कहानी संग्रह ''टेम्स नदी बहती रही'' की सशक्त कहानियाँ

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: टेम्स नदी बहती रही (कहानी संग्रह)
कहानीकार: रूबी भूषण
मूल्य: ₹ 360/-
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली

कोई भी कथा साहित्य पाठकों को रचनाकार की संवेदनाओं से जोड़ता है, उनके अनुभवों से कोई सीख देता है और आलोक फैलाता है। ऐसी रचनाएँ अपने काल-खण्ड का ऐतिहासिक दस्तावेज होती हैं। बहुत कुछ हमारी प्रवृत्तियों, हमारे चिन्तन और हमारे अनुभूत संसार का लेखा-जोखा होता है। आज कहानी का परिदृश्य विस्तृत और व्यापक है। कहानी ने अपने तेवर-कलेवर में, अपनी भाव-भंगिमा में खूब विस्तार किया है। दुनिया भर में तमाम भाषाओं में कहानियाँ लिखी-पढ़ी जा रही हैं और उन पर चिन्तन-मनन हो रहा है। प्रवासी भारतीय जहाँ, जिस देश में हैं, वहाँ का कथ्य-कथानक चित्रित करते हैं, अपने देश को भूले नहीं हैं, उनके लेखन में अपने देश की खुशबू घुली-मिली होती है। बहुतेरे कहानीकार अपने भ्रमण काल में दूर देशों की भाव-संवेदनाएँ समेट लाते हैं और इत्मीनान से अपनी रचना-विधाओं में उपयोग करते हैं। यह भाव-प्रवाह विश्व-संस्कृति को बढ़ावा देता है और भारतीय पाठकों के सामने विश्व भर का अनुभव उजागर होता है।

विजय कुमार तिवारी
आजकल मैं पटना की सशक्त कथाकार डा० रूबी भूषण के सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह "टेम्स नदी बहती रही" के पन्ने उलटने-पलटने में लगा हुआ हूँ। डा० रूबी भूषण जी को मैं बहुत पहले से नहीं जानता। पिछले वर्ष मुझे पटना जाने का सुखद संयोग मिला। मैं भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से मिलना चाहता था। उन्होंने कहा, "हम लोग एक कहानीकार के घर में कहानी को लेकर विमर्श करने वाले हैं और उनकी कहानियाँ सुनने वाले हैं। आप भी हमारे साथ चलें।" हम जिस कथाकार के घर में पहुँचे वह डा० रूबी भूषण जी ही थीं। वहाँ मेरे सहकर्मी वरिष्ठ साहित्यकार मुकेश प्रत्यूष सहित कई नये लोग मिले। स्वयं कहानीकार डा० रूबी भूषण जी से हमने उनकी कहानियाँ सुनी और उनसे मेरा परिचय हुआ।

"टेम्स नदी बहती रही" के भीतरी आवरण में डा० शिवनारायण जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है-"कहानियों के अपने इस पहले ही संग्रह "टेम्स नदी बहती रही" में कथा कहन कौशल, कथ्य की विविधता और द्वंद्वात्मक संवेदन से उन्होंने मन मोह लिया है।" उनका यह भाव भी उद्धृत करने योग्य है-"रूबी भूषण के कथाकर्म में अतीत के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का उत्खनन है तो आधुनिक समाज की चेतना का विस्तार भी मिलता है। धर्मनिरपेक्ष जीवन-मूल्यों के प्रति गहन आस्था का भाव तो है ही! रिश्तों में भावनाओं की सघनता मिलती है, किन्तु भावातिरेक की निष्क्रिय बोझिलता से बचने का सायास उपक्रम भी दिखता है।"

