गए पर अनाज अधिक महंगा हो गया। सरकारी लोगों की बात अलग है, लेकिन जनता तो सोना-चाँदी खाने से रही। उद्योगपतियों की गोद भराई हुई है पर महंगाई से परेशान लोगों की कमर टूट गई है। डायमंड के ऊपर कस्टम ड्यूटी घटी है पर पेट्रोल पर बढ़ गई है। रोजगार, तदर्थ-रोजगार और जनसहयोग वाले रोजगार पर बजट में कुछ नहीं है। राहतों का पिटारा बंद रखा गया है। यह रुलाने वाला और अलोकतांत्रिक बजट है। हकीकत में यह बजट के नाम पर लीपापोती है। जब पढ़े-लिखे बेरोज़गार इससे खुश नहीं हैं तो मजदूर वर्ग क्या आशा करे! इससे अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और चौड़ी तथा गहरी होगी। विकास ही नहीं है तो क्या विकास दर! आसमान छूती महंगाई वंदे मातरम्, अंधे मातरम्, धंधे मातरम् बोलने से कम नहीं होगी। मंदी, घोर मंदी में बदल जाएगी।

कुछ जागरुक विपक्षी ऐसे भी कह सकते हैं कि इस बजट से किसानों को चपत लगी है। बजट मध्यम वर्ग के लिए कड़वी गोली है लेकिन उद्योगपतियों के लिए स्विस चॉकलेट है। सामाजिक सुरक्षा राशि जितनी बढ़ी है, राक्षसी महंगाई उससे तीन गुना बढ़ी है। सरकार गरीबों को मार डालने पर तुली है। एक बार जरूर ध्यान रखे, बजट की निंदा करते समय ‘बजट ने मायूस किया’ जैसे वाक्यांश नहीं बोलें। पिछले साल एक राजनेता ने ‘मायूस किया, मायूस किया’ बोला तो एक राष्ट्रधर्मी पत्रकार ने राजनेताजी को शिलाजीत का विज्ञापन बता दिया। विपक्षियों के लिए कुछ और धाँसू कुतर्क हैं। जैसे वे कह सकते हैं कि इनके बाप ने कभी बजट नहीं बनाया तो ये क्या बनाएँगे। वे कह सकते हैं, बजट किसी के बाप का नहीं देश का होता है। जिनको बजट का ‘ब’ नहीं आता वे बजट पर थीसिस लिख रहे हैं। जो ग्राम पंचायत का बजट नहीं बना पाये, वे महादेश का बजट बना रहे हैं। जो चार अंकों की संख्या ढंग से नहीं जोड़ सकते वे खरबों-खरब गलत-सलत जोड़ रहे हैं। दैनिक भत्ता और पेंशन बढ़ भी जाए तो विपक्षी नेताओं को अपने चेहरे पर खुशी नहीं आने देनी चाहिए। उनका विपक्ष में रहना तभी सार्थक माना जाता है जब वे हर मुददे पर निराशा भरी प्रतिक्रिया दें। कभी गलती से भी कोई सकारात्मक बोल निकल गया तो मीडिया वाले उन्हें बागी और पलटूराम घोषित कर देंगे।


बजट के पक्ष में बोलना हो तो

पक्ष में बोलने वाले धैर्यपूर्वक और चबा-चबा कर बोलें। जैसे कि यह बजट दूरदर्शी है। राजधानी से लगाकर टपोरियाखेड़ी तक का ध्यान बजट में रखा गया है। यह कमजोर लोगों को ताकत देता है। यह सबका हितकारी है, हमने किसी को नहीं छोड़ा है। यह युवाओं का भविष्य चकाचक कर देगा। जनता की बेमिसाल सेवा करेगा। इसमें बड़ी-बड़ी विकास योजनाओं के साथ अगले पचास सालों के ‘विज़न’ की झलक है। आप हमें वोट देते रहेंगे तो यह बजट काम करता रहेगा। टैक्स बढ़ने से आज कुछ तकलीफ भी हुई तो भविष्य शानदार होगा। सबसे बड़ी बात, अब अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है, पुरानी पटरियाँ उखड़वा कर नई लगवाई जा रही हैं। यह बजट देश का नवनिर्माण करेगा। इस बजट से देश हाइटेक हो जाएगा, शक्तिशाली बनेगा तो कमजोर बिचौलिये विपक्षी खत्म हो जाएँगे। ये सर्व-समावेशी बजट है। यह आत्मनिर्भरता देता है पर पुरातन परंपराओं को मजबूत करता है। किसानों को और छोटा बनाया जाएगा ताकि सबको सम्मान राशि मिल सके और खेतों में ड्रोन से मुफ्त छिड़काव कराया जा सके।

सरकार को मजबूरी में टैक्स लगाना पड़ता है। सरकार टैक्स नहीं लगाए तो जनता को कैसे मालूम हो कि देश में सरकार नाम की कोई चीज है। हमारी सरकार जनता के लिए घाटा उठा कर देश चलाती है। जितना कमाती है उससे ज्यादा खर्च करती है। किसी विपक्षी में दम हो तो ऐसा घाटा खाकर अपना धंधा करके बताए। बजट का कमाल देखिए, हमारे यहाँ स्टार्टअप में ही इतनी कमाई है कि कई लोगों ने करोड़ों रुपये बना लिए। ये विपक्षी स्टार्टअप से भी गए-बीते हैं। बजट में गंभीर लोचा भी हो तो सत्तापक्ष के राजनेता को आत्मा की आवाज दबाकर बजट के समर्थन में बोलना चाहिए। पार्टी लाइन के खिलाफ़ बोलने वालों को मीडिया बागी करार देता है। दो-चार लोग मिलकर सत्ता की भाड़ नहीं फोड़ सकते, इसलिए विरोध में कतई नहीं बोलें। बजट के पक्ष में बोलने पर जनाक्रोश जैसा कुछ लगे तो कहें कि वित्तमंत्री की मंशा एकदम सही है, मीडिया इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझ नहीं पा रहा है। आप मीडिया को नहीं समझाएँ। अपनी कमियों का ठीकरा मीडिया पर फोड़ देंगे तो जनता कभी नाराज नहीं होगी। 

कोई भी बजट हो वह गरीबी हटाता ही है। बस, गरीबी किसकी हटेगी यह कोई नहीं समझ पाता। यदि आप आम आदमी हैं तो बजट से परेशान न हो, जो सबका हश्र होगा वही आपका होगा। अमेरिका में बजट सुनकर कोई आत्मदाह नहीं करता और न ही आत्महत्या करने की धमकी देता है। हमारे देशवासी भी अमेरिकियों से कम नहीं हैं। 

इन जुमलों का उचित उपयोग करेंगे तो प्रजातंत्र मजबूत बनेगा और टीवी वाले आपके पीछे पड़े रहेंगे।

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