सुखद ही है, इस संग्रह की भूमिका "मन की व्यथा-कथा" में भगवती प्रसाद द्विवेदी जी लिखते हैं-"गिनी-चुनी लेखिकाएँ ही विश्वसनीय यथार्थ की सृष्टि कर नारी-मन की गुत्थियों को कथात्मक अभिव्यक्ति दे पाती हैं। श्रीमती रूबी भूषण इसी कोटि की समर्थ कथाकार है, जिनकी दस दो कहानियों का संग्रह "टेम्स नदी बहती रही" सही मायने में स्त्री-विमर्श का पारदर्शी आईना प्रतीत होता है।" वे लिखते हैं-"बतौर कहानीकार वह नारी के मनोविज्ञान की कुशल पारखी छवि के साथ पाठक के दिलो-दिमाग पर छा जाती हैं। संस्मरणात्मक शैली में रची इन कहानियों में सुदूर ग्राम्यांचल व जनजातीय क्षेत्र की स्त्री है और नगर-महानगर की संभ्रांत महिलाएँ भी, साथ ही सर्वाधिक उपेक्षित किन्नर समाज की लक्ष्मी और उसका सड़ांध भरा परिवेश भी इसमें शामिल है।" इस तरह सत्यनारायण जी की सारगर्भित टिप्पणी और भगवती प्रसाद द्विवेदी जी की विस्तृत भूमिका के बाद किसी और के लिए कुछ भी शेष रह नहीं गया है कहने, सुनने के लिए।

इस संग्रह के शुरु में स्वय रूबी भूषण जी ने "मैं और मेरी कहानियाँ" शीर्षक से विस्तृत, सार्थक आत्म-कथ्य लिखा है। उनकी कुछ पंक्तियों को उद्धृत करना उचित ही है। वे लिखती हैं, "मैं सोचती हूँ कि मैं कहानी लिख रही हूँ या फिर कहानी मुझे लिख रही है।" उनके इस विचार को समझने की जरुरत है-"एक कहानीकार के लिए सबसे कठिन क्षण यही होता है कि वह अपने पात्रों के साथ न्याय कर सके।" वह शिवानी को याद करती हैं-"शिवानी अपने पात्रों को शब्दों में कुछ इस तरह पिरोकर प्रस्तुत करती थीं कि लगता था कि वह जीवंत है। हम कोई चलचित्र देख रहे हों। मैं उनकी भाषा-शैली और लेखनी की मुरीद हो गई।" जीवन के उतार-चढ़ाव, स्वास्थ्य की समस्याओं को झेलने के बाद वह पूरे जोश व उत्साह के साथ लेखन में सक्रिय हैं और लिखती हैं-"इन दिनों साहित्य ही मेरी दुनिया है।" उन्होंने अपनी कहानियों में किस्सागोई की शैली अपनाई है और सहज तरीके से पाठकों तक अलग-अलग पृष्ठभूमि की भाव-संवेदनाएँ पहुँचाती हैं। इस संग्रह में कुल 13 छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं जो उनके भाव-चिन्तन को दर्शाती हैं।

'सुरमा' रूबी भूषण की संस्मरणात्मक, बचपन की यादों के साथ भावुक करने वाली मार्मिक कहानी है।  इसमें यात्रा वृत्तान्त के साथ तत्कालीन स्थितियों-परिस्थितियों का जीवन्त चित्रण हुआ है। लेखिका के मन में दादी के लिए 'सुरमा' न ला पाने का कोई भाव-बोध है। सभी पात्र अपना चरित्र बेहतरी से निभाते दिखाई दे रहे हैं और सारे दृश्य सटीक हैं। बाल मन की बातें, दादी की आँखों का टिमटिमाना, झुकी-झुकी नजर से लड़का-लड़की का एक-दूसरे को देखना, इश्क शुरु भी नहीं होता और उसका समाप्त हो जाना सहित सारे प्रसंग कहानीकार की सूक्ष्म दृष्टि और पकड़ दिखाते है। इस तरह यह सहज रूप में लिखी, रोमांचित करती और संवेदना जगाती कहानी है।

"मैं नरेश शुक्ला की बेटी नहीं हो सकती" मार्मिक, संवेदनशील और स्त्री-मन की पीड़ा की कहानी है। समाज में हो रहे बलात्कार, उसका दुष्परिणाम भोगती स्त्री की त्रासदी यथार्थतः चित्रित हुई है। नरेश शुक्ला की पत्नी उषा को बच्चा नहीं हो रहा है। किसी शादी समारोह से लौटते हुए कुछ बदमाश रात के अंधेरे में उनका बलात्कार कर देते हैं। संयोग ही है, वे गर्भवती होती हैं और मान लिया जाता है, यह उसी दुर्घटना का परिणाम है। कहानीकार ने अनेक मोड़ों, जीवन की कटु सच्चाइयों, पीड़ाओं, दुखों और बदलते रिश्तों-सम्बन्धों को पूरी ईमानदारी से चित्रित किया है। यहाँ जीवन का, पात्रों का मनोविज्ञान स्पष्ट दिखाई देता है। सभी की परिस्थितियाँ, उसके प्रभाव और संवेदनाएँ झकझोर कर रख देती हैं। यह घोर पीड़ादायक स्थिति है किसी पुत्री के लिए, उसका पिता उससे पापा कहलवाना नहीं चाहता। हमारा समाज उदार नहीं है। कहानी को रूबी भूषण ने परत दर परत बुना है। पापिया कहती है-"मैं गर्भ से देख रही थी, सुन रही थी, माँ का वह कातर क्रंदन, कुछ भी भूली नहीं हूँ।" जाँच से पता चलता है, नरेश शुक्ला और पापिया का डीएनए एक ही है। कहानीकार लिखती हैं-"एक संभ्रान्त परिवार के लोग यह नहीं समझ सके कि बलात्कार में उषा की कोई गलती नहीं थी।" पापिया कहती है-"सारी जिंदगी उसको और उसकी माँ को अदृश्य रूप से एक ऐसी सजा के लिए प्रताड़ित किया गया जो उन्होंने की ही नहीं थी।" इसीलिए वह विचलित होकर कहती है, "नहीं, मैं नरेश शुक्ला की बेटी नहीं हो सकती।"

रूबी भूषण की कहानियाँ शहरी परिवेश की हैं तो कुछ ग्रामीण क्षेत्रों की भी हैं, जहाँ जंगल, पहाड़, नदियाँ हैं, आदिवासी अपने रीति-रिवाजों के साथ निवास करते हैं। "अघोरिया" ऐसा ही एक निडर, साहसी चरित्र है जो नित्य नए कारनामे करती रहती है। उसकी अपनी समझ है, गलत होने पर किसी को अपने तरीके से सजा देती है, पेड़ की डाली से उल्टा लटक कर गुनगुनाती है और खुशी जताती है। उसका विद्रोही तेवर लोग समझ नहीं पाते। उसने लकड़बग्घे को मारकर अपने पराक्रम का परिचय दिया है। उसमें मनमौजीपन के साथ करुणा, प्रेम, सहयोग के भाव हैं। वह किसी को नहीं छोड़ती जो गलत करता है। कजरी के हत्यारे वन अधिकारी को भी नहीं छोड़ा उसने। इस कहानी में कहानीकार ने आदिवासी क्षेत्रों की भाषा, रहन-सहन की शैली, शब्द, वाक्य, मुहावरे आदि का प्रयोग किया है। यहाँ वीभत्स और रोचक दृश्य चित्रित हुए हैं और पूरी कहानी में अबूझ तार्किकता के भाव भरे हुए हैं।

"कब आयेगा खत" पर्यटन, संस्मरण, अकस्मात बनते सम्बन्ध और खत के लिए लम्बी प्रतीक्षा की कहानी के साथ-साथ कश्मीर में पंडितों के पलायन के दौर की सच्चाई की मार्मिक कहानी है। कभी-कभी यात्रा के दौरान किसी के साथ आत्मीय सम्बन्ध बन जाते हैं और देर तक टिके रहते हैं। हमीदा के साथ ऐसा ही भाव-सम्बन्ध बनता है और सालों यह सम्बन्ध बना रहता है। कश्मीर की दहशतगर्दी में स्थिति बदलती है और हमीदा एवं उसके परिवार का कुछ पता नहीं चलता। यह कहानी अपने तरीके से कश्मीर समस्या पर, वहाँ के तत्कालीन जन-जीवन पर प्रकाश डालती है। लेखिका ने वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य, लोगों की दिनचर्या, खुशहाली आदि के साथ मनोरम दृश्यों का चित्रण किया है।"उड़ान" स्त्री के संघर्ष और विजेता बनने की सहज कहानी है। यह उस दौर की रचना है जब स्त्री शिक्षा बहुत कम थी, समाज स्त्री के पक्ष में जोर-शोर से खड़ा नहीं होता था। उसके सौन्दर्य , उसकी बुद्धिमता, उसकी योग्यता को महत्व नहीं दिया जाता था। शादी जैसे विषय में भी उसकी राय नहीं ली जाती थी। बेमेल, विधुर या ऐसे व्यक्ति से शादी कर दी जाती थी, जो पहले से ही किसी स्त्री के साथ सम्बन्धों में है। छुटकी साहस का परिचय देती है, संघर्ष का मार्ग अपनाती है, अपनी शिक्षा पूरी करती है, उच्च पद पर आसीन होती है और दूसरी स्त्रियों के सामने उदाहरण बनती है। लेखिका ने बड़ी बारीकी से संघर्ष प्रसंगों, घटनाओं, पात्रों के चरित्रों, मजबूरियों आदि का चित्रण किया है। कहानी में विस्तार है, भावुकता है, भाव-संवेदनाएँ हैं, साथ ही बिखराव भी है। एक कहानी के भीतर अनेक कहानियाँ हैं, अनेक प्रसंग है, कभी अधिक रोचक लगते हैं, कभी कम, जिससे प्रवाह प्रभावित होता है। कहानी सशक्त संदेश देने में सफल मानी जानी चाहिए।  

"राजनीति कौवा और कौव्वी की" किंचित हास्य-व्यंग्य के साथ घर-परिवार के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश और अंततः मुँह की खाने की कहानी है। कौवा पक्षियों में सबसे चालाक माना जाता है परन्तु कोयल उससे इस तरह सेवा ले लेती है कि अपने अंडे उसके घोसले में डाल देती है। इस समस्या का रूबी भूषण ने मानवीकरण करते हुए पारिवारिक उलझनों, झगड़ों और लाभ उठाने वाले चरित्रों का रोचक चित्रण किया है। कहानियों में उनकी भाषा और शैली समयानुकूल, परिस्थितिजन्य और कटाक्ष करती हुई दिखाई देती है। कौवे को आकर्षित करने के लिए कोयल के प्रयास का चित्रण रोमांस से भरा है। लेखिका ने खूब रस लेते हुए इसे चित्रित किया है। कौवा-कौव्वी के बीच का संवाद समझने योग्य है। "अनसुलझी व्यथा" अद्भुत मार्मिक कहानी है। यह कथा समाज में सौदामिनी जैसी लड़कियों द्वारा विवाह जैसी पवित्र संस्था को नष्ट करने की कोशिश के रूप में रेखांकित करती है। अक्सर पूरा घर ऐसी परिस्थितियों में शिकार होकर रह जाता है और उनके सारे प्रयास विफल होते हैं। कहानीकार ने  पात्रों के मनोविज्ञान को बखूबी चित्रित किया है, एक-एक दृश्य, सारे प्रसंग बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से उभर कर आए हैं। ऐसी लड़कियाँ किस हद तक जा सकती हैं, यह कहानी दिखाती है। अंततः शुभेन्दु की मृत्यु हो जाती है। खुशहाल परिवार और अच्छे लोगों का जीवन दुख, पीड़ा और बदनामी का शिकार होकर रह जाता है। हिन्दी के साथ अंग्रेजी और बंगला भाषा के लम्बे-लम्बे वाक्य रोचकता प्रदान करते हैं। लेखिका द्वारा स्त्री सौन्दर्य को व्यक्त करने, वर्णन करने का हुनर प्रभावशाली है। यह कहानी झकझोरने वाली है।

"कहा था न" कहानी समाज का वीभत्स, भयावह और विद्रूप चेहरा दिखाती है। स्त्रियाँ न घर में सुरक्षित हैं और न बाहर। उनकी ओर ललचाई निगाहों से देखने वाले हजारों हैं। कोई कामकाजी स्त्री कैसे स्वयं को बचाए और कैसे अपनी बच्चियों की रक्षा करे। उसे अनेक मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है, सावधान रहना पड़ता है और बार-बार खून के घूँट पीना पड़ता है। कहानीकार ने सड़क छाप वाली भाषा में बहुत जीवटता के साथ कुछ संवाद लिखा है। बिल्कुल उन शोहदों की यही भाषा है। दिन भर मोड़-चौराहों पर खड़ा होकर फब्तियाँ कसते रहते हैं। जया शिक्षिका है, बाहर निकलना ही पड़ता है। स्कूल का हेडमास्टर, मकान मालिक, रास्ते में खड़े शोहदे, हर किसी की आँख की भाषा समझती है जया। जैसे सबके जीवन में संघर्ष है, जया के साथ भी है। पति की नौकरी छूट गयी है। बेटी जूही को अकेले कहाँ छोड़े, गाँव में दादी के पास भेजती है। पति और बेटी लौट आए हैं। जूही अंततः शिकार हो ही जाती है। जया कहती है-कहा था न कि दरवाजा मत खोलना---कहा था न--। शेष सब खानापूर्ति है। रूबी भूषण ने सशक्त और यथार्थ चित्रण किया है। समाज के घिनौने चेहरे को उजागर करती यह कहानी विचलित करती है।  

'कशिश' कोई प्रयोगधर्मी, भावुक करने वाली मार्मिक कहानी है। बच्चे के मुँह से बोलचाल में भिन्न शब्दावली का प्रयोग ध्यान खींचता है। बब्लू के साथ वैदेही का संवाद रोचक है और करुणा से भर देता है। वह 'र' की जगह 'ल' बोलता है और प्रश्न पूछने या उत्तर देने में मुखर है। वैदेही चकित और भावुक होती है उसकी गम्भीर बात सुनकर, वह कहता है-"झूठ बोले हैं, हम तो छोटका आदमी हैं। आप तो बलका लोग हैं, हम छे काहे मिलने आवेगी। बोलिए-बोलिए।" वैदेही को यह 'बड़का आदमी' किसी गाली की तरह लगता है। वह बेचैन होती है उससे मिलने के लिए। अगली बार वह अपने घर की स्थिति सहित सब कुछ बताता है। वैदेही पूछती है-"बीमार थी क्या तुम्हारी बहन---" उसके उत्तर में कोई विचित्र भाव है, कहता है-"आप समझती नहीं हैं, बुलबक हैं क्या?" वैदेही कहती है-"हाँ, मैं बुलबक (बेवकूफ)ही हूँ।" उसे लगता है-एक अबोध बच्चे में कितनी समझदारी है। उसका यह कहना किसी को भी भावुक कर सकता है-"अरे वाह, तब आपका बचवा सब भलपेट तलह-तलह का खाना खाता होगा। ठेला पल बिके वाला चाऊमीनो खाता होगा।" कहानीकार के भीतर अद्भुत संवेदनाएँ भरी पड़ी हैं और उनकी कहानियाँ इसका प्रमाण हैं।

हमारे समाज के घृणित चेहरे और स्त्री के साथ अमानवीय व्यवहार की दिल दहला देने वाली कहानी है 'इंतजार'। यह कहानी समाज की हृदयहीनता सहित अनेक प्रश्न खड़ा करती है। गाँव की कहानी है फिर भी व्यवस्था में ऐसी बच्ची के लिए कोई जिम्मेदारी उठाने वाला नहीं है। उसके साथ जो घटित हुआ है, पुरुष समाज पर भी प्रश्न खड़ा करता है। स्त्रियों में कोई उसकी बच्ची का चेहरा लाला जी के साथ, कोई हलवाई के साथ, कोई टायर बनाने वाले बाबा के साथ कोई पंडित जी के भतीजे के साथ मिला रहा है। रिया की मां चीख पड़ती है-"पागल औरत पर मर्दानगी दिखाना कैसी कुंठित मानसिकता है, अपने ही समाज की बेटी को जो इसी गाँव में पली बढ़ी है, हमारे समाज पर कई सवालिया निशान खड़ा करती है। इस कहानी को रूबी भूषण ने बड़ी बारीकी से, सच्चाई के साथ बुना है और समाज के मनोविज्ञान को दिखाया है।

'लक्ष्मी' किन्नरों के त्रासदी, अपमान और सघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित कहानी है। रूबी भूषण द्वारा रचित यह कहानी किन्नरों के जीवन पर सटीक चित्रण है और बहुत सा गोपनीय रहस्य उजागर हुआ है। समाज के सामने उनका हँसता, आँख मटकाता, ताली बजाता, नाचता और हाव-भाव दिखाता रूप ही दिखाई देता है। लक्ष्मी किन्नर है और उसकी आत्मीयता मीता के साथ हो गई है। मीता को वह बहूरिया कहती है और धीरे-धीरे अपने जीवन की सारी बातें बताती है। वह कुछ प्रश्न उठाती है, माँ-बाप को धिक्कारती है और अपने समाज के साथ जीने की लाचारी बताती है। कहानी पढ़कर समाज में कोई संवेदनात्मक भाव उभरना चाहिए और उन्हें आदर-सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

समाज में व्याप्त अंधविश्वास और पाखण्ड पर "साया" कहानी चोट करती है। कल्लू की घटना के बाद पंडित जी ने महायज्ञ कराने का निर्देश दिया और मौलवी साहब ने अपनी कौम को झाड़ना, फूँकना, ताबीज देना शुरु कर दिया। कहानीकार ने प्रभावशाली तरीके से हर एक प्रसंग को बुना है, हिना-भानु को आधार बनाकर दृश्य चित्रित किया है और प्रेम प्रसंग को परवान चढ़ाया है। वह तो बड़ी हवेली में रहने वाली मामी ने हिम्मत दिखाई और साहस के कई कारनामे किए। मामी, उनकी ननद और उसके देवर ने हिना का पीछा किया। लट्ठ लगते ही वह लड़खड़ा गई, इन लोगों ने देखा, ये तो पंडित जी और मौलवी के लड़के हैं। उनकी खूब पिटाई हुई और सारा रहस्य खुला।

संग्रह की अंतिम कहानी "टेम्स नदी बहती रही" संवेदना से भरी मार्मिक रचना है। इसी के नाम पर संग्रह का नामकरण हुआ है। इस कथा की पृष्ठभूमि में विदेश की धरती है, पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति है और समलैंगिकता का संकेत है। वैचारिक मतभेद किसी भी परिवार को तोड़ देते हैं और उसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। लीजा दादी के पास रह जाती है और उसके माता-पिता लड़ते-झगड़ते अपनी स्वतंत्र दुनिया बसा लेते हैं। लीजा के मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है, वह अन्तर्मुखी होती है और पुरुषों के प्रति आकर्षण खो देती है। वह वायलिन बजाती है। स्वतंत्र विचार की बाँसुरी बजाने वाली जेन से उसकी दोस्ती होती है, आत्मीयता बढ़ती है और दोनों की जुगलबंदी से पाउण्ड अधिक मिलते हैं। दोनों में संवाद होता है, आकर्षण बढ़ता है, दोनों साथ-साथ रहने लगती हैं और एक शाम टेम्स नदी के किनारे उन दोनों ने निर्णय ले ही लिया कि दोनों साथ रहेंगी। कहानीकार लिखती है-"जेन ने आगे बढ़कर लीजा को अपनी बाँहों में ले लिया और उसके होंठों पर एक लम्बा सा चुम्बन जड़ दिया और अपने रिश्ते पर मोहर लगा दी।" इस कहानी में घरेलू झगड़े का प्रभाव पड़ता है, जीवन का मनोविज्ञान दिखाई देता है और दोनों बच्चियाँ अपने-अपने तरह से पुरुष को पसंद नहीं करती। इस कहानी के गहरे संदेश हैं।

इन कहानियों का अपना अलग आलोक है और भिन्न चिन्तन-मनन है। कहानीकार को गाँव-शहर और हर तरह के पात्रों की समझ है। ऐसी भाषा विरले ही कोई इतना खुलकर लिखता है और सटीक मुहावरे प्रभावशाली हैं। कहानियों में थोड़ा और कसाव के लिए थोड़ी और मेहनत की आवश्यकता है। कहानीकार में संभावनाएँ हैं, उनमें जोश है, स्थितियों की पकड़ है, संवेदना है, हास्य और रूमानी भाव है। उन्होंने अपने आसपास को, आसपास के जीवन को, पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों को खूब गहराई से अनुभव किया है। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, भोजपुरी और आदिवासी बोली प्रभावित करने वाली है। सबसे बड़ी बात है, उनकी हर कहानी अलग-अलग विषयों को उठाती है या केन्द्रित होती है।

